कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 368, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें३४२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अनिलयनम् = आश्रय न देनेवाले, च = तथा, विज्ञानम् = चेतनायुक्त, च = और; अविज्ञानम् = जड पदार्थ, च = तथा; सत्यम् = सत्य; च = और; अनृतम् = झूठ ( इन सबके रूपमें ), च = भी; सत्यम् = वह सत्यस्वरूप परमात्मा ही; अभवत् = हो गया, यत् = जो; किम् = कुछ, च = भी, इदम् = यह दिखायी देता है और अनुभवमें आता है; तत् = वह; सत्यम् = सत्य ही है; इति = इस प्रकार, आचक्षते = ज्ञानीजन कहते हैं, तत् = उस विषयमें, अपि = भी, एषः = यह, श्लोकः = श्लोक, भवति = है । व्याख्या—सर्गके आदिमें परब्रह्म परमात्माने यह विचार किया कि मैं नानारूपमें उत्पन्न होकर बहुत हो जाऊँ । यह विचार करके उन्होंने तप किया अर्थात् जीवोंके कर्मानुसार सृष्टि उत्पन्न करनेके लिये सङ्कल्प किया । सङ्कल्प करके यह जो कुछ भी देखने, सुनने और समझनेमें आता है, उस जड-चेतनमय समस्त जगत्की रचना की, अर्थात् इसका सङ्कल्पमय स्वरूप बना लिया । उसके बाद स्वयं भी उसमें 'प्रविष्ट हो गये। यद्यपि अपनेसे ही उत्पन्न इस जगत्मे वे परमेश्वर पहलेसे ही प्रविष्ट थे, —यह जगत् जब उन्हींका स्वरूप है, तब उसमें उनका प्रविष्ट होना नहीं बनता, —तथापि जड-चेतनमय जगत्में आत्मरूपसे परिपूर्ण हुए उन परब्रह्म परमेश्वरके विशेष स्वरूप—उनके अन्तर्यामी स्वरूपका लक्ष्य करानेके लिये यहाँ यह बात कही गयी है कि 'इस जगत्की रचना करके वे स्वयं भी उसमें प्रविष्ट हो गये।' प्रविष्ट होनेके बाद वे मूर्त और अमूर्तरूपसे अर्थात् देखनेमें आनेवाले पृथ्वी, जल और तेज—इन भूतोंके रूपमें तथा वायु और आकाश—इन न दिखायी देनेवाले भूतोंके रूपमें प्रकट हो गये । फिर जिनका वर्णन किया जा सकता है और नहीं किया जा सकता, ऐसे विभिन्न नाना पदार्थोंके रूपोंमें हो गये । इसी प्रकार आश्रय देनेवाले और आश्रय न देनेवाले, चेतन और जड—इन सबके रूपमें वे एकमात्र परमेश्वर ही बहुत-से नाम और रूप धारण करके व्यक्त हो गये । वे एक सत्यस्वरूप परमात्मा ही सत्य और झूठ—इन सबके रूपमें हो गये । इसीलिये ज्ञानीजन कहते हैं कि 'यह जो कुछ देखने, सुनने और समझनेमें आता है, वह सब-का सब सत्यस्वरूप परमात्मा ही है।' इस विषयमें भी यह आगे सप्तम अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है । ॥ षष्ठ अनुवाक समाप्त ॥ ६ ॥ स अनुवाक असद्वा इदमग्र आसीत् । ततो वै सदजायत । तदात्मानग्ँस्वयमकुरुत । तस्मात्तत्सुकृतमुच्यत इति । अग्रे = प्रकट होनेसे पहले, इदम् = यह जड-चेतनात्मक जगत्; असत् = अव्यक्तरूपमें, वै = ही, आसीत् = था; ततः = उससे, वै = ही, सत् = सत् अर्थात् नामरूपमय प्रत्यक्ष जगत्, अजायत = उत्पन्न हुआ है, तत् = उसने, आत्मानम् = अपनेको, स्वयम् = स्वय, अकुरुत = ( इस रूपमे ) प्रकट किया है, तस्मात् = इसीलिये, तत् = वह; सुकृतम् = 'सुकृत'; उच्यते = कहा जाता है, इति = इस प्रकार यह श्लोक है । व्याख्या—सूक्ष्म और स्थूलरूपमे प्रकट होनेसे पहले यह जड-चेतनमय सम्पूर्ण जगत् असत्—अर्थात् अव्यक्तरूपमें ही था, उस अव्यक्तावस्थासे ही यह सत् अर्थात् नाम-रूपमय प्रत्यक्ष जड-चेतनात्मक जगत् उत्पन्न हुआ है । परमात्माने अपने- को स्वय ही इस जड-चेतनात्मक जगत्के रूपमें बनाया है, इसीलिये उनका नाम 'सुकृत' (अपने-आप बने हुए ) है । *
- गीतामें कई प्रकारसे इस जड-चेतनात्मक जगत्का अव्यक्तसे उत्पन्न होना और उसीमें लय होना बताया गया है ( गीता ८ । १८, ९ । ७, २ । २८ ) । परंतु भगवान् जब स्वय अवतार लेकर लीला करनेके लिये जगत्में प्रकट होते हैं, तब उनका वह प्रकट होना अन्य जीवोंकी भाँति अव्यक्तसे व्यक्त होने अर्थात् कारणसे कार्यरूपमें परिवर्तित होनेके समान नहीं है, वह तो अलौकिक है । इसलिये वहाँ भगवान्ने कहा है कि जो मुझे अव्यक्तसे व्यक्त हुआ मानते हैं, वे बुद्धिहीन हैं ( ७ । २४ ), वहाँ जडतत्त्वों और उनके नियमोंका प्रवेश नहीं है । भगवान्के नाम, रूप, लीला, धाम—सब कुछ अप्राकृत हैं, चिन्मय हैं । उनके जन्म-कर्म दिव्य हैं । भगवान्के प्राकट्यका रहस्य बड़े-बड़े देवता और महर्षिलोग भी नहीं जानते ( गीता १० । २) ।