कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 369, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 369
- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३४३ यद्वै तत्सुकृतं रसो वै सः। रस२ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति। को ह्येवान्यात्कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्। एष ह्येवानन्दयाति। वै=निश्चय ही; यत्=जो; तत्=वह; सुकृतम्=सुकृत है; सः वै=वही; रसः=रस है; हि=क्योंकि; अयम्=यह (जीवात्मा); रसम्=इस रसको; लब्ध्वा=प्राप्त करके; एव=ही; आनन्दी=आनन्दयुक्त; भवति=होता है; यत्=यदि; एषः=यह; आनन्दः=आनन्दस्वरूप; आकाशः=आकाशकी भाँति व्यापक परमात्मा; न स्यात्=न होता; हि=तो; कः एव= कौन; अन्यात्=जीवित रह सकता; (और) कः=कौन; प्राण्यात्=प्राणोंकी क्रिया (चेष्टा) कर सकता; हि=निःसंदेह; एषः=यह परमात्मा; एव=ही; आनन्दयाति=सबको आनन्द प्रदान करता है। व्याख्या—ये जो ऊपरके वर्णनमे 'सुकृत' नामसे कहे गये हैं, वे परब्रह्म परमात्मा सचमुच रसस्वरूप (आनन्दमय) हैं; ये ही वास्तविक आनन्द हैं; क्योंकि अनादिकालसे जन्म-मृत्युरूप घोर दुःखका अनुभव करनेवाला यह जीवात्मा इन रसमय परब्रह्मको पाकर ही आनन्दयुक्त होता है। जबतक इन परम प्राप्य आनन्दस्वरूप परमेश्वरसे इसका संयोग नहीं हो जाता; तबतक इसे किसी भी स्थितिमें पूर्णानन्द; नित्यानन्द; अखण्डानन्द नहीं मिल सकता। इसीसे उन वास्तविक आनन्दस्वरूप परमात्माका अस्तित्व निःसंदेह सिद्ध होता है; क्योंकि यदि ये आकाशकी भाँति व्यापक आनन्द- स्वरूप परमात्मा नहीं होते तो कौन जीवित रह सकता और कौन प्राणोंकी क्रिया—हिलना-डुलना आदि कर सकता। अर्थात् समस्त प्राणी सुखस्वरूप परमात्माके ही सहारे जीते और हलन-चलन आदि चेष्टा करते हैं। इतना ही नहीं, सबके जीवन- निर्वाहकी सब प्रकारसे सुव्यवस्था करनेवाले भी वे ही हैं; अन्यथा इस जगत्की समस्त भौतिक क्रिया, जो नियमित और व्यवस्थितरूपसे चल रही है, कैसे हो सकती। अतः मनुष्यको यह दृढ़तापूर्वक विश्वास करना चाहिये कि इस जगत्के कर्त्ता- हर्त्ता परब्रह्म परमेश्वर अवश्य हैं तथा निःसंदेह ये परमात्मा ही सबको आनन्द प्रदान करते हैं। जब आनन्दस्वरूप एकमात्र परमात्मा ही हैं, तब दूसरा कौन आनन्द दे सकता है। यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते। अथ सोऽभयं गतो भवति। हि=क्योंकि; यदा एव=जब कभी; एषः=यह जीवात्मा; एतस्मिन्=इस; अदृश्ये=देखनेमें न आनेवाले; अनात्म्ये= शरीररहित; अनिरुक्ते=बतलानेमें न आनेवाले; (और) अनिलयने=दूसरेका आश्रय न लेनेवाले परब्रह्म परमात्मामें; अभयम्=निर्भयतापूर्वक; प्रतिष्ठाम्=स्थिति; विन्दते=लाभ करता है; अथ=तब; सः=वह; अभयम्=निर्भयपदको; गतः=प्राप्त; भवति=हो जाता है। व्याख्या—क्योंकि उन परब्रह्म परमेश्वरको पानेकी अभिलाषा रखनेवाला यह जीव जब कभी देखनेमें न आनेवाले, बतलानेमें न आनेवाले और किसीके आश्रित न रहनेवाले शरीर-रहित परब्रह्म परमात्मामें निर्भय (अविचल) स्थिति लाभ करता है, उस समय वह निर्भयपदको प्राप्त हो जाता है—सदाके लिये भय एव शोकसे रहित हो जाता है। यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते। अथ तस्य भयं भवति। तत्त्वेव भयं विदुषो मन्वानस्य। तदप्येष श्लोको भवति। हि=क्योंकि; यदा एव=जवतक; एषः=यह; उदरम्=थोड़ा-सा; वै=भी; एतस्मिन् अन्तरम्=इस परमात्मासे वियोग; कुरुते=किये रहता है; अथ=तबतक; तस्य=उसको; भयम्=जन्म-मृत्युरूप भय; भवति=प्राप्त होता है; तु=तथा; तत् एव=वही; भयम्=भय; (केवल मूर्खको ही नहीं होता; किंतु) =अभिमानी; विदुषः=शास्त्रज्ञ विद्वान्को भी अवश्य होता है; तत्=उसके विषयमें; अपि=भी; एषः=यह (आगे कहा हुआ); श्लोकः=श्लोक; भवति=है। व्याख्या—क्योंकि जबतक यह जीवात्मा उन परब्रह्म परमात्मासे थोड़ा-सा भी अन्तर किये रहता है—उनमें पूर्ण स्थिति लाभ नहीं कर लेता या उनका निरन्तर स्मरण नहीं करता—उन्हें थोड़ी देरके लिये भी भूल जाता है; तबतक उसके