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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

३४२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अनिलयनम् = आश्रय न देनेवाले, च = तथा, विज्ञानम् = चेतनायुक्त, च = और; अविज्ञानम् = जड पदार्थ, च = तथा; सत्यम् = सत्य; च = और; अनृतम् = झूठ ( इन सबके रूपमें ), च = भी; सत्यम् = वह सत्यस्वरूप परमात्मा ही; अभवत् = हो गया, यत् = जो; किम् = कुछ, च = भी, इदम् = यह दिखायी देता है और अनुभवमें आता है; तत् = वह; सत्यम् = सत्य ही है; इति = इस प्रकार, आचक्षते = ज्ञानीजन कहते हैं, तत् = उस विषयमें, अपि = भी, एषः = यह, श्लोकः = श्लोक, भवति = है । व्याख्या—सर्गके आदिमें परब्रह्म परमात्माने यह विचार किया कि मैं नानारूपमें उत्पन्न होकर बहुत हो जाऊँ । यह विचार करके उन्होंने तप किया अर्थात् जीवोंके कर्मानुसार सृष्टि उत्पन्न करनेके लिये सङ्कल्प किया । सङ्कल्प करके यह जो कुछ भी देखने, सुनने और समझनेमें आता है, उस जड-चेतनमय समस्त जगत्‌की रचना की, अर्थात् इसका सङ्कल्पमय स्वरूप बना लिया । उसके बाद स्वयं भी उसमें 'प्रविष्ट हो गये। यद्यपि अपनेसे ही उत्पन्न इस जगत्‌मे वे परमेश्वर पहलेसे ही प्रविष्ट थे, —यह जगत् जब उन्हींका स्वरूप है, तब उसमें उनका प्रविष्ट होना नहीं बनता, —तथापि जड-चेतनमय जगत्‌में आत्मरूपसे परिपूर्ण हुए उन परब्रह्म परमेश्वरके विशेष स्वरूप—उनके अन्तर्यामी स्वरूपका लक्ष्य करानेके लिये यहाँ यह बात कही गयी है कि 'इस जगत्‌की रचना करके वे स्वयं भी उसमें प्रविष्ट हो गये।' प्रविष्ट होनेके बाद वे मूर्त और अमूर्तरूपसे अर्थात् देखनेमें आनेवाले पृथ्वी, जल और तेज—इन भूतोंके रूपमें तथा वायु और आकाश—इन न दिखायी देनेवाले भूतोंके रूपमें प्रकट हो गये । फिर जिनका वर्णन किया जा सकता है और नहीं किया जा सकता, ऐसे विभिन्न नाना पदार्थोंके रूपोंमें हो गये । इसी प्रकार आश्रय देनेवाले और आश्रय न देनेवाले, चेतन और जड—इन सबके रूपमें वे एकमात्र परमेश्वर ही बहुत-से नाम और रूप धारण करके व्यक्त हो गये । वे एक सत्यस्वरूप परमात्मा ही सत्य और झूठ—इन सबके रूपमें हो गये । इसीलिये ज्ञानीजन कहते हैं कि 'यह जो कुछ देखने, सुनने और समझनेमें आता है, वह सब-का सब सत्यस्वरूप परमात्मा ही है।' इस विषयमें भी यह आगे सप्तम अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है । ॥ षष्ठ अनुवाक समाप्त ॥ ६ ॥ स अनुवाक असद्वा इदमग्र आसीत् । ततो वै सदजायत । तदात्मानग्ँस्वयमकुरुत । तस्मात्तत्सुकृतमुच्यत इति । अग्रे = प्रकट होनेसे पहले, इदम् = यह जड-चेतनात्मक जगत्; असत् = अव्यक्तरूपमें, वै = ही, आसीत् = था; ततः = उससे, वै = ही, सत् = सत् अर्थात् नामरूपमय प्रत्यक्ष जगत्, अजायत = उत्पन्न हुआ है, तत् = उसने, आत्मानम् = अपनेको, स्वयम् = स्वय, अकुरुत = ( इस रूपमे ) प्रकट किया है, तस्मात् = इसीलिये, तत् = वह; सुकृतम् = 'सुकृत'; उच्यते = कहा जाता है, इति = इस प्रकार यह श्लोक है । व्याख्या—सूक्ष्म और स्थूलरूपमे प्रकट होनेसे पहले यह जड-चेतनमय सम्पूर्ण जगत् असत्—अर्थात् अव्यक्तरूपमें ही था, उस अव्यक्तावस्थासे ही यह सत् अर्थात् नाम-रूपमय प्रत्यक्ष जड-चेतनात्मक जगत् उत्पन्न हुआ है । परमात्माने अपने- को स्वय ही इस जड-चेतनात्मक जगत्‌के रूपमें बनाया है, इसीलिये उनका नाम 'सुकृत' (अपने-आप बने हुए ) है । *

  • गीतामें कई प्रकारसे इस जड-चेतनात्मक जगत्‌का अव्यक्तसे उत्पन्न होना और उसीमें लय होना बताया गया है ( गीता ८ । १८, ९ । ७, २ । २८ ) । परंतु भगवान् जब स्वय अवतार लेकर लीला करनेके लिये जगत्‌में प्रकट होते हैं, तब उनका वह प्रकट होना अन्य जीवोंकी भाँति अव्यक्तसे व्यक्त होने अर्थात् कारणसे कार्यरूपमें परिवर्तित होनेके समान नहीं है, वह तो अलौकिक है । इसलिये वहाँ भगवान्‌ने कहा है कि जो मुझे अव्यक्तसे व्यक्त हुआ मानते हैं, वे बुद्धिहीन हैं ( ७ । २४ ), वहाँ जडतत्त्वों और उनके नियमोंका प्रवेश नहीं है । भगवान्‌के नाम, रूप, लीला, धाम—सब कुछ अप्राकृत हैं, चिन्मय हैं । उनके जन्म-कर्म दिव्य हैं । भगवान्‌के प्राकट्यका रहस्य बड़े-बड़े देवता और महर्षिलोग भी नहीं जानते ( गीता १० । २) ।
  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३४३ यद्वै तत्सुकृतं रसो वै सः। रस२ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति। को ह्येवान्यात्कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्। एष ह्येवानन्दयाति। वै=निश्चय ही; यत्=जो; तत्=वह; सुकृतम्=सुकृत है; सः वै=वही; रसः=रस है; हि=क्योंकि; अयम्=यह (जीवात्मा); रसम्=इस रसको; लब्ध्वा=प्राप्त करके; एव=ही; आनन्दी=आनन्दयुक्त; भवति=होता है; यत्=यदि; एषः=यह; आनन्दः=आनन्दस्वरूप; आकाशः=आकाशकी भाँति व्यापक परमात्मा; न स्यात्=न होता; हि=तो; कः एव= कौन; अन्यात्=जीवित रह सकता; (और) कः=कौन; प्राण्यात्=प्राणोंकी क्रिया (चेष्टा) कर सकता; हि=निःसंदेह; एषः=यह परमात्मा; एव=ही; आनन्दयाति=सबको आनन्द प्रदान करता है। व्याख्या—ये जो ऊपरके वर्णनमे 'सुकृत' नामसे कहे गये हैं, वे परब्रह्म परमात्मा सचमुच रसस्वरूप (आनन्दमय) हैं; ये ही वास्तविक आनन्द हैं; क्योंकि अनादिकालसे जन्म-मृत्युरूप घोर दुःखका अनुभव करनेवाला यह जीवात्मा इन रसमय परब्रह्मको पाकर ही आनन्दयुक्त होता है। जबतक इन परम प्राप्य आनन्दस्वरूप परमेश्वरसे इसका संयोग नहीं हो जाता; तबतक इसे किसी भी स्थितिमें पूर्णानन्द; नित्यानन्द; अखण्डानन्द नहीं मिल सकता। इसीसे उन वास्तविक आनन्दस्वरूप परमात्माका अस्तित्व निःसंदेह सिद्ध होता है; क्योंकि यदि ये आकाशकी भाँति व्यापक आनन्द- स्वरूप परमात्मा नहीं होते तो कौन जीवित रह सकता और कौन प्राणोंकी क्रिया—हिलना-डुलना आदि कर सकता। अर्थात् समस्त प्राणी सुखस्वरूप परमात्माके ही सहारे जीते और हलन-चलन आदि चेष्टा करते हैं। इतना ही नहीं, सबके जीवन- निर्वाहकी सब प्रकारसे सुव्यवस्था करनेवाले भी वे ही हैं; अन्यथा इस जगत्‌की समस्त भौतिक क्रिया, जो नियमित और व्यवस्थितरूपसे चल रही है, कैसे हो सकती। अतः मनुष्यको यह दृढ़तापूर्वक विश्वास करना चाहिये कि इस जगत्‌के कर्त्ता- हर्त्ता परब्रह्म परमेश्वर अवश्य हैं तथा निःसंदेह ये परमात्मा ही सबको आनन्द प्रदान करते हैं। जब आनन्दस्वरूप एकमात्र परमात्मा ही हैं, तब दूसरा कौन आनन्द दे सकता है। यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते। अथ सोऽभयं गतो भवति। हि=क्योंकि; यदा एव=जब कभी; एषः=यह जीवात्मा; एतस्मिन्=इस; अदृश्ये=देखनेमें न आनेवाले; अनात्म्ये= शरीररहित; अनिरुक्ते=बतलानेमें न आनेवाले; (और) अनिलयने=दूसरेका आश्रय न लेनेवाले परब्रह्म परमात्मामें; अभयम्=निर्भयतापूर्वक; प्रतिष्ठाम्=स्थिति; विन्दते=लाभ करता है; अथ=तब; सः=वह; अभयम्=निर्भयपदको; गतः=प्राप्त; भवति=हो जाता है। व्याख्या—क्योंकि उन परब्रह्म परमेश्वरको पानेकी अभिलाषा रखनेवाला यह जीव जब कभी देखनेमें न आनेवाले, बतलानेमें न आनेवाले और किसीके आश्रित न रहनेवाले शरीर-रहित परब्रह्म परमात्मामें निर्भय (अविचल) स्थिति लाभ करता है, उस समय वह निर्भयपदको प्राप्त हो जाता है—सदाके लिये भय एव शोकसे रहित हो जाता है। यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते। अथ तस्य भयं भवति। तत्त्वेव भयं विदुषो मन्वानस्य। तदप्येष श्लोको भवति। हि=क्योंकि; यदा एव=जवतक; एषः=यह; उदरम्=थोड़ा-सा; वै=भी; एतस्मिन् अन्तरम्=इस परमात्मासे वियोग; कुरुते=किये रहता है; अथ=तबतक; तस्य=उसको; भयम्=जन्म-मृत्युरूप भय; भवति=प्राप्त होता है; तु=तथा; तत् एव=वही; भयम्=भय; (केवल मूर्खको ही नहीं होता; किंतु) =अभिमानी; विदुषः=शास्त्रज्ञ विद्वान्‌को भी अवश्य होता है; तत्=उसके विषयमें; अपि=भी; एषः=यह (आगे कहा हुआ); श्लोकः=श्लोक; भवति=है। व्याख्या—क्योंकि जबतक यह जीवात्मा उन परब्रह्म परमात्मासे थोड़ा-सा भी अन्तर किये रहता है—उनमें पूर्ण स्थिति लाभ नहीं कर लेता या उनका निरन्तर स्मरण नहीं करता—उन्हें थोड़ी देरके लिये भी भूल जाता है; तबतक उसके

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी लिप्यन्तरण दिया गया है:

३४४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * लिये भय है, अर्थात् उसका पुनर्जन्म होना सम्भव है; क्योंकि जिस समय उसकी परमात्मामें स्थिति नहीं है, वह भगवान्‌को भूला हुआ है, उसी समय यदि उसकी मृत्यु हो गयी तो फिर उसका अन्तिम संस्कारके अनुसार जन्म होना निश्चित है। क्योंकि भगवान्‌ने गीतामें कहा है—'जिस-जिस भावको स्मरण करता हुआ मनुष्य अन्तकालमे शरीर छोड़ता है, उसीके अनुसार उसे जन्म ग्रहण करना पड़ता है (८।६)।' और मृत्यु प्रारब्धके अनुसार किसी क्षण भी आ सकती है। इसीलिये योगभ्रष्टका पुनर्जन्म होनेकी बात गीतामें कही गयी है (६। ४०-४२)। जबतक परमात्मामे पूर्ण स्थिति नहीं हो जाती अथवा जबतक भगवान्‌का निरन्तर स्मरण नहीं होता, तबतक यह पुनर्जन्मका भय—जन्म-मृत्युका भय सभीके लिये बना हुआ है—चाहे कोई बड़े-से-बड़ा शास्त्रज्ञ विद्वान् क्यों न हो, चाहे कोई अपनेको बड़े-से-बड़ा ज्ञानी अथवा पण्डित क्यों न माने। वे परमेश्वर सबपर शासन करनेवाले हैं, उन्हींकी शासन-शक्तिसे जगत्‌की सारी व्यवस्था नियमितरूपसे चल रही है। इसी विषयपर यह आगे अष्टम अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है। ॥ सप्तम अनुवाक समाप्त ॥ ७ ॥ अष्टम अनुवाक सम्बन्ध-पिछले अनुवाकमें जिस श्लोकका लक्ष्य कराया गया था, उसका उल्लेख करते हैं— भीषास्माद्वातः पवते। भीषोदेति सूर्यः। भीषास्मादग्निश्चेन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पञ्चम इति। अस्मात् भीषा = इसीके भयसे, वातः = पवन; पवते = चलता है, भीषा = ( इसीके ) भयसे, सूर्यः = सूर्य; उदेति = उदय होता है, अस्मात् भीषा = इसीके भयसे, अग्निः = अग्नि; च = और, इन्द्रः = इन्द्र, च = और; पञ्चमः = पाँचवाँ; मृत्युः = मृत्यु, धावति = ( ये सब ) अपना-अपना कार्य करनेमें प्रवृत्त हो रहे हैं, इति = इस प्रकार यह श्लोक है। व्याख्या-इन परब्रह्म परमेश्वरके भयसे ही पवन नियमानुसार चलता है, इन्हींके भयसे सूर्य ठीक समयपर उदय होता है और ठीक समयपर अस्त होता है तथा इन्हींके भयसे अग्नि, इन्द्र और पाँचवाँ मृत्यु—ये सब अपना-अपना कार्य नियम- पूर्वक सुव्यवस्थितरूपसे कर रहे हैं। यदि इन सबकी सुव्यवस्था करनेवाला इन सबका प्रेरक कोई न हो तो जगत्‌के सारे काम कैसे चलें। इससे सिद्ध होता है कि इन सबको बनानेवाला, सबको यथायोग्य नियममे रखनेवाला कोई एक सत्य, ज्ञान और आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्मा अवश्य हैं और वे मनुष्यको अवश्य मिल सकते हैं*। सम्बन्ध-उन आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्माका वह आनन्द कितना और कैसा है, इस जिज्ञासापर आनन्दविषयक विचार आरम्भ किया जाता है— सैषाऽऽनन्दस्य मीमाᳵसा भवति। युवा स्यात्साधुयुवाध्यायक आशिष्ठो द्रढिष्ठो बलिष्ठस्तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात्। स एको मानुष आनन्दः। सा = वह, एषा = यह, आनन्दस्य = आनन्दसम्बन्धी, मीमांसा = विचार, भवति = आरम्भ होता है; युवा = कोई युवक, स्यात् = हो, ( वह भी ऐसा-वैसा नहीं, ) साधुयुवा = श्रेष्ठ आचरणोंवाला युवक हो; ( तथा ) अध्यापकः = वेदोंका अध्ययन कर चुका हो; आशिष्ठः = शासनमें अत्यन्त कुशल हो, द्रढिष्ठः = उसके सम्पूर्ण अङ्ग और इन्द्रियाँ सर्वथा दृढ हों; ( तथा ) बलिष्ठः = वह सब प्रकारसे बलवान् हो; तस्य = ( फिर ) उसे, इयम् = यह; वित्तस्य पूर्णा = धनसे परिपूर्ण; सर्वा = सब-की-सब, पृथिवी = पृथ्वी, स्यात् = प्राप्त हो जाय, ( तो ) सः = वह, मानुषः = मनुष्यलोकका; एकः = एक, आनन्दः = आनन्द है। व्याख्या-इस वर्णनमे उस आनन्दका विचार आरम्भ करनेकी सूचना देकर सर्वप्रथम मनुष्य-लोकके भोगोंसे मिल सकनेवाले बड़े-से-बड़े आनन्दकी कल्पना की गयी है। भाव यह है कि एक मनुष्य युवा हो, वह भी ऐसा-वैसा

  • इसी भावकी श्रुति कठोपनिषद्‌में भी आयी है (२। ३। ३)।
  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३४५ मामूली युवक नहीं—सदाचारी, अच्छे स्वभाववाला, अच्छे कुलमे उत्पन्न श्रेष्ठ पुरुष हो, उसे सम्पूर्ण वेदोंकी शिक्षा मिली हो तथा शासनमे—ब्रह्मचारियोंको सदाचारकी शिक्षा देनेमें अत्यन्त कुशल हो, उसके सम्पूर्ण अङ्ग और इन्द्रियाँ रोगरहित, समर्थ और सुदृढ हों और वह सब प्रकारके बलसे सम्पन्न हो। फिर धन-सम्पत्तिसे भरी यह सम्पूर्ण पृथ्वी उसके अधिकार- में आ जाय, तो यह मनुष्यका एक बड़े-से-बड़ा सुख है। वह मानव-लोकका एक सबसे महान् आनन्द है। ते ये शतं मानुषा आनन्दाः। स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। ते=वे, ये=जो; मानुषाः=मनुष्यलोक-सम्बन्धी, शतम्=एक सौ, आनन्दाः=आनन्द हैं, सः=वह, मनुष्य- गन्धर्वाणाम्=मानव-गन्धर्वोका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द होता है, अकामहतस्य=जिसका अन्तःकरण भोगोंकी कामनाओंसे दूषित नहीं हुआ है, ऐसे; श्रोत्रियस्य=वेदवेत्ता पुरुषका; च=भी (वह स्वाभाविक आनन्द है) । व्याख्या-जो मनुष्य-योनिमें उत्तम कर्म करके गन्धर्वभावको प्राप्त हुए हैं, उनको 'मनुष्य-गन्धर्व' कहते हैं। यहाँ इनके आनन्दको उपर्युक्त मनुष्यके आनन्दसे सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि जिस मनुष्य-सम्बन्धी आनन्दका पहले वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर आनन्दकी जो एक राशि होती है, उतना मनुष्य-गन्धवोंका एक आनन्द है। परंतु जो पहले बताये हुए मनुष्यलोकके भोगोंकी और इस गन्धर्वलोकके भोगोतककी कामनासे दूषित नहीं है, इन सबसे सर्वथा विरक्त है, उस श्रोत्रिय—वेदज्ञ पुरुषको तो वह आनन्द स्वभावसे ही प्राप्त है। ते ये शतं मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दाः । स एको देवगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते=वे (पूर्वोक्त), ये=जो, मनुष्यगन्धर्वाणाम्=मनुष्य-गन्धवोंके, शतम्=एक सौ, आनन्दाः=आनन्द हैं, सः=वह, देवगन्धर्वाणाम्=देवजातीय गन्धर्वांका, एकः=एक, आनन्दः=आनन्द है, च=तथा, (वही) अकामहतस्य= कामनाओंसे अदूषित चित्तवाले, श्रोत्रियस्य=श्रोत्रिय (वेदज्ञ) को भी स्वभावतः प्राप्त है। व्याख्या-इस वर्णनमें पहले बताये हुए मनुष्य-गन्धवोंकी अपेक्षा देव-गन्धवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि जिस मनुष्य-गन्धर्वके आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्द- की राशि होती है, उतना सृष्टिके आरम्भसे देवजातीय गन्धर्वरूपमें उत्पन्न हुए जीवोंका एक आनन्द है। तथा जो मनुष्य इस आनन्दकी कामनासे आहत नहीं हुआ है, अर्थात् जिसको इसकी आवश्यकता नहीं है, तथा जो वेदके उपदेशको हृदयङ्गम कर चुका है, ऐसे विद्वान्को वह आनन्द स्वभावतः प्राप्त है। ते ये शतं देवगन्धर्वाणामानन्दाः । स एकः पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते=वे (पूर्वोक्त), ये=जो, देवगन्धर्वाणाम्=देवजातीय गन्धर्वोके; शतम्=एक सौ, आनन्दाः=आनन्द हैं, सः=वह; चिरलोकलोकानाम्=चिरस्थायी पितृलोकको प्राप्त हुए; पितॄणाम्=पितरोका, एकः=एक; आनन्दः= आनन्द है, च=और; (वह) अकामहतस्य=भोगोंके प्रति निष्काम, श्रोत्रियस्य=वेदज्ञ पुरुषको स्वतः प्राप्त है। व्याख्या-इस वर्णनमें देवगन्धर्वोके आनन्दकी अपेक्षा चिरस्थायी पितृलोकको प्राप्त दिव्य पितरोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि देव-गन्धवोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करने- पर आनन्दकी जो एक राशि होती है, उतना चिरस्थायी पितृलोकमे रहनेवाले दिव्य पितरोंका एक आनन्द है। तथा जो उस लोकके भोग-सुखकी कामनासे आहत नहीं है अर्थात् जिसको उसकी आवश्यकता ही नहीं रही है, उस श्रोत्रियको— वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्तको वह आनन्द स्वतः ही प्राप्त है। ते ये शतं पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दाः । स एक आजानजानां देवानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । उ० सं० ४४-

३४६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ते = वे (पूर्वोक्त); ये = जो; चिरलोकलोकानाम् = चिरस्थायी पितृलोकको प्राप्त हुए; पितृणाम् = पितरोंके; शतम् = एक सौ, आनन्दाः = आनन्द हैं; सः = वह; आजानजानाम् = आजानज नामक; देवानाम् = देवताओंका; एकः = एक; आनन्दः = आनन्द है; च = और; (वह आनन्द) अकामहतस्य = उस लोकतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य = श्रोत्रिय (वेदज्ञ) को स्वभावतः प्राप्त है। व्याख्या-इस वर्णनमें चिरस्थायी लोकोंमें रहनेवाले दिव्य पितरोंके आनन्दकी अपेक्षा 'आजानज' नामक देवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि चिरस्थायी लोकोंमें रहनेवाले दिव्य पितरोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंकी मात्राको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना 'आजानज' नामक देवताओंका एक आनन्द है। देवलोकके एक विशेष स्थानका नाम 'आजान' है; जो लोग स्मृतियोंमें प्रतिपादित किन्हीं पुण्यकर्मोंके कारण वहाँ उत्पन्न हुए हैं, उन्हें 'आजानज' कहते हैं। जो उस लोकतकके भोगोंकी कामनासे आहत नहीं है, अर्थात् जो उस आनन्दको भी तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो गया है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्त पुरुषके लिये तो वह आनन्द स्वभावसिद्ध है। ते ये शतमाजानजानां देवानामानन्दाः । स एकः कर्मदेवानां देवानामानन्दः । ये कर्मणा देवानपियन्ति । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते = वे (पूर्वोक्त); ये = जो; आजानजानाम् = आजानज नामक; देवानाम् = देवोंके; शतम् = एक सौ; आनन्दाः = आनन्द हैं; सः = वह, कर्मदेवानाम् देवानाम् = (उन) कर्मदेव नामक देवताओंका, एकः = एक; आनन्दः = आनन्द है; ये = जो; कर्मणा = वेदोक्त कर्मोंसे; देवान् = देवभावको; अपियन्ति = प्राप्त हुए हैं; च = और; (वह) अकामहतस्य = उस लोकतकके भोगोंमें कामनारहित, श्रोत्रियस्य = श्रोत्रिय (वेदज्ञ) को तो स्वतः प्राप्त है। व्याख्या-इस वर्णनमें आजानज देवोंके आनन्दकी अपेक्षा कर्मदेवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि आजानज देवोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना आनन्द जो वेदोक्त कर्मोंद्वारा मनुष्यसे देवभावको प्राप्त हुए हैं, उन कर्मदेवताओंका आनन्द है। जो उन कर्मदेवताओंतकके आनन्दकी कामनासे आहत नहीं है अर्थात् जिसको देवलोकतकके भोगोंकी इच्छा नहीं रही है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्त पुरुषके लिये तो वह आनन्द स्वभावसिद्ध है। ते ये शतं कर्मदेवानां देवानामानन्दाः । स एको देवानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते = वे (पूर्वोक्त), ये = जो; कर्मदेवानाम् देवानाम् = कर्मदेव नामक देवताओंके, शतम् = एक सौ; आनन्दाः = आनन्द हैं, सः = वह, देवानाम् = देवताओंका; एकः = एक; आनन्दः = आनन्द है, च = और; (वह) अकामहतस्य = उस लोकतकके भोगोंमें कामनारहित, श्रोत्रियस्य = श्रोत्रिय (वेदज्ञ) को तो स्वभावतः प्राप्त है। व्याख्या-इस वर्णनमें कर्मदेवोंकी अपेक्षा सृष्टिके आदिकालमे जिन स्थायी देवोंकी उत्पत्ति हुई है, उन स्वभावसिद्ध देवोंके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि कर्मदेवोंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना उन स्वभावसिद्ध देवताओंका एक आनन्द है। जो उन स्वभावसिद्ध देवताओंके भोगानन्दकी कामनासे आहत नहीं है, अर्थात् उसकी भी जिसको कामना नहीं है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले निष्काम विरक्तके लिये तो वह आनन्द स्वभावसिद्ध ही है। ते ये शतं देवानामानन्दाः । स एक इन्द्रस्यानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते = वे; ये = जो, देवानाम् = देवताओंके, शतम् = एक सौ, आनन्दाः = आनन्द हैं; सः = वह; इन्द्रस्य = इन्द्रका; एकः = एक; आनन्दः = आनन्द है, च = और; (वह) अकामहतस्य = इन्द्रतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य = वेदवेत्ताको स्वतः प्राप्त है।

  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३४७ व्याख्या-इस वर्णनमें पहले बताये हुए स्वभावसिद्ध देवोंके आनन्दकी अपेक्षा इन्द्रके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि देवताओंके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना इन्द्रभावको प्राप्त देवताका एक आनन्द है। जो इन्द्रके भोगानन्दकी कामनासे आहत नहीं हुआ है, अर्थात् जिसको इन्द्रके सुखकी भी आकाङ्क्षा नहीं है-जो उसे भी तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो गया है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले निष्काम पुरुषको तो वह आनन्द स्वतः प्राप्त है। ते ये शतमिन्र्दस्यानन्दाः । स एको बृहस्पतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते=वे; ये=जो; इन्द्रस्य=इन्द्रके, शतम्=एक सौ; आनन्दाः = आनन्द हैं, सः=वह, बृहस्पतेः=बृहस्पतिका, एकः = एक, आनन्दः = आनन्द है; च= और; ( वह ) अकामहतस्य = बृहस्पतितकके भोगोंमें निःस्पृह; श्रोत्रियस्य = वेद- वेत्ताको स्वतःप्राप्त है। व्याख्या-इस वर्णनमें इन्द्रके आनन्दकी अपेक्षा बृहस्पतिके आनन्दको सौगुना बताया गया है । भाव यह है कि इन्द्रके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना बृहस्पतिके पदको प्राप्त हुए देवताका एक आनन्द है। परंतु जो मनुष्य बृहस्पतिके भोगानन्दकी कामनासे भी आहत नहीं है, उस भोगानन्दको भी अनित्य होनेके कारण जो तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो चुका है, उस वेदके रहस्यको जाननेवाले निष्काम मनुष्यको वह आनन्द स्वतःप्राप्त है। ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः । स एकः प्रजापतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते=वे; ये=जो; बृहस्पतेः = बृहस्पतिके, शतम् = एक सौ; आनन्दाः = आनन्द हैं, सः=वह; प्रजापतेः= प्रजापतिका; एकः = एक, आनन्दः = आनन्द है; च = और; ( वह ) अकामहतस्य प्रजापतितकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य = वेदवेत्ता पुरुषको स्वतः प्राप्त है। -इस वर्णनमें बृहस्पतिके आनन्दकी अपेक्षा प्रजापतिके आनन्दको सौगुना बताया गया है । भाव यह है कि बृहस्पतिके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो आनन्दकी एक राशि होती है, उतना प्रजापतिके पदपर आरूढ देवताका एक आनन्द है। परंतु जो मनुष्य इस प्रजापतिके भोगानन्दकी कामनासे भी आहत नहीं है, अर्थात् उससे भी जो विरक्त हो चुका है, उस वेदके रहस्यको जाननेवाले निष्काम मनुष्यको तो वह आनन्द स्वभावसे ही प्राप्त है। ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः। स एको आनन्दः । श्रोत्रियस्य चाकांमहतस्य । ते=वे; ये=जो; प्रजापतेः=प्रजापतिके; शतम् = एक सौ; आनन्दाः = आनन्द हैं, सः=वह, ब्रह्मणः =ब्रह्माका; एकः=एक; आनन्दः=आनन्द है, च=और; (वह ) अकामहतस्य = ब्रह्मलोकतकके भोगोंमें कामनारहित; श्रोत्रियस्य = श्रोत्रिय ( वेदज्ञ ) को स्वभावतः प्राप्त है। व्याख्या-इस वर्णनमें प्रजापतिके आनन्दसे भी हिरण्यगर्भ ब्रह्माके आनन्दको सौगुना बताया गया है। भाव यह है कि प्रजापतिके जिस आनन्दका ऊपर वर्णन किया गया है, वैसे सौ आनन्दोंको एकत्र करनेपर जो एक आनन्दकी राशि होती है, उतना सृष्टिके आरम्भमें सबसे पहले उत्पन्न होनेवाले हिरण्यगर्भ ब्रह्माका एक आनन्द है। तथा जो मनुष्य उस ब्रह्मा- के पदसे प्राप्त भोग-सुखकी कामनासे भी आहत नहीं है, अर्थात् जो उसे भी अनित्य और तुच्छ समझकर उससे विरक्त हो गया है, जिसको एकमात्र परमानन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त करनेकी ही उत्कट अभिलाषा है, उस वेदके रहस्यको समझनेवाले विरक्त पुरुषको वह आनन्द स्वतःप्राप्त है। इस प्रकार यहाँ एकसे दूसरे आनन्दकी अधिकताका वर्णन करते-करते सबसे बढकर हिरण्यगर्भके आनन्दको बताकर यह भाव दिखाया गया है कि इस जगत्में जितने प्रकारके जो-जो आनन्द देखने, सुनने तथा समझनेमें आ सकते हैं, वे चाहे

३४८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * कितने ही बड़े क्यों न हों, उस पूर्णानन्दस्वरूप परमात्माके आनन्दकी तुलनामें बहुत ही तुच्छ हैं। बृहदारण्यकमें कहा भी है कि 'समस्त प्राणी इसी परमात्मसम्बन्धी आनन्दके किसी एक अंशको लेकर ही जीते हैं (४।३।३२)।' स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः । स य एवंविदस्माल्लोकात्प्रेत्य । एतमन्नमयमात्मान- मुपसंक्रामति । एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रामति । एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रामति । एतं विज्ञान- मयमात्मानमुपसंक्रामति । एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति । तदप्येष श्लोको भवति । सः=वह (परमात्मा), यः=जो, अयम्=यह, पुरुषे=मनुष्यमें; च=और, यः=जो; असौ=वह, आदित्ये च= सूर्यमें भी है; सः=वह (सबका अन्तर्यामी), एकः=एक ही है, यः=जो, एवंवित्=इस प्रकार जाननेवाला है; सः= वह, अस्मात् लोकात्=इस लोकसे, प्रेत्य=विदा होकर, एतम् = इस, अन्नमयम्=अन्नमय, आत्मानम्=आत्माको; उपसंक्रामति=प्राप्त हो जाता है, एतम् = इस, प्राणमयम् = प्राणमय, आत्मानम्=आत्माको, उपसंक्रामति=प्राप्त होता है, एतम् = इस, मनोमयम् = मनोमय, आत्मानम्=आत्माको, उपसक्रामति=प्राप्त होता है, एतम्=इस; विज्ञानमयम् = विज्ञानमय, आत्मानम् = आत्माको, उपसंक्रामति=प्राप्त होता है, एतम् = इस, आनन्दमयम् = आनन्दमय; आत्मानम् = आत्माको, उपसंक्रामति=प्राप्त होता है, तत्=उसके विषयमें; अपि=भी, एषः=यह (आगे कहा गया); श्लोकः = श्लोक; भवति = है । व्याख्या-ऊपर बताये हुए समस्त आनन्दोंके एकमात्र केन्द्र परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही सबके अन्तर्यामी हैं। जो परमात्मा मनुष्योंमें हैं, वे ही सूर्यमें भी हैं। वे सबके अन्तर्यामी एक ही हैं। जो इस प्रकार जान लेता है, वह मरनेपर इस मनुष्य-शरीरको छोड़कर उस पहले बताये हुए अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है। तात्पर्य यह कि इन पाँचोंके जो आत्मा हैं, ये पाँचों जिनके स्वरूप हैं, उन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। पहले इन पाँचोंका वर्णन करते समय सबका शरीरान्तर्वर्ती आत्मा अन्तर्यामी परमात्माको ही बतलाया था। फलरूपमें उन्हींकी प्राप्ति होती है और वे ही ब्रह्म हैं- यह बतानेके लिये ही यहाँ पाँचोंको क्रमसे प्राप्त होनेकी बात कही गयी है। वास्तवमें इस क्रमसे प्राप्त होनेकी बात यहाँ नहीं कही गयी है; क्योंकि अन्नमय मनुष्य-शरीरको तो वह पहलेसे प्राप्त था ही, उसे छोड़कर जानेके बाद प्राप्त होनेवाला फल परमात्मा है, शरीर नहीं। अतः यहाँ अन्नमय आदिके अन्तर्यामी परमात्माकी ही प्राप्ति बतायी गयी है। इसलिये इन सबमें परिपूर्ण, सर्वरूप, सबके आत्मा, परम आनन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त हो जाना ही इस फलश्रुतिका तात्पर्य है। इसके विषयमें आगे नवम अनुवाकमें कहा जानेवाला यह श्लोक भी है। ॥ अष्टम अनुवाक समाप्त ॥८॥ नवम अनुवाक सम्बन्ध-आठवें अनुवाकमें जिस श्लोक (मन्त्र) को लक्ष्य कराया गया है, उसका उल्लेख किया जाता है- यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चनेति । मनसा सह=मनके सहित; वाचः=वाणी आदि समस्त इन्द्रियाँ, यतः=जहाँसे, अप्राप्य=उसे न पाकर, निवर्तन्ते= लौट आती हैं, [तस्य] ब्रह्मणः = उस ब्रह्मके, आनन्दम् = आनन्दको, विद्वान् = जाननेवाला (महापुरुष); कुतश्चन= किसीसे भी, न बिभेति = भय नहीं करता, इति=इस प्रकार यह श्लोक है । व्याख्या-इस मन्त्रमें परब्रह्म परमात्माके परमानन्दस्वरूपको जाननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि मनके सहित सभी इन्द्रियाँ जहाँसे उसे न पाकर लौट आती हैं- जिस ब्रह्मानन्दको जाननेकी इन मन और इन्द्रियोंकी शक्ति नहीं है, परब्रह्म परमात्माके उस आनन्दको जाननेवाला ज्ञानी महापुरुष कभी किसीसे भी भय नहीं करता, वह सर्वथा निर्भय हो जाता है। इस प्रकार इस श्लोकका तात्पर्य है ।

  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३४९

एतꣳह वाव न तपति । किमहꣳसाधु नाकरवम् । किमहं पापमकरवमिति । स य एवं विद्वानेते आत्मानꣳ स्पृणुते । उभे ह्येवैष एते आत्मानꣳ स्पृणुते । य एवं वेद । इत्युपनिषत् । ह वाव = यह प्रसिद्ध ही है कि, एतम् = उस (महापुरुष) को, (यह बात) न तपति = चिन्तित नहीं करती कि; अहम् = मैंने, किम् = क्यों; साधु = श्रेष्ठ कर्म, न = नहीं; अकरवम् = किया, किम् = (अथवा) क्यों, अहम् = मैंने, पापम् = पापाचरण, अकरवम् इति = किया, यः = जो, एते = इन पुण्य-पापकर्मोंको, एवम् = इस प्रकार (संतापका हेतु), विद्वान् = जानने- वाला है, सः = वह; आत्मानम् स्पृणुते = आत्माकी रक्षा करता है, हि = अवश्य ही; यः = जो; एते = इन पुण्य और पाप, उभे एव = दोनों ही कर्मोंको, एवम् = इस प्रकार (संतापका हेतु), वेद = जानता है, [ सः ] एषः = वह यह पुरुष, आत्मानम् स्पृणुते = आत्माकी रक्षा करता है, इति = इस प्रकार; उपनिषत् = उपनिषद् (की ब्रह्मानन्दवल्ली) पूरी हुई। व्याख्या--इस वर्णनमे यह बात कही गयी है कि ज्ञानी महापुरुषको किसी प्रकारका शोक नहीं होता । भाव यह है कि परमात्माको ऊपर बताये अनुसार जाननेवाला विद्वान् कभी इस प्रकार शोक नहीं करता कि 'क्यों मैंने श्रेष्ठ कर्मोंका आचरण नहीं किया, अथवा क्यों मैने पाप-कर्म किया।' उसके मनमें पुण्य-कर्मोंके फलस्वरूप उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका लोभ नहीं होता और उसे पापजनित नरकादिका भय भी नहीं सताता। लोभ और भयजनित संतापसे वह ऊँचा उठ जाता है। उक्त ज्ञानी महापुरुष आसक्तिपूर्वक किये हुए पुण्य और पाप दोनों प्रकारके कर्मोंको जन्म-मरणरूप संतापका हेतु समझकर उनके प्रति राग-द्वेषसे सर्वथा रहित हो जाता है और परमात्माके चिन्तनमे संलग्न रहकर आत्माकी रक्षा करता है। इस मन्त्रमें कुछ शब्दोंको अक्षरशः अथवा अर्थतः दुहराकर इस वल्लीके उपसहारकी सूचना दी गयी है। ॥ नवम अनुवाक समाप्त ॥ ९॥ ॥ ब्रह्मानन्दवल्ली समाप्त ॥ २ ॥

भृगुवल्ली

ॐ भृगुवल्ली * प्रथम अनुवाक भृगुर्वै वारुणिः वरुणं पितरमुपससार अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तस्मा एतत्प्रोवाच। अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचमिति। तꣳहोवाच। यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व। तद् ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा। वै = यह प्रसिद्ध है कि; वारुणिः = वरुणका पुत्र, भृगुः = भृगु; पितरम् = अपने पिता, वरुणम् उपससार = वरुणके पास गया (और विनयपूर्वक बोला—); भगवन् = भगवन्; (मुझे) ब्रह्म अधीहि = ब्रह्मका उपदेश कीजिये; इति = इस प्रकार प्रार्थना करनेपर, तस्मै = उससे, (वरुणने) एतत् = यह, प्रोवाच = कहा; अन्नम् = अन्न; प्राणम् = प्राण, चक्षुः = नेत्र; श्रोत्रम् = श्रोत्र, मनः = मन, (और) वाचम् = वाणी, इति = इस प्रकार (ये सब ब्रह्मकी उपलब्धिके द्वार हैं); तम् ह उवाच = पुनः (वरुणने) उससे कहा, वै = निश्चय ही, इमानि = ये सब प्रत्यक्ष दीखनेवाले; भूतानि = प्राणी; यतः = जिससे; जायन्ते = उत्पन्न होते हैं, जातानि = उत्पन्न होकर, येन = जिसके सहारे, जीवन्ति = जीवित रहते हैं; (तथा) प्रयन्ति = (अन्तमें इस लोकसे) प्रयाण करते हुए; यत् अभिसंविशन्ति = जिसमें प्रवेश करते हैं, तत् = उसको; विजिज्ञासस्व = तत्त्वसे जाननेकी इच्छा कर, तत् = वही, ब्रह्म = ब्रह्म है, इति = इस प्रकार (पिताकी बात सुनकर), सः = उसने; तपः अतप्यत = तप किया, सः = उसने, तपः तप्त्वा = तप करके— व्याख्या—भृगु नामसे प्रसिद्ध एक ऋषि थे, जो वरुणके पुत्र थे। उनके मनमें परमात्माको जानने और प्राप्त करनेकी उत्कट अभिलाषा हुई, तब वे अपने पिता वरुणके पास गये। उनके पिता वरुण वेदको जाननेवाले, ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष थे, अतः भृगुको किसी दूसरे आचार्यके पास जानेकी आवश्यकता नहीं हुई। अपने पिताके पास जाकर भृगुने इस प्रकार प्रार्थना की—'भगवन् ! मैं ब्रह्मको जानना चाहता हूँ, अतः आप कृपा करके मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।' तब वरुणने भृगुसे कहा—'तात ! अन्न, प्राण, नेत्र, श्रोत्र, मन और वाणी—ये सभी ब्रह्मकी उपलब्धिके द्वार हैं। इन सबमें ब्रह्मकी सत्ता स्फुरित हो रही है।' साथ ही यह भी कहा—'ये प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले सब प्राणी जिनसे उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिनके सहयोगसे, जिनका बल पाकर ये सब जीते हैं—जीवनोपयोगी क्रिया करनेमें समर्थ होते हैं और महाप्रलयके समय जिनमें विलीन हो जाते हैं, उनको वास्तवमें जाननेकी (पानेकी) इच्छा कर। वे ही ब्रह्म हैं।' इस प्रकार पिताका उपदेश पाकर भृगु ऋषिने ब्रह्मचर्य और शम दम आदि नियमोंका पालन करते हुए तथा समस्त भोगोंके त्यागपूर्वक सयमसे रहते हुए पिताके उपदेशपर विचार किया। यही उनका तप था। इस प्रकार तप करके उन्होने क्या किया, यह बात अगले अनुवाकमें कही गयी है। ॥ प्रथम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥ द्वितीय अनुवाक अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्। अन्नाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। अन्नेन जातानि जीवन्ति। अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तꣳ होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा।

  • वरुणने अपने पुत्र भृगु ऋषिको जिस ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया था, उसीका इस वल्लीमें वर्णन है, इस कारण इसका नाम भृगुवल्ली है।
  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३५१ अन्नम् = अन्न; ब्रह्म = ब्रह्म है, इति = इस प्रकार, व्यजानात् = जाना, हि = क्योंकि, खलु = सचमुच, अन्नात् = अन्नसे, एव = ही; इमानि = ये सब, भूतानि = प्राणी, जायन्ते = उत्पन्न होते हैं, जातानि = उत्पन्न होकर; अन्नेन = अन्नसे ही, जीवन्ति = जीते हैं, (और) प्रयन्ति = (अन्तमें यहाँसे) प्रयाण करते हुए, अन्नम् अभिसंविशन्ति = अन्नमे ही प्रविष्ट होते हैं; इति = इस प्रकार, तत् = उसको, विज्ञाय = जानकर, (वह) पुनः = पुनः, पितरम् = अपने पिता; वरुणम् एव उपससार = वरुणके ही पास गया, (तथा अपनी समझी हुई बात उसने पिताको सुनायी, किंतु पिताने उसका समर्थन नहीं किया। तब वह बोला—) भगवः = भगवन्, (मुझे) ब्रह्म अधीहि = ब्रह्मका बोध कराइये, इति = तब, तम् ह उवाच = उससे सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिमे कहा, तपसा = तपसे, ब्रह्म = ब्रह्मको, विजिज्ञासस्व = तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर, तपः = तप ही; ब्रह्म = ब्रह्म है; इति = इस प्रकार (पिताकी आज्ञा पाकर), सः = उसने, तपः अतप्यत = (पुनः) तप किया, सः = उसने; तपः तप्त्वा = तप करके— व्याख्या—भृगुने पिताके उपदेशानुसार यह निश्चय किया कि अन्न ही ब्रह्म है, क्योंकि पिताजीने ब्रह्मके जो लक्षण बताये थे, वे सब अन्नमें पाये जाते हैं। समस्त प्राणी अन्नसे-अन्नके परिणामभूत वीर्यसे उत्पन्न होते हैं, अन्नसे ही उनका जीवन सुरक्षित रहता है और मरनेके बाद अन्नस्वरूप इस पृथ्वीमे ही प्रविष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार निश्चय करके वे पुनः अपने पिता वरुणके पास आये। आकर अपने निश्चयके अनुसार उन्होंने सब बातें कहीं। पिताने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने सोचा—'इसने अभी ब्रह्मके स्थूल रूपको ही समझा है, वास्तविक रूपतक इसकी बुद्धि नहीं गयी, अतः इसे तपस्या करके अभी और विचार करनेकी आवश्यकता है। पर जो कुछ इसने समझा है, उसमें इसकी तुच्छबुद्धि कराकर अश्रद्धा उत्पन्न कर देनेमे भी इसका हित नहीं है, अतः इसकी बातका उत्तर न देना ही ठीक है।' पितासे अपनी बातका समर्थन न पाकर भृगुने फिर प्रार्थना की—'भगवन् ! यदि मैने ठीक नहीं समझा हो तो आप मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।' तब वरुणने कहा—'तू तपके द्वारा ब्रह्मके तत्त्वको समझनेकी कोशिश कर। यह तप ब्रह्मका ही स्वरूप है, अतः यह उनका बोध करानेमें सर्वथा समर्थ है।' इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर भृगु ऋषि पुनः पहलेकी भाँति तपोमय जीवन बिताते हुए, पितासे पहले सुने हुए उपदेशके अनुसार ब्रह्मका स्वरूप निश्चय करनेके लिये विचार करते रहे। इस प्रकार तप करके उन्होंने क्या किया, यह बात अगले अनुवाकमे कही गयी है। ॥ द्वितीय अनुवाक समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय अनुवाक प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात्। प्राणाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। प्राणेन जातानि जीवन्ति। प्राणं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तम् होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा। प्राणः = प्राण, ब्रह्म = ब्रह्म है, इति = इस प्रकार, व्यजानात् = जाना; हि = क्योकि, खलु = सचमुच, प्राणात् = प्राणसे; एव = ही, इमानि = ये समस्त, भूतानि = प्राणी, जायन्ते = उत्पन्न होते हैं, जातानि = उत्पन्न होकर, प्राणेन = प्राणसे ही; जीवन्ति = जीते हैं, (और) प्रयन्ति = (अन्तमें यहाँसे) प्रयाण करते हुए, प्राणम् अभिसंविशन्ति = प्राणमें ही सब प्रकारसे प्रविष्ट हो जाते हैं, इति = इस प्रकार, तत् = उसे, विज्ञाय = जानकर, पुनः = फिर; पितरम् वरुणम् एव उपससार = (अपने) पिता वरुणके ही पास गया (और वहाँ उसने अपना निश्चय सुनाया, जब पिताने उत्तर नहीं दिया, तब वह बोला—); भगवः = भगवन्, (मुझे) ब्रह्म अधीहि = ब्रह्मका उपदेश दीजिये, इति = इस प्रकार प्रार्थना करनेपर, ह तम् उवाच = सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिमे उससे कहा, ब्रह्म = ब्रह्मको, तपसा = तपसे, विजिज्ञासस्व = तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर; तपः = तप ही, ब्रह्म = ब्रह्म अर्थात् उनकी प्राप्तिका बड़ा साधन है, इति = इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर, सः = उसने; (पुनः) तपः अतप्यत = तप किया; सः = उसने, तपः तप्त्वा = तप करके—

३५२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या-भृगुने पिताके उपदेशानुसार तपके द्वारा यह निश्चय किया कि प्राण ही ब्रह्म है; उन्होंने सोचा, पिताजीद्वारा बताये हुए ब्रह्मके लक्षण प्राणमें पूर्णतया पाये जाते हैं। समस्त प्राणी प्राणसे उत्पन्न होते हैं, अर्थात् एक जीवित प्राणीसे उसीके सदृश दूसरा प्राणी उत्पन्न होता हुआ प्रत्यक्ष देखा जाता है, तथा सभी प्राणसे ही जीते हैं। यदि श्वासका आना-जाना बंद हो जाय, यदि प्राणद्वारा अन्न ग्रहण न किया जाय तथा अन्नका रस समस्त शरीरमें न पहुँचाया जाय, तो कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह सकता। और मरनेके बाद सब प्राणमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं। यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि मृत शरीरमें प्राण नहीं रहते, अतः निःसंदेह प्राण ही ब्रह्म है, यह निश्चय करके वे पुनः अपने पिता वरुणके पास गये। पहलेकी भाँति अपने निश्चयके अनुसार उन्होंने पुनः पितासे अपना अनुभव निवेदन किया। पिताने फिर भी कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने सोचा कि यह पहलेकी अपेक्षा तो कुछ सूक्ष्मतामें पहुँचा है, परन्तु अभी बहुत कुछ समझना शेष है, अतः उत्तर न देनेसे अपने-आप इसकी जिज्ञासामें बल आयेगा, अतः उत्तर न देना ही ठीक है। पिताजीसे अपनी बातका समर्थन न पाकर भृगुने फिर उनसे प्रार्थना की—'भगवन् ! यदि अब भी मैने ठीक न समझा हो तो आप ही कृपा करके मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।' तब वरुणने पुनः वही बात कही—'तू तपके द्वारा ब्रह्मको जाननेकी चेष्टा कर, यह तप ही ब्रह्म है, अर्थात् ब्रह्मके तत्त्वको जाननेका प्रधान साधन है।' इस प्रकार पिताजीकी आज्ञा पाकर भृगु ऋषि फिर उसी प्रकार तपस्या करते हुए पिताके उपदेशपर विचार करते रहे। तपस्या करके उन्होंने क्या किया, यह अगले अनुवाकमें बताया गया है। ॥ तृतीय अनुवाक समाप्त ॥ ३ ॥ चतुर्थ अनुवाक मनो ब्रह्मेति व्यजानात् । मनसो ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । मनसा जातानि जीवन्ति । मनः प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳ होवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा । मनः=मन; ब्रह्म= ब्रह्म है, इति=इस प्रकार, व्यजानात्=समझा, हि=क्योंकि, खलु=सचमुच, मनसः=मनसे, एव=ही, इमानि=ये समस्त, भूतानि=प्राणी, जायन्ते = उत्पन्न होते हैं, जातानि = उत्पन्न होकर, मनसा=मनसे ही, जीवन्ति=जीते हैं, (तथा) प्रयन्ति=(इस लोकसे) प्रयाण करते हुए, (अन्तमें) मनः अभिसंविशन्ति=मनमें ही सब प्रकारसे प्रविष्ट हो जाते हैं, इति = इस प्रकार, तत्=उस ब्रह्मको, विज्ञाय= जानकर, पुनः एव=फिर भी, पितरम्= अपने पिता; वरुणम् उपससार=वरुणके पास गया (और अपनी बातका कोई उत्तर न पाकर बोला—), भगवः =भगवन्; (मुझे) ब्रह्म अधीहि=ब्रह्मका उपदेश दीजिये, इति= इस प्रकार (प्रार्थना करनेपर), ह तम् उवाच = सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिने उससे कहा; ब्रह्म= ब्रह्मको, तपसा=तपसे, विजिज्ञासस्व=तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर; तपः=तप ही, ब्रह्म= ब्रह्म है, इति=इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर, सः=उसने, तपः अतप्यत=तप किया, सः=उसने, तपः तप्त्वा=तप करके— व्याख्या—इस बार भृगुने पिताके उपदेशानुसार यह निश्चय किया कि मन ही ब्रह्म है, क्योंकि उन्होंने सोचा, पिताजीके बताये हुए ब्रह्मके सारे लक्षण मनमें पाये जाते हैं। मनसे सब प्राणी उत्पन्न होते हैं—स्त्री और पुरुषके मानसिक प्रेमपूर्ण सम्बन्धसे ही प्राणी बीजरूपसे माताके गर्भमें आकर उत्पन्न होते हैं; उत्पन्न होकर मनसे ही इन्द्रियोंद्वारा समस्त जीवनोपयोगी वस्तुओंका उपभोग करके जीवित रहते हैं और मरनेके बाद मनमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं—मरनेके बाद इस शरीरमें प्राण और इन्द्रियाँ नहीं रहतीं, इसलिये मन ही ब्रह्म है। इस प्रकार निश्चय करके वे पुनः पहलेकी भाँति अपने पिता वरुणके पास गये और अपने अनुभवकी बात पिताजीको सुनायी। इस बार भी पितासे कोई उत्तर नहीं मिला। पिताने सोचा कि यह पहलेकी अपेक्षा तो गहराईमें उतरा है, परंतु अभी इसे और भी तपस्या करनी चाहिये, अतः उत्तर न देना ही ठीक है। पितासे अपनी बातका उत्तर न पाकर भृगुने पुनः पहलेकी भाँति प्रार्थना की—'भगवन् ! यदि मैंने ठीक न समझा हो तो कृपया आप ही मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।' तब वरुणने पुनः वही उत्तर दिया—'तू तपके द्वारा ब्रह्मके तत्त्वको जाननेकी

  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३५३ इच्छा कर। अर्थात् तपस्या करते हुए मेरे उपदेशपर पुनः विचार कर। यह तपरूप साधन ही ब्रह्म है। ब्रह्मको जानने- का इससे बढ़कर दूसरा कोई उपाय नही है।' इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर भृगुने पुनः पहलेकी भाँति संयमपूर्वक रहकर पिताके उपदेशपर विचार किया। विचार करके उन्होंने क्या किया, यह बात अगले अनुवाकमे कही गयी है। ॥ चतुर्थ अनुवाक समाप्त ॥ ४ ॥ पञ्चम अनुवाक विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात् । विज्ञानाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । विज्ञानेन जातानि जीवन्ति । विज्ञानं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳहोवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा । विज्ञानम् = विज्ञान; ब्रह्म = ब्रह्म है; इति = इस प्रकार, व्यजानात् = जाना; हि = क्योकि, खलु = सचमुच; विज्ञानात् = विज्ञानसे, एव = ही, इमानि = ये समस्त, भूतानि = प्राणी, जायन्ते = उत्पन्न होते हैं, जातानि = उत्पन्न होकर, विज्ञानेन = विज्ञानसे ही, जीवन्ति = जीते हैं, (और) प्रयन्ति = अन्तमें यहाँसे प्रयाण करते हुए, विज्ञानम् अभिसंविशन्ति = विज्ञानमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं, इति = इस प्रकार; तत् = ब्रह्मको, विज्ञाय = जानकर, पुनः एव = (वह) पुनः उसी प्रकार; पितरम् = अपने पिता; वरुणम् उपससार = वरुणके पास गया, (और अपनी बातका उत्तर न मिलनेपर बोला-) भगवः = भगवन् !, (मुझे) ब्रह्म अधीहि = ब्रह्मका उपदेश दीजिये; इति = इस प्रकार कहनेपर, ह तम् उवाच = सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिणे उससे कहा, ब्रह्म = ब्रह्मको, तपसा = (तू) तपके द्वारा; विजिज्ञासस्व = तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर, तपः = तप ही, ब्रह्म = ब्रह्म है, इति = इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर; सः = उसने, तपः अतप्यत = पुनः तप किया; सः = उसने; तपः तप्त्वा = तप करके- व्याख्या-इस बार उन्होंने पिताके उपदेशानुसार यह निश्चय किया कि यह विज्ञानस्वरूप चेतन जीवात्मा ही ब्रह्म है; क्योंकि उन्होंने सोचा-पिताजीने जो ब्रह्मके लक्षण बताये थे, वे सब-के-सब पूर्णतया इसमें पाये जाते हैं। ये समस्त प्राणी जीवात्मासे ही उत्पन्न होते हैं, सजीव चेतन प्राणियोंसे ही प्राणियोंकी उत्पत्ति प्रत्यक्ष देखी जाती है। उत्पन्न होकर इस विज्ञान- स्वरूप जीवात्मासे ही जीते हैं, यदि जीवात्मा न रहे तो ये मन, इन्द्रियाँ, प्राण आदि कोई भी नहीं रह सकते और कोई भी अपना-अपना काम नहीं कर सकते। तथा मरनेके बाद ये मन आदि सब जीवात्मामें ही प्रविष्ट हो जाते हैं-जीवके निकल जानेपर मृत शरीरमें ये सब देखनेमें नहीं आते। अतः विज्ञानस्वरूप जीवात्मा ही ब्रह्म है। यह निश्चय करके वे पहलेकी भाँति अपने पिता वरुणके पास आये। आकर अपने निश्चित अनुभवकी बात पिताजीको सुनायी। इस बार भी पिताजीने कोई उत्तर नही दिया। पिताने सोचा-'इस बार यह बहुत कुछ ब्रह्मके निकट आ गया है, इसका विचार स्थूल और सूक्ष्म-दोनों प्रकारके जडतत्त्वोंसे ऊपर उठकर चेतन जीवात्मातक तो पहुँच गया है। परंतु ब्रह्मका स्वरूप तो इससे भी विलक्षण है, वे तो नित्य आनन्दस्वरूप एक अद्वितीय परमात्मा हैं; इसे अभी और तपस्या करनेकी आवश्यकता है, अतः उत्तर न देना ही ठीक है।' इस प्रकार बार-बार पिताजीसे कोई उत्तर न मिलनेपर भी भृगु हतोत्साह या निराश नहीं हुए। उन्होंने पहलेकी भाँति पुनः पिताजीसे वही प्रार्थना की- 'भगवन् ! यदि मैंने ठीक न समझा हो तो आप मुझे ब्रह्मका रहस्य बतलाइये।' तब वरुणने पुनः वही उत्तर दिया-'तू तपके द्वारा ही ब्रह्मके तत्त्वको जाननेकी इच्छा कर। अर्थात् तपस्यापूर्वक उसका पूर्व- कथनानुसार विचार कर। तप ही ब्रह्म है।' इस प्रकार पिताजीकी आज्ञा पाकर भृगुने पुनः पहलेकी भाँति संयमपूर्वक रहते हुए पिताके उपदेशपर विचार किया। विचार करके उन्होंने क्या किया, यह आगे बताया गया है। ॥ अनुवाक ॥ ५ ॥ उ० सं० ४५-

३५४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * षष्ठ अनुवाक आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् । आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । आनन्देन जातानि जीवन्ति । आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । सैषा भार्गवी वारुणी विद्या परमे व्योमन् प्रतिष्ठिता । स य एवं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या । आनन्दः = आनन्द ही; ब्रह्म = ब्रह्म है, इति = इस प्रकार; व्यजानात् = निश्चयपूर्वक जाना; हि = क्योंकि; खलु = सचमुच; आनन्दात् = आनन्दसे, एव = ही, इमानि = ये समस्त; भूतानि = प्राणी; जायन्ते = उत्पन्न होते हैं; जातानि = उत्पन्न होकर, आनन्देन = आनन्दसे ही, जीवन्ति = जीते हैं, (तथा) प्रयन्ति = इस लोकसे प्रयाण करते हुए; (अन्तमें) आनन्दम् अभिसंविशन्ति = आनन्दमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं; इति = इस प्रकार (जाननेपर उसे परब्रह्मका पूरा ज्ञान हो गया), सा = वह; एषा = यह, भार्गवी = भृगुकी जानी हुई; वारुणी = और वरुणद्वारा उपदेश की हुई; विद्या = विद्या. परमे व्योमन् = विशुद्ध आकाशस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें, प्रतिष्ठिता = प्रतिष्ठित है अर्थात् पूर्णतः स्थित है; यः = जो कोई (दूसरा साधक) भी, एवम् = इस प्रकार (आनन्दस्वरूप ब्रह्मको), वेद = जानता है, सः = वह; (उस विशुद्ध आकाशस्वरूप परमानन्दमे) प्रतितिष्ठति = स्थित हो जाता है, (इतना ही नहीं, इस लोकमें लोगोंके देखनेमें भी वह) अन्नवान् = बहुत अन्नवाला, अन्नादः = और अन्नको भलीभाँति पचानेकी शक्तिवाला; भवति = हो जाता है, (तथा) प्रजया = सन्तानसे; पशुभिः = पशुओंसे, (तथा) ब्रह्मवर्चसेन = ब्रह्मतेजसे सम्पन्न होकर, महान् = महान्; भवति = हो जाता है, कीर्त्या [अपि] = उत्तम कीर्तिके द्वारा भी, महान् = महान्; [भवति = हो जाता है।] व्याख्या-इस बार भृगुने पिताके उपदेशपर गहरा विचार करके यह निश्चय किया कि आनन्द ही ब्रह्म है। ये आनन्दमय परमात्मा ही अन्नमय आदि सबके अन्तरात्मा हैं। वे सब भी इन्हींके स्थूल रूप हैं। इसी कारण उनमें ब्रह्मबुद्धि होती है और ब्रह्मके आंशिक लक्षण पाये जाते हैं। परतु सर्वोत्तमे ब्रह्मके लक्षण आनन्दमें ही घटते हैं, क्योंकि ये समस्त प्राणी उन आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्मासे ही सृष्टिके आदिमें उत्पन्न होते हैं- इन सबके आदि कारण तो वे ही हैं। तथा इन आनन्दमयके आनन्दका लेश पाकर ही ये सब प्राणी जी रहे हैं-कोई भी दुःखके साथ जीवित रहना नहीं चाहता। इतना ही नहीं, उन आनन्दमय सर्वान्तर्यामी परमात्माकी अचिन्त्यशक्तिकी प्रेरणासे ही इस जगत्के समस्त प्राणियोंकी सारी चेष्टाएँ हो रही हैं। उनके शासनमें रहनेवाले सूर्य आदि यदि अपना-अपना काम न करें तो एक क्षण भी कोई प्राणी जीवित नहीं रह सकता। सबके जीवनाधार सचमुच वे आनन्दस्वरूप परमात्मा ही हैं। तथा प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंसे भरा हुआ यह ब्रह्माण्ड उन्हींमें प्रविष्ट होता है-उन्हींमें विलीन होता है; वे ही सबके सब प्रकारसे सदा-सर्वदा आधार हैं। इस प्रकार अनुभव होते ही भृगुको परब्रह्मका यथार्थ ज्ञान हो गया। फिर उन्हें किसी प्रकारकी जिज्ञासा नहीं रही। श्रुति स्वय उस विद्याकी महिमा बतलानेके लिये कहती है-वही यह वरुणद्वारा बतायी हुई और भृगुको प्राप्त हुई ब्रह्मविद्या (ब्रह्मका रहस्य बतानेवाली विद्या) है। यह विद्या विशुद्ध आकाशस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें स्थित है। वे ही इस विद्याके भी आधार हैं। जो कोई मनुष्य भृगुकी भाँति तपस्यापूर्वक इसपर विचार करके परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्माको जान लेता है, वह भी उन विशुद्ध परमानन्दस्वरूप परमात्मामे स्थित हो जाता है। इस प्रकार इस विद्याका वास्तविक फल बताकर मनुष्योंको उस साधनकी ओर लगानेके लिये उपर्युक्त प्रकारसे अन्न, प्राण आदि समस्त तत्त्वोंके रहस्य विज्ञानपूर्वक ब्रह्मको जाननेवाले ज्ञानीके शरीर और अन्तःकरणमें जो स्वाभाविक विलक्षण शक्तियाँ उत्पन्न हो जाती हैं, उनको भी श्रुति बतलाती है। वह अन्नवान् अर्थात् नाना प्रकारके जीवनयात्रोपयोगी भोगोंसे सम्पन्न हो जाता है और उन सबको सेवन करनेकी सामर्थ्य भी उसमें आ जाती है। अर्थात् उसके मन, इन्द्रियों और शरीर सर्वथा निर्विकार और नीरोग हो जाते हैं। इतना ही नहीं, वह सन्तानसे, पशुओंसे, ब्रह्मतेजसे और बड़ी भारी कीर्तिसे समृद्ध होकर जगत्में सर्वश्रेष्ठ समझा जाता है। ॥ षष्ठ अनुवाक समाप्त ॥ ६ ॥

ॐ तैत्तिरीयोपनिषद् ॐ ३५५ सप्तम अनुवाक सम्बन्ध—छठे अनुवाकमें ब्रह्मज्ञानीके अन्न और प्रजा आदिसे सम्पन्न होनेकी बात कही गयी, उसपर यह जिज्ञासा होती है कि ये सब सिद्धियाँ भी क्या ब्रह्माक्षात्कार होनेपर ही मिलती हैं, या इन्हें प्राप्त करनेका दूसरा उपाय भी है। इसपर उन सबकी प्राप्तिके दूसरे उपाय भी बताये जाते हैं— अन्नं न निन्द्यात् । तद्व्रतम् । प्राणो वा अन्नम् । शरीरमन्नादम् । प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम् । शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या । अन्नम् न निन्द्यात् = अन्नकी निन्दा न करे; तत् = वह; व्रतम् = व्रत है. प्राण.= प्राण, वै = ही; अन्नम् = अन्न है; (और) शरीरम् = शरीर; (उस प्राणरूप अन्नसे जीनेके कारण) अन्नादम् = अन्नका भोक्ता है; शरीरम् = शरीर; प्राणे = प्राणके आधारपर, प्रतिष्ठितम् = स्थित हो रहा है; (और) शरीरे = शरीरके आधारपर; प्राण.= प्राण. प्रतिष्ठितः = स्थित हो-रहे हैं; तत् = इस तरह, एतत् = यह, अन्ने = अन्नमें ही, अन्नम् = अन्न, प्रतिष्ठितम् = स्थित हो रहा है, यः = जो मनुष्य; अन्ने = अन्नमें ही; अन्नम् = अन्न, प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित हो रहा है; एतत् = इस रहस्यको, वेद = जानता है; सः = वह; प्रतितिष्ठति = उसमें प्रतिष्ठित हो जाता है; (अतः) अन्नवान् = अन्नवाला, (और) अन्नादः = अन्नको खानेवाला, भवति = हो जाता है, प्रजया = प्रजासे, पशुभि.= पशुओंसे, ब्रह्मवर्चसेन = (और) ब्रह्मतेजसे सम्पन्न होकर महान् = महान्; भवति = बन जाता है; (तथा) कीर्त्या = कीर्तिसे (सम्पन्न होकर भी); महान् = महान्; [भवति = हो जाता है।] व्याख्या—इस अनुवाकमें अन्नका महत्त्व बतलाकर उसे जाननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि जो मनुष्य अन्नादिसे सम्पन्न होना चाहे, उसे सबसे पहले तो यह व्रत लेना चाहिये कि 'मैं कभी अन्नकी निन्दा नहीं करूँगा।' यह एक साधारण नियम है कि जिस किसी वस्तुको मनुष्य पाना चाहता है, उसके प्रति उसकी महत्त्वबुद्धि होनी चाहिये, तभी वह उसके लिये प्रयत्न करेगा। जिसकी चित्तमें हेयबुद्धि है, वह उसकी ओर आँख उठाकर देखेगा भी नहीं। अन्नकी निन्दा न करनेका व्रत लेकर अन्नके इस महत्त्वको समझना चाहिये कि अन्न ही प्राण है, और प्राण ही अन्न है, क्योंकि अन्नसे ही प्राणोंमें बल आता है और प्राणशक्तिसे ही अन्नमय शरीरमें जीवनी-शक्ति आती है। यहाँ प्राणको अन्न इसलिये भी कहा है कि यही शरीरमें अन्नके रसको सर्वत्र फैलाता है। शरीर प्राणके ही आधार टिका हुआ है, इसीलिये वह प्राणरूप अन्नका भोक्ता है। शरीर प्राणमें स्थित है अर्थात् शरीरकी स्थिति प्राणके अधीन है और प्राण शरीरमें स्थित है—प्राणोंका आधार शरीर है, यह बात प्रत्यक्ष है ही। इस प्रकार यह अन्नमय शरीर भी अन्न है। यह अनुभवसिद्ध विषय है कि प्राणोंको आहार न मिलनेपर वे शरीरकी धातुओंको ही सोख लेते हैं। और शरीरकी स्थिति प्राणके अधीन होनेसे प्राण भी अन्न ही हैं। अतः शरीर और प्राणका अन्योन्याश्रय सम्बन्ध होनेसे यह कहा गया है कि अन्नमे ही अन्न स्थित हो रहा है। यही इसका तत्त्व है। जो मनुष्य इस रहस्यको समझ लेता है, वही शरीर और प्राण—इन दोनोंका ठीक ठीक उपयोग कर सकता है। इसीलिये यह कहा गया है कि वह शरीर और प्राणके विज्ञानमें पारङ्गत हो जाता है। और इसी विज्ञानके फलस्वरूप वह सब प्रकारकी भोगसामग्रीसे युक्त और उसे उपभोगमें लानेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। और इसीलिये वह सन्तानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और ब्रह्मतेजसे भी सम्पन्न होकर महान् बन जाता है। उसकी कीर्ति, उसका यश जगत्में फैल जाता है और उसके द्वारा भी वह जगत्में महान् हो जाता है। ॥ सप्तम अनुवाक समाप्त ॥ ७ ॥ 🙞···🙜 अष्टम अनुवाक अन्नं न परिचक्षीत । तद्व्रतम् । आपो वा अन्नम् । ज्योतिरन्नादम् । अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम् ।

३५६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान्कीर्त्या । अन्नम् न परिचक्षीत = अन्नकी अवहेलना न करे; तत् = वह; व्रतम् = एक व्रत है, आपः = जल; वै = ही; अन्नम् = अन्न है, ( और ) ज्योतिः = तेज, अन्नादम् = ( रसस्वरूप ) अन्नका भोक्ता है; अप्सु = जलमें; ज्योतिः = तेज; प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है, ज्योतिषि = तेजमें, आपः = जल, प्रतिष्ठिताः = प्रतिष्ठित है, तत् = वही; एतत् = यह; अन्ने = अन्नमें, अन्नम् = अन्न, प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है, यः = जो मनुष्य, ( इस प्रकार ) अन्ने = अन्नमें, अन्नम् = अन्न; प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है; एतत् = इस रहस्यको, वेद = भलीभाँति समझता है, सः = वह, ( अन्तमे ) प्रतितिष्ठति = ( उस रहस्यमे ) परिनिष्ठित हो जाता है, ( तथा ) अन्नवान् = अन्नवाला, ( और ) अन्नादः = अन्नको खानेवाला; भवति = हो जाता है; प्रजया = ( वह ) संतानसे; पशुभिः = पशुओंसे, ( और ) ब्रह्मवर्चसेन = ब्रह्मतेजसे, महान् = महान्; भवति = बन जाता है, ( तथा ) कीर्त्या = कीर्तिसे ( समृद्ध होकर भी ); महान् = महान्, [ भवति = हो जाता है । ] व्याख्या - इस अनुवाकमें जल और ज्योति दोनोंको अन्नरूप बताकर उन्हें जाननेका फल बतलाया है । भाव यह है कि जिस मनुष्यकी अन्नादिसे सम्पन्न होनेकी इच्छा हो, उसे यह नियम ले लेना चाहिये कि 'मैं कभी अन्नकी अवहेलना नहीं करूँगा अर्थात् अन्नका उल्लङ्घन, दुरुपयोग और परित्याग नहीं करूँगा एव उसे जूठा नहीं छोड़ें गा ।' यह साधारण नियम है कि जो जिस वस्तुका अनादर करता है, उसके प्रति उपेक्षाबुद्धि रखता है, वह वस्तु उसका कभी वरण नहीं करती । किसी भी वस्तुको प्राप्त करनेके लिये उसके प्रति आदरबुद्धि रखना परमावश्यक है । जिसकी जिसमें आदरबुद्धि नहीं है, वह उसे पानेकी इच्छा अथवा चेष्टा क्यों करेगा । इस प्रकार अन्नकी अवहेलना न करनेका व्रत लेकर फिर अन्नके इस तत्त्वको समझना चाहिये कि जल ही अन्न है; क्योंकि सब प्रकारके अन्न अर्थात् खाद्य वस्तुएँ जलसे ही उत्पन्न होती हैं। और ज्योति अर्थात् तेज ही इस जलरूप अन्नको भक्षण करनेवाला है । जिस प्रकार अग्नि एवं सूर्यरश्मियाँ आदि बाहरके जलका शोषण करती हैं, उसी प्रकार शरीरमें रहनेवाली जठराग्नि शरीरमें जानेवाले जलीय तत्त्वोंका शोषण करती है । जलमें ज्योति प्रतिष्ठित है। यद्यपि जल स्वभावतः ठंडा है, अतएव उसमें उष्ण ज्योति कैसे स्थित है- यह बात समझमें नहीं आती, तथापि शास्त्रोंमें यह माना गया है कि समुद्रमे वडवानल रहता है तथा आजकलके वैज्ञानिक भी जलमेंसे बिजली-तत्त्वको निकालते हैं। इससे यह बात सिद्ध होती है कि जलमें तेज स्थित है । इसी प्रकार तेजमें जल स्थित है, यह तो प्रत्यक्ष देखनेमें आता ही है, क्योंकि सूर्यकी प्रखर किरणोंमें स्थित जल ही हमलोगोंके सामने वृष्टिके रूपमें प्रत्यक्ष होता है । इस प्रकार ये जल और तेज अन्योन्याश्रित होनेके कारण समस्त अन्नरूप खाद्य पदार्थोंके कारण हैं, अतः ये ही उनके रूपमें परिणत होते हैं, इसलिये दोनों अन्न ही हैं। इस प्रकार अन्न ही अन्नमें प्रतिष्ठित है। जो मनुष्य इस तत्त्वको समझ लेता है, वह इन दोनोंके विज्ञानमें प्रतिष्ठित अर्थात् सिद्ध हो जाता है, क्योंकि वही इन दोनोंका ठीक उपयोग कर सकता है । और इसीके फलस्वरूप वह अन्नसे अर्थात् सब प्रकारकी भोग-सामग्रीसे सम्पन्न और उन सबको यथायोग्य उपभोगमें लानेकी सामर्थ्यसे युक्त हो जाता है। और इसीलिये वह संतानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और ब्रह्मतेजसे सम्पन्न हो महान् हो जाता है। इतना ही नहीं, इस समृद्धिके कारण उसका यश सर्वत्र फैल जाता है, वह बड़ा भारी यशस्वी हो जाता है । और उस यशके कारण भी वह महान् हो जाता है । ॥ अष्टम अनुवाक समाप्त ॥ ८ ॥ नवम अनुवाक अन्नं बहु कुर्वीत । तद् व्रतम् । पृथिवी वा अन्नम् । आकाशोऽन्नादः । पृथिव्यामाकाशः प्रतिष्ठितः । आकाशे पृथिवी प्रतिष्ठिता । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान्कीर्त्या ।

  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३५७

-अन्नम् = अन्नको; बहु कुर्वीत = बढ़ाये; तत् = वह; व्रतम् = एक व्रत है; पृथिवी = पृथ्वी; वै = ही; अन्नम् = अन्न है; आकाशः = आकाश; अन्नादः = पृथ्वीरूप अन्नका आधार होनेसे (मानो) अन्नाद है; पृथिव्याम् = पृथ्वीमें, आकाशः = आकाश; प्रतिष्ठितः = प्रतिष्ठित है; आकाशे = आकाशमे, पृथिवी = पृथ्वी; प्रतिष्ठिता = प्रतिष्ठित है; तत् = वही; एतत् = यह, अन्ने = अन्नमें; अन्नम् = अन्न, प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है, यः = जो मनुष्य; (इस प्रकार) अन्ने = अन्नमें, अन्नम् = अन्न; प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है, एतत् = इस रहस्यको; वेद = भलीभाँति जान लेता है; सः = वह; (उस विषयमें) प्रतितिष्ठति = प्रतिष्ठित हो जाता है, अन्नवान् = अन्नवाला; (और) अन्नादः = अन्नको खानेवाला अर्थात् उसे पचानेकी शक्तिवाला, भवति = हो जाता है, प्रजया = (वह) प्रजासे; पशुभिः = पशुओंसे, (और) ब्रह्मवर्चसेन = ब्रह्मतेजसे; महान् = महान्, भवति = बन जाता है; कीर्त्या = कीर्तिसे, [च = भी;] महान् = महान्; [भवति = हो जाता है।] व्याख्या—इस अनुवाकमें पृथ्वी और आकाश दोनोंको अन्नरूप बताकर उनके तत्त्वको जाननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि जिस मनुष्यको अन्नादिसे समृद्ध होनेकी इच्छा हो, उसे पहले तो यह व्रत लेना चाहिये—यह दृढ़ संकल्प करना चाहिये कि 'मैं अन्नको खूब बढ़ाऊँगा।' किसी वस्तुका अभ्युदय—उसका विस्तार चाहना ही उसे आकर्षित करनेका सबसे श्रेष्ठ उपाय है। जो जिस वस्तुको क्षीण करनेपर तुला हुआ है, वह वस्तु उसे कदापि नहीं मिल सकती और मिलनेपर टिकेगी नहीं। इसके बाद अन्नके इस तत्त्वको समझना चाहिये कि पृथ्वी ही अन्न है—जितने भी अन्न है वे सब पृथ्वीसे ही उत्पन्न होते हैं। और पृथ्वीको अपनेमें विलीन कर लेनेवाला इसका आधारभूत आकाश ही अन्नाद अर्थात् इस अन्नका भोक्ता है। पृथ्वीमें आकाश स्थित है, क्योंकि वह सर्वव्यापी है, और आकाशमें पृथ्वी स्थित है—यह बात प्रत्यक्ष- सिद्ध है। ये दोनों ही एक दूसरेके आधार होनेके कारण अन्नस्वरूप हैं। पाँच भूतोंमें आकाश पहला तत्त्व है और पृथ्वी अन्तिम तत्त्व है, बीचके तीनों तत्त्व इन्हींके अन्तर्गत हैं। समस्त भोग्यपदार्थरूप अन्न इन पाँच महाभूतोंके ही कार्य हैं; अतः ये ही अन्नके रूपमें स्थित हैं। इसलिये अन्नमें ही अन्न प्रतिष्ठित है। जो मनुष्य इस बातको तत्त्वसे जानता है कि पृथ्वीरूप अन्नमें आकाशरूप अन्न और आकाशरूप अन्नमें पृथ्वीरूप अन्न प्रतिष्ठित है, वही सम्पूर्ण भूतोंका यथायोग्य उपयोग कर सकता है और इसीलिये वह इस विषयमें सिद्ध हो जाता है। इसी विज्ञानके फलस्वरूप वह अन्नसे अर्थात् सब प्रकारके भोग्य पदार्थोंसे और उनको उपभोगमें लानेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। और इसीलिये वह सन्तानसे, नाना प्रकारके पशुओंसे और विद्याके तेजसे समृद्ध हो महान् बन जाता है। उसका यश समस्त जगत्में फैल जाता है, अतः वह यशके द्वारा भी महान् हो जाता है। ॥ नवम अनुवाक समाप्त ॥ ९ ॥

दशम अनुवाक न कंचन वसतौ प्रत्याचक्षीत । तद् व्रतम् । तस्माद्यया कया च विधया बह्वन्नं प्राप्नुयात् । अराध्यस्मा अन्नमित्याचक्षते । एतद्वै मुखतोऽन्नꣳराद्धम् । मुखतोऽस्मा अन्नꣳराध्यते । एतद्वै मध्यतोऽ- न्नꣳराद्धम् । मध्यतोऽस्मा अन्नꣳराध्यते । एतद्वा अन्ततोऽन्नꣳराद्धम् । अन्ततोऽस्मा अन्नꣳराध्यते । य एवं वेद । वसतौ = अपने घरपर (ठहरनेके लिये आये हुए); कंचन = किसी (भी अतिथि) को; न प्रत्याचक्षीत = प्रतिकूल उत्तर न दे, तत् = वह, व्रतम् = एक व्रत है, तस्मात् = इसलिये, (अतिथि-सत्कारके लिये) यया कया च विधया = जिस किसी भी प्रकारसे, बहु = बहुत-सा, अन्नम् = अन्न, प्राप्नुयात् = प्राप्त करना चाहिये, (क्योंकि सद्गृहस्थ) अस्मै = इस (घरपर आये हुए अतिथि) से, अन्नम् = भोजन, अराधि = तैयार है; इति = यों, आचक्षते = कहते हैं, (यदि यह अतिथिको) मुखतः = मुख्यवृत्तिसे अर्थात् अधिक श्रद्धा, प्रेम और सत्कारपूर्वक, एतत् = यह, राद्धम् = तैयार किया हुआ, 'अन्नम् = भोजन (देता है तो), वै = निश्चय ही, अस्मै = इस (दाता) को, मुखतः = अधिक आदर-सत्कारके साथ ही, अन्नम् =

३५८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *


अन्नं, राध्यते= प्राप्त होता है; (यदि यह अतिथिको ) मध्यतः=मध्यम श्रेणीकी श्रद्धा और प्रेमसे; एतत् = यह; राद्धम् = तैयार किया हुआ; अन्नम् = भोजन (देता है तो); चै = निःसन्देह; अस्मै = इस (दाता) को; मध्यतः = मध्यम श्रद्धा और प्रेमसे ही, अन्नम् राध्यते=अन्न प्राप्त होता है; (और यदि यह अतिथिको) अन्ततः = निकृष्ट श्रद्धा-सत्कारसे, एतत् = यह; राद्धम् = तैयार किया हुआ; अन्नम् = भोजन (देता है तो), वै = अवश्य ही; अस्मै = इस (दाता) को, अन्ततः = निकृष्ट श्रद्धा आदिसे; अन्नम् = अन्न; राध्यते = मिलता है; यः = जो; एवम् = इस प्रकार; वेद = इस रहस्यको जानता है (वह अतिथिके साथ बहुत उत्तम बर्ताव करता है)।

**व्याख्या—**दसवें अनुवाकके इस अंशमें अतिथि-सेवाका महत्त्व और फल बताया गया है। भाव यह है कि जो मनुष्य अतिथि-सेवाका पूरा लाभ उठाना चाहे, उसको सबसे पहले तो यह नियम लेना चाहिये कि 'मेरे घरपर जो कोई अतिथि आश्रयकी आशासे पधारेगा, मैं कभी उसको सूखा जवाब देकर निराश नहीं लौटाऊँगा।' 'अतिथिदेवो भव'— अतिथिकी देवताबुद्धिसे सेवा करो—यह उपदेश गुरुके द्वारा स्नातक शिष्यको पहले ही दिया जा चुका है। इस प्रकारका नियम लेनेपर ही अतिथि-सेवा सम्भव है। यह व्रत लेकर इसका पालन करनेके लिये—केवल अपना तथा कुटुम्बका पोषण करनेके लिये ही नहीं—जिस किसी भी न्यायोचित उपायसे बहुत से अन्नका उपार्जन करे। धन-सम्पत्ति और अन्नादि, जो शरीरके पालन पोषणके लिये उपयोगी सामग्री हैं, उन्हें प्राप्त करनेके लिये जितने भी न्यायोचित उपाय बताये गये हैं तथा पूर्वके तीन अनुवाकोंमें भी जो-जो उपाय बताये गये हैं, उनमेंसे किसीके भी द्वारा बहुत-सा अन्न प्राप्त करना चाहिये। अर्थात् अतिथि-सेवाके लिये आवश्यक वस्तुओंका अधिक मात्रामे सङ्ग्रह करना चाहिये; क्योंकि अतिथि-सेवा गृहस्थोचित सदाचारका एक अत्यावश्यक अङ्ग है। अच्छे प्रतिश्रित मनुष्य घरपर आये हुए अतिथिसे यही कहते हैं—'आइये, बैठिये; भोजन तैयार है, भोजन कीजिये' इत्यादि। वे यह कदापि नहीं कहते कि हमारे यहाँ आपकी सेवाके लिये उपयुक्त वस्तुएँ अथवा रहनेका स्थान नहीं है। जो मनुष्य अपने घरपर आये हुए अतिथिकी अधिक आदर-सत्कारपूर्वक उत्तमभावसे विशुद्ध सामग्रियोंद्वारा सेवा करता है—उसे शुद्धतापूर्वक तैयार किया हुआ भोजन देता है, उसको भी उत्तमभावसे ही अन्न प्राप्त होता है अर्थात् उसे भोग्य-पदार्थाके संग्रह करनेमें कठिनाईका सामना नहीं करना पड़ता। अतिथि-सेवाके प्रभावसे उसे किसी बातकी कमी नहीं रहती। अनायास उसकी सारी आवश्यकताएँ पूर्ण होती रहती हैं। यदि वह आये हुए अतिथिकी मध्यमभावसे सेवा करता है, साधारण रीतिसे भोजनादि तैयार करके विशेष आदर-सत्कारके बिना ही अतिथिको भोजन आदि कराके उसे सुख पहुँचाता है, तो उसे भी साधारण रीतिसे ही अन्न प्राप्त होता है। अर्थात् अन्न-वस्त्र आदि पदार्थोंका सङ्ग्रह करनेमें उसे साधारणतया आवश्यक परिश्रम करना पड़ता है। जिस भावसे वह अतिथिको देता है, उसी भावसे उतने ही आदर-सत्कारके साथ उसे वे वस्तुएँ मिलती हैं। इसी प्रकार यदि कोई अन्तिम वृत्तिसे अर्थात् बिना किसी प्रकारका आदर- सत्कार किये तुच्छ भावसे भाररूप समझकर अतिथिकी सेवा करता है—उसे निकृष्ट भावसे अश्रद्धापूर्वक तैयार किया हुआ भोजन आदि पदार्थ देता है, तो उसे वे पदार्थ वैसे ही भावसे प्राप्त होते हैं। अर्थात् उनकी प्राप्तिके लिये उसे अधिक-से-अधिक परिश्रम करना पड़ता है, लोगोंकी खुशामद करनी पड़ती है। जो मनुष्य इस प्रकार इस रहस्यको जानता है, वह उत्तम रीतिसे और विशुद्धभावसे अतिथि सेवा करता है, अतः उसे सर्वोत्तम फल जो पहले तीन अनुवाकोंमें बताया गया है, वह मिलता है।

**सम्बन्ध—**अब परमात्माका विभूतिरूपसे सर्वत्र चिन्तन करनेका प्रकार बताया जाता है—

क्षेम इति वाचि । योगक्षेम इति प्राणापानयोः । कर्मेति हस्तयोः । गतिरिति पादयोः । विमुक्तिरिति पायौ । इति मानुषीः समाज्ञाः । अथ दैवीः । तृप्तिरिति दृष्टौ । बलमिति विद्युति । यश इति पशुषु । ज्योतिरिति नक्षत्रेषु । प्रजातिरमृतमानन्द इत्युपस्थे । सर्वमित्याकाशे ।

[ सः परमात्मा = वह परमात्मा, ] वाचि = वाणीमें; क्षेमः इति = रक्षाशक्तिके रूपसे है; प्राणापानयोः = प्राण और अपानमें, योगक्षेमः इति = प्राप्ति और रक्षा—दोनों शक्तियोंके रूपमें है, हस्तयोः = हाथोंमें; कर्म इति = कर्म करनेकी शक्तिके रूपमें है, पादयोः = पैरोंमें, गतिः इति = चलनेकी शक्तिके रूपमें स्थित है, पायौ = गुदामें, विमुक्तिः इति = मलत्यागकी शक्ति बनकर है, इति = इस प्रकार (ये), मानुषीः समाज्ञा = मानुषी समाज्ञा अर्थात् आध्यात्मिक उपासनाएँ हैं, अथ = अब;

  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३५९ दैवी = दैवी उपासनाओंका वर्णन करते हैं; (वह परमात्मा) वृष्टौ = वृष्टिमें; तृप्तिः इति = तृप्ति-शक्तिके रूपमें है; विद्युति = बिजलीमें; बलम् इति = बल (पावर) बनकर स्थित है; पशुषु = पशुओंमें, यशः इति = यशके रूपमें स्थित है; नक्षत्रेषु = ग्रहों और नक्षत्रोंमें; ज्योतिः इति = ज्योतिरूपसे स्थित है, उपस्थे = उपस्थमें; प्रजातिः = प्रजा उत्पन्न करनेकी शक्ति, अमृतम् = वीर्यरूप अमृत (और); आनन्दः = आनन्द देनेकी शक्ति, इति = बनकर स्थित है, आकाशे = (तथा) आकाशमें; सर्वम् इति = सबका आधार बनकर स्थित है । व्याख्या-दसवें अनुवाकके इस अंशमें परमेश्वरकी विभूतियोंका संक्षेपमें वर्णन किया गया है । भाव यह है कि सत्यरूप वाणीमें आशीर्वादादिके द्वारा जो रक्षा करनेकी शक्ति प्रतीत होती है, उसके रूपमें वहाँ परमात्माकी ही स्थिति है । प्राण और अपानमें जो जीवनोपयोगी वस्तुओंको आकर्षण करनेकी और जीवन-रक्षाकी शक्ति है, वह भी परमात्माका ही अंश है । इसी प्रकार हाथोंमें काम करनेकी शक्ति, पैरोंमें चलनेकी शक्ति और गुदामें मलत्याग करनेकी शक्ति भी परमात्माकी ही हैं । ये सब शक्तियाँ उन परमेश्वरकी शक्तिका ही एक अंश हैं । यह देखकर मनुष्यको परमेश्वरकी सत्तापर विश्वास करना चाहिये । यह मानुषी समाज्ञा बतायी गयी है, अर्थात् मनुष्यके शरीरमें प्रतीत होनेवाली परमात्माकी शक्तियोंका संक्षेपमे दिग्दर्शन कराया गया है । इसीको आध्यात्मिक (शरीर-सम्बन्धी) उपासना भी कह सकते हैं । इसी प्रकार दैवी पदार्थोंमें अभिव्यक्त होनेवाली शक्तिका वर्णन करते हैं । यह दैवी अथवा आधिदैविक उपासना है। वृष्टिमें जो अन्नादिको उत्पन्न करने तथा जल-प्रदानके द्वारा सबको तृप्त करनेकी शक्ति है, बिजलीमें जो बल (पावर) है, पशुओमे जो स्वामीका यश बढानेकी शक्ति है, नक्षत्रोंमें अर्थात् सूर्य, चन्द्रमा और तारागणोंमें जो प्रकाश है, उपस्थमें जो संतानोत्पादनकी शक्ति, वीर्यरूप अमृत* और आनन्द देनेकी शक्ति है तथा आकाशमें जो सबको धारण करनेकी और सर्वव्यापकताकी एवं अन्य सब प्रकारकी शक्ति है—ये सब उन परमेश्वरकी अचिन्त्य एव अपार शक्तिके ही किसी एक अंशकी अभिव्यक्तियाँ हैं । गीतामे भी कहा है कि इस जगत्में जो कुछ भी विभूति, शक्ति और शोभासे युक्त है, वह मेरे ही तेजका एक अंश है (गीता १० । ४१) । इन सबको देखकर मनुष्यको सर्वत्र एक परमात्माकी व्यापकताका रहस्य समझना चाहिये । सम्बन्ध-अब विविध भावनासे की जानेवाली उपासनाका फलसहित वर्णन करते हैं— तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत । प्रतिष्ठावान् भवति । तन्मह इत्युपासीत । महान् भवति । तन्मन इत्युपासीत । मानवान् भवति । तन्नम इत्युपासीत । नम्यन्तेऽस्मै कामाः । तद् ब्रह्मेत्युपासीत । ब्रह्मवान् भवति । तद् ब्रह्मणः परिमर इत्युपासीत । पर्येणं म्रियन्ते द्विषन्तः सपत्नाः । परि येऽप्रिया भ्रातृव्याः । तत् = वह (उपास्यदेव); प्रतिष्ठा = 'प्रतिष्ठा' (सबका आधार) है; इति = इस प्रकार, उपासीत = (उसकी) उपासना करे तो; प्रतिष्ठावान् भवति = साधक प्रतिष्ठावाला हो जाता है, तत् = वह (उपास्यदेव); महः = सबमे महान् है, इति = इस प्रकार समझकर, उपासीत = उपासना करे तो, महान् = महान्, भवति = हो जाता है, तत् = वह (उपास्यदेव), मनः = 'मन' है, इति = इस प्रकार समझकर; उपासीत = उसकी उपासना करे तो; (ऐसा उपासक) मानवान् = मनन- शक्तिसे सम्पन्न; भवति = हो जाता है, तत् = वह (उपास्यदेव), नमः = 'नमः' (नमस्कारके योग्य) है; इति = इस प्रकार समझकर, उपासीत = उसकी उपासना करे तो, अस्मै = ऐसे उपासकके लिये, कामाः = समस्त काम—भोग पदार्थ; नम्यन्ते = विनीत हो जाते हैं, तत् = वह (उपास्यदेव); ब्रह्म = ब्रह्म है; इति = इस प्रकार समझकर, उपासीत = उसकी उपासना करे तो, (ऐसा उपासक) ब्रह्मवान् = ब्रह्मसे युक्त, भवति = हो जाता है, तत् = वह (उपास्यदेव), ब्रह्मणः = परमात्माका; परिमरः = सबको मारनेके लिये नियत किया हुआ अधिकारी है, इति = इस प्रकार समझकर, उपासीत = उसकी उपासना करे तो, एनम् परि = ऐसे उपासकके प्रति, द्विषन्तः = द्वेष रखनेवाले; सपत्नाः = शत्रु, म्रियन्ते = मर जाते हैं;
  • शरीरका रक्षक एव पोषक तथा जीवनका आधार होनेसे वीर्यको अमृत कहा गया है । इसकी सावधानीके साथ रक्षा करनेसे अमृतत्वकी प्राप्ति भी सम्भव है ।

३६० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ये = जो, परि = (उसका) सब प्रकारसे, अप्रियाः भ्रातृव्याः = अनिष्ट चाहनेवाले अप्रिय बन्धुजन हैं, [ ते अपि म्रियन्ते = वे भी मर जाते हैं।] व्याख्या-इस मन्त्रमे सकाम उपासनाका भिन्न-भिन्न फल बताया गया है। भाव यह है कि प्रतिष्ठा चाहनेवाला पुरुष अपने उपास्यदेवकी प्रतिष्ठाके रूपमे उपासना करे, अर्थात् 'वे उपास्यदेव ही सब की प्रतिष्ठा-सबके आधार हैं' इस भावसे उनका चिन्तन करे। ऐसे उपासककी संसारमे प्रतिष्ठा होती है। महत्त्वकी प्राप्तिके लिये यदि अपने उपास्यदेवको 'महान्' समझकर उनकी उपासना करे तो वह महान् हो जाता है—महत्त्वको प्राप्त कर लेता है। यदि अपने उपास्यदेवको महान् मनस्वी समझकर मनन करनेकी शक्ति प्राप्त करनेके लिये उनकी उपासना करे तो वह साधक मनन करनेकी विशेष शक्ति प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार जो अपने उपास्यदेवको नमस्कार करनेयोग्य शक्तिशाली समझकर वैसी शक्ति प्राप्त करनेके लिये उनकी उपासना करे, वह स्वयं नमस्कार करनेयोग्य बन जाता है, समस्त कामनाएँ उसके सामने हाथ जोड़कर खड़ी रहती हैं। समस्त भोग अपने-आप उसके चरणोंमें लोटने लगते हैं। अनायास ही उसे समस्त भोग-सामग्री प्राप्त हो जाती है। तथा जो अपने उपास्यदेवको सबसे बड़ा-सर्वाधार ब्रह्म समझकर उन्हींकी प्राप्तिके लिये उनकी उपासना करे, वह ब्रह्मवान् बन जाता है, अर्थात् सर्वशक्तिमान् परमेश्वर उसके अपने बन जाते हैं—उसके वशमे हो जाते हैं। जो अपने उपास्यदेवको ब्रह्मके द्वारा सबका सहार करनेके लिये नियत किया हुआ अधिकारी देवता समझकर उनकी उपासना करता है, उससे द्वेष करनेवाले शत्रु स्वतः नष्ट हो जाते हैं तथा जो उसके अपकारी एवं अप्रिय बन्धुजन होते हैं, वे भी मारे जाते हैं। वास्तवमे किसी भी रूपमें किसी भी उपास्यदेवकी उपासना की जाय, वह प्रकारान्तरसे उन परब्रह्म परमेश्वरकी ही उपासना है, परतु सकाम मनुष्य अज्ञानवश इस रहस्यको न जाननेके कारण भिन्न-भिन्न शक्तियोंसे युक्त भिन्न-भिन्न देवताओंकी भिन्न-भिन्न कामनाओंकी सिद्धिके लिये उपासना करते हैं, इसलिये वे वास्तविक लाभसे वञ्चित रह जाते हैं (गीता ७। २१, २२, २३, २४; ९। २२, २३)। अतः मनुष्यको चाहिये कि इस रहस्यको समझकर सब देवोंके देव सर्वशक्तिमान् परमात्माकी उपासना उन्हींकी प्राप्तिके लिये करे, उनसे और कुछ न चाहे। सम्बन्ध-सर्वत्र एक ही परमात्मा परिपूर्ण हैं, इस बातको समझकर उन्हें प्राप्त कर लेनेका फल और प्राप्त करनेवालेकी स्थितिका वर्णन करते हैं— स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः। सय एवंवित्। अस्माल्लोकात्प्रेत्य। एतमन्नमयमात्मानमुप- संक्राम्य । एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रम्य । एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रम्य। एतं विज्ञानमयमात्मानमुप- संक्राम्य । एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्राम्य । इमाँल्लोकान्कामान्नी कामरूप्यनुसंचरन् । एतत्साम गायन्नास्ते । सः = वह (परमात्मा); यः = जो; अयम् = यह; पुरुषे = इस मनुष्यमें है, च = तथा; यः = जो, असौ = वह; आदित्ये च = सूर्यमें भी है, सः = वह (दोनोंका अन्तर्यामी); एकः = एक ही है; यः = जो (मनुष्य), एवंवित् = इस प्रकार तत्त्वसे जाननेवाला है; सः = वह, अस्मात् = इस; लोकात् = लोक (शरीर) से; प्रेत्य = उत्क्रमण करके; एतम् = इस, अन्नमयम् = अन्नमय; आत्मानम् = आत्माको, उपसंक्रम्य = प्राप्त होकर, एतम् = इस, प्राणमयम् = प्राणमय, आत्मानम् = आत्माको; उपसंक्रम्य = प्राप्त होकर; एतम् = इस, मनोमयम् = मनोमय, आत्मानम् = आत्माको; उपसंक्रम्य = प्राप्त होकर, एतम् = इस; विज्ञानमयम् = विज्ञानमय, आत्मानम् = आत्माको; उपसंक्रम्य = प्राप्त होकर; एतम् = इस; आनन्दमयम् = आनन्दमय; आत्मानम् = आत्माको, उपसंक्रम्य = प्राप्त होकर; कामान्नी = इच्छानुसार भोगवाला; (और) कामरूपी = इच्छानुसार रूपवाला हो जाता है, (तथा) इमान् = इन, लोकान् अनुसंचरन् = सब लोकोंमें विचरता हुआ; एतत् = इस (आगे बताये हुए ); साम गायन् = साम (समतायुक्त उद्गारों) का गायन करता; आस्ते = रहता है। —वे परमात्मा, जिनका वर्णन पहले सबकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण कहकर किया जा चुका

३ तैत्तिरीयोपनिषद् * ३६१ है और जो परमानन्दस्वरूप है, वे इस पुरुषमे अर्थात् मनुष्यमे और सूर्यमे एक ही है। अभिप्राय यह कि सम्पूर्ण प्राणियोंमे अन्तर्यामीरूपसे विराजमान एक ही परमात्मा है। नाना रूपोंमे उन्हीकी अभिव्यक्ति हो रही है। जो मनुष्य इस तत्त्व- को जान लेता है, वह वर्तमान शरीरसे अलग होनेपर उन परमानन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, जिनका वर्णन अन्नमय आत्मा, प्राणमय आत्मा, मनोमय आत्मा, विज्ञानमय आत्मा और आनन्दमय आत्माके नामसे पहले किया गया है। इन सबको पाकर अर्थात् स्थूल और सूक्ष्म भेदसे जो एककी अपेक्षा एकके अन्तरात्मा होकर नाना रूपोंमे स्थित हे और सबके अन्तर्यामी परमानन्दस्वरूप हैं, उनको प्राप्त करके मनुष्य पर्याप्त भोग-सामग्रीसे युक्त और इच्छानुसार रूप धारण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। साथ ही वह इन लोकोमे विचरता हुआ आगे बताये जानेवाले साम ( समतायुक्त भावो ) का गान करता रहता है। सम्बन्ध-उसके आनन्दमग्न मनम जो समता और सर्वरूपताके भाव उठा करते हैं, उनका वर्णन करते हैं- हा३वु हा३वु हा३वु । अहमन्नमहमन्नमहमन्नम् । अहमन्नादो३ऽहमन्नादो३ऽहमन्नादः । अहग्ँश्लोककृदहग्ँश्लोककृदहग्ँश्लोककृत् । अहमस्मि प्रथमजा ऋता३स्य । पूर्वं देवेभ्योऽमृतस्य ना३भायि। यो मा ददाति स इदेव मा३वाः। अहमन्नमन्नमदन्तमा३द्मि। अहं विश्वं भुवनमभ्यभवा३म् । सुवर्णं ज्योतीः । य एवं वेद । इत्युपनिषत् । हावु हावु हावु = आश्चर्य ! आश्चर्य !! आश्चर्य !II; अहम् = मै, अन्नम् = अन्न हूँ, अहम् = मं; अन्नम् = अन्न हूँ; अहम् = मै; अन्नम् = अन्न हूँ; अहम् = मैं ही; अन्नादः = अन्नका भोक्ता हूँ; अहम् = मै ही; अन्नादः = अन्नका भोक्ता हूँ, अहम् = मैं ही; अन्नादः = अन्नका भोक्ता हूँ; अहम् = मैं, श्लोककृत् = इनका संयोग करानेवाला हूँ; अहम् = मैं, श्लोककृत् = इनका संयोग करानेवाला हूँ, अहम् = मैं; श्लोककृत् = इनका संयोग करानेवाला हूँ, अहम् = मैं, ऋतस्य = सत्यका अर्थात् प्रत्यक्ष दीखने- वाले जगत्की अपेक्षासे, प्रथमजाः = सबमें प्रधान होकर उत्पन्न होनेवाला (हिरण्यगर्भ), [च = और,] देवेभ्यः = देवताओंसे भी; पूर्वम् = पहले विद्यमान, अमृतस्य = अमृतका, नाभायि (नाभिः) = केन्द्र, अस्मि = हूँ, यः = जो कोई, मा = मुझे; ददाति = देता है, सः = वह, इत् = इस कार्यसे, एव = ही, मा आवाः = मेरी रक्षा करता है, अहम् = मे, अन्नम् = अन्नस्वरूप होकर, अन्नम् = अन्न, अदन्तम् = खानेवालेको, अद्मि = निगल जाता हूँ, अहम् = मै, विश्वम् = समस्त; भुवनम् अभ्यभवाम् = ब्रह्माण्डका तिरस्कार करता हूँ, सुवः न ज्योतीः = मेरे प्रकाशकी एक झलक सूर्यके समान है, यः = जो, एवम् = इस प्रकार; वेद = जानता है (उसे भी यही स्थिति प्राप्त होती है), इति = इस प्रकार, उपनिषत् = यह उपनिषद्-ब्रह्मविद्या समाप्त हुई । व्याख्या-उस महापुरुषकी स्थिति शरीरमे नहीं रहती । वह शरीरसे सर्वथा ऊपर उठकर परमात्माको प्राप्त हो जाता है । यह बात पहले कहकर उसके बाद इस साम-गानका वर्णन किया गया है। इससे यह प्रकट होता है कि परमात्मा- के साथ एकताकी प्राप्ति कर लेनेवाले महापुरुषके ये पावन उद्गार उसके विशुद्ध अन्तःकरणसे निकले हैं और उसकी अलौकिक महिमा सूचित करते हे । 'हावु' पद आश्चर्यबोधक अव्यय है। वह महापुरुष कहता है-बड़े आश्चर्यकी बात है ! ये सम्पूर्ण भोग वस्तुएँ, इनको भोगनेवाला जीवात्मा और इन दोनोंका संयोग करानेवाला परमेश्वर एक मैं ही हूँ। मै ही इस प्रत्यक्ष दीखनेवाले जगत्में समस्त देवताओंसे पहले सबमें प्रधान होकर प्रकट होनेवाला ब्रह्मा हूँ, और परमानन्दरूप अमृतके केन्द्र परब्रह्म परमेश्वर भी मुझसे अभिन्न है, अतः वे भी मै ही हूँ । जो कोई मनुष्य किसी भी वस्तुके रूपमे मुझे किसीको प्रदान करता है, वह मानो मुझे देकर मेरी रक्षा करता है । अर्थात् योग्य पात्रमें भोग्य पदार्थोंका दान ही उनकी रक्षाका सर्वोत्तम उपाय है । इसके विपरीत जो अपने ही लिये अन्नरूप समस्त भोगोंका उपभोग करता है, उस खानेवालेको मैं अन्नरूप होकर निगल जाता हूँ। अर्थात् उसका विनाश हो जाता है-उसकी भोग-सामग्री टिकती नही। मैं समस्त ब्रह्माण्डका तिरस्कार करनेवाला हूँ। मेरी महिमाकी तुलनामें यह सब तुच्छ है । मेरे प्रकाशकी एक झलक भी सूर्यके समान है। अर्थात् जगत्मे जितने भी प्रकाशयुक्त पदार्थ हैं, वे सब मेरे ही तेज- उ० अ० ४६-