भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 832 में से

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पृष्ठ 364

३३८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या—इस मन्त्रमें ब्रह्मके आनन्दको जाननेवाले विद्वान्की महिमाके साथ अर्थान्तरसे उसके मनोमय शरीरकी महिमा प्रकट की गयी है । भाव यह है कि परब्रह्म परमात्माका जो स्वरूपभूत परम आनन्द है, वहाँतक मन, वाणी आदि समस्त इन्द्रियोंके समुदायस्वरूप मनोमय शरीरकी भी पहुँच नहीं है, परंतु ब्रह्मको पानेके लिये साधन करनेवाले मनुष्यको यह ब्रह्मके पास पहुँचानेमें विशेष सहायक है । ये मन-वाणी आदि साधनपरायण पुरुषको उन परब्रह्मके द्वारतक पहुँचाकर, उसे वहीं छोड़कर स्वय लौट आते हैं और वह साधक उनको प्राप्त हो जाता है । ब्रह्मके आनन्दमय स्वरूपको जान लेनेवाला विद्वान् कभी भयभीत नहीं होता । इस प्रकार यह मन्त्र है । मनोमय शरीरके भी अन्तर्यामी आत्मा वे ही परमात्मा हैं, जो पूर्वोक्त अन्न-रसमय शरीर और प्राणमय शरीरके अन्तर्यामी हैं। तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयादन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयस्तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः । तस्य श्रद्धैव शिरः । ऋतं दक्षिणः पक्षः । सत्यमुत्तरः पक्षः । योग आत्मा । महः पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति । वै=निश्चय ही; तस्मात्=उस पहले बताये हुए, एतस्मात्=इस, मनोमयात्=मनोमय पुरुषसे; अन्यः= अन्य, अन्तरः=इसके भीतर रहनेवाला, आत्मा=आत्मा, विज्ञानमयः=विज्ञानमय है, तेन=उस विज्ञानमय आत्मासे, एषः=यह मनोमय शरीर, पूर्णः=व्याप्त है; सः=वह, एषः=यह विज्ञानमय आत्मा, वै=निश्चय ही, पुरुषविधः एव=निस्सन्देह पुरुषके आकारका ही है, तस्य=उसकी, पुरुषविधताम् अनु=पुरुषाकृतिमें अनुगत होनेसे ही, अयम्= यह विज्ञानमय आत्मा, पुरुषविधः=पुरुषके आकारका बताया जाता है, तस्य=उस विज्ञानमय आत्माका; श्रद्धा= श्रद्धा; एव=ही; शिरः=( मानो ) सिर है, ऋतम्=सदाचारका निश्चय; दक्षिणः=दाहिना, पक्षः=पख है; सत्यम्= सत्य-भाषणका निश्चय, उत्तरः=बायाँ, पक्षः=पख है, योगः=( ध्यानद्वारा परमात्मामें एकाग्रतारूप ) योग ही; आत्मा= शरीरका मध्यभाग है, महः='महः' नामसे प्रसिद्ध परमात्मा ही, पुच्छम्=पुच्छ, ( एव ) प्रतिष्ठा=आधार है, तत्= उस विषयमें; अपि=भी, एषः=यह आगे कहा जानेवाला, श्लोकः=श्लोक, भवति=है । व्याख्या—चतुर्थ अनुवाकके इस दूसरे अंशमे विज्ञानमय पुरुषका अर्थात् विज्ञानमय शरीरके अधिष्ठाता जीवात्माका वर्णन है । भाव यह है कि पहले बताये हुए मनोमय शरीरसे भी सूक्ष्म होनेके कारण उसके भीतर रहनेवाला जो आत्मा है, वह अन्य है । वह है विज्ञानमय पुरुष अर्थात् बुद्धिरूप गुफामें निवास करनेवाला और उसमें तदाकार-सा बना हुआ जीवात्मा । उससे यह मनोमय शरीर पूर्ण है अर्थात् वह इस मनोमय शरीरमें सर्वत्र व्याप्त है । और मनोमय अपनेसे पहले- वाले प्राणमय और अन्नमयमें व्याप्त है । अतः यह विज्ञानमय जीवात्मा समस्त शरीरमें व्याप्त है । गीतामें भी यही कहा है कि जीवात्मारूप क्षेत्रज्ञ शरीररूप क्षेत्रमें सर्वत्र स्थित है (गीता १३ । ३२) । वह विज्ञानमय आत्मा भी निश्चय ही पुरुषके आकार- का है । उस मनोमय पुरुषमें व्याप्त होनेसे ही वह पुरुषाकार कहा जाता है । उस विज्ञानमयके अङ्गोंकी पक्षीके रूपमे इस प्रकार कल्पना की गयी है । श्रद्धा कहते हैं बुद्धिकी निश्चित विश्वासरूप वृत्तिको, वही उस विज्ञानात्माके शरीरमे प्रधान अङ्गरूप सिर है; क्योंकि यह दृढ विश्वास ही प्रत्येक विषयमें उन्नतिका कारण है । परमात्माकी प्राप्तिमें तो सबसे पहले और सबसे अधिक इसीकी आवश्यकता है । सदाचरणका निश्चय ही इसका दाहिना पख है, सत्य भाषणका निश्चय ही इसका बायाँ पख है । ध्यानद्वारा परमात्माके साथ सयुक्त रहना ही विज्ञानमय शरीरका मध्यभाग है और 'महः' नामसे प्रसिद्ध परमात्मा पुच्छ अर्थात् आधार है, क्योंकि परमात्मा ही जीवात्माका परम आश्रय है । इस विज्ञानात्माकी महिमाके विषयमें भी यह आगे पञ्चम अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है । ॥ चतुर्थ अनुवाक समाप्त ॥ ४ ॥

  • शिक्षावल्लीमें 'भू', 'भुव', 'स्व' और 'मह'—इन चार व्याहृतियोंमें 'मह' को ब्रह्मका स्वरूप बताया है, अतः 'मह' व्याहृति ब्रह्मका नाम है और ब्रह्मको आत्माकी प्रतिष्ठा बतलाना सर्वथा युक्तिसङ्गत है ।