भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 373, कुल 832 में से

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पृष्ठ 373
  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३४७ व्याख्या-इस वर्णनमें पहले बताये हुए स्वभावसिद्ध देवोंके आनन्दकी अपेक्षा इन्द्रके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि देवताओंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना इन्द्रभावको प्राप्त देवताका एक आनन्द है। जो इन्द्रके भोगानन्दकी कामनासे आहत नहीं हुआ है, अर्थात् जिसको इन्द्रके सुखकी भी आकाङ्क्षा नहीं है-जो उसे भी तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो गया है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले निष्काम पुरुषको तो वह आनन्द स्वतः प्राप्त है। ते ये शतमिन्र्दस्यानन्दाः । स एको बृहस्पतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते=वे; ये=जो; इन्द्रस्य=इन्द्रके, शतम्=एक सौ; आनन्दाः = आनन्द हैं, सः=वह, बृहस्पतेः=बृहस्पतिका, एकः = एक, आनन्दः = आनन्द है; च= और; ( वह ) अकामहतस्य = बृहस्पतितकके भोगोंमें निःस्पृह; श्रोत्रियस्य = वेद- वेत्ताको स्वतःप्राप्त है। व्याख्या-इस वर्णनमें इन्द्रके आनन्दकी अपेक्षा बृहस्पतिके आनन्दको सौगुना बताया गया है । भाव यह है कि इन्द्रके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना बृहस्पतिके पदको प्राप्त हुए देवताका एक आनन्द है। परंतु जो मनुष्य बृहस्पतिके भोगानन्दकी कामनासे भी आहत नहीं है, उस भोगानन्दको भी अनित्य होनेके कारण जो तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो चुका है, उस वेदके रहस्यको जाननेवाले निष्काम मनुष्यको वह आनन्द स्वतःप्राप्त है। ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः । स एकः प्रजापतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते=वे; ये=जो; बृहस्पतेः = बृहस्पतिके, शतम् = एक सौ; आनन्दाः = आनन्द हैं, सः=वह; प्रजापतेः= प्रजापतिका; एकः = एक, आनन्दः = आनन्द है; च = और; ( वह ) अकामहतस्य प्रजापतितकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य = वेदवेत्ता पुरुषको स्वतः प्राप्त है। -इस वर्णनमें बृहस्पतिके आनन्दकी अपेक्षा प्रजापतिके आनन्दको सौगुना बताया गया है । भाव यह है कि बृहस्पतिके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना प्रजापतिके पदपर आरूढ देवताका एक आनन्द है। परंतु जो मनुष्य इस प्रजापतिके भोगानन्दकी कामनासे भी आहत नहीं है, अर्थात् उससे भी जो विरक्त हो चुका है, उस वेदके रहस्यको जाननेवाले निष्काम मनुष्यको तो वह आनन्द स्वभावसे ही प्राप्त है। ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः। स एको आनन्दः । श्रोत्रियस्य चाकांमहतस्य । ते=वे; ये=जो; प्रजापतेः=प्रजापतिके; शतम् = एक सौ; आनन्दाः = आनन्द हैं, सः=वह, ब्रह्मणः =ब्रह्माका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है, च=और; (वह ) अकामहतस्य = ब्रह्मलोकतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य = श्रोत्रिय ( वेदज्ञ ) को स्वभावतः प्राप्त है। व्याख्या-इस वर्णनमें प्रजापतिके आनन्दसे भी हिरण्यगर्भ ब्रह्माके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि प्रजापतिके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो एक आनन्दकी राशि होती है, उतना सृष्टिके आरम्भमें सबसे पहले उत्पन्न होनेवाले हिरण्यगर्भ ब्रह्माका एक आनन्द है। तथा जो मनुष्य उस ब्रह्मा- के पदसे प्राप्त भोग-सुखकी कामनासे भी आहत नहीं है, अर्थात् जो उसे भी अनित्य और तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो गया है, जिसको एकमात्र परमानन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त करनेकी ही उत्कट अभिलाषा है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्त पुरुषको वह आनन्द स्वतःप्राप्त है। इस प्रकार यहाँ एकसे दूसरे आनन्दकी अधिकताका वर्णन करते-करते सबसे बढकर हिरण्यगर्भके आनन्दको बताकर यह भाव दिखाया गया है कि इस जगत्में जितने प्रकारके जो-जो आनन्द देखने, सुनने तथा समझनेमें आ सकते हैं, वे चाहे