कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 671, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ शुक्लयजुर्वेदीय मुक्तिकोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्ति. !!! प्रथम अध्याय श्रीराम और हनुमान्का संवाद, वेदान्तकी महिमा, मुक्तिके भेद, १०८ उपनिषदोंकी नामावली तथा वेदोंके अनुसार विभाग; उपनिषदोंके पाठका माहात्म्य तथा उनके श्रवणके अधिकारी ॐश्रीरामचन्द्रजी अयोध्यापुरीमे रमणीय रत्नमण्डपके बीच सीता, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न आदिसे समन्वित होकर रत्नसिंहासनपर आसीन थे । सनक-सनन्दनादि मुनिगण, वशिष्ठ आदि गुरुजन तथा शुकादि अन्यान्य भागवत रात- दिन उनका स्तवन करते रहते थे । सर्वान्तर्यामी एव निर्विकार श्रीरामचन्द्रजी एक समय अपने स्वरूप-ध्यानमें रत होकर समाधिस्थ हो रहे थे । उनकी समाधि टूटनेपर श्री- हनुमान्जीने भक्तिपूर्वक सुननेकी इच्छासे स्तवन करते हुए श्रीरामचन्द्रजीसे पूछा—'रामजी ! आप परमात्मा हैं, सत्-चित् और आनन्दस्वरूप परब्रह्मके अवतार हैं। रघुवर ! इस अवसरपर मैं आपको बारवार प्रणाम करता हूँ । श्रीरामजी, मैं आपके यथार्थ स्वरूपको जानना चाहता हूँ, जो मुक्ति प्रदान करनेवाला है, जिससे मैं अनायास—सहजमें ही इस संसार-बन्धनसे छूट जाऊँ । रामजी ! कृपा करके मुझसे उसका वर्णन कीजिये, जिससे मैं मुक्त हो जाऊँ' ॥ १-६ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने कहा—'महाबलशाली हनूमान् ! तुमने अच्छा प्रश्न किया । मैं तत्त्वकी बात कहता हूँ, सुनो । मेरा स्वरूप वेदान्तमें अच्छी प्रकारसे वर्णित है, अतएव तुम वेदान्त- शास्त्रका आश्रय लो।' श्रीहनुमान्जीने पूछा—'रघुवंशियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामजी ! वेदान्त किसे कहते हैं, और उसकी स्थिति कहाँ है—मुझे बतलायें।' श्रीरामजीने कहा—'हनूमान्जी ! सुनो, मैं तुम्हें अविलम्ब वेदान्तकी स्थिति बतलाऊँगा । मुझ विष्णुके निःश्वाससे सुविस्तृत चारों वेद उत्पन्न हुए । तिलोंमें तेलकी भाँति वेदोंमें वेदान्त सुप्रतिष्ठित है।' श्रीहनुमान्- जीने पूछा—'श्रीरामजी ! वेद कितने प्रकारके हैं, और राघव ! उनकी शाखाएँ कितनी हैं तथा उनमे उपनिषद् कौन-कौन-से हैं, यह कृपा करके तत्त्वतः-यथार्थरूपसे समझाइये' ॥७-१०॥ श्रीरामजीने कहा-वेद चार कहे गये हैं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद । उन चारोंकी अनेकों शाखाएँ हैं, और उन शाखाओंके उपनिषद् भी अनेकों हैं । ऋग्वेदकी इक्कीस शाखाएँ हैं । पवनतनय ! यजुर्वेदकी एक सौ नौ शाखाएँ हैं। और शत्रुतापन ! सामवेदसे सहस्र शाखाएँ निकली हैं । कपीश्वर ! अथर्ववेदकी शाखाओंके पचास भेद हैं । एक-एक शाखाकी एक-एक उपनिषद् मानी गयी है । जो व्यक्ति उन उपनिषदोंके एक भी मन्त्रका भक्तिपूर्वक पाठ करता है, वह व्यक्ति मुनियोंके लिये भी दुर्लभ मेरी सायुज्य-मुक्ति प्राप्त करता है॥ ११-१४ ॥ हनूमान्जीने कहा—श्रीरामजी ! कोई-कोई मुनिश्रेष्ठ कहते हैं कि मुक्ति एक ही प्रकारकी होती है । और कुछ मुनिगण कहते हैं कि तुम्हारा नामस्मरण करनेसे मुक्ति होती है तथा काशीमे मरनेवालेको भगवान् शङ्कर तारक-मन्त्रका उपदेश देते हैं, जिससे प्राणी मुक्त हो जाता है। दूसरे मुनियोंका कथन है कि सांख्ययोगसे मुक्ति होती है, और कुछ मुनियोंके मतसे भक्तियोग ही मुक्तिका कारण है। अन्य महर्षियोंके कथनानुसार वेदान्त वाक्योंके अर्थका विचार करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है । और किसी-किसीके मतमें सालोक्य, सायुज्य, सामीप्य और कैवल्यरूपमे मुक्ति चार प्रकारकी कही गयी है' ॥ १५-१६ ॥ श्रीरामने कहा—'कपिवर ! कैवल्य-मुक्ति तो एक ही प्रकारकी है, वह परमार्थरूप है। इसके अतिरिक्त भक्तिपूर्वक मेरा नाम-स्मरण करते रहनेसे दुराचारमें लगा हुआ मनुष्य भी सालोक्यमुक्तिको प्राप्त होता है, वहाँसे वह अन्य