भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 365, कुल 832 में से

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पृष्ठ 365
  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३३९ पञ्चम अनुवाक विज्ञानं यज्ञं तनुते । कर्माणि तनुतेऽपि च । विज्ञानं देवाः सर्वे । ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते । विज्ञानं ब्रह्म चेद्वेद । तस्माच्चेन्न प्रमाद्यति । शरीरे पाप्मनो हित्वा । सर्वान्कामान्समश्नुत इति । तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य । विज्ञानम् = विज्ञान ही; यज्ञम् तनुते = यज्ञोंका विस्तार करता है; च = और; कर्माणि अपि तनुते = कर्मोंका भी विस्तार करता है, सर्वे = सब; देवाः = इन्द्रियरूप देवता; ज्येष्ठम् = सर्वश्रेष्ठ; ब्रह्म = ब्रह्मके रूपमें, विज्ञानम् उपासते = विज्ञानकी ही सेवा करते हैं; चेत् = यदि; ( कोई ) विज्ञानम् = विज्ञानको; ब्रह्म = ब्रह्मरूपसे; वेद = जानता है, ( और ) चेत् = यदि; तस्मात् = उससे, न प्रमाद्यति = प्रमाद नहीं करता, निरन्तर उसी प्रकार चिन्तन करता रहता है, ( तो ) पाप्मनः = ( शरीराभिमानजनित ) पापसमुदायको; शरीरे = शरीरमें ही, हित्वा = छोड़कर; सर्वान् = समस्त, कामान् समश्नुते = भोगोंका अनुभव करता है; इति = इस प्रकार यह श्लोक है, तस्य = उस विज्ञानमयका, एषः = यह परमात्मा; एव = ही; शारीरः = शरीरान्तर्वर्ती, आत्मा = आत्मा है; यः = जो; पूर्वस्य = पहलेवालेका है। व्याख्या- इस मन्त्रमें विज्ञानात्माकी महिमाका वर्णन और उसकी ब्रह्मरूपसे उपासना करनेका फल बताया गया है । भाव यह है कि यह विज्ञान अर्थात् बुद्धिके साथ तद्रूप हुआ जीवात्मा ही यज्ञोंका अर्थात् शुभ-कर्मरूप पुण्योंका विस्तार करता है और यही अन्यान्य लौकिक कर्मोंका भी विस्तार करता है । अर्थात् बुद्धिसे ही सम्पूर्ण कर्मोंको प्रेरणा मिलती है । सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और मनरूप देवता सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मके रूपमें इस विज्ञानमय जीवात्माकी ही सेवा करते हैं, अपनी-अपनी वृत्तियों- द्वारा इसीको सुख पहुँचाते रहते हैं । यदि कोई साधक इस विज्ञानस्वरूप आत्माको ही ब्रह्म समझता है और यदि यह उस धारणासे कभी च्युत नहीं होता अर्थात् उस धारणामे भूल नहीं करता या शरीर आदिमे स्थित, एकदेशीय एव बद्धस्वरूपमें ब्रह्मका अभिमान नहीं कर लेना तो वह अनेक जन्मोंके संचित पापसमुदायको शरीरमें ही छोड़कर समस्त दिव्य भोगोंका अनुभव करता है । इस प्रकार यह श्लोक है । उस विज्ञानमयके भी अन्तर्यामी आत्मा वे ही परब्रह्म परमेश्वर हैं, जो पहलेवालोंके अर्थात् अन्न-रसमय स्थूलशरीरके, प्राणमयके और मनोमयके हैं । तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयादन्योऽन्तर आत्माऽऽनन्दमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्रियमेव शिरः । मोदो दक्षिणः पक्षः । प्रमोद उत्तरः पक्षः । आनन्द आत्मा । ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति । वै = निश्चय ही, तस्मात् = उस पहले कहे हुए; एतस्मात् = इस, विज्ञानमयात् = विज्ञानमय जीवात्मासे; अन्यः = भिन्न, अन्तरः = इसके भी भीतर रहनेवाला आत्मा, आनन्दमयः आत्मा = आनन्दमय परमात्मा है; तेन = उससे, एषः = वह विज्ञानमय, पूर्णः = पूर्णतः व्याप्त है; सः = वह, एषः = यह आनन्दमय परमात्मा, वै = भी, पुरुषविधः = पुरुषके समान आकारवाला; एव = ही है, तस्य = उस विज्ञानमयकी, पुरुषविधताम् अनु = पुरुषाकारतामें अनुगत होनेसे ही, अयम् = यह ( आनन्दमय परमात्मा ), पुरुषविधः = पुरुषाकार कहा जाता है, तस्य = उस आनन्दमय- का, प्रियम् = प्रिय, एव = ही; शिरः = ( मानो ) सिर है, मोदः = मोद, दक्षिणः = दाहिना; पक्षः = पंख है; प्रमोदः = प्रमोद, उत्तरः = बायाँ, पक्षः = पंख है, आनन्दः = आनन्द ही, आत्मा = शरीरका मध्यभाग है, ब्रह्म = ब्रह्म, पुच्छम् = पूँछ, ( एव ) प्रतिष्ठा = आधार है, तत् = उसकी महिमाके विषयमें, अपि = भी, एषः = यह, श्लोकः = श्लोक; भवति = है । व्याख्या- पञ्चम अनुवाकके इस दूसरे अंशमें आनन्दमय परमपुरुषका वर्णन किया गया है । भाव यह है कि पहले अंशमें कहे हुए विज्ञानमय जीवात्मासे भिन्न, उसके भी भीतर रहनेवाला एक दूसरा आत्मा है, वह है आनन्दमय परमात्मा । उससे यह विज्ञानमय पुरुष व्याप्त है अर्थात् वह इसमें भी परिपूर्ण है । बृहदारण्यक उपनिषद् ( ३ । ७ । २३ ) में भी