कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 367, कुल 832 में से
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- तैत्तिरीयोपनिषद् * ३४१ सम्बन्ध-ऊपर कहे हुए अंशमें ब्रह्मको 'असत्' मानने और 'सत्' माननेका फल बताया गया है, उसे सुनकर प्रत्येक मनुष्यके मनमें जो प्रश्न उठ सकते हैं, उन प्रश्नोंका निर्णय करके उन ब्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन करनेके लिये श्रुति स्वयं ही प्रश्न उपस्थित करती है— अथातोऽनुप्रश्नाः । उताविद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चन गच्छती ३ । आहो विद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चित्समश्नुता ३ उ । अथ = इसके बाद; अतः = यहाँसे; अनुप्रश्नाः = अनुप्रश्न आरम्भ होते हैं; उत = क्या, अविद्वान् = ब्रह्मको न जाननेवाला; कश्चन = कोई पुरुष, प्रेत्य = मरकर; अमुम् लोकम् गच्छति = उस लोकमें (परलोकमें) जाता है, आहो = अथवा; कश्चित् = कोई भी; विद्वान् = ज्ञानी; प्रेत्य = मरकर, अमुम् = उस, लोकम् = लोकको; समश्नुते = प्राप्त होता है; उ = क्या ? व्याख्या-अब यहाँसे अनुप्रश्न* आरम्भ करते हैं। पहला प्रश्न तो यह है कि यदि ब्रह्म हैं तो उनको न जाननेवाला कोई भी मनुष्य मरनेके अनन्तर परलोकमें जाता है या नहीं ? दूसरा यह प्रश्न है कि ब्रह्मको जाननेवाला कोई भी विद्वान् मरनेके बाद परलोकको प्राप्त होता है या नहीं ? सम्बन्ध-इन प्रश्नोंके उत्तरमें श्रुति ब्रह्मके स्वरूप और शक्तिका वर्णन करती है तथा पहले अनुवाकमें जो संक्षेपसे सृष्टिकी उत्पत्तिका क्रम बताया था, उसे भी विशदरूपसे समझाया जाता है— सोऽकामयत । बहु स्यां प्रजायेयेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा इद सर्वमसृजत यदिदं किं च । तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् । तदनुप्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत् । निरुक्तं चानिरुक्तं च । निलयनं चानिलयनं च। विज्ञानं चाविज्ञानं च। सत्यं चानृतं च सत्यमभवत् । यदिदं किं च । तत्सत्यमित्याचक्षते । तदप्येष श्लोको भवति । सः = उस परमेश्वरने; अकामयत = विचार किया कि; प्रजायेय = मैं प्रकट होऊँ; (और अनेक नाम-रूप धारण • करके) बहु = बहुत; स्याम् इति = हो जाऊँ; सः = (इसके बाद) उसने, तपः = तप किया अर्थात् अपने संकल्पका विस्तार किया; सः = उसने, तपः तप्त्वा = इस प्रकार संकल्पका विस्तार करके; यत् = जो, किम् = कुछ, च = भी; इदम् = यह देखने और समझनेमें आता है, इदम् = इस, सर्वम् असृजत = समस्त जगत्की रचना की, तत् सृष्ट्वा = उस जगत्की रचना करनेके अनन्तर, तत् एव = (वह स्वयं) उसीमें; अनुप्राविशत् = साथ-साथ प्रविष्ट हो गया, तत् अनुप्रविश्य = उसमें साथ-साथ प्रविष्ट होनेके बाद, (वह स्वयं ही) सत् = मूर्त, च = और, त्यत् = अमूर्त, च = भी, अभवत् = हो गया; निरुक्तम् च अनिरुक्तम् = बतानेमे आनेवाले और न आनेवाले, च = तथा, निलयनम् = आश्रय देनेवाले, च = और,
- अनुप्रश्न उन प्रश्नोंको कहते हैं, जो आचार्यके उपदेशके अनन्तर किसी शिष्यके मनमें उठते हैं या जिन्हें वह उपस्थित करता है। इस अनुवाकमें जो अनुप्रश्न पूछे गये हैं, वे दोके रूपमें तीन हैं-(१) वास्तवमें ब्रह्म है या नहीं ? (२) जब ब्रह्म आकाशकी भाँति सर्वगत तथा पक्षपातरहित-सम है, तब क्या वे अविद्वान् (अपना ज्ञान न रखनेवाले) को भी प्राप्त होते हैं या नहीं ? (३) यदि अविद्वान्को नहीं प्राप्त होते, तब तो सम होनेके कारण वे विद्वान्को भी नहीं प्राप्त होंगे, इसलिये यह तीसरा प्रश्न है कि विद्वान् पुरुष ब्रह्मका अनुभव करता है या नहीं ? इनके उत्तरमें ब्रह्मको सृष्टिका कारण बतलाकर अर्थत उनकी सत्ता सिद्ध कर दी गयी। फिर 'तत् सत्यम् इत्याचक्षते ' इस वाक्यद्वारा श्रुतिने स्पष्टरूपसे भी उनकी सत्ताका प्रतिपादन कर दिया। सातवें अनुवाकमें तो और भी स्पष्ट वचन मिलता है-'को ह्येवान्यात् ? कः प्राण्यात् ? यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्' अर्थात् यदि ये आकाशस्वरूप आनन्दमय परमात्मा न होते तो कौन जीवित रहता और कौन चेष्टा भी कर सकता ? अर्थात् प्राणियोंका जीवन और चेष्टा परमात्मापर ही निर्भर है। दूसरे प्रश्नके उत्तरमें सप्तम अनुवाकमें यह बात कही गयी है कि जबतक मनुष्य परमात्माको पूर्णतया नहीं जान लेता, उनमें थोड़ा-सा भी अन्तर रख लेता है, तबतक वह जन्म-मरणके भयसे नहीं छूटता । तीसरे प्रश्नके उत्तरमें आठवें अनुवाकके उपसंहारमें श्रुति 'स्वयं कहती है-'स य एवंवित् आनन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति' अर्थात् जो यह जानता है, वह क्रमश अन्नमय, प्राणमय आदिको प्राप्त करता हुआ अन्तमें आनन्दमय परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है।'