भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 374, कुल 832 में से

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पृष्ठ 374

३४८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * कितने ही बड़े क्यों न हों, उस पूर्णानन्दस्वरूप परमात्माके आनन्दकी तुलनामें बहुत ही तुच्छ हैं। बृहदारण्यकमें कहा भी है कि 'समस्त प्राणी इसी परमात्मसम्बन्धी आनन्दके किसी एक अंशको लेकर ही जीते हैं (४।३।३२)।' स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः । स य एवंविदस्माल्लोकात्प्रेत्य । एतमन्नमयमात्मान- मुपसंक्रामति । एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रामति । एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रामति । एतं विज्ञान- मयमात्मानमुपसंक्रामति । एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति । तदप्येष श्लोको भवति । सः=वह (परमात्मा), यः=जो, अयम्=यह, पुरुषे=मनुष्यमें; च=और, यः=जो; असौ=वह, आदित्ये च= सूर्यमें भी है; सः=वह (सबका अन्तर्यामी), एकः=एक ही है, यः=जो, एवंवित्=इस प्रकार जाननेवाला है; सः= वह, अस्मात् लोकात्=इस लोकसे, प्रेत्य=विदा होकर, एतम् = इस, अन्नमयम्=अन्नमय, आत्मानम्=आत्माको; उपसंक्रामति=प्राप्त हो जाता है, एतम् = इस, प्राणमयम् = प्राणमय, आत्मानम्=आत्माको, उपसंक्रामति=प्राप्त होता है, एतम् = इस, मनोमयम् = मनोमय, आत्मानम्=आत्माको, उपसक्रामति=प्राप्त होता है, एतम्=इस; विज्ञानमयम् = विज्ञानमय, आत्मानम् = आत्माको, उपसंक्रामति=प्राप्त होता है, एतम् = इस, आनन्दमयम् = आनन्दमय; आत्मानम् = आत्माको, उपसंक्रामति=प्राप्त होता है, तत्=उसके विषयमें; अपि=भी, एषः=यह (आगे कहा गया); श्लोकः = श्लोक; भवति = है । व्याख्या-ऊपर बताये हुए समस्त आनन्दोंके एकमात्र केन्द्र परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही सबके अन्तर्यामी हैं। जो परमात्मा मनुष्योंमें हैं, वे ही सूर्यमें भी हैं। वे सबके अन्तर्यामी एक ही हैं। जो इस प्रकार जान लेता है, वह मरनेपर इस मनुष्य-शरीरको छोड़कर उस पहले बताये हुए अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है। तात्पर्य यह कि इन पाँचोंके जो आत्मा हैं, ये पाँचों जिनके स्वरूप हैं, उन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। पहले इन पाँचोंका वर्णन करते समय सबका शरीरान्तर्वर्ती आत्मा अन्तर्यामी परमात्माको ही बतलाया था। फलरूपमें उन्हींकी प्राप्ति होती है और वे ही ब्रह्म हैं- यह बतानेके लिये ही यहाँ पाँचोंको क्रमसे प्राप्त होनेकी बात कही गयी है। वास्तवमें इस क्रमसे प्राप्त होनेकी बात यहाँ नहीं कही गयी है; क्योंकि अन्नमय मनुष्य-शरीरको तो वह पहलेसे प्राप्त था ही, उसे छोड़कर जानेके बाद प्राप्त होनेवाला फल परमात्मा है, शरीर नहीं। अतः यहाँ अन्नमय आदिके अन्तर्यामी परमात्माकी ही प्राप्ति बतायी गयी है। इसलिये इन सबमें परिपूर्ण, सर्वरूप, सबके आत्मा, परम आनन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त हो जाना ही इस फलश्रुतिका तात्पर्य है। इसके विषयमें आगे नवम अनुवाकमें कहा जानेवाला यह श्लोक भी है। ॥ अष्टम अनुवाक समाप्त ॥८॥ नवम अनुवाक सम्बन्ध-आठवें अनुवाकमें जिस श्लोक (मन्त्र) को लक्ष्य कराया गया है, उसका उल्लेख किया जाता है- यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चनेति । मनसा सह=मनके सहित; वाचः=वाणी आदि समस्त इन्द्रियाँ, यतः=जहाँसे, अप्राप्य=उसे न पाकर, निवर्तन्ते= लौट आती हैं, [तस्य] ब्रह्मणः = उस ब्रह्मके, आनन्दम् = आनन्दको, विद्वान् = जाननेवाला (महापुरुष); कुतश्चन= किसीसे भी, न बिभेति = भय नहीं करता, इति=इस प्रकार यह श्लोक है । व्याख्या-इस मन्त्रमें परब्रह्म परमात्माके परमानन्दस्वरूपको जाननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि मनके सहित सभी इन्द्रियाँ जहाँसे उसे न पाकर लौट आती हैं- जिस ब्रह्मानन्दको जाननेकी इन मन और इन्द्रियोंकी शक्ति नहीं है, परब्रह्म परमात्माके उस आनन्दको जाननेवाला ज्ञानी महापुरुष कभी किसीसे भी भय नहीं करता, वह सर्वथा निर्भय हो जाता है। इस प्रकार इस श्लोकका तात्पर्य है ।

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