भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 670, कुल 832 में से

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पृष्ठ 670

६२२ * महोपनिषद् * [ अध्याय ६

[बायाँ स्तम्भ]

नहीं प्राप्त होते । जो नित्य प्राप्त कर्मको करता है, शत्रु मित्रको समान दृष्टिसे देखता है तथा इच्छा और अनिच्छासे मुक्त है, न शोक करता है न किसी वस्तुकी इच्छा करता है, सबसे प्रिय बोलता है, पूछे जानेपर मृदु भाषण करता है, और प्राणियोके आशयको जानता है, वह संसारमे शोकको नहीं प्राप्त होता । ध्येय वस्तुके त्यागसे विलसित होनेवाली पूर्व दृष्टिका अवलम्बनकर, संसार-तापसे रहित एव आत्मस्थ होकर जीवन्मुक्तकी भाँति जगत्में विचरण करो । सारी आशाओको हृदयसे त्यागकर, वीतराग एव वासनाशून्य होकर, बाहरसे समस्त जागतिक व्यवहारोंको भलीभाँति करते हुए ससारमे ताप-रहित होकर विचरण करो । बाहरसे कृत्रिम क्रोधका नाट्य करते हुए तथा हृदयसे क्रोधशून्य, बाहरसे कर्ता तथा हृदयसे अकर्ता बनकर शुद्धचित्तसे लोकमे विचरण करो । अहङ्कारको छोड़कर, शान्तचित्त होकर, कलङ्क-कालिमासे सर्वथा मुक्त हो, आकाश-सा स्वच्छ जीवन ले शुद्ध मनसे लोकमें विचरण करो ॥ ६१–६९ ॥

'उदार एव श्रेष्ठ आचरणसे युक्त, समस्त सदाचारोंका अनुगमन करता हुआ, भीतरसे अनासक्त होकर बाहरसे यत्नशील-सा रहे । अन्तःकरणमें वैराग्यवान् होकर बाहरसे आशान्वित व्यवहार करे । यह मेरा बन्धु है और वह नहीं है, यह तुच्छ बुद्धिवालोंकी बात है । उदार चरित्रवालोंके लिये तो सारा संसार ही अपना कुटुम्ब होता है। जो भाव और अभावसे मुक्त है, जरा मरणसे वर्जित है, जहाँ सारे सङ्कल्प पूर्णतः शान्त हो जाते हैं, ऐसे रागरहित एव सुरम्य पदका आश्रय लो । यह स्वच्छ, निष्काम, दोषविहीन ब्राह्मी स्थिति है । इसको ग्रहण करके विहार करता हुआ पुरुष सङ्कटकालमें मोहको नहीं प्राप्त होता । वैराग्यसे अथवा शास्त्रज्ञानसे तथा महत्त्वादि गुणोंके द्वारा जो सङ्कल्पका नाश किया जाता है, उससे मन स्वय ही उन्नत अवस्थाको प्राप्त होता है । निराशाके वशीभूत हुआ

[दायाँ स्तम्भ]

मन वैराग्यके द्वारा पूर्णताको प्राप्त होता है । वही आशायुक्त होनेपर शरद्‌मे स्वच्छ सरोवरके समान रागको प्राप्त होता है । उसी भोगसे विरक्त मनको पुनः-पुनः प्रतिदिन व्यापारोंम डालते हुए प्राज्ञ पुरुषको लज्जा क्यों नहीं आती । चित् और विषयके योग को बन्धन कहते हैं । उस योगसे मुक्त होना ही मुक्ति कहलाता है । निश्चयपूर्वक विषयविहीन चित् ही आत्मा है, यह समस्त वेदान्त सिद्धान्तका सार है । इस निश्चयको ग्रहणकर प्रदीप्त अन्तःकरणसे स्वयं ही अपने आपको देखो । , इससे आनन्दपदकी प्राप्ति होगी । मै चित् हूँ । ये लोक चित् है, दिशाएँ चित् हैं । ये जीवमात्र चित् ह । दृश्य और दर्शनसे मुक्त होकर, केवल स्वच्छ रूपवाला साक्षी चिदात्मा निराभास और नित्य उदित होकर द्रष्टा बन रहा हूँ । विषयोसे मुक्त, पूर्ण ज्योतिःस्वरूप, समस्त संवेदनसे पूर्णतया मुक्त चित्स्वरूप तथा महान् मवित् मात्र मै हूँ । मुनीश्वर ! सारे सङ्कल्पोंको पूर्णतः शान्त करके ममत्व एषणाओका परित्यागकर निर्विकल्पपदमें जाकर आत्मस्थ हो जाओ ॥ ७०–८२ ॥

'जो ब्राह्मण इस महोपनिषदका नित्य अध्ययन करता है, वह अश्रोत्रिय हो तो श्रोत्रिय हो जाता है । उपनीत न हो तो उपनीत हो जाता है । वह अग्निपूत होता है, वह वायूपूत होता है, वह सोमपूत होता है, सत्यपूत होता है । वह सर्वथा पवित्र हो जाता है। वह सब देवताओका परिचित हो जाता है । उसको सारे तीर्थस्नानोका फल प्राप्त होता है । उसे सब देवताओके ध्यानका फल मिल जाता है । वह सब यज्ञोंका अनुष्ठान कर लेता है । सहस्रों गायत्रीके जपका फल उसे प्राप्त होता है । सहस्रों इतिहास-पुराणके पाठका फल उसे मिल जाता है । दस हजार प्रणवजपका फल उसे मिलता है। जहाँतक उसकी दृष्टि जाती है, वह पंक्तिको पवित्र करता है। सात पहले और सात आगेकी पीढियोंको पवित्र करता है। यों भगवान् हिरण्यगर्भ—ब्रह्माजीने कहा । इसका जप करनेसे अमृतत्वकी प्राप्ति होती है, यह उपनिषद्—रहस्य है ।'


॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥

॥ सामवेदीय महोपनिषद् समाप्त ॥

शान्तिपाठ

ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ।

ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!