कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 675, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६२७ करके मुझ चैतन्यस्वरूपमें जो निवात दीपशिखाके समान निश्चल होकर स्थित रहता है, वह मुझ सच्चिदानन्दस्वरूपको एकीभावसे प्राप्त होता है। समाधि अथवा कर्मानुष्ठान वह करे या न करे। जिसके हृदयमें वासनाका सर्वथा अभाव हो गया है, वही मुक्त है, वही उत्तमाशय है ॥ १७-२० ॥ "जिसके मनसे वासनाएँ दूर हो गयी हैं, उसे न नैष्कर्म्य- से—कर्मोंके त्यागसे मतलब है और न कर्मानुष्ठानसे । उसे समाधान अर्थात् षट्सम्पत्ति और जपकी भी आवश्यकता नहीं है। सारी वासनाओंका त्याग करके मनका मौन धारण करनेके अतिरिक्त कोई दूसरा परम पद नहीं है। किसी प्रकारकी प्रत्यक्ष वासना न होनेपर भी चक्षु आदि इन्द्रियाँ जो स्वतः अपने-अपने बाह्य विषयोंमें प्रवृत्त होती हैं, इसमें कोई-न-कोई सूक्ष्म वासना ही कारण है। अनायास सामने आये हुए दृश्य विषयोंमें जैसे चक्षु-इन्द्रियकी वारंवार प्रवृत्ति रागरहित ही होती है, उसी प्रकार धीर पुरुष कार्योंमें अनासक्तभावसे ही प्रवृत्त होते हैं। पवनतनय ! जो सत्ता- बुद्धिसे प्रकट होती है और उसीके अनुकूल होती है तथा जिसमें चित्तका उदय और लय भी होता है, मुनलोग उसी वृत्तिको वासनाके नामसे पुकारते हैं । चिर-परिचित पदार्थोंके अनन्य चिन्तनके द्वारा जो चित्तमें अत्यन्त चञ्चलता उत्पन्न हो जाती है, वही चित्त-चाञ्चल्य जन्म, जरा और मृत्युका एकमात्र कारण होता है। वासनाके कारण प्राणीमें स्पन्दन होता है और उस स्पन्दनसे पुनः वासनाकी उत्पत्ति होती है, इस प्रकार चित्तरूपी बीजमें अङ्कुर लगते रहते हैं ॥ २१–२६ ॥ "चित्तरूपी वृक्षके दो बीज हैं—प्राण स्पन्दन ( प्राणोंकी गति ) और वासना । इन दोनोंमेंसे एकके भी क्षीण होनेसे दोनों नष्ट हो जाते हैं। अनासक्त होकर व्यवहार करनेसे, संसार- का चिन्तन छोड़ देनेसे और शरीरकी विनश्वरताका दर्शन करते रहनेसे वासना उत्पन्न नहीं होती। और वासनाका भलीभाँति त्याग हो जानेपर चित्त अचित्तताको प्राप्त होता है, अर्थात् उसकी वासनात्मिका प्रवृत्ति नष्ट हो जाती है। वासनाके नष्ट हो जानेपर जब मन मनन करना छोड़ देता है, तब मनके निराकृत होनेपर परम शान्तिप्रद विवेककी उत्पत्ति होती है। जबतक तुम्हारे अन्दर ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं हो जाती, जबतक तुम्हें परमपद अज्ञात है, तबतक गुरु तथा शास्त्र-प्रमाणके द्वारा निर्णीत मार्गका आचरण करो । तदनन्तर कषायोंका परिपाक होनेपर जब निश्चयपूर्वक तुम्हें तत्त्वका ज्ञान हो जाय, तब तुम्हें निश्चिन्त होकर समस्त शुभ वासनाओंका भी त्याग कर देना चाहिये ॥ २७-३१ ॥ "चित्तनाश दो प्रकारका होता है—सरूप और अरूप । जीवन्मुक्तका चित्तनाश सरूप होता है और विदेहमुक्तका अरूप होता है। अर्थात् जीवन्मुक्तका चित्त स्वरूपसे रहता तो है, पर वह अचित्त हुआ रहता है, विदेहमुक्त होनेपर उसका स्वरूपतः नाश हो जाता है। पवनसुत ! अब एकाग्र- चित्तसे मनोनाशके विषयमें सुनो। जब तुम्हारा मन चित्त- नाशकी स्थितिको प्राप्त हो जायगा अर्थात् उसकी अनुसंधानात्मिका वृत्ति शान्त हो जायगी, तब मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा प्रभृति गुणोंसे युक्त होकर वह परमशान्तिको प्राप्त कर लेगा—इसमें कोई संशय नहीं है। जीवन्मुक्तका मन आवागमनसे मुक्त हो जाता है, अतः उसका वह मनोनाश सरूप कहलाता है। विदेह-मुक्ति मिल जानेपर जो मनोनाश होता है, वह अरूप कहलाता है। अतएव सहस्रों अङ्कुर, त्वचा, पत्ते, शाखा एव फल फूलसे युक्त इस संसार-वृक्षका यह मन ही मूल है—यह निश्चित हुआ । और वह मन सङ्कल्प- रूप है। सङ्कल्पको निवृत्त करके उस मनस्तत्त्वको सुखा डालो, जिससे यह संसार वृक्ष भी नीरस होकर सूख जाय । अपने मनके निग्रहका एक ही उपाय है, वह है यह निश्चय करना कि मनका अभ्युदय—उसका स्फीत होना ही उसका विनाश— पतन है, और उसके नाशमें ही उसका महान् अभ्युदय— उसकी उन्नति है। ज्ञानसे मनोनाश होता है। अज्ञानीका मन उसके लिये शृङ्खलारूप—बन्धनका कारण होता है। रात्रिमें वेतालोंकी भाँति हृदयमें वासनाओंका वेग तभीतक रहता है, जबतक एक तत्त्वके दृढ अभ्याससे मनपर विजय नहीं कर ली जाती। जिनका चित्त और अभिमान क्षीण हो गये हैं और इन्द्रियरूपी शत्रु वशमें हो गये हैं, उनकी भोग- वासनाएँ उसी प्रकार क्षीण हो जाती हैं, जैसे हेमन्त ऋतुके आनेपर कमलिनी—कमलका पौधा स्वयमेव नष्ट हो जाता है। हाथसे हाथको मलकर, दाँतसे दाँत पीसकर तथा अङ्गोंको अङ्गोंसे दबाकर—अर्थात् अपनी पूरी शक्ति लगाकर पहले अपने मनको जीतना चाहिये । बारंबार, एकाग्रचित्त होकर बैठने तथा सदद्युक्ति के द्वारा आत्म चिन्तन करनेके अतिरिक्त मनको जीतनेका दूसरा कोई उपाय नहीं है ॥ ३२-४१ ॥ "जिस प्रकार मदमत्त हाथी अङ्कुशके बिना वशमे नहीं आता, उसी प्रकार चित्तको वशमे करनेके लिये अध्यात्म- विद्याका ज्ञान, सत्सङ्गति, वासनाओंका भलीभाँति परित्याग