कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 371, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 371
- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३४५ मामूली युवक नहीं—सदाचारी, अच्छे स्वभाववाला, अच्छे कुलमे उत्पन्न श्रेष्ठ पुरुष हो, उसे सम्पूर्ण वेदोंकी शिक्षा मिली हो तथा शासनमे—ब्रह्मचारियोंको सदाचारकी शिक्षा देनेमें अत्यन्त कुशल हो, उसके सम्पूर्ण अङ्ग और इन्द्रियाँ रोगरहित, समर्थ और सुदृढ हों और वह सब प्रकारके बलसे सम्पन्न हो। फिर धन-सम्पत्तिसे भरी यह सम्पूर्ण पृथ्वी उसके अधिकार- में आ जाय, तो यह मनुष्यका एक बड़े-से-बड़ा सुख है। वह मानव-लोकका एक सबसे महान् आनन्द है। ते ये शतं मानुषा आनन्दाः। स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। ते=वे, ये=जो; मानुषाः=मनुष्यलोक-सम्बन्धी, शतम्=एक सौ, आनन्दाः=आनन्द हैं, सः=वह, मनुष्य- गन्धर्वाणाम्=मानव-गन्धर्वोका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द होता है, अकामहतस्य=जिसका अन्तःकरण भोगोंकी कामनाओंसे दूषित नहीं हुआ है, ऐसे; श्रोत्रियस्य=वेदवेत्ता पुरुषका; च=भी (वह स्वाभाविक आनन्द है) । व्याख्या-जो मनुष्य-योनिमें उत्तम कर्म करके गन्धर्वभावको प्राप्त हुए हैं, उनको 'मनुष्य-गन्धर्व' कहते हैं। यहाँ इनके आनन्दको उपर्युक्त मनुष्यके आनन्दसे सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि जिस मनुष्य-सम्बन्धी आनन्दका पहले वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर आनन्दकी जो एक राशि होती है, उतना मनुष्य-गन्धवोंका एक आनन्द है। परंतु जो पहले बताये हुए मनुष्यलोकके भोगोंकी और इस गन्धर्वलोकके भोगोतककी कामनासे दूषित नहीं है, इन सबसे सर्वथा विरक्त है, उस श्रोत्रिय—वेदज्ञ पुरुषको तो वह आनन्द स्वभावसे ही प्राप्त है। ते ये शतं मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दाः । स एको देवगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते=वे (पूर्वोक्त), ये=जो, मनुष्यगन्धर्वाणाम्=मनुष्य-गन्धवोंके, शतम्=एक सौ, आनन्दाः=आनन्द हैं, सः=वह, देवगन्धर्वाणाम्=देवजातीय गन्धर्वांका, एकः=एक, आनन्दः=आनन्द है, च=तथा, (वही) अकामहतस्य= कामनाओंसे अदूषित चित्तवाले, श्रोत्रियस्य=श्रोत्रिय (वेदज्ञ) को भी स्वभावतः प्राप्त है। व्याख्या-इस वर्णनमें पहले बताये हुए मनुष्य-गन्धवोंकी अपेक्षा देव-गन्धवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि जिस मनुष्य-गन्धर्वके आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्द- की राशि होती है, उतना सृष्टिके आरम्भसे देवजातीय गन्धर्वरूपमें उत्पन्न हुए जीवोंका एक आनन्द है। तथा जो मनुष्य इस आनन्दकी कामनासे आहत नहीं हुआ है, अर्थात् जिसको इसकी आवश्यकता नहीं है, तथा जो वेदके उपदेशको हृदयङ्गम कर चुका है, ऐसे विद्वान्को वह आनन्द स्वभावतः प्राप्त है। ते ये शतं देवगन्धर्वाणामानन्दाः । स एकः पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते=वे (पूर्वोक्त), ये=जो, देवगन्धर्वाणाम्=देवजातीय गन्धर्वोके; शतम्=एक सौ, आनन्दाः=आनन्द हैं, सः=वह; चिरलोकलोकानाम्=चिरस्थायी पितृलोकको प्राप्त हुए; पितॄणाम्=पितरोका, एकः=एक; आनन्दः= आनन्द है, च=और; (वह) अकामहतस्य=भोगोंके प्रति निष्काम, श्रोत्रियस्य=वेदज्ञ पुरुषको स्वतः प्राप्त है। व्याख्या-इस वर्णनमें देवगन्धर्वोके आनन्दकी अपेक्षा चिरस्थायी पितृलोकको प्राप्त दिव्य पितरोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि देव-गन्धवोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करने- पर आनन्दकी जो एक राशि होती है, उतना चिरस्थायी पितृलोकमे रहनेवाले दिव्य पितरोंका एक आनन्द है। तथा जो उस लोकके भोग-सुखकी कामनासे आहत नहीं है अर्थात् जिसको उसकी आवश्यकता ही नहीं रही है, उस श्रोत्रियको— वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्तको वह आनन्द स्वतः ही प्राप्त है। ते ये शतं पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दाः । स एक आजानजानां देवानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । उ० सं० ४४-