भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 363, कुल 832 में से

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पृष्ठ 363
  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३३७ है; तस्य = उसकी; पुरुषविधताम् अनु = पुरुष-तुल्य आकृतिमें अनुगत (व्याप्त) होनेसे ही, अयम् = यह मनोमय आत्मा; पुरुषविधः = पुरुषके आकारका है, तस्य = उस (मनोमय पुरुष) का, यजुः = यजुर्वेद; एव = ही; शिरः = (मानो) सिर है; ऋक् = ऋग्वेद; दक्षिणः = दाहिना, पक्षः = पंख है, साम = सामवेद, उत्तरः = बायाँ, पक्षः = पख है; आदेशः = आदेश (विधिवाक्य); आत्मा = शरीरका मध्यभाग है, अथर्वाङ्गिरसः = अथर्वा और अङ्गिरा ऋषिद्वारा देखे गये अथर्ववेदके मन्त्र ही, पुच्छम् = पूँछ; (एवं) प्रतिष्ठा = आधार है, तत् = उसकी महिमाके विषयमें; अपि = भी; एषः = यह आगे कहा जानेवाला, श्लोकः = श्लोक, भवति = है। व्याख्या-इस तृतीय अनुवाकके दूसरे अंशमें मनोमय पुरुषका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि पहले बताये हुए प्राणमय पुरुषसे भिन्न, उससे भी सूक्ष्म होनेके कारण उसके भीतर रहनेवाला दूसरा पुरुष है; उसका नाम है मनोमय । उस मनोमयसे यह प्राणमय शरीर पूर्ण है अर्थात् वह इस प्राणमय शरीरमें सर्वत्र व्याप्त हो रहा है। वह यह मनोमय शरीर भी पुरुषके ही आकारका है। प्राणमय पुरुषमें अनुगत होनेसे ही यह मनोमय आत्मा पुरुषके समान आकारवाला है। उसकी पक्षीके रूपमें इस प्रकार कल्पना की गयी है-उस मनोमय पुरुषका मानो यजुर्वेद ही सिर है; ऋग्वेद दाहिना पंख है, सामवेद बायाँ पंख है, आदेश (विधिवाक्य) मानो शरीरका मध्यभाग है तथा अथर्वा और अङ्गिरा ऋषियोंद्वारा देखे हुए अथर्ववेदके मन्त्र ही पूँछ और आधार हैं। यज्ञ आदि कर्मोंमें यजुर्वेदके मन्त्रकी ही प्रधानता है। इसके सिवा जिनके अक्षरोंकी कोई नियत संख्या न हो तथा जिसकी पाद-पूर्तिका कोई नियत नियम न हो, ऐसे मन्त्रोंको 'यजु''छन्दके अन्तर्गत समझा जाता है। इस नियमके अनुसार जिस किसी वैदिकवाक्य या मन्त्रके अन्तमें 'स्वाहा' पद जोड़कर अग्निमें आहुति दी जाती है, वह वाक्य या मन्त्र भी 'यजुः' ही कहलायेगा। इस प्रकार यजुर्मन्त्रोंके द्वारा ही अग्निको हविष्य अर्पित किया जाता है, इसलिये वहाँ यजुः प्रधान है। अङ्गोंमें भी सिर प्रधान है, अतः यजुर्वेदको सिर बतलाना उचित ही है। वेद-मन्त्रोंके वर्ण, पद और वाक्य आदिके उच्चारणके लिये पहले मनमें ही संकल्प उठता है; अतः संकल्पात्मक वृत्तिका द्वारा मनोमय आत्माके साथ वेद-मन्त्रोंका घनिष्ठ सम्बन्ध है। इसीलिये इन्हें मनोमय पुरुषके ही अङ्गोंमें स्थान दिया गया है। शरीरमें जो स्थान दोनों भुजाओंका है, वही स्थान मनोमय पुरुषके अङ्गोंमें ऋग्वेद और सामवेदका है। यज्ञ-यागादिमें इनके मन्त्रोंद्वारा स्तवन और गायन होता है, अतः यजुर्मन्त्रोंकी अपेक्षा ये अप्रधान हैं; फिर भी भुजाओंकी भाँति यज्ञमें विशेष सहायक हैं, अतएव इनको भुजाओंका रूप दिया गया है। आदेश (विधि)-वाक्य वेदोंके भीतर हैं, अतः उन्हें ही मनोमय पुरुषके अङ्गोंका मध्यभाग बताया गया है। अथर्ववेदमें शान्तिक-पौष्टिक आदि कर्मोंके साधक मन्त्र हैं, जो प्रतिष्ठाके हेतु हैं, अतः उनको पुच्छ एव प्रतिष्ठा कहना सर्वथा युक्तिसगत ही है। संकल्पात्मक वृत्तिका द्वारा मनोमय पुरुषका इन सबके साथ नित्य सम्बन्ध है, इसीलिये वेदमन्त्रोंको उसका अङ्ग बताया गया है-यह बात सदा स्मरण रखनी चाहिये। इस मनोमय पुरुषकी महिमाके विषयमे भी यह आगे चतुर्थ अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है। ॥ तृतीय अनुवाक समाप्त ॥ ३ ॥ चतुर्थ अनुवाक यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कदाचनेति । तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य । यतः = जहाँसे, मनसा सह = मनके सहित, वाचः = वाणी आदि इन्द्रियाँ, अप्राप्य = उसे न पाकर; निवर्तन्ते = लौट आती हैं, [ तस्य ] ब्रह्मणः = उस ब्रह्मके, आनन्दम् = आनन्दको, विद्वान् = जाननेवाला पुरुष; कदाचन = कभी; न बिभेति = भय नहीं करता, इति = इस प्रकार यह श्लोक है, तस्य = उस मनोमय पुरुषका भी; एषः एव = यही परमात्मा, शारीरः = शरीरान्तर्वर्ती, आत्मा = आत्मा है, यः = जो; पूर्वस्य = पहले बताये हुए अन्नरसमय शरीर या प्राणमय शरीरका है। उ० अं० ४३-