भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 377, कुल 832 में से

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पृष्ठ 377
  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३५१ अन्नम् = अन्न; ब्रह्म = ब्रह्म है, इति = इस प्रकार, व्यजानात् = जाना, हि = क्योंकि, खलु = सचमुच, अन्नात् = अन्नसे, एव = ही; इमानि = ये सब, भूतानि = प्राणी, जायन्ते = उत्पन्न होते हैं, जातानि = उत्पन्न होकर; अन्नेन = अन्नसे ही, जीवन्ति = जीते हैं, (और) प्रयन्ति = (अन्तमें यहाँसे) प्रयाण करते हुए, अन्नम् अभिसंविशन्ति = अन्नमे ही प्रविष्ट होते हैं; इति = इस प्रकार, तत् = उसको, विज्ञाय = जानकर, (वह) पुनः = पुनः, पितरम् = अपने पिता; वरुणम् एव उपससार = वरुणके ही पास गया, (तथा अपनी समझी हुई बात उसने पिताको सुनायी, किंतु पिताने उसका समर्थन नहीं किया। तब वह बोला—) भगवः = भगवन्, (मुझे) ब्रह्म अधीहि = ब्रह्मका बोध कराइये, इति = तब, तम् ह उवाच = उससे सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिमे कहा, तपसा = तपसे, ब्रह्म = ब्रह्मको, विजिज्ञासस्व = तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर, तपः = तप ही; ब्रह्म = ब्रह्म है; इति = इस प्रकार (पिताकी आज्ञा पाकर), सः = उसने, तपः अतप्यत = (पुनः) तप किया, सः = उसने; तपः तप्त्वा = तप करके— व्याख्या—भृगुने पिताके उपदेशानुसार यह निश्चय किया कि अन्न ही ब्रह्म है, क्योंकि पिताजीने ब्रह्मके जो लक्षण बताये थे, वे सब अन्नमें पाये जाते हैं। समस्त प्राणी अन्नसे-अन्नके परिणामभूत वीर्यसे उत्पन्न होते हैं, अन्नसे ही उनका जीवन सुरक्षित रहता है और मरनेके बाद अन्नस्वरूप इस पृथ्वीमे ही प्रविष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार निश्चय करके वे पुनः अपने पिता वरुणके पास आये। आकर अपने निश्चयके अनुसार उन्होंने सब बातें कहीं। पिताने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने सोचा—'इसने अभी ब्रह्मके स्थूल रूपको ही समझा है, वास्तविक रूपतक इसकी बुद्धि नहीं गयी, अतः इसे तपस्या करके अभी और विचार करनेकी आवश्यकता है। पर जो कुछ इसने समझा है, उसमें इसकी तुच्छबुद्धि कराकर अश्रद्धा उत्पन्न कर देनेमे भी इसका हित नहीं है, अतः इसकी बातका उत्तर न देना ही ठीक है।' पितासे अपनी बातका समर्थन न पाकर भृगुने फिर प्रार्थना की—'भगवन् ! यदि मैने ठीक नहीं समझा हो तो आप मुझे ब्रह्मका तत्त्व समझाइये।' तब वरुणने कहा—'तू तपके द्वारा ब्रह्मके तत्त्वको समझनेकी कोशिश कर। यह तप ब्रह्मका ही स्वरूप है, अतः यह उनका बोध करानेमें सर्वथा समर्थ है।' इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर भृगु ऋषि पुनः पहलेकी भाँति तपोमय जीवन बिताते हुए, पितासे पहले सुने हुए उपदेशके अनुसार ब्रह्मका स्वरूप निश्चय करनेके लिये विचार करते रहे। इस प्रकार तप करके उन्होंने क्या किया, यह बात अगले अनुवाकमे कही गयी है। ॥ द्वितीय अनुवाक समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय अनुवाक प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात्। प्राणाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। प्राणेन जातानि जीवन्ति। प्राणं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तम् होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा। प्राणः = प्राण, ब्रह्म = ब्रह्म है, इति = इस प्रकार, व्यजानात् = जाना; हि = क्योकि, खलु = सचमुच, प्राणात् = प्राणसे; एव = ही, इमानि = ये समस्त, भूतानि = प्राणी, जायन्ते = उत्पन्न होते हैं, जातानि = उत्पन्न होकर, प्राणेन = प्राणसे ही; जीवन्ति = जीते हैं, (और) प्रयन्ति = (अन्तमें यहाँसे) प्रयाण करते हुए, प्राणम् अभिसंविशन्ति = प्राणमें ही सब प्रकारसे प्रविष्ट हो जाते हैं, इति = इस प्रकार, तत् = उसे, विज्ञाय = जानकर, पुनः = फिर; पितरम् वरुणम् एव उपससार = (अपने) पिता वरुणके ही पास गया (और वहाँ उसने अपना निश्चय सुनाया, जब पिताने उत्तर नहीं दिया, तब वह बोला—); भगवः = भगवन्, (मुझे) ब्रह्म अधीहि = ब्रह्मका उपदेश दीजिये, इति = इस प्रकार प्रार्थना करनेपर, ह तम् उवाच = सुप्रसिद्ध वरुण ऋषिमे उससे कहा, ब्रह्म = ब्रह्मको, तपसा = तपसे, विजिज्ञासस्व = तत्त्वतः जाननेकी इच्छा कर; तपः = तप ही, ब्रह्म = ब्रह्म अर्थात् उनकी प्राप्तिका बड़ा साधन है, इति = इस प्रकार पिताकी आज्ञा पाकर, सः = उसने; (पुनः) तपः अतप्यत = तप किया; सः = उसने, तपः तप्त्वा = तप करके—
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