कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 673, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६२५ को प्रदान करना चाहिये । इस प्रकारका जो व्यक्ति इन उपनिषदोंको पढता या सुनता है, वह मुझको प्राप्त होता है—इसमें कुछ भी सदेह नहीं है ॥ ४७-४७ ॥ यही बात ऋचामें भी कही गयी है । कहते हैं, वेद-विद्या— उपनिषद् ब्राह्मणके पास गयी और बोली—'मेरी रक्षा करो, मैं तुम्हारी निधि हूँ । याद रहे—मुझे निन्दकों, मिथ्याचारी और दुष्ट प्रकृतिवालोंको मत सुनाना, कभी मत सुनाना, तभी मैं वीर्यवती—सामर्थ्ययुक्त अथवा सफल होऊँगी ।' जिसे गुरु श्रुतशील (शास्त्राभ्यासी), प्रमादरहित, मेधावी और ब्रह्मचर्यसे युक्त समझे, उसीके समीप आनेपर उसकी सम्यक् परीक्षा करके इस आत्मविषयक वैष्णवी विद्याको प्रदान करे ॥ ४८-४९ ॥ पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीसे श्रीहनूमान्जीने पूछा—भगवन् ! ऋग्वेदादिके अनुसार उपनिषदोंका अलग अलग विभाग करके शान्ति-मन्त्रोंको मुझपर अनुग्रह करके कहिये ॥ ५० ॥ श्रीरामचन्द्रजीने कहा—ऐतरेयं¹, कौषीतकिब्राह्मण², नाद-³ बिन्दु⁴, आत्मप्रबोध⁵, निर्वाणं⁶, मुद्गलं⁷, अक्षमालिका⁸, त्रिपुरा⁹, सौर्भाग्य-¹⁰ लक्ष्मी और बह्वृच—ये दस उपनिषद् ऋग्वेदीय हैं और इनका शान्ति-मन्त्र है 'वाङ् मे मनसि' इत्यादि ॥ ५१ ॥ ईशावास्य¹, बृहदारण्यक², जाबाल³, हंसैं⁴, परमहंस⁵, सुर्बाल⁶, मन्त्रिका⁷, निरालम्ब⁸, त्रिशिखिब्राह्मण⁹, मण्डलब्राह्मण¹⁰, अद्वयतारक¹¹, पैङ्गल¹², भिक्षुक¹³, तुरीयातीत¹⁴, अध्यात्म¹⁵, तारसार¹⁶, याज्ञवल्क्य¹⁷, शाट्यायनी¹⁸ और मुक्तिंका¹⁹—ये शुक्लयजुर्वेदके उन्नीस उपनिषद् हैं, इनका शान्तिमन्त्र है 'पूर्णमद पूर्णमिदम' इत्यादि ॥५२॥ कठवल्ली¹, तैत्तिरीय², ब्रह्म³, कैवल्यै⁴, श्वेताश्वेतर⁵, र्गभ⁶, नारायण⁷, अमृतविन्दु⁸, अमृतनाद⁹, कालाग्निरुद्र¹⁰, क्षुरिका¹¹, सर्वसार¹², शुकरहस्य¹³, तेजोविन्दु¹⁴, ध्यानविन्दु¹⁵, ब्रह्मविद्या¹⁶, योगतत्त्व¹⁷, दक्षिणामूर्ति¹⁸, स्कन्द¹⁹, शारीरक²⁰, योगशिखा²¹, एकाक्षर²², अक्षि²³, अवधूत²⁴, कठरुद्र²⁵, रुद्रहृदय²⁶, योगकुण्डली²⁷, पञ्चब्रह्म²⁸, प्राणाग्निहोत्र²⁹, वराह³⁰, कलिसंतरण³¹ और सरस्वती-³² रहस्य—ये कृष्णयजुर्वेदके बत्तीस उपनिषद् हैं, इनका शान्तिमन्त्र है—'सह नाववतु सह नौ भुनक्तु' इत्यादि ॥५३॥ केन¹, छान्दोग्य², आरुणिक³, मैत्रायणी⁴, मैत्रेयी⁵, वज्रसूचिका⁶, योगचूडामणि⁷, वासुदेवै⁸, महत्⁹, सन्यास¹⁰, अव्यक्त¹¹, कुण्डिका¹², सावित्री¹³, रुद्राक्षजाबाल¹⁴, जाबालदर्शन¹⁵ और जाबालि—¹⁶ ये सामवेदके सोलह उपनिषद् हैं, इनका शान्तिमन्त्र है 'आप्यायन्तु ममाङ्गानि०' इत्यादि ॥ ५४ ॥ प्रश्न¹, मुण्डकै², माण्डूक्य³, अथर्वाङ्गिरस्⁴, अथर्वशिखा⁵, बृहज्जाबाल⁶, नृसिंहतापनीय⁷, नारदंपरिव्राजक⁸, सीतों⁹, शरभ¹⁰, त्रिपाद्विभूतिमहानारायण¹¹, रामरहस्य¹², रामतापनीय¹³, शाण्डिल्य¹⁴, परमहंसपरिव्राजक¹⁵, अन्नपूर्णा¹⁶, सूर्य¹⁷, आत्मा¹⁸, पाशुपत¹⁹, परब्रह्म²⁰, त्रिपुरातपनीय²¹, देवी²², भावना²³, भस्मजाबाल²⁴, गणपति²⁵, महावाक्य²⁶, गोपालतापनीय²⁷, कृष्ण²⁸, हयग्रीव²⁹, दत्तात्रेय³⁰ और गरुड—³¹ये अथर्ववेदके इकतीस उपनिषद् हैं, इनका शान्तिमन्त्र है 'भद्रं कर्णेभि शृणुयाम०' इत्यादि ॥ ५५ ॥ जो लोग मुक्तिके अभिलाषी हैं, जो नित्यानित्यवस्तु- विवेक, इस लोक एव परलोकके भोगोंसे वैराग्य, शम दम आदि षट्सम्पत्ति तथा मोक्षाभिलाषरूप साधनचतुष्टयसे सम्पन्न हैं, वे श्रद्धावान् पुरुष सत्कुलमें उत्पन्न, श्रोत्रिय ( वेदज्ञान- सम्पन्न ), शास्त्रानुरागी, गुणवान्, सरलहृदय, समस्त प्राणियोंकी भलाईमें रत तथा दयाके समुद्र सद्गुरुके निकट विधिपूर्वक भेंट लेकर जाते हैं और उनसे १०८ उपनिषदोंको विधिपूर्वक पढकर निरन्तर श्रवण मनन-निदिध्यासनका अभ्यास करते हैं। फिर प्रारब्धका क्षय होनेपर जब उनके स्थूल, सूक्ष्म तथा आतिवाहिक—तीनों शरीर नष्ट हो जाते हैं, तब वे उपाधिमुक्त घटाकाशके समान परिपूर्णताको प्राप्त करते है, अर्थात् ब्रह्ममें लीन हो जाते हैं। यही विदेहमुक्ति कहलाती है, इसीको कैवल्यमुक्ति भी कहते हैं। अतएव ब्रह्मलोकमें रहनेवाले भी ब्रह्माजीके मुखसे वेदान्तका श्रवण मनन निदिध्यासन करके उन्हींके साथ कैवल्यको प्राप्त करते है। अतः सबके लिये केवल ज्ञानद्वारा ही कैवल्यमुक्ति कही गयी है—कर्मयोग, सांख्य- योग तथा उपासनादिके द्वारा नहीं। यह उपनिषद् है ॥५६॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥ उ० अं० ७९—