कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 372, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें३४६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ते = वे (पूर्वोक्त); ये = जो; चिरलोकलोकानाम् = चिरस्थायी पितृलोकको प्राप्त हुए; पितृणाम् = पितरोंके; शतम् = एक सौ, आनन्दाः = आनन्द हैं; सः = वह; आजानजानाम् = आजानज नामक; देवानाम् = देवताओंका; एकः = एक; आनन्दः = आनन्द है; च = और; (वह आनन्द) अकामहतस्य = उस लोकतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य = श्रोत्रिय (वेदज्ञ) को स्वभावतः प्राप्त है। व्याख्या-इस वर्णनमें चिरस्थायी लोकोंमें रहनेवाले दिव्य पितरोंके आनन्दकी अपेक्षा 'आजानज' नामक देवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि चिरस्थायी लोकोंमें रहनेवाले दिव्य पितरोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंकी मात्राको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना 'आजानज' नामक देवताओंका एक आनन्द है। देवलोकके एक विशेष स्थानका नाम 'आजान' है; जो लोग स्मृतियोंमें प्रतिपादित किन्हीं पुण्यकर्मोंके कारण वहाँ उत्पन्न हुए हैं, उन्हें 'आजानज' कहते हैं। जो उस लोकतकके भोगोंकी कामनासे आहत नहीं है, अर्थात् जो उस आनन्दको भी तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो गया है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्त पुरुषके लिये तो वह आनन्द स्वभावसिद्ध है। ते ये शतमाजानजानां देवानामानन्दाः । स एकः कर्मदेवानां देवानामानन्दः । ये कर्मणा देवानपियन्ति । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते = वे (पूर्वोक्त); ये = जो; आजानजानाम् = आजानज नामक; देवानाम् = देवोंके; शतम् = एक सौ; आनन्दाः = आनन्द हैं; सः = वह, कर्मदेवानाम् देवानाम् = (उन) कर्मदेव नामक देवताओंका, एकः = एक; आनन्दः = आनन्द है; ये = जो; कर्मणा = वेदोक्त कर्मोंसे; देवान् = देवभावको; अपियन्ति = प्राप्त हुए हैं; च = और; (वह) अकामहतस्य = उस लोकतकके भोगोंमें कामनारहित, श्रोत्रियस्य = श्रोत्रिय (वेदज्ञ) को तो स्वतः प्राप्त है। व्याख्या-इस वर्णनमें आजानज देवोंके आनन्दकी अपेक्षा कर्मदेवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि आजानज देवोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना आनन्द जो वेदोक्त कर्मोंद्वारा मनुष्यसे देवभावको प्राप्त हुए हैं, उन कर्मदेवताओंका आनन्द है। जो उन कर्मदेवताओंतकके आनन्दकी कामनासे आहत नहीं है अर्थात् जिसको देवलोकतकके भोगोंकी इच्छा नहीं रही है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्त पुरुषके लिये तो वह आनन्द स्वभावसिद्ध है। ते ये शतं कर्मदेवानां देवानामानन्दाः । स एको देवानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते = वे (पूर्वोक्त), ये = जो; कर्मदेवानाम् देवानाम् = कर्मदेव नामक देवताओंके, शतम् = एक सौ; आनन्दाः = आनन्द हैं, सः = वह, देवानाम् = देवताओंका; एकः = एक; आनन्दः = आनन्द है, च = और; (वह) अकामहतस्य = उस लोकतकके भोगोंमें कामनारहित, श्रोत्रियस्य = श्रोत्रिय (वेदज्ञ) को तो स्वभावतः प्राप्त है। व्याख्या-इस वर्णनमें कर्मदेवोंकी अपेक्षा सृष्टिके आदिकालमे जिन स्थायी देवोंकी उत्पत्ति हुई है, उन स्वभावसिद्ध देवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि कर्मदेवोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना उन स्वभावसिद्ध देवताओंका एक आनन्द है। जो उन स्वभावसिद्ध देवताओंके भोगानन्दकी कामनासे आहत नहीं है, अर्थात् उसकी भी जिसको कामना नहीं है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले निष्काम विरक्तके लिये तो वह आनन्द स्वभावसिद्ध ही है। ते ये शतं देवानामानन्दाः । स एक इन्द्रस्यानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते = वे; ये = जो, देवानाम् = देवताओंके, शतम् = एक सौ, आनन्दाः = आनन्द हैं; सः = वह; इन्द्रस्य = इन्द्रका; एकः = एक; आनन्दः = आनन्द है, च = और; (वह) अकामहतस्य = इन्द्रतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य = वेदवेत्ताको स्वतः प्राप्त है।