कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 366, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें३४० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * परमात्माको जीवात्मारूप शरीरका शासन करनेवाला और उसका अन्तरात्मा बताया है। वे ही वास्तवमें समस्त पुरुषोंसे उत्तम होनेके कारण 'पुरुष' शब्दके अभिधेय हैं। वे विज्ञानमय पुरुषके समान आकारवाले हैं। उस विज्ञानमय पुरुषमें व्याप्त होनेके कारण ही वे पुरुषाकार कहे जाते हैं। पक्षीके रूपमें उन आनन्दमय परमेश्वरके अङ्गोंकी कल्पना इस प्रकार की गयी है। प्रियभाव उनका सिर है। तात्पर्य यह कि आनन्दमय परमात्मा सबके प्रिय हैं। समस्त प्राणी 'आनन्द' से प्रेम करते हैं, सभी 'आनन्दको' चाहते हैं, परंतु न जाननेके कारण उन्हें पा नहीं सकते। यह 'प्रियता' उन आनन्दमय परमात्मा- का एक प्रधान अंश है; अतः यही मानो उनका प्रधान अङ्ग सिर है। मोद दाहिना पंख है, प्रमोद बायाँ पंख है, आनन्द ही परमात्माका मध्य-अङ्ग है तथा स्वयं ब्रह्म ही इनकी पूँछ एव आधार हैं। परमात्मा अवयवरहित होनेके कारण उनके स्वरूप और अङ्गोंका वर्णन वास्तविकरूपसे नहीं बन सकता। फिर ऐसी कल्पना क्यों की गयी ? इसका समाधान करते हुए ब्रह्मसूत्र (३ । ३ । १२ से ३ । ३ । १४ तक) में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि ब्रह्मके विषयमें ऐसी कल्पना केवल उपासनाकी सुगमताके लिये की जाती है, दूसरा कोई प्रयोजन नहीं है। इस प्रकरणमें विज्ञानमयका अर्थ जीवात्मा और आनन्दमयका अर्थ परमात्मा ही लेना चाहिये, यह बात ब्रह्मसूत्र ( १ । १ । १२ से १९ तकके विवेचन) में युक्तियों तथा श्रुतियोंके प्रमाणोंद्वारा सिद्ध की गयी है। इन आनन्दमय परमात्माके विषयमें भी आगे षष्ठ अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है। ॥ पञ्चम अनुवाक समाप्त ॥ ५॥ ❧❦❧ षष्ठ अनुवाक असन्नेव स भवति । असद्ब्रह्मेति वेद चेत् । अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद । सन्तमेनं ततो विदुरिति । चेत्=यदि; (कोई) ब्रह्म=ब्रह्म; असत्=नहीं है; इति=इस प्रकार; वेद=समझता है, (तो) सः=वह, असत्= असत्; एव=ही, भवति=हो जाता है, (और) चेत्=यदि; (कोई) ब्रह्म=ब्रह्म; अस्ति=है; इति=इस प्रकार; वेद= जानता है, ततः=तो, [विद्वांसः=ज्ञानीजन,] एनम्=इसको; सन्तम्=सत्—सत्पुरुष, विदुः=समझते हैं; इति=इस प्रकार यह श्लोक है। व्याख्या—इस मन्त्रमें ब्रह्मकी सत्ता माननेका और न माननेका फल बताया गया है। भाव यह है कि यदि कोई मनुष्य यह समझता है या ऐसा निश्चय करता है कि 'ब्रह्म असत् है' अर्थात् ब्रह्म या ईश्वर नामकी कोई चीज नहीं है, तो वह 'असत्' हो जाता है, अर्थात् स्वेच्छाचारी होकर सदाचारसे भ्रष्ट, नीच प्रकृतिका हो जाता है। और यदि कोई मनुष्य ब्रह्मके यथार्थ तत्त्वको न जानकर भी यह समझता है कि 'निःसंदेह ब्रह्म है', अर्थात् शास्त्र और महापुरुषोंपर दृढ विश्वास होनेके कारण यदि उसके मनमें ईश्वरकी सत्तापर पूरा विश्वास हो गया है, तो ऐसे मनुष्यको ज्ञानी और महापुरुष 'सत्' अर्थात् सत्पुरुष समझते हैं, क्योंकि परमात्माके तत्त्वज्ञानकी पहली सीढी उनकी सत्तामें विश्वास ही है। परमात्माकी सत्तामें विश्वास बना रहे तो कभी न-कभी किन्हीं महापुरुषकी कृपासे साधनमें लगकर मनुष्य उन्हें प्राप्त भी कर सकता है। तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य । तस्य=उस (आनन्दमय) का भी; एषः एव=यही, शारीरः=शरीरान्तर्वर्ती; आत्मा=आत्मा है, यः= जो; पूर्वस्य=पहलेवाले (विज्ञानमय) का है। व्याख्या—षष्ठ अनुवाकके इस दूसरे अंशमें पहलेके वर्णनानुसार आनन्दमयका अन्तरात्मा स्वय आनन्दमयको ही बताया गया है। भाव यह है कि उन आनन्दमय ब्रह्मके वे स्वय ही शरीरान्तर्वर्ती आत्मा हैं, क्योंकि उनमें शरीर और शरीरीका भेद नहीं है। जो पहले बताये हुए अन्न-रसमय आदि सबके अन्तर्यामी परमात्मा हैं, वे स्वय ही अपने अन्तर्यामी हैं; उनका अन्तर्यामी कोई दूसरा नहीं है। इसीलिये इनके आगे किसी दूसरेको न बताकर उस वर्णनकी परम्पराको यहीं समाप्त कर दिया गया है।