भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 669

अध्याय ६ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति :- ६२१

समता, अभिन्नता, निष्कामता, निष्क्रियता, सौम्यता, निर्विकल्पता, धृति, मैत्री, सन्तोष, मृदुता तथा मृदुभाषिता प्रभृति गुण वासनासे विहीन तथा हेयोपादेयसे मुक्त ज्ञानी पुरुषमें रहते हैं । तृष्णारूपी भीलनीके फैलाये हुए वासनारूपी जालमे तुम फँस गये हो, चिन्तारूपी रश्मियोंके द्वारा समाररूपी मृगजाल चारों ओर फैला हुआ है । तात ! जिस प्रकार बवंडरसे मेघजाल छिन्न भिन्न हो जाते हैं, उसी प्रकार इम ज्ञानरूपी तेज बर्छीसे उसे काटकर अपने व्यापक स्वरूपमें स्थित हो जाओ ॥ २२-३२ ॥

'कुल्हाड़ीके द्वारा वृक्षके समान, मनसे ही मनको काटकर 'पावन पदको शीघ्र ही प्राप्तकर स्थिर हो जाओ । खड़े रहते, चलते, सोते, जागते, निवास करते, उठते और गिरते समय भी 'ये सब असत् ही ह' ऐसा निश्चय करके हृद्यमें आस्थाको छोड़ दो। यदि इम दृश्यका आश्रय लेते हो तो चित्तयुक्त होकर बन्धनमें पड़ते हो, और यदि इस दृश्यका सम्यक् त्याग करते हो तो चित्तशून्य होकर मोक्षके भागी बनते हो । न मै हूँ, न जगत् है - इस प्रकार चिन्तन करते हुए तुम पर्वतके समान अचल होकर रहो। आत्मा और जगत्‌के मध्य, द्रष्टा और दृश्य-इन दोनों अवस्थाओंके बीच अपनेको सर्वदा दर्शनस्वरूप आत्मा ही समझते रहो। आस्वादनके पदार्थ तथा आस्वादनकर्तासे भिन्न तथा इन दोनोंके मध्यमें अवस्थित केवल आस्वादनका ध्यान करते हुए परमात्ममय हो जाओ । बीच-बीचमे निरालम्ब-अवस्थाका अवलम्बन कर स्थिर हो जाओ । रज्जुसे बँधे हुए तो मुक्त हो जाते हैं, परंतु तृष्णासे बँधे हुए जीव किसीके द्वारा भी मुक्त नहीं किये जा सकते । अतएव निदाघ ! तुम सङ्कल्प को छोड़ते हुए तृष्णाका त्याग करो । अभावशून्यताविषयी बर्छीके द्वारा इम अद्भावमयी, स्वभावत उत्पन्न हुई पापिनी तृष्णाको काटकर समस्त प्राणियोंको उत्पन्न होनेवाले भयसे अभय होकर सुन्दर परमार्थलोकमें विचरण करो । मे इन पदार्थोंका हूँ और ये मेरे जीवन हैं, इनके बिना मैं कुछ नहीं हूँ और न ये मेरे बिना कुछ हैं-अन्त करणके इस निश्चयका त्याग करके तथा मनसे विचारकर 'मे पदार्थोंका नहीं हूँ तथा पदार्थ मेरे नहीं ह'-ऐसी भावना करो । शान्तचित्तसे विचार- पूर्वक कर्मोंको महज भावसे करते हुए जो वासनाका त्याग है, ब्रह्मन् ! वही ध्येय कहा गया हे ॥ ३३-४३ ॥

'समता रखनेवाली बुद्धिसे जो वासनाका सर्वथा क्षय करके ममतारहित हो जाता है, उसीसे शरीर-बन्धन छोड़ा जाता है। ऐसा वासनाक्षय अवश्यकर्त्तव्य है । जो अहङ्कारमयी वासनाको सहजमें ही छोड़कर ध्येय वस्तुका सम्यक् त्याग करके स्थित होता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो सङ्कल्परूपी वासनाका

मूलसहित त्याग करके शान्तिको प्राप्त होता है, उसीका वह त्याग जानने योग्य हे। और उसीको मुक्त एव ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ जानो। ये ही दोनो ब्रह्मत्वको प्राप्त होते हैं, ये ही दो ससारतापसे मुक्त हैं। शम दमसम्पन्न सन्यासो और योगी, हे मुनीश्वर ! यथासमय आ पड़नेवाले सुखों और दु.खोंमें रत नहीं होते । जिसकी अन्तर्दृष्टिमें इच्छा-अनिच्छा दोनो ही नहीं ह तथा जो सुषुप्तके समान आचरण करता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो वासनाशून्य है, वह हर्ष, अमर्ष, भय, क्रोध, काम और कार्पण्यदृष्टिमे न प्रसन्न होता है, न दुखी होता है । जो तृष्णा बाह्य विषयोंकी वासनासे उत्पन्न होती है, वह बन्धनकारक होती है, और जो तृष्णा सब प्रकारके विषयोंकी वासनासे मुक्त होती है, वह मोक्षकारक होती है। 'मुझे अमूक वस्तु प्राप्त हो'-इस प्रकारकी प्रार्थनासे युक्त इच्छा दु.ख, जन्म और भय प्रदान करनेवाली होती है । उसे दृढ़ बन्धनस्वरूप जानो । महात्मालोग सत् और असत्रूप सभी पदार्थोंकी इच्छाका सर्वदा एव सम्यक् त्याग करके परम उदार पदको प्राप्त होते हैं। बन्धकी आस्था (बन्धनकी सत्तामें विश्वास) तथा मोक्षकी आस्था एव सुख-दुःख-स्वरूपवाली सत् और असत्की आस्थाका सर्वथा त्याग करके तुम प्रशान्त महासागरकी भाँति स्थिर हो जाओ ॥ ४४-५३ ॥

'महात्मन् ! पुरुषको चार प्रकारके निश्चय होते हैं। 'पैरसे लेकर सिरतक मेरी सृष्टि माता पिताके द्वारा हुई है' - यह पहला निश्चय है । ब्रह्मन् बन्धनमे दुःख देखकर 'मै सब प्रकारके सासारिक भारोंसे परे बालके अग्रभागसे भी सूक्ष्म आत्मा हूँ'-इस प्रकारका दूसरा निश्चय सतजनोंको मुक्ति प्रदानके लिये होता है । विप्रवर ! तीसरा निश्चय यह है कि 'मै समस्त जगत्‌के पदार्थोंका आत्मा हूँ, सर्वस्वरूप ओर अक्षय हूँ।' यह निश्चय मोक्षका कारण बनता हे । 'मै अथवा जगत् सत्र आकाशवत् शून्य है'-इस प्रकारका चौथा निश्चय मोक्षसिद्धि प्रदान करता है। इनमेंसे पहला निश्चय बन्धनमे डालनेवाली तृष्णासे युक्त होता है। शेष तीनो निश्चय स्वच्छ, शुद्ध तृष्णासे युक्त होते हैं और इन त्रिविध निश्चयोंवाले पुरुष जीवन्मुक्त तथा आत्मतत्त्वमे विलास करनेवाले होते हैं । परम बुद्धिमान् ! सब कुछ मे ही हूँ-इस प्रकारका जो निश्चय है, उसको ग्रहण करके बुद्धि पुनः विषादको प्राप्त नहीं होती ॥ ५४-६० ॥

'शून्य ही प्रकृति, माया, ब्रह्मज्ञान, शिव, पुरुष, ईशान तथा नित्य आत्माके नामसे पुकारा जाता है । परमात्ममयी अद्वैतशक्ति ही द्वैत एव अद्वैतसे उत्पन्न हुए पदार्थोंसे जगत्‌के निर्माणकी लीला करकेविकसित होती है। जो समस्त प्रपञ्चसे परे आत्मपदका आश्रय लेकर एक परिपूर्ण चिन्मय स्थितिमें रहकर न उद्वेग करते हैं न सन्तुष्ट होते हैं, संसारमें वे शोकको