कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 370, कुल 832 में से
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३४४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * लिये भय है, अर्थात् उसका पुनर्जन्म होना सम्भव है; क्योंकि जिस समय उसकी परमात्मामें स्थिति नहीं है, वह भगवान्को भूला हुआ है, उसी समय यदि उसकी मृत्यु हो गयी तो फिर उसका अन्तिम संस्कारके अनुसार जन्म होना निश्चित है। क्योंकि भगवान्ने गीतामें कहा है—'जिस-जिस भावको स्मरण करता हुआ मनुष्य अन्तकालमे शरीर छोड़ता है, उसीके अनुसार उसे जन्म ग्रहण करना पड़ता है (८।६)।' और मृत्यु प्रारब्धके अनुसार किसी क्षण भी आ सकती है। इसीलिये योगभ्रष्टका पुनर्जन्म होनेकी बात गीतामें कही गयी है (६। ४०-४२)। जबतक परमात्मामे पूर्ण स्थिति नहीं हो जाती अथवा जबतक भगवान्का निरन्तर स्मरण नहीं होता, तबतक यह पुनर्जन्मका भय—जन्म-मृत्युका भय सभीके लिये बना हुआ है—चाहे कोई बड़े-से-बड़ा शास्त्रज्ञ विद्वान् क्यों न हो, चाहे कोई अपनेको बड़े-से-बड़ा ज्ञानी अथवा पण्डित क्यों न माने। वे परमेश्वर सबपर शासन करनेवाले हैं, उन्हींकी शासन-शक्तिसे जगत्की सारी व्यवस्था नियमितरूपसे चल रही है। इसी विषयपर यह आगे अष्टम अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है। ॥ सप्तम अनुवाक समाप्त ॥ ७ ॥ अष्टम अनुवाक सम्बन्ध-पिछले अनुवाकमें जिस श्लोकका लक्ष्य कराया गया था, उसका उल्लेख करते हैं— भीषास्माद्वातः पवते। भीषोदेति सूर्यः। भीषास्मादग्निश्चेन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पञ्चम इति। अस्मात् भीषा = इसीके भयसे, वातः = पवन; पवते = चलता है, भीषा = ( इसीके ) भयसे, सूर्यः = सूर्य; उदेति = उदय होता है, अस्मात् भीषा = इसीके भयसे, अग्निः = अग्नि; च = और, इन्द्रः = इन्द्र, च = और; पञ्चमः = पाँचवाँ; मृत्युः = मृत्यु, धावति = ( ये सब ) अपना-अपना कार्य करनेमें प्रवृत्त हो रहे हैं, इति = इस प्रकार यह श्लोक है। व्याख्या-इन परब्रह्म परमेश्वरके भयसे ही पवन नियमानुसार चलता है, इन्हींके भयसे सूर्य ठीक समयपर उदय होता है और ठीक समयपर अस्त होता है तथा इन्हींके भयसे अग्नि, इन्द्र और पाँचवाँ मृत्यु—ये सब अपना-अपना कार्य नियम- पूर्वक सुव्यवस्थितरूपसे कर रहे हैं। यदि इन सबकी सुव्यवस्था करनेवाला इन सबका प्रेरक कोई न हो तो जगत्के सारे काम कैसे चलें। इससे सिद्ध होता है कि इन सबको बनानेवाला, सबको यथायोग्य नियममे रखनेवाला कोई एक सत्य, ज्ञान और आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्मा अवश्य हैं और वे मनुष्यको अवश्य मिल सकते हैं*। सम्बन्ध-उन आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्माका वह आनन्द कितना और कैसा है, इस जिज्ञासापर आनन्दविषयक विचार आरम्भ किया जाता है— सैषाऽऽनन्दस्य मीमाᳵसा भवति। युवा स्यात्साधुयुवाध्यायक आशिष्ठो द्रढिष्ठो बलिष्ठस्तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात्। स एको मानुष आनन्दः। सा = वह, एषा = यह, आनन्दस्य = आनन्दसम्बन्धी, मीमांसा = विचार, भवति = आरम्भ होता है; युवा = कोई युवक, स्यात् = हो, ( वह भी ऐसा-वैसा नहीं, ) साधुयुवा = श्रेष्ठ आचरणोंवाला युवक हो; ( तथा ) अध्यापकः = वेदोंका अध्ययन कर चुका हो; आशिष्ठः = शासनमें अत्यन्त कुशल हो, द्रढिष्ठः = उसके सम्पूर्ण अङ्ग और इन्द्रियाँ सर्वथा दृढ हों; ( तथा ) बलिष्ठः = वह सब प्रकारसे बलवान् हो; तस्य = ( फिर ) उसे, इयम् = यह; वित्तस्य पूर्णा = धनसे परिपूर्ण; सर्वा = सब-की-सब, पृथिवी = पृथ्वी, स्यात् = प्राप्त हो जाय, ( तो ) सः = वह, मानुषः = मनुष्यलोकका; एकः = एक, आनन्दः = आनन्द है। व्याख्या-इस वर्णनमे उस आनन्दका विचार आरम्भ करनेकी सूचना देकर सर्वप्रथम मनुष्य-लोकके भोगोंसे मिल सकनेवाले बड़े-से-बड़े आनन्दकी कल्पना की गयी है। भाव यह है कि एक मनुष्य युवा हो, वह भी ऐसा-वैसा
- इसी भावकी श्रुति कठोपनिषद्में भी आयी है (२। ३। ३)।