कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
by गीताप्रेस
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
द्वितीय अध्याय
ॐ द्वितीय अध्याय जीवन्मुक्ति एवं विदेहमुक्तिका स्वरूप, उनके होनेमें प्रमाण, उनकी सिद्धिका उपाय तथा प्रयोजन तत्पश्चात् श्रीहनुमान्जीने श्रीरामजीसे पूछा- 'भगवन् ! जीवन्मुक्ति क्या है, विदेह-मुक्ति क्या है और इनके होनेमें प्रमाण क्या है ? तथा उनकी सिद्धि कैसे होती है और उस सिद्धिका प्रयोजन क्या है ?' ॥ १ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने कहा-'हनुमान् ! जीवको 'मे भोक्ता हूँ, मे कर्ता हूँ, मे सुखी हूँ और मे दुखी हूँ' - इत्यादि जो ज्ञान होता है, वह चित्तका धर्म है। यही ज्ञान क्लेशरूप होनेके कारण उसके लिये बन्धनका कारण हो जाता है। इस प्रकार- के ज्ञानका निरोध ही जीवन्मुक्ति है। घटरूप उपाधिसे मुक्त घटाकाशकी भाँति प्रारब्धरूप उपाधिके नष्ट होनेपर यह जीव विदेहमुक्त हो जाता है। जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्तिके होनेमे अक्षोत्तरशत-उपनिषद् ही प्रमाण हैं। कर्तापन और भोक्तापन आदि दु खोंकी निवृत्तिके द्वारा नित्यानन्दकी प्राप्ति ही इनका प्रयोजन है। वह आनन्द प्राप्ति पुरुषके प्रयत्नसे-पुरुषार्थसे सिद्ध होती है। जैसे पुत्रेष्टि यज्ञके द्वारा पुत्रकी, वाणिज्य- व्यापारके द्वारा धनकी एव ज्योतिष्टोम यज्ञके द्वारा स्वर्गकी प्राप्ति होती है, उसी प्रकार पुरुषके प्रयत्नमे होनेवाले वेदान्त- के श्रवण मनन और निदिध्यासनसे उत्पन्न हुई समाधिसे जीवन्मुक्ति आदिकी सिद्धि होती है और वह सारी वासनाओं- के नाश होनेपर प्राप्त होती है ॥ २ ॥ "पुरुषका प्रयत्न या पुरुषार्थ दो प्रकारका होता है- शास्त्रविरुद्ध और शास्त्रानुकूल । उनमे शास्त्रविरुद्ध पुरुषार्थ अनर्थका कारण होता है और शास्त्रानुकूल पुरुषार्थ परमार्थ- को सिद्ध करनेवाला होता है। लोक वासना, शास्त्र-वासना तथा देह वासनाके कारण प्राणीको यथार्थज्ञानकी प्राप्ति नहीं होती । अर्थात् ये तीन प्रकारकी वासनाएँ ही ज्ञानकी प्राप्तिमें बाधक हैं। वासनाएँ पुनः दो प्रकारकी होती हैं- शुभ और अशुभ । शुभ वासनाओंके द्वारा, हनूमान् ! यदि तुम ज्ञानका अनुशीलन करते हो तो क्रमशः उसके द्वारा मेरे पदको प्राप्त करोगे, और यदि अशुभ भावोंसे युक्त रहते हो तो वे तुम्हे महान् सकटमें डाल देंगे । कपीश्वर ! पूर्वके सस्कारोंको तुम्हें यत्नपूर्वक जीतना चाहिये । शुभाशुभ मार्गोसे बहती हुई वासनारूपी नदीको अपने पुरुषार्थके द्वारा शुभ- मार्गमें लगाना चाहिये । अशुभ मागोंमें जाते हुए वासना- प्रवाहको शुभ मागोंमें उतारना चाहिये, क्योंकि मनका यह स्वभाव है कि अशुभसे हटानेपर वह शुभकी ओर जाता है और शुभसे हटाये जानेपर अशुभमें प्रवृत्त होता है। मनुष्यको चाहिये कि पुरुषार्थके द्वारा यत्नपूर्वक चित्तरूपी बालकको फुसलाकर - थपथपाकर शुभमे ही लगाये। अभ्यास- के द्वारा जब तुम्हारी दोनो प्रकारकी वासनाएँ जल्दी ही क्षीण होने लगे, तब शत्रुओका मर्दन करनेवाले हनूमान् ! तुम जान लेना कि अभ्यास परिपक्वताको प्राप्त हो गया। पवनकुमार ! जहाँ वासनाके अस्तित्त्वका संदेह भी हो, वहाँ शुभ वासनाओं- में ही बारवार चित्तको लगाये । शुभ वासनाओंकी वृद्धि होनेपर कभी दोष नही उत्पन्न हो सकता ॥ ३-१० ॥ "महामति हनूमान् ! वासनाक्षय, विज्ञान और मनोनाश- इन तीनोंका एक साथ चिरकालतक अभ्यास करनेपर ये फल प्रदान करते ह। जबतक इन तीनोंका बारवार एक साथ अभ्यास न किया जाय, तबतक सैकड़ो वर्ष बीतनेपर भी कैवल्य पदकी प्राप्ति नहीं होती। यदि अलग-अलग इनका चिरकालतक भी खूब अभ्यास किया जाय तो, जिस प्रकार टुकड़े टुकड़े करके जपे हुए मन्त्र सिद्ध नहीं होते, उसी प्रकार इनमे सिद्धिकी प्राप्ति नहीं होती। यदि इन तीनोका चिरकालतक अभ्यास किया जाय तो हृदयकी दृढ ग्रन्थियाँ भी निःसन्देह उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे कमलकी नालको तोड़नेपर उसके रेशे टूट जाते है। जिस दृढती ससार-वासनाका सैकड़ों जन्मोंसे अभ्यास हो रहा है, वह चिरकालतक साधना किये बिना कदापि क्षीण नहीं होती । इसलिये, प्यारे हनूमान् ! पुरुषार्थके द्वारा प्रयत्न करते हुए विवेकपूर्वक भोगकी इच्छाओंको दूरसे ही नमस्कार करके इन तीनोका सम्यक्रूपसे अवलम्बन करो ॥ ११-१६ ॥ "वासनासे युक्त मनको ज्ञानियोंने बद्ध बतलाया है और जो मन वासनासे सम्यक्रूतया मुक्त हो गया है, वह मुक्त कहलाता है । महाकपि ! मनको वासनाविहीन स्थितिमें शीघ्र ले आओ। भलीभाँति विचार करनेसे और सत्यके अभ्याससे वासनाओंका नाश हो जाता है। वासनाओके नाशसे चित्त उसी प्रकार विलीन हो जाता है, जैसे तेलके समाप्त हो जानेपर दीपक बुझ जाता है। वासनाओंका भलीभाँति त्याग
अध्याय २] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ६२७
अध्याय २] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६२७ करके मुझ चैतन्यस्वरूपमें जो निवात दीपशिखाके समान निश्चल होकर स्थित रहता है, वह मुझ सच्चिदानन्दस्वरूपको एकीभावसे प्राप्त होता है। समाधि अथवा कर्मानुष्ठान वह करे या न करे। जिसके हृदयमें वासनाका सर्वथा अभाव हो गया है, वही मुक्त है, वही उत्तमाशय है ॥ १७-२० ॥ "जिसके मनसे वासनाएँ दूर हो गयी हैं, उसे न नैष्कर्म्य- से—कर्मोंके त्यागसे मतलब है और न कर्मानुष्ठानसे । उसे समाधान अर्थात् षट्सम्पत्ति और जपकी भी आवश्यकता नहीं है। सारी वासनाओंका त्याग करके मनका मौन धारण करनेके अतिरिक्त कोई दूसरा परम पद नहीं है। किसी प्रकारकी प्रत्यक्ष वासना न होनेपर भी चक्षु आदि इन्द्रियाँ जो स्वतः अपने-अपने बाह्य विषयोंमें प्रवृत्त होती हैं, इसमें कोई-न-कोई सूक्ष्म वासना ही कारण है। अनायास सामने आये हुए दृश्य विषयोंमें जैसे चक्षु-इन्द्रियकी वारंवार प्रवृत्ति रागरहित ही होती है, उसी प्रकार धीर पुरुष कार्योंमें अनासक्तभावसे ही प्रवृत्त होते हैं। पवनतनय ! जो सत्ता- बुद्धिसे प्रकट होती है और उसीके अनुकूल होती है तथा जिसमें चित्तका उदय और लय भी होता है, मुनलोग उसी वृत्तिको वासनाके नामसे पुकारते हैं । चिर-परिचित पदार्थोंके अनन्य चिन्तनके द्वारा जो चित्तमें अत्यन्त चञ्चलता उत्पन्न हो जाती है, वही चित्त-चाञ्चल्य जन्म, जरा और मृत्युका एकमात्र कारण होता है। वासनाके कारण प्राणीमें स्पन्दन होता है और उस स्पन्दनसे पुनः वासनाकी उत्पत्ति होती है, इस प्रकार चित्तरूपी बीजमें अङ्कुर लगते रहते हैं ॥ २१–२६ ॥ "चित्तरूपी वृक्षके दो बीज हैं—प्राण स्पन्दन ( प्राणोंकी गति ) और वासना । इन दोनोंमेंसे एकके भी क्षीण होनेसे दोनों नष्ट हो जाते हैं। अनासक्त होकर व्यवहार करनेसे, संसार- का चिन्तन छोड़ देनेसे और शरीरकी विनश्वरताका दर्शन करते रहनेसे वासना उत्पन्न नहीं होती। और वासनाका भलीभाँति त्याग हो जानेपर चित्त अचित्तताको प्राप्त होता है, अर्थात् उसकी वासनात्मिका प्रवृत्ति नष्ट हो जाती है। वासनाके नष्ट हो जानेपर जब मन मनन करना छोड़ देता है, तब मनके निराकृत होनेपर परम शान्तिप्रद विवेककी उत्पत्ति होती है। जबतक तुम्हारे अन्दर ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं हो जाती, जबतक तुम्हें परमपद अज्ञात है, तबतक गुरु तथा शास्त्र-प्रमाणके द्वारा निर्णीत मार्गका आचरण करो । तदनन्तर कषायोंका परिपाक होनेपर जब निश्चयपूर्वक तुम्हें तत्त्वका ज्ञान हो जाय, तब तुम्हें निश्चिन्त होकर समस्त शुभ वासनाओंका भी त्याग कर देना चाहिये ॥ २७-३१ ॥ "चित्तनाश दो प्रकारका होता है—सरूप और अरूप । जीवन्मुक्तका चित्तनाश सरूप होता है और विदेहमुक्तका अरूप होता है। अर्थात् जीवन्मुक्तका चित्त स्वरूपसे रहता तो है, पर वह अचित्त हुआ रहता है, विदेहमुक्त होनेपर उसका स्वरूपतः नाश हो जाता है। पवनसुत ! अब एकाग्र- चित्तसे मनोनाशके विषयमें सुनो। जब तुम्हारा मन चित्त- नाशकी स्थितिको प्राप्त हो जायगा अर्थात् उसकी अनुसंधानात्मिका वृत्ति शान्त हो जायगी, तब मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा प्रभृति गुणोंसे युक्त होकर वह परमशान्तिको प्राप्त कर लेगा—इसमें कोई संशय नहीं है। जीवन्मुक्तका मन आवागमनसे मुक्त हो जाता है, अतः उसका वह मनोनाश सरूप कहलाता है। विदेह-मुक्ति मिल जानेपर जो मनोनाश होता है, वह अरूप कहलाता है। अतएव सहस्रों अङ्कुर, त्वचा, पत्ते, शाखा एव फल फूलसे युक्त इस संसार-वृक्षका यह मन ही मूल है—यह निश्चित हुआ । और वह मन सङ्कल्प- रूप है। सङ्कल्पको निवृत्त करके उस मनस्तत्त्वको सुखा डालो, जिससे यह संसार वृक्ष भी नीरस होकर सूख जाय । अपने मनके निग्रहका एक ही उपाय है, वह है यह निश्चय करना कि मनका अभ्युदय—उसका स्फीत होना ही उसका विनाश— पतन है, और उसके नाशमें ही उसका महान् अभ्युदय— उसकी उन्नति है। ज्ञानसे मनोनाश होता है। अज्ञानीका मन उसके लिये शृङ्खलारूप—बन्धनका कारण होता है। रात्रिमें वेतालोंकी भाँति हृदयमें वासनाओंका वेग तभीतक रहता है, जबतक एक तत्त्वके दृढ अभ्याससे मनपर विजय नहीं कर ली जाती। जिनका चित्त और अभिमान क्षीण हो गये हैं और इन्द्रियरूपी शत्रु वशमें हो गये हैं, उनकी भोग- वासनाएँ उसी प्रकार क्षीण हो जाती हैं, जैसे हेमन्त ऋतुके आनेपर कमलिनी—कमलका पौधा स्वयमेव नष्ट हो जाता है। हाथसे हाथको मलकर, दाँतसे दाँत पीसकर तथा अङ्गोंको अङ्गोंसे दबाकर—अर्थात् अपनी पूरी शक्ति लगाकर पहले अपने मनको जीतना चाहिये । बारंबार, एकाग्रचित्त होकर बैठने तथा सदद्युक्ति के द्वारा आत्म चिन्तन करनेके अतिरिक्त मनको जीतनेका दूसरा कोई उपाय नहीं है ॥ ३२-४१ ॥ "जिस प्रकार मदमत्त हाथी अङ्कुशके बिना वशमे नहीं आता, उसी प्रकार चित्तको वशमे करनेके लिये अध्यात्म- विद्याका ज्ञान, सत्सङ्गति, वासनाओंका भलीभाँति परित्याग
६२८ मुक्तिकोपनिषद् [ अध्याय २
६२८ * मुक्तिकोपनिषद् * [ अध्याय २
तथा प्राणवायुका निरोध अर्थात् प्राणायाम-ये प्रवल उपाय हैं। इन श्रेष्ठ युक्तियोके रहते हुए जो हठपूर्वक चित्तको निरुद्ध करनेकी चेष्टा करते हैं, वे दीपकको छोड़कर अन्धकारमें भटकते हैं। जो मूढ पुरुष हठसे चित्तको वशमें करनेका उद्योग करते हैं, वे उन्मत्त हाथीको कमल नालके तन्तुओंसे बाँधनेकी चेष्टा करते हैं । वृत्तिरूप लताओंके आश्रयभूत चित्तरूपी वृक्षके दो बीज हैं-एक है प्राणोंका स्पन्दन (गति), दूसरी दृढ भावना। प्राण वायुके सञ्चालनसे घट- घट व्यापक संवित्-समष्टि-चेतना चलायमान हो उठती है। चित्तकी एकाग्रतासे ज्ञानकी प्राप्ति होती है और उससे मुक्ति- लाभ होता है। अतएव चित्तकी एकाग्रताके साधनोंमें ध्यान- की यथोचित विधि बतलायी जाती है-॥४२-४७॥
"चित्त सर्वथा विकारहीन न हो, तो भी यशके आविर्भाव और अरिष्टके तिरोभावके क्रमसे केवल चैतन्य-चिदानन्द स्वरूप परब्रह्मका चिन्तन करो। जिस क्षण चित्त चिदानन्दमें आरूढ होता है, वह यशकी स्थिति है, और जिस क्षण उससे अलग होता है, वह अरिष्टकी स्थिति है। चित्तकी चाञ्चल्यके कारण यह स्वाभाविक स्थिति होती है, अतएव अरिष्टकी स्थितिसे पुनः-पुनः यशकी स्थितिमे चित्तको स्थापितकर परब्रह्मके चिन्तनमें लगो । अपानवायुके भीतर रोक दिये जानेपर जबतक हृदयमे प्राणवायुका उदय नहीं होता, तबतक वह कुम्भकावस्था रहती है, जिसका योगीलोग अनुभव करते हैं। और प्राण वायुके बाहर रोक दिये जानेपर जबतक अपान वायुका उदय नहीं होता, तबतक जो पूर्ण समावस्था रहती है, उसे बाह्य कुम्भक कहते हैं॥ ४८-५० ॥
"चिरकालतक ध्यानका अभ्यास करते रहनेपर जब अहङ्कार विगलित हो जाता है और मनोवृत्ति ब्रह्माकारमें प्रवाहित होने लगती है, तब उसे सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं। जब चित्त- की सारी वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं, उस समय परमानन्द प्रदान करनेवाली असम्प्रज्ञात नामकी समाधि होती है, जो योगियोंको प्रिय है। इस समाधिकी अवस्थामें कुछ भी मान नहीं होता। हो कैसे, उस स्थितिमे मन और बुद्धिका अस्तित्त्वतक नहीं रहता, केवल चित्स्वरूपकी अवस्थिति होती है। इस समाधिमे चित्त निरालम्ब होकर कैवल्य स्थिति- मे रहता है, मुनिलोग इस समाधिकी भावना करते हैं। इस समाधिमें ऊपर, नीचे और बीचमें-सर्वत्र शिवस्वरूप पूर्ण ब्रह्म ही अनुभूत होते हैं, यह समाधि परमार्थ अर्थात् मोक्ष- स्वरूप है तथा साक्षात् ब्रह्माके मुखसे उपदिष्ट हुई है ॥५१-५४॥
"दृढ भावनाके द्वारा पूर्वापरका विचार छोड़कर चित्त जो पदार्थके स्वरूपको ग्रहण करता है, उस चित्तविकारको वासना कहते हैं। कपिश्रेष्ठ ! आत्मा चित्तके तीव्र संवेगसे जैसी भावना करता है, इतर वासनाओंसे मुक्त होकर वह शीघ्र वैसा ही बन जाता है। इस प्रकारका पुरुष वासनाके वशीभूत होकर जो कुछ देखता है, उसीको सद्वस्तु-यथार्थ मानकर मोहको प्राप्त होता है। वासनाके वेगकी विभिन्नताके कारण चित्त अपने वासनात्मक स्वरूपको नहीं छोड़ता। एक वासनाके छोड़ते छोड़ते दूसरी वासनामें रमने लगता है। जिस प्रकार नशेके कारण पुरुषकी विवेकबुद्धि नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार वह दुर्बुद्धि भ्रान्त होकर सब कुछ देखता है। वासना दो प्रकारकी होती है-शुद्ध और मलिन । मलिन वासना आवागमनमे डालती है और शुद्ध वासना मनुष्यको जन्म- मृत्युसे छुड़ाती है। ज्ञानीजन कहते हैं कि मलिन वासना निविड़ अहङ्कार और घन अज्ञानस्वरूप होती है, वह पुनर्जन्म प्रदान करती है ॥ ५५-६० ॥
"जिस प्रकार बीजके अच्छी प्रकार भुन जानेपर उससे अङ्कुर नहीं उत्पन्न होता, उसी प्रकार संसार-वासनाके नष्ट हो जानेपर पुनर्जन्म नहीं होता। अतएव दग्ध बीजके समान स्थिति होनी चाहिये । वायुनन्दन ! चबाये हुएको चबानेके समान नाना शास्त्रोंकी व्यर्थ आलोचनासे क्या लाभ, प्रयत्न होना चाहिये भीतरी प्रकाशको खोजनेके लिये। कपिशार्दूल ! दर्शन और अदर्शन अर्थात् सत् ख्याति और असत्-ख्याति दोनों- को छोड़कर जो स्वयं कैवल्यरूपमें स्थित रहता है, वह ब्रह्मविद् नहीं, स्वयं ब्रह्मस्वरूप ही है। चारों वेदोंका और अनेकों शास्त्रोंका अध्ययन करके भी जो ब्रह्मतत्त्वको नहीं जानता, वह परमानन्दसे उसी प्रकार वञ्चित रहता है, जैसे कलछुल भोजनके पदार्थोंमें रहती हुई भी उनके रसको नहीं जानती । जिसका अपने शरीरकी अपवित्र गन्धको प्रत्यक्ष करके भी उससे विराग नहीं होता, उसको चिराग पैदा करनेवाला दूसरा कौन सा उपदेश दिया जा सकता है ॥ ६१-६४ ॥
"शरीर अत्यन्त मलयुक्त है और आत्मा अत्यन्त निर्मल है, दोनोंके भेद को जानकर किसकी शुचिताका उपदेश किया जाय। जो वासनासे बँधा है, वही बद्ध है, और वासनाओंका नाश ही मोक्ष है। अतएव वासनाओंका सम्यक्रूपसे परित्याग करके मोक्ष-प्राप्तिकी वासनाका भी त्याग करो । पहले मानसी वासनाओंका त्याग करके विषय वासनाओंका भी त्याग करो; और मोक्षादिकी शुद्ध-निर्दोष वासनाओंको ग्रहण करो ।
अध्याय २ ] ⁕ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ⁕ ६२९
अध्याय २ ] ⁕ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ⁕ ६२९ इसके बाद उनको भी छोड़कर, अथवा उन भव्य वासनाओं- को व्यवहारमें रखते हुए भी भीतरसे शान्त अर्थात् सब प्रकारकी वासनाओंसे मुक्त रहकर सबके प्रति समान स्नेह रखते हुए एकमात्र चित्स्वरूपमें अपनी वासना लगाओ । 'मारुति ! फिर उस चिद्वासनाको भी मन और बुद्धिके साथ परित्याग करके अन्ततोगत्वा तुम मुझमे पूर्णतया समाहित हो जाओ । जो शब्दरहित, स्पर्श्वरहित, रूपरहित, रसरहित और गन्धरहित है, जो कभी विकारको नहीं प्राप्त होता, जिसका न कोई नाम है और न कोई गोत्र है तथा जो सब प्रकारके दुःखोंको हरनेवाला है—पवनतनय ! इस प्रकारके मेरे स्वरूपका तुम भजन करो ॥ ६५-७० ॥ "हनूमान् ! जो साक्षिस्वरूप है, आकाशके समान अनन्त है, जिसे एक बार जान लेनेपर कुछ भी जानना शेष नहीं रहता, जो अजन्मा, एक—अद्वितीय, निर्लेप, सर्वव्यापी एवं सर्वश्रेष्ठ है; जो अकार-उकार-मंकाररूप तीन कलाओंसे युक्त तथा सम्पूर्ण कलाओंसे विमुक्त अद्वय-तत्त्व है, वह ओंङ्काररूप अक्षर—अविनाशी ब्रह्म मैं ही हूँ। मैं द्रष्टा हूँ, शुद्धस्वरूप हूँ, कभी विकारको प्राप्त नहीं होता और मेरे अतिरिक्त कोई दूसरा पदार्थ नहीं है, जो मेरा विषय बने । अर्थात् मेरा द्रष्टापन भी कहनेके लिये ही है। मै आगे-पीछे, ऊपर-नीचे— सर्वत्र परिपूर्ण हूँ। मे भूमा हूँ, मुझमें किसी प्रकारकी कमी नहीं है। हे हनूमान् ! तुम मेरे इस स्वरूपका चिन्तन करो । मैं अज हूँ, अमर हूँ, अजर हूँ, अमृत हूँ, स्वयंप्रकाश हूँ, सर्वव्यापी हूँ, अव्यय—अविनाशी हूँ, मेरा कोई कारण नहीं—मैं स्वयम्भू हूँ, समस्त कार्य-कलापसे परे मैं शुद्धस्वरूप हूँ, नित्यतृप्त हूँ—इस प्रकार तुम चिन्तन करो। इस प्रकार चिन्तन करते-करते जब कालवश शरीरपात होगा, तब वायुके स्पन्दनके समान तुम जीवन्मुक्त पदका भी परित्याग करके निर्वाण मुक्ति—विदेह-मुक्तिकी अवस्थामें पहुँच जाओगे । यही बात ऋचामे भी कही गयी है— 'जो आकाशमें तेजोमय सूर्यमण्डलकी भाँति, परमव्योममें चिन्मय प्रकाशद्वारा सब ओर व्याप्त है, भगवान् विष्णुके उस परमधामको विद्वान् उपासक सदा ही देखते हैं। साधनामें सदा जाग्रत् रहनेवाले निष्काम उपासक ब्राह्मण वहाँ पहुँचकर उस परमधामको और भी उद्दीप्त किये रहते हैं, जिसे विष्णुका परमपद कहते हैं। वह परमपद निष्काम उपासकको प्राप्त होता है ।' जो इस प्रकार जानता है, वह उक्त फलका भागी होता है । यह महा-उपनिषद् है" ॥ ७१-७६ ॥ ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥ ॥ शुक्लयजुर्वेदीय मुक्तिकोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! मन ही बन्ध-मोक्षका कारण है मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । बन्धाय विषयासक्तं मुक्तं निर्विषयं स्मृतम् ॥ ( ब्रह्मविन्दु० २ । ३ ) मनुष्योंके बन्ध और मोक्षमें मन ही कारण है, विषयासक्त मन बन्धनके लिये है और निर्विषय मन ही मुक्त माना जाता है ।
ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय गर्भोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! गर्भकी उत्पत्ति एवं वृद्धिके प्रकार
ॐ शरीर पञ्चात्मक, पाँचोंमें वर्तमान, छः आश्रयोंवाला, छः गुणोंके योगसे युक्त, सात धातुओंसे निर्मित, तीन मलोंसे दूषित, दो योनियोंसे युक्त तथा चार प्रकारके आहारसे पोषित होता है । पञ्चात्मक कैसे है ? पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश (—इनसे रचा हुआ होनेके कारण) शरीर पञ्चात्मक है । इस शरीरमें पृथिवी क्या है ? जल क्या है ? तेज क्या है ? वायु क्या है ? और आकाश क्या है ? इस शरीरमें जो कठिन तत्त्व है, वह पृथिवी है, जो द्रव है, वह जल है, जो उष्ण है, वह तेज है, जो सञ्चार करता है, वह वायु है, जो छिद्र है, वह आकाश कहलाता है । इनमें पृथिवी धारण करती है, जल एकत्रित करता है, तेज प्रकाशित करता है, वायु अवयवोंको यथास्थान रखता है, आकाश अवकाश प्रदान करता है । इसके अतिरिक्त श्रोत्र शब्दको ग्रहण करनेमे, त्वचा स्पर्श करनेमें, नेत्र रूप ग्रहण करनेमें, जिह्वा रसका आस्वादन करनेमें, नासिका सूँघनेमें, उपस्थ आनन्द लेनेमे तथा पायु मलोत्सर्ग- के कार्यमें लगा रहता है । जीव बुद्धिद्वारा ज्ञान प्राप्त करता है, मनके द्वारा सङ्कल्प करता है, वाक् इन्द्रियसे बोलता है। शरीर छः आश्रयोवाला कैसे है ? इसलिये कि वह मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कटु और कषाय—इन छ. रसोंका आस्वादन करता है । षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद—ये सप्त स्वर तथा इष्ट, अनिष्ट और प्रणिधानकारक (प्रणवादि) शब्द मिलाकर दस प्रकारके शब्द (स्वर) होते हैं । शुक्ल, रक्त, कृष्ण, धूम्र, पीत, कपिल और पाण्डुर—ये सप्त रूप (रंग) हैं ॥ १ ॥
सात धातुओंसे निर्मित कैसे है ? जब देवदत्तनामक व्यक्तिको द्रव्य आदि भोग्य विषय जुड़ते हैं, तब उनके परस्पर अनुकूल होनेके कारण षड्रस पदार्थ प्राप्त होते हैं—जिनसे रस बनता है । रससे रुधिर, रुधिरसे मास, माससे मेद, मेदसे स्नायु, स्नायुसे अस्थि, अस्थिसे मज्जा और मज्जासे शुक्र—ये सात धातुएँ उत्पन्न होती हैं । पुरुषके शुक्र और स्त्रीके रक्तके संयोगसे गर्भका निर्माण होता है । ये सब धातुएँ हृदयमे रहती हैं, हृदयमें अन्तराग्नि उत्पन्न होती है, अग्निकेस्थानमें पित्त, पित्तके स्थानमें वायु और वायु- से हृदयका निर्माण सृजन-क्रमसे होता है ॥ २ ॥ ऋतुकालमें सम्यक् प्रकारसे गर्भाधान होनेपर एक रात्रि- में शुक्र शोणितके संयोगसे कलल बनता है । सात रातमें बुद्बुद बनता है । एक पक्षमें उसका पिण्ड (स्थूल आकार) बनता है । वह एक मासमें कठिन होता है । दो महीनोंमें वह सिरसे युक्त होता है, तीन महीनोंमें पैर बनते हैं, पश्चात् चौथे महीने गुल्फ (पैरकी घुट्टियाँ), पेट तथा कटि-प्रदेश तैयार हो जाते है । पाँचवें महीने पीठकी रीढ तैयार होती है । छठे महीने मुख, नासिका, नेत्र और श्रोत्र बन जाते हैं । सातवें महीने जीवसे युक्त होता है । आठवें महीने सब लक्षणोंसे पूर्ण हो जाता है । पिताके शुक्रकी अधिकतासे पुत्र, माताके रुधिरकी अधिकतासे पुत्री तथा शुक्र और शोणित दोनोंके तुल्य होनेसे नपुंसक संतान उत्पन्न होती है । व्याकुल चित्त होकर समागम करनेसे अन्धी, कुबड़ी, खोड़ी तथा बौनी संतान उत्पन्न होती है । परस्पर वायुके सङ्घर्षसे शुक्र दो भागोंमें बँटकर सूक्ष्म हो जाता है, उससे युग्म
ༀ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ༀ ६३१ (जुड़वाँ) संतान उत्पन्न होती है। पञ्चभूतात्मक शरीरके समर्थ—स्वस्थ होनेपर चेतनामें पञ्च ज्ञानेन्द्रियात्मक बुद्धि होती है, उससे गन्ध, रस आदिके ज्ञान होते हैं। वह अविनाशी अक्षर ॐकारका चिन्तन करता है, तब इस एकाक्षरको जानकर उसी चेतनके शरीरमें आठ प्रकृतियाँ (प्रकृति, महत्-तत्त्व, अहङ्कार और पाँच तन्मात्राएँ) तथा सोलह विकार (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच स्थूल भूत तथा मन) होते हैं। पश्चात् माताका खाया हुआ अन्न एव पिया हुआ जल नाड़ियोंके सूत्रोंद्वारा पहुँचाया जाकर गर्भस्थ शिशुके प्राणोंको तृप्त करता है। तदनन्तर नवें महीने वह ज्ञानेन्द्रिय आदि सभी लक्षणोंसे पूर्ण हो जाता है। तब वह पूर्व-जन्मका स्मरण करता है। उसके शुभ-अशुभ कर्म भी उसके सामने आ जाते हैं ॥ ३ ॥ तब जीव सोचने लगता है—'मैंने सहस्रो पूर्व-जन्मोंको देखा, उनमें नाना प्रकारके भोजन किये, नाना प्रकारके— नाना योनियोंके स्तनोंका पान किया। मैं बारवार उत्पन्न हुआ, मृत्युको प्राप्त हुआ। अपने परिवारवालोंके लिये जो मैंने शुभाशुभ कर्म किये, उनको सोचकर मैं आज यहाँ अकेला दग्ध हो रहा हूँ। उनके भोगोंको भोगनेवाले तो चले गये, मैं यहाँ दुःखके समुद्रमें पड़ा कोई उपाय नहीं देख रहा हूँ। यदि इस योनिसे मैं छूट जाऊँगा—इस गर्भके बाहर निकल गया तो अशुभ कर्मोंका नाश करनेवाले तथा मुक्तिरूप फल को प्रदान करनेवाले महेश्वरके चरणोंका आश्रय लूँगा। यदि मे योनिसे छूट जाऊँगा तो अशुभ कर्मोंका नाश करनेवाले और मुक्तिरूप फल प्रदान करनेवाले भगवान् नारायणकी शरण ग्रहण करूँगा। यदि मैं योनिसे छूट जाऊँगा तो अशुभ कर्मोंका नाश करनेवाले और मुक्तिरूप फल प्रदान करनेवाले सांख्य और योगका अभ्यास करूँगा। यदि मैं इस बार योनिसे छूट गया तो मैं ब्रह्मका ध्यान करूँगा।' पश्चात् वह योनिद्वार- को प्राप्त होकर योनिरूप यन्त्रमें दबाया जाकर बड़े कष्टसे जन्म ग्रहण करता है। बाहर निकलते ही वैष्णवी वायु (माया) के स्पर्शसे वह अपने पिछले जन्म और मृत्युओंको भूल जाता है और शुभाशुभ कर्म भी उसके सामनेसे हट जाते हैं ॥ ४ ॥ देह-पिण्डका 'शरीर' नाम कैसे होता है? इसलिये कि ज्ञानाग्नि, दर्शनाग्नि तथा जठराग्निके रूपमें अग्नि इसमें आश्रय लेता है। इनमें जठराग्नि वह है, जो खाये, पिये, चाटे और चूसे हुए पदार्थोंको पचाता है। दर्शनाग्नि वह है, जो रूपोंको दिखलाता है, ज्ञानाग्नि शुभाशुभ कर्मोंको सामने खड़ा कर देता है। अग्निके शरीरमें तीन स्थान होते हैं—आह्वनीय अग्नि मुखमें रहता है, गार्हपत्य अग्नि उदरमें रहता है, और दक्षिणाग्नि हृदयमे रहता है। आत्मा यजमान है, मन ब्रह्मा है, लोभादि पशु है, धैर्य और सतोष दीक्षाएँ हैं, ज्ञानेन्द्रियाँ यज्ञ- के पात्र हैं, कर्मेन्द्रियाँ हवि (होम करनेकी सामग्री) है, सिर कपाल है, केश दर्भ हैं, मुख अन्तर्वेदिक़ा है, सिर चतुष्कपाल है, पार्श्वकी दन्तपक्तियाँ षोडश कपाल हैं, एक सौ सात मर्मस्थान हैं, एक सौ अस्सी संधियाँ हैं, एक सौ नौ स्नायु हैं, सात सौ शिराएँ हैं, पाँच सौ मज्जाएँ हैं, तीन सौ साठ अस्थियाँ हैं, साढे चार करोड़ रोम है, आठ पल (तोले) हृदय है, द्वादश पल (बारह तोला) जिह्वा है, प्रस्थमात्र (एक सेर) पित्त, आढकमात्र (ढाई सेर) कफ, कुडवमात्र (पावभर) शुक्र तथा दो प्रस्थ (दो सेर) मेद है, इसके अतिरिक्त शरीरमे आहारके परिमाणसे मल-मूत्रका परिमाण अनियमित होता है। यह पिप्पलाद ऋषिके द्वारा प्रकटित मोक्षशास्त्र है, पैप्पलाद मोक्षशास्त्र है ॥ ५ ॥ ॥ गर्भोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ कृष्णयजुर्वेदीय कैवल्योपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! आत्माका स्वरूप तथा उसे जाननेका उपाय
महर्षि आश्वलायन भगवान् प्रजापति ब्रह्माजीके पास विधिपूर्वक समिधा हाथमे लेकर गये और बोले, 'भगवन् ! सदा सतजनोंके द्वारा परिसेवित, अत्यन्त गोप्य तथा अतिशय श्रेष्ठ उस ब्रह्मविद्याका मुझे उपदेश कीजिये, जिसके द्वारा विद्वान्लोग शीघ्र ही सारे पापोंको नष्ट करके परात्पर पुरुष—परब्रह्मको प्राप्त होते हैं।' ब्रह्माजीने उन महर्षिसे कहा—'आश्वलायन ! तुम उस परात्पर तत्त्वको श्रद्धा, भक्ति, ध्यान और योगके द्वारा जाननेका यत्न करो। उसकी प्राप्ति न कर्मके द्वारा होती है, न सन्तान अथवा धनके द्वारा। ब्रह्मज्ञानियोंने केवल त्यागके द्वारा अमृतत्वको प्राप्त किया है। स्वर्गलोकसे भी ऊपर गुहामें अर्थात् बुद्धिके गह्वरमें स्थित होकर जो ब्रह्मलोक प्रकाशित है, उसमे यति-सयमशील योगीजन प्रवेश करते हैं। जिन्होंने वेदान्तके सविशेष ज्ञानसे तथा श्रवण, मनन और निदिध्यासनके द्वारा परम तत्त्वका निश्चय कर लिया है, वे शुद्ध अन्त.करणवाले योगीजन संन्यास-योगके द्वारा ब्रह्मलोकमें जाकर कल्पके अन्तमें अमृतस्वरूप होकर मुक्त हो जाते हैं। स्नानादिसे शुद्ध होनेके अनन्तर निर्जन स्थानमें सुखसे बैठकर, ग्रीवा, सिर और शरीरको सीधे रखकर सारी इन्द्रियोंका निरोध करके भक्ति-पूर्वक अपने गुरुको प्रणाम करके सन्यास-आश्रममें स्थित योगीलोग अपने हृदय-कमलमें रजोगुणरहित, विशुद्ध, दुःख-शोकातीत आत्मतत्त्वका विशदरूपसे चिन्तन करते है। इस प्रकार जो अचिन्त्य है, अव्यक्त और अनन्तरूप है, कल्याणमय है, प्रशान्त है, अमृत है, जो ब्रह्म अर्थात् निखिल ब्रह्माण्डका मूल कारण है; जिसका आदि, मध्य और अन्त नही, जो एक अर्थात् अद्वितीय है, विभु और चिदानन्द है, रूपरहित और अद्भुत है, उस उमासहित अर्थात् ब्रह्मविद्याके साथ परमेश्वरको, समस्त चराचरके स्वामीको, प्रगान्तस्वरूप, त्रिलोचन, नीलकण्ठ महादेव अर्थात् परात्पर परब्रह्मको—जो सब भूतोंका मूल कारण है, सबका साक्षी है तथा अविद्यासे परे प्रकाशमान हो रहा है, उसको मुनिलोग ध्यानके द्वारा प्राप्त करते हैं ॥ १-७ ॥
'वही ब्रह्मा है, वही शिव है, वही इन्द्र है, वही अक्षर—अविनाशी परमात्मा है, वही विष्णु है; वह प्राण है, वह काल है, अग्नि है, वह चन्द्रमा है। जो कुछ हो चुका है और जो भविष्यमें होनेवाला है, वह सब वही है, उस सनातन तत्त्वको जानकर प्राणी मृत्युके परे चला जाता है। इसके अतिरिक्त मुक्तिका दूसरा कोई मार्ग नहीं है। जो आत्माको सब भूतोंमें देखता है तथा सब भूतोको आत्मामें देखता है, वह परब्रह्मको प्राप्त करता है; दूसरे किसी उपायसे नहीं। आत्मा—अन्तःकरणको नीचेकी अरणि तथा प्रणवको ऊपरकी अरणि बनाकर ज्ञानीजन ज्ञानरूपी मन्थनके अभ्यासद्वारा ससार-बन्धनको नष्ट कर देते हैं—ज्ञानाग्निमें जला डालते हैं। वही प्राणी मायाके वश अत्यन्त मोहग्रस्त होकर शरीरको ही अपना स्वरूप मान सब प्रकारके कर्मोंको करता है। वही जाग्रत् अवस्थामें स्त्री, अन्न पान आदि नाना प्रकारके
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६३३ भोगोंको भोगता हुआ परितृप्ति लाभ करता है। वही जीव स्वप्नावस्थामें अपनी मायासे कल्पित जीवलोकमें सुख-दुःखका भोक्ता बनता है और सुषुप्तिकालमें सारे मायिक प्रपञ्चके विलीन होनेपर वह तमोगुणसे अभिभूत होकर सुख-स्वरूपको प्राप्त होता है। पुनः जन्मान्तरोंके कर्मोंकी प्रेरणासे वह जीव सुषुप्तिसे स्वप्न-जगत्में उतरता है और उसके बाद जाग्रत्- अवस्थामें आता है। इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और -कारण- शरीररूपी तीन पुरोंमें जो जीव क्रीडा करता है, उसीसे यह सारा प्रपञ्च-वैचित्र्य उत्पन्न होता है॥ ८-१४॥ 'इस समस्त प्रपञ्चका आधार आनन्दस्वरूप अखण्ड बोध है- जिसमें स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीररूपी तीनों पुर लयको प्राप्त होते हैं। इसीसे प्राण उत्पन्न होता है, मन और सारी इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं, आकाश, वायु, अग्नि, जल और सारे विश्वको धारण करनेवाली पृथ्वी उत्पन्न होती है। जो परब्रह्म सबका आत्मा है, समस्त कार्य-कारणरूप विश्वका महान् आयतन अर्थात् आधार है, जो सूक्ष्म-से-सूक्ष्म है, अविनाशी है, वह तुम्हीं हो, तुम वही हो। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति आदि जो प्रपञ्च भासमान है, वह ब्रह्म- स्वरूप है और वही मैं हूँ- यों जानकर जीव सारे बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। तीनों धाम अर्थात् जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिमें जो कुछ भोक्ता, भोग्य और भोग हैं, उनसे विलक्षण साक्षी, चिन्मात्रस्वरूप, सदाशिव मैं हूँ। मुझमे ही सब कुछ उत्पन्न हुआ है, मुझमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है, मुझमें ही सब लयको प्राप्त होता है, वह अद्वय ब्रह्मस्वरूप मैं ही हूँ। मैं अणुसे भी अणु हूँ, इसी प्रकार मैं महान्से भी महान् हूँ; यह विचित्र विश्व मेरा ही स्वरूप है। मैं पुरातन पुरुष हूँ, मैं ईश्वर हूँ, मैं हिरण्मय पुरुष ब्रह्मा हूँ, मैं शिवस्वरूप हूँ। वह पाणि पाद-विहीन, अचिन्त्यशक्ति परब्रह्म मैं हूँ। मैं नेत्रोंके बिना देखता हूँ, कानोंके बिना सुनता हूँ, बुद्धि आदिसे पृथक् होकर मैं ही जानता हूँ, मुझको जाननेवाला कोई नहीं है, मैं सदा चित्स्वरूप हूँ। समस्त वेद मेरा ही ज्ञान कराते हैं, मैं ही वेदान्तका कर्त्ता हूँ, वेदवेत्ता भी मैं ही हूँ। मुझे पुण्य-पाप नहीं लगते, मेरा कभी नाश नहीं होता और न जन्म ही होता है। और न मेरे शरीर, मन-बुद्धि और इन्द्रियाँ ही हैं। मेरे लिये न भूमि है न जल है, न अग्नि है, न वायु और न आकाश ही है।' जो इस प्रकार गुहा-बुद्धिके गह्वरमें स्थित, निष्कल (अवयवहीन) और अद्वितीय, सदसत्से परे सबके साक्षी मेरे परमात्मस्वरूपको जानता है, वह शुद्ध परमात्मस्वरूपको प्राप्त होता है। जो शतरुद्रियका पाठ करता है, वह अग्निपूत होता है, वायुपूत होता है, आत्मपूत होता है, सुरापानके दोषसे छूट जाता है, ब्रह्महत्याके दोषसे मुक्त हो जाता है, वह स्वर्णकी चोरीके पापसे छूट जाता है, वह शुभाशुभ कर्मोंसे उद्धार पाता है, भगवान् सदाशिवके आश्रित हो जाता है तथा अविमुक्तस्वरूप हो जाता है। अतएव जो आश्रमसे अतीत हो गये हैं, उन परमहंसोंको सदा-सर्वदा अथवा कम-से-कम एक बार इसका पाठ अवश्य करना चाहिये। इससे उस ज्ञानकी प्राप्ति होती है, जो भवसागरका नाश कर देता है। इसलिये इसको इस प्रकार जानकर मनुष्य कैवल्यरूप मुक्तिको प्राप्त होता है, कैवल्य पदको प्राप्त होता है॥ १५-२५॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय कैवल्योपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! ज्ञानमयी दृष्टि 'दृष्टिं ज्ञानमयीं कृत्वा पश्येद् ब्रह्ममयं जगत् ।' 'दृष्टिको ज्ञान (ब्रह्म) मयी करके जगत्को ब्रह्ममय देखे ।' उ० अ० ८०-
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय कठरुद्रोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! संन्यासकी विधि और आत्मतत्त्वका वर्णन हरिः ॐ एक समय देवगण भगवान् प्रजापतिके पास गये और बोले—भगवन् ! हमे ब्रह्मविद्याका उपदेश कीजिये। भगवान् प्रजापति बोले—'शिकासहित केशोंका मुण्डन करा और यज्ञोपवीतका त्याग करके, पुत्रको देखकर यों कहे— 'तुम ब्रह्मा हो, तुम यज्ञ हो, तुम वषट्कार हो, तुम ॐकार हो, तुम स्वाहा हो, तुम स्वधा हो, तुम धाता हो, तुम विधाता हो, तुम प्रतिष्ठा हो।' तब पुत्र कहे, 'मैं ब्रह्मा हूँ, में यज्ञ हूँ, मैं वषट्कार हूँ, मैं ॐकार हूँ, मैं स्वाहा हूँ, मैं स्वधा हूँ, मैं धाता हूँ, मैं विधाता हूँ, मैं त्वष्टा हूँ, मैं प्रतिष्ठा हूँ।' परिव्राजक (सन्यासी) होकर घरसे निकलनेपर जब पुत्र-कलत्रादि पीछे पीछे चलें तो उनको देखकर अश्रुपात न करे। यदि अश्रुपात करेगा तो सन्तानका नाश हो जायगा। फिर वे सब लोग सन्यासीकी प्रदक्षिणा करके इधर-उधर बिना देखे लौट जाते हे। ऐसा सन्यासी देवलोकका अधिकारी होता है। “ब्रह्मचारीके रूपमें वेदोंका अध्ययन करने एव वेद- शास्त्रानुसार ब्रह्मचर्यका पालन करनेके पश्चात् विवाहपूर्वक पुत्रोंको उत्पन्न करके, उनको सुसस्कृत बना, यथाशक्ति यज्ञ- हवन करके अपने बन्धु बान्धवों तथा गुरुजनोंसे अनुज्ञा प्राप्तकर सन्यास ग्रहण किया जा सकता हे। इस प्रकार सन्यास ग्रहण करनेवाला वनमे जाकर बारह रात्रियोंतक दुग्धसे अग्निहोत्र करे, बारह रात्रियोंतक केवल दुग्धाहारपर रहे। बारह रात्रियोंके अन्तमे त्रिगुणसम्बन्धी तथा प्रजापतिसम्बन्धी चरुको, जो तीन मिट्टीकी ठीकरीयोंपर सिद्ध किया गया हो, वैश्वानर अग्नि तथा प्रजापतिके उद्देश्यसे हवनकर अग्निहोत्रमे प्रयुक्त दारुपात्रोंको भी अग्निमें होम दे। मिट्टीके पात्रोंका जलमें विसर्जन कर दे और तैजस—स्वर्णादिके बने पदार्थोंको अपने गुरुको प्रदान कर दे। उस समय यों कहे—'तू मुझे छोड़कर दूर न जाना, और मैं तुम्हें छोड़कर दूर नहीं जाऊँगा।' कुछ शाखोंके मतसे, इसके पश्चात् गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि और आहवनीय—इन तीनों प्रकारकी यज्ञाग्नियोंसे अरणियोंके पाससे भस्मकी मुष्टि लेकर पान करे। शिकासहित केशोंका वपन कराके और यज्ञोपवीत उतारकर 'ॐ भूः स्वाहा' इस मन्त्रसे जलमें डाल दे। इसके बाद अनशन, जलप्रवेश, अग्नि- प्रवेश, वीरोंके मार्गका ग्रहण करके (पाण्डवोंकी भाँति) महा- प्रस्थान करे; अथवा किसी वृद्ध सन्यासीके आश्रममें चला जाय। दुग्ध अथवा जलके साथ जो कुछ वह भोजन करे, वही उसका सायंकालीन हवन है, प्रातःकाल जो भोजन करे, वही प्रातः- कालीन हवन है। अमावास्याको जो भोजन करता है, वही दर्श-यज्ञ है। पूर्णिमाको जो भोजन करता है, वह उसका पौर्णमास्य यज्ञ है। वसन्त ऋतुमे जो वह केश, दाढी, मूँछ, शरीर-रोएँ, नख आदि कटवाता है, वह उसका अग्निष्टोम है। सन्यास लेनेके बाद पुनः अग्न्याधान न करे, 'मृत्युर्जयमावहम्' इत्यादिक आध्यात्मिक मन्त्रोंका पाठ करे। 'स्वस्ति सर्वजीवेभ्यः'—सब जीवोंका कल्याण हो, यह कहकर केवल आत्मतत्त्वका ध्यान करता हुआ, ऊपर हाथ उठाये प्रपञ्चातीत पथमे विचरण करे, गृहहीन होकर विचरण करे। भिक्षान्नके सिवा और कुछ ग्रहण न करे। थोड़ी देर भी एक जगह न
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६३५
ठहरें; जीव हिंसासे बचनेके लिये केवल वर्षाकालमें भ्रमण न करे। "इस विषयमें दूसरे श्लोक भी हैं, जिनका भाव इस प्रकार है—'सन्यासीको चाहिये कि वह कुण्डिका, चमस तथा शिक्य (झोली) आदिको, तथा तिपाई, जूते, शीतको दूर करनेवाली कन्था (कथरी), कौपीनके ऊपर अङ्ग ढकनेवाला वस्त्र, कुशका बना पवित्र, स्नानके अनन्तर धारण करनेका वस्त्र तथा उत्तरीय वस्त्र, यज्ञोपवीत एव वेदाध्ययन—सबका त्याग कर दे। वह अपना स्नान, पान तथा शौच पवित्र जलके द्वारा सम्पादन करे। नदीके किनारे जाकर सोये या देवमन्दिरमें सोये। अत्यधिक आराम न करे अथवा आयासके द्वारा शरीरको व्यर्थ कष्ट न दे, दूसरोंके द्वारा अपनी स्तुति सुनकर प्रसन्न न हो और निन्दा सुनकर गाली या शाप न दे। सन्यासी प्रमादरहित होकर ब्रह्मचर्यपूर्वक जीवन बिताये। स्त्रियोंका दर्शन, स्पर्श, केलि—क्रीडा, चर्चा, गुह्य (कामसम्बन्धी) विषयोंकी बातचीत, काम-सङ्कल्प, सम्भोगके लिये प्रयत्न तथा सम्भोगकी क्रिया— ये आठ प्रकारके मैथुन विचारवान् पुरुषों ने गिनाये हैं। उपर्युक्त अष्टविध मैथुनके त्यागरूप ब्रह्मचर्यका पालन मुमुक्षुजनोंको करना चाहिये ॥ १—६ ॥ "जो जगत्का प्रकाशक है, नित्य प्रकाशके रूपमें अपनेद्वारा ही प्रकाशित है, वही जगत्का साक्षी है, निर्मल आकृति- वाला सबका आत्मा है। वह प्रज्ञानघनरूप है, सब प्राणी उसीमें प्रतिष्ठित हैं। मनुष्य न कर्मके द्वारा, न सन्तानके द्वारा और न अन्य किसी साधनके द्वारा—बल्कि ब्रह्मानुभवके द्वारा ही ब्रह्मको प्राप्त कर सकता है। वह सत्य-ज्ञान-आनन्द- रूप अद्वितीय ब्रह्म इस माया, अज्ञान, गुहा आदि नामोंसे कहे जानेवाले संसारमें व्याप्त है तथा केवल विद्याके द्वारा जाना जाता है। जो परम व्योम नामक नित्य धाममे विराजमान इस ब्रह्मको जानता है, वह द्विजश्रेष्ठ क्रमशः सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है—पूर्णकाम हो जाता है। अज्ञान और मायाशक्तिके साक्षी प्रत्यगात्माको जो 'मै एक ब्रह्मस्वरूप हूँ' यों जानता है, वह स्वयं ब्रह्म हो जाता है ॥ ७-१२ ॥ "पूर्वोक्त शक्तियुक्त इस ब्रह्मस्वरूप आत्मासे उसी प्रकार अपञ्चीकृत आकाश अर्थात् शब्द-तन्मात्र उत्पन्न हुआ, जैसे रज्जुमें सर्पका भान होता है। पुनः आकाशसे वायुसञ्ज्ञक अपञ्ची- कृत स्पर्श-तन्मात्र उत्पन्न हुआ। वायुसे अग्नि, अग्निसेज ल और जलसे पृथिवी उत्पन्न हुई। उन सूक्ष्म भूतोंको शिवरूप ईश्वरने ८ पञ्चीकृत करके उन्हींसे ब्रह्माण्ड आदिकी सृष्टि की। ब्रह्माण्ड- के भीतर प्राणियोंके पुराकृत कर्मोंके अनुसार देव, दानव, यक्ष, किन्नर, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि योनियोंकी सृष्टि हुई तथा अस्थि, स्नायु आदिसे निर्मित यह प्राणियोंका शरीर भी कर्मानुसार ही प्रकाशित हो रहा है। समस्त शरीरधारियोंका यह जो अन्नमय आत्मा—स्थूल शरीर प्रकाशित हो रहा है, उससे भिन्न एक प्राणमय आत्मा और है, जो इस अन्नमय आत्माके भीतर स्थित है। उससे भी सूक्ष्म दूसरा विज्ञानमय आत्मा है, जो प्राणमय आत्माके भी भीतर स्थित है। उससे भी सूक्ष्म आनन्दमय आत्मा है, जो विज्ञानमय आत्माके भी भीतर है। अन्नमय आत्मा प्राणमयमे भरा है, उसी प्रकार प्राणमय आत्मा स्वभावतः मनोमय आत्मासे पूर्ण है। मनोमय आत्मा विज्ञान- मयसे पूर्ण है। सदा सुखरूप विज्ञानमय आत्मा आनन्दसे पूर्ण रहता है। उसी प्रकार आनन्दमय आत्मा अपनेसे भिन्न साक्षिरूप सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामी ब्रह्मके द्वारा पूर्ण है। वह ब्रह्म किसी दूसरेके द्वारा नहीं, बल्कि स्वतः सब ओरसे पूर्ण है। जो यह सत्य एव ज्ञानस्वरूप अद्वितीय ब्रह्म है, वही सबका पुच्छ— आधार है। वह सबका सार एव रसमय (आनन्दस्वरूप) है। उस सनातन तत्त्वको प्राप्तकर यह देही सर्वत्र सुखी होता है। इसके सिवा अन्यत्र सुखता कहाँ है? अखिल प्राणियोंके आत्मस्वरूप इस परानन्द ब्रह्मके न होनेपर कौन मानव जीता रह सकता है अथवा कौन प्राणी नित्य चेष्टा करता है? अतएव सर्वान्तर्यामीरूपसे जो चित्तमे भासित होता है, वही परमपुरुष दुःखोंसे घिरे हुए जीवात्माको सदा आनन्द प्रदान करता है ॥ १३-२५ ॥ "जो अदृश्यत्व आदि लक्षणोंसे युक्त इस परतत्त्वसे अभेद- रूप परमाद्वैतको प्राप्त कर लेता है, वही महासन्यासी है। सद्रूप परब्रह्म जो देश-काल-वस्तुसे अपरिच्छिन्न है, वही अभयपद है, परम कल्याणस्वरूप है, परम अमृत है। जबतक मनुष्यको इससे थोड़ा भी अन्तर—व्यवधान दीख पड़ता है, तबतक उसे (जन्म मृत्युका) भय है—इसमे सदेह नहीं। भगवान् विष्णुसे लेकर क्षुद्रातिक्षुद्र तृणपर्यन्त सभी तारतम्यके अनुसार नित्य इसी आनन्दकोषसे आनन्द प्राप्त करते हैं। इस लोक तथा परलोकके भोगोंसे विरक्त, प्रसन्न चित्तवाले श्रोत्रियको यह स्वरूपभूत आनन्द स्वय ही अनुभूत होता है—उसी प्रकार जैसे स्वयं परमात्माके अन्दर होता है। शब्दकी प्रवृत्ति किसी निमित्तको लेकर होती है। परतत्त्वमें निमित्तका अभाव होनेसे वाणी वहाँसे लौट आती
है । जो सब विशेषोंसे रहित परानन्दरूप तत्त्व है, वहाँ शब्दकी प्रवृत्ति कैसे हो । इस कारण यह मन सूक्ष्म और व्यावृत्त अर्थात् सीमित शक्तिसम्पन्न होकर सर्वत्र गमन करता है । क्योंकि श्रोत्र, त्वक्, नेत्र आदि ज्ञानेन्द्रियाँ तथा शब्द, स्पर्श आदि उनके विषय एवं वाक्, पाणि आदि कर्मेन्द्रियाँ सीमित शक्तिसम्पन्न हैं । अतएव परतत्त्वको प्राप्त करनेमें ये समर्थ नहीं हैं । जो साधक उस द्वन्द्वरहित, निर्गुण, सत्य स्वरूप और विज्ञानघन ब्रह्मानन्दको 'यह मेरा ही स्वरूप है'— इस प्रकार जान लेता है, उसे कहीं भी भय नहीं होता । इस प्रकार जो अपने इन्द्रियोंका स्वामी अपने गुरुके उपदेशसे आत्मसाक्षात्कारके द्वारा ब्रह्मानन्दको जानता है, वह साधु- असाधु कर्मोंके द्वारा कभी सतत नहीं होता । विषय तापक हैं और चित्त ताप्य है, चित्त और उसके विषयोंसे यह अखिल जगत् विभासित हो रहा है । परन्तु वेदान्त-शास्त्रके वाक्योंके ज्ञानसे यह प्रत्यगात्माके रूपमें अनुभूत होता है । शुद्ध-बुद्ध-मुक्त- स्वभाव ब्रह्म, ईश्वर चैतन्य, जीव-चैतन्य, प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और फल—ये सप्तविध तत्त्व कहे गये हैं, जिनमें व्यवहारोंकों लेकर भेद है । मायाकृत उपाधियोंसे अत्यन्त मुक्त ब्रह्म —शुद्ध चैतन्य कहलाता है । मायाके सम्बन्धसे वह ईश है, अविद्याके वशीभूत वही जीव है, तथा अन्तःकरणके सम्बन्धसे वही प्रमाता—ज्ञाता कहलाता है । उस अन्तःकरणकी वृत्तिके सम्बन्धसे वह प्रमाण संज्ञाको प्राप्त होता है । वह चैतन्य जबतक अज्ञात है, तबतक प्रमेय-कोटिमें आता है और वही ज्ञात हो जानेपर फल कहलाता है । अतएव बुद्धिमान् पुरुष अपने-आपको 'मैं सब उपाधियोंसे मुक्त हूँ'—इस प्रकार चिन्तन करे । इस प्रकार जो तत्त्वतः जानता है, वह ब्रह्मतत्त्वको प्राप्त करनेयोग्य हो जाता है । मैंने समस्त वेदान्तके सिद्धान्तोंका सार यथार्थतः कहा है । जीव स्वयं—अपने ही कर्मोंसे उत्पन्न होता है, स्वयं ही मरता है और स्वय ही अवशिष्ट रहता है । यह सब आत्माकी क्रीडा है, आत्माके सिवा कोई दूसरा तत्त्व नहीं है । यही उपनिषद्—रहस्य है" ॥ २६-४३ ॥
॥ कृष्णयजुर्वेदीय कठरुद्रोपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
देहनाशसे आत्माका नाश नहीं
घटावभासको भानुर्घटनाशे न नश्यति । देहावभासकः साक्षी देहनाशे न नश्यति ॥ (आत्मप्रबोध० १८)
'जैसे घड़ेका प्रकाशक सूर्य घड़ेके नाश हो जानेपर नष्ट नहीं होता, वैसे ही देहका प्रकाशक साक्षी (आत्मा) देहके नाशने नाशको नहीं प्राप्त होता ।'
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय रुद्रहृदयोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! भगवान् रुद्रकी सर्वश्रेष्ठता, सर्वस्वरूपता और ब्रह्मस्वरूपता हरिः ॐ रुद्रहृदय, योगकुण्डली, भस्मजाबाल, रुद्राक्षजाबाल और गणपति-ये पाँच उपनिषद् प्रणवके मूल तत्त्वको बतलाते हैं । ये श्रुतिके महावाक्य हैं, ब्रह्म- ज्ञानात्मक अग्निहोत्रके ये पाँच महामन्त्र हैं, अथवा मुक्तिकी प्राप्तिके लिये पाँच ब्रह्म अर्थात् मन्त्रात्मक अग्निहोत्र हैं ॥ १ ॥ श्रीशुकदेवजीने व्यासजीके चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम किया और बोले, 'भगवन् ! बतलाइये, सब वेदोंमें किस एक देवताका प्रतिपादन हुआ है और किसमें सारे देवता वास करते हैं ? किसकी सेवा पूजा करनेसे सर्वदा सब देवता मुझपर प्रसन्न रहेंगे ?' श्रीशुकदेवजीकी इस बातको सुनकर उनके पिता उनसे बोले- 'शुक ! सुनो - भगवान् रुद्र सर्वदेवस्वरूप हैं, और सब देवता रुद्रस्वरूप हैं । रुद्रके दक्षिण पार्श्वमें सूर्यभगवान्, ब्रह्माजी तथा गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि और आहवनीय-ये तीन प्रकारके अग्निदेव स्थित हैं। वामपार्श्वमें भगवती उमा, विष्णुभगवान् और सोम- ये तीन हैं । जो भगवती उमा हैं, वही विष्णुभगवान् हैं और जो विष्णुभगवान् हैं, वही चन्द्रमा हैं। जो गोविन्दको नमस्कार करते हैं, वे शङ्करजीको नमस्कार करते हैं। और जो भक्तिपूर्वक विष्णुभगवान्की "अर्चना करते हैं, वे वृषभध्वज अर्थात् शङ्करजीकी ही पूजा करते हैं। जो विरूपाक्ष अर्थात् भगवान् आशुतोषसे द्वेष करते हैं, वे जनार्दनसे ही द्वेष करते हैं। जो रुद्रको नहीं जानते, वे केशवको भी नहीं जानते । रुद्रसे बीज उत्पन्न होता है और उस बीजकी योनि (अर्थात् क्षेत्र) विष्णुभगवान् हैं । जो रुद्र हैं, वे स्वयं ब्रह्मा हैं और जो ब्रह्मा हैं, वे अग्निदेव हैं। रुद्र ब्रह्मा और विष्णुस्वरूप हैं। और अग्नि-सोमात्मक समस्त जगत् भी रुद्र ही है। सृष्टिमें जितने पुँल्लिङ्ग प्राणी हैं, सब महेश्वर हैं और जितने स्त्रीलिङ्ग प्राणी हैं, सब भगवती उमा हैं। सारी स्थावर और जङ्गमस्वरूप सृष्टि उमा-महेश्वररूप है । समस्त व्यक्त जगत् उमाका स्वरूप है । और अव्यक्त जगत् महेश्वरका स्वरूप है । उमा और शङ्करका योग ही विष्णु कहलाता है । जो उन विष्णुभगवान्को भक्तिपूर्वक नमस्कार करते हैं, वे आत्मा, परमात्मा और अन्तरात्मा - इस त्रिविध आत्माको जानकर परमात्माको प्राप्त होते हैं । अन्तरात्मा ब्रह्मा हैं और परमात्मा महेश्वर हैं । और सभी प्राणियोंके सनातन आत्मा विष्णुभगवान् हैं । इस त्रिलोकी- रूप वृक्षके, जिसके तने और शाखाएँ भूमिपर फैली हुई हैं, अग्रभाग विष्णु है । मध्य (तना) ब्रह्मा हैं और मूलभाग भगवान् महेश्वर हैं । विष्णु कार्यरूप हैं, ब्रह्मा क्रियारूप हैं और महेश्वर कारण-स्वरूप हैं । प्रयोजनके अनुसार रुद्रने अपनी एक ही मूर्तिको तीन प्रकारसे व्यवस्थित किया है । धर्म रुद्रस्वरूप है, जगत् विष्णुस्वरूप है और समस्त ज्ञान ब्रह्मस्वरूप हैं । 'श्रीरुद्र रुद्र रुद्र' इस प्रकारसे जो बुद्धिमान् जपता है, इससे समस्त देवोंका कीर्तन हो जानेके कारण वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २-१६ ॥ “पुरुष रुद्रस्वरूप हैं और स्त्रियाँ उमास्वरूपा हैं-इन दोनों प्रकारके रूपोंमें भगवान् रुद्र और भगवती उमाको
६३८ * रुद्रहृदयोपनिषद् *
[बायाँ स्तम्भ]
नमस्कार है। रुद्र ब्रह्मा हैं और उमा वाणी हैं। इन दोनों रूपोंमें रुद्र और उमाको नमस्कार। रुद्र विष्णु हैं और उमा लक्ष्मी हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र सूर्य हैं और उमा छाया हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र चन्द्रमा हैं और उमा तारा हैं, उनको और उनको नमस्कार। रुद्र दिवस हैं और उमा रात्रि हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र यज्ञ हैं और उमा वेदी हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र अग्निदेव हैं और उमा स्वाहा हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र वेद हैं और उमा शास्त्र हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र वृक्ष हैं और उमा लता हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र गन्ध हैं और उमा पुष्प हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र अर्थ हैं और उमा अक्षर हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र लिङ्ग हैं और उमा पीठ हैं। उनको और उनको नमस्कार। इस प्रकार सर्वदेवात्मक रुद्रको पृथक् पृथक् नमस्कार करे। मैं भी इन्हीं मन्त्रपदोंके द्वारा महेश्वर और पार्वतीको नमस्कार करता हूँ। मनुष्य जहाँ-जहाँ रहे, इस अर्धालीसहित मन्त्रका उच्चारण करता रहे। ब्रह्महत्यारा भी यदि जलमे प्रविष्ट होकर इस मन्त्रका जाप करे तो सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १७-२५ ॥
“जो सबका अधिष्ठान है, द्वन्द्वातीत है, सच्चिदानन्दस्वरूप, सनातन परम ब्रह्म है, मन और वाणीके अगोचर है, शुक ! उसके भलीभाँति जान लेनेपर यह सब ज्ञात हो जाता है, क्योंकि सब कुछ उसका ही स्वरूप है, उससे भिन्न कुछ भी नहीं है। दो विद्याएँ जानने योग्य हैं—वे हैं परा और अपरा। उनमें अपरा विद्या यह है—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष, तथा मुनीश्वर ! इस अपरा विद्यामें आत्मविषयके अतिरिक्त सब प्रकारके बौद्धिक ज्ञानका समावेश हो जाता है। अब परा विद्या वह है, जिसके द्वारा आत्मविषयका ज्ञान होता है। वह आत्मतत्त्व परम अविनाशी है। वह देखनेमें नहीं आता, ग्रहण नहीं किया जाता। नाम-रूप और गोत्रसे वर्जित है। उसके चक्षु और श्रोत्र नहीं हैं। वह विषयातीत है, उसके हाथ-पैर नहीं हैं, वह नित्य है, विभु है, सर्वगत है, सूक्ष्मसे सूक्ष्म है तथा वह कभी विकारको प्राप्त नहीं होता। वह सब भूतोंका प्रभव स्थान है, उस परमात्माको धीर पुरुष अपने आत्मामें देखते हैं ॥ २६-३२ ॥
[दायाँ स्तम्भ]
“जो सर्वज्ञ है—जिसे भूत-भविष्य-वर्तमानका ज्ञान है, जो सम्पूर्ण विद्याओंका आश्रय है, ज्ञान ही जिसका तप है, उसीसे भोक्ता एव अन्नरूपमें यह समस्त जगत् उत्पन्न होता है। जो जगत् सत्यकी तरह प्रतीत होता है, वह सब ब्रह्ममें उसी प्रकार स्थित है, जैसे रज्जुमे सर्प। वही यह अविनाशी ब्रह्म सत्य है, जो इसको जानता है, वह मुक्त हो जाता है। ज्ञानसे ही संसार-बन्धनका नाश होता है, कर्मसे नहीं। अतएव मुमुक्षुको विधिपूर्वक श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ अपने गुरुके पास जाना चाहिये। तब गुरु उसे ब्रह्म और आत्माके एकत्वका ज्ञान करानेवाली पराविद्या प्रदान करे। यदि पुरुष गुहामें निहित उस अक्षरब्रह्मको साक्षात् कर लेता है तो अविद्यारूपी महाग्रन्थिको काटकर वह सनातन शिवके पास पहुँच जाता है। यही वह अमृतरूप सत्य है, जो मुमुक्षुओंको जानना चाहिये ॥ ३३-३७ ॥
“प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म वह लक्ष्य कहलाता है। उसको प्रमादरहित होकर बींधना (चिन्तन करना) चाहिये तथा लक्ष्यमे घुसे हुए बाणकी भाँति ही उस ब्रह्ममें तन्मय हो जाना चाहिये। लक्ष्य अर्थात् ब्रह्म सर्वगत है। शर अर्थात् आत्मा सब ओर मुखवाला है और वेद्धा अर्थात् साधक यदि सर्वगत हो तो शिवरूप लक्ष्यकी प्राप्तिमें संशय नहीं रह जाता। जहाँ चन्द्रमा और सूर्यका विग्रह प्रकाशित नहीं होता, जहाँ वायु तथा सम्पूर्ण देवताओंकी भी गति नहीं है, वे ही ये तेजोमय परमात्मा साधकके द्वारा चिन्तन करनेपर अपने विशुद्ध एव रजोगुणरहित स्वरूपसे प्रकाशित होते हैं। इस शरीररूपी वृक्षमें जीव और ईश्वर नामके दो पक्षी निवास करते हैं। उनमें जीव कर्मोंका फल भोगता है, महेश्वर नहीं। महेश्वर कर्मफलका भोग न करते हुए केवल साक्षीरूपमें प्रकाशित हो रहा है, उसमें जीव और ईश्वरका भेद मायाके द्वारा कल्पित है। जिस प्रकार घटाकाश और महाकाश आकाशके ही कल्पित भेद हैं, उसी प्रकार परमात्माके जीव और ईश्वररूप भेद भी कल्पित हैं। वस्तुतः तो चिन्मय जीवात्मा सदा स्वतः साक्षात् शिव है। जीव और ईश्वरमें जो चित् है, वह चित्के औपाधिक आकार-भेदसे भिन्न-भिन्न प्रतीत होती है, स्वरूपतः भिन्न नहीं है, क्योंकि स्वरूपतः भेद होनेपर तो दोनोंकी चित्स्वरूपताकी ही हानि हो जायगी। (जड वस्तुमें ही स्वरूपगत भेद होता है, चित्में नहीं।) चित्से जो चित्का भेद कहा जाता है, वह चिदाकारता (चिन्मयता) से
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६३९ नहीं, अपितु जडरूप उपाधिके ही कारण है। यदि भेद स्वरूप सर्वसाक्षी परमात्माको वे ही पुरुष देखते हैं, जिनके है तो वह भेद जडरूप ही है। चित् तो सर्वत्र एक दोष क्षीण हो गये हैं; जो मायासे आवृत्त हैं, वे इतर प्राणी ही होती है। युक्ति और प्रमाणसे चित्की एकता नहीं देख सकते। जिस महायोगीको इस प्रकार स्वरूप-ज्ञान ही निश्चित होती है, इसलिये जब पुरुषको चित्के हो गया है, उस पूर्णस्वरूपताको प्राप्त हुए सिद्ध महात्माका एकत्वका परिज्ञान हो जाता है, तब वह न शोकको प्राप्त होता कहीं आना-जाना नहीं होता। जिस प्रकार एक और पूर्ण है न मोहको। वह केवल अद्वैत परमानन्दस्वरूप शिव- आकाश कहीं नहीं जाता, उसी प्रकार अपने आत्मतत्त्वका भावको प्राप्त हो जाता है। समस्त जगत्का अधिष्ठान वह अनुभव करनेवाला ज्ञानी महात्मा कहीं नहीं जाता। जो सत्यस्वरूप चिद्घन परमात्मा है। मुनिलोग उसे ‘अहम् मुनि निश्चयपूर्वक उस परम ब्रह्मको जानता है, वह अपने अस्मि’ (वह परमात्मा मैं ही हूँ) ऐसा निश्चय करके स्वरूपमें स्थित हो, सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म ही हो जाता शोकरहित हो जाते हैं। अपने अन्तःकरणमें स्वयञ्ज्योतिः- है” ॥ ३८-५२ ॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय रुद्रहृदयोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! आठ गुणोंसे युक्त आत्माको जाननेका फल य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच। (छान्दोग्य० ८। ७। १) प्रजापतिने कहा-जो आत्मा पापरहित, जरा (बुढ़ापा) रहित, मृत्युरहित, शोकहीन, भूखसे रहित, प्याससे रहित, सत्यकाम और सत्यसङ्कल्प (इन आठ स्वभावगत गुणोंसे युक्त) है, उसे खोजना चाहिये, उसे जानना चाहिये। जो उसको खोजकर जान लेता है, वह सब लोकोंको और समस्त कामनाओंको प्राप्त हो जाता है।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय नीलरुद्रोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣲसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! भगवान् नीलरुद्रकी महिमा और शिव-विष्णुकी एकता
भगवान् नीलकण्ठ ! आपको हम अपने दिव्यधामसे नीचे पृथिवीपर अवतीर्ण होते देखते हैं। हम देखते हैं कि आप दुष्टोंका विनाश करते हुए अपने उग्र रुद्ररूपसे मयूर- पिच्छके समान गगनको ही मुकुट बनाये पृथिवीपर अवतीर्ण होते है और पृथिवीमें प्रतिष्ठित होते हैं, क्योंकि आप ही भूमिके अधीश्वर हैं। (तात्पर्य यह कि नीलकण्ठ भगवान् रुद्र अपने गगनव्यापी स्वरूपसे दिव्यधामसे पृथिवीपर अवतीर्ण होकर दुष्टोंका नाश करके पृथिवीकी रक्षा करते हैं। वे पृथिवीके अधिदेवता हैं। उनकी अष्टविध मूर्तियोंमें पृथिवी भी एक मूर्ति है। इस मन्त्रमें भगवान् शिवकी भूमिमयी मूर्तिका निर्देश है।) लोगो ! इन भगवान् नीलकण्ठको देखो, जिनका वर्ण अत्यन्त लाल है। ये प्राणियोंके जीवनस्वरूप हैं। ये भगवान् रुद्र जलमें निक्षिप्त ओषधियोंमें पधारकर पापोंका विनाश करते हैं। (जलमें ओषधियाँ डालकर उसके द्वारा अभिषेक करनेसे पापनाश होता है।) निश्चय ही तुम्हारे अकल्याणको नष्ट करनेके लिये और तुम्हारे अप्राप्त अभीष्टको प्राप्त करानेके लिये वे (योगक्षेमकारी ओषधियुक्त जलरूप भगवान् रुद्र) तुम्हारे समीप आयें। (इस मन्त्रमें भगवान् रुद्रकी जलमयी मूर्तिका निर्देश है।) क्रोधस्वरूप भगवान् रुद्र ! आपको नमस्कार। मन्यु (क्रोधावेश)-स्वरूप भगवान् भव ! आपको नमस्कार। भगवान् नीलकण्ठ ! आपकी दोनों भुजाओंको नमस्कार और आपके 'बाणको भी नमस्कार। कैलासवासी ! आप पर्वतपर (संसारसे अलग) रहकर सबका मङ्गल करते हैं। भगवन् ! जिस बाणको दुष्टोंपर फेंकनेके लिये आपने अपने हाथमें धारण किया है, गिरित्राता ! उस बाणको हमारे लिये कल्याणकारी बनाइये। उसके द्वारा पुरुषों (हमारे स्वजनो) का वध मत कीजिये।
कैलासवासिन् ! ( अपनी ) कल्याणमयी ( पवित्र ) वाणीके द्वारा हम आपके निर्मल गुणोंका वर्णन करते हैं। क्योकि यो करनेसे हमारे लिये यह समस्त जगत् दुःख- रहित तथा अनुकूल हो जायगा। आपके जो बाण हैं, वे कल्याणमय हैं। आपका धनुष कल्याणकारी होता है। आपके धनुषकी प्रत्यञ्चा भी कल्याणरूपिणी है। हे मृड ! हे मङ्गल- स्वरूप ! इन सबके द्वारा आप हमे जीवन प्रदान करते हैं। ( तात्पर्य यह कि भगवान् रुद्रका विनाशक रूप एव विनाशके समस्त साधन भगवद्भक्तोंके लिये तथा जगत्के लिये नव- जीवनका विधान करनेके लिये हैं और वास्तविक रूपमें कल्याणस्वरूप हैं।) भगवान् रुद्र ! आप पर्वतपर रहकर सबका कल्याण करनेवाले हैं। आपका जो पापहारी अघोर ( सौम्य ) स्वरूप है, आप अपने उस कल्याणकारी स्वरूपके द्वारा हमें सब ओरसे प्रकाशित करें। अर्थात् हमारे सम्मुख सदा सब ओर आपका सौम्य मङ्गलमय स्वरूप ही रहे। ये जो आपकी ताम्रवर्ण, हल्की लाल, भूरी, अत्यन्त लाल तथा और भी सहस्रों रुद्रमूर्तियाँ (किरणें) चारो ओर दिशाओंमें व्याप्त है, निश्चय ही हम स्तुतिके लिये उनकी कामना करते हैं। (यहाँ अन्तमें भगवान् रुद्रके सूर्यरूपका निर्देश है) ॥१॥ विलोहित ( अधिक रक्तवर्ण ) नीलकण्ठ भगवान् ! हमने अवतार ग्रहण करते हुए आपको देखा है। आपको (उस अवताररूपमें) या तो गोपोंने देखा है या जल भरनेवाली गोपसुन्दरियोंने देखा है। योगियोंके लिये भी दुर्दर्श आपको (उस श्यामसुन्दर-स्वरूपमें) विश्वके समस्त प्राणियोंने देखा है। उस देखे हुए श्रीकृष्णस्वरूपधारी आपको नमस्कार। (यहाँ श्रुति भगवान् रुद्र एव अवतार-विग्रहोंके एकत्वका निर्देश करती है।) मयूरपिच्छधारी (मयूर- मुकुटी) ! आपको हम नमस्कार करते हैं। आप ही महान्
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६४१ शक्तिशाली इन्द्र हैं । (देवराज इन्द्र नहीं, जो अनुगोमे पराजित होते हैं । यहाँ गोविन्दसे तात्पर्य है ।) अथवा आप अपने भक्तोंके सामने हजारों (असंख्य) नेत्रोंसे सम्पन्न विराट्रूपम भी प्रकट होते हैं। और आपके उस (श्रीकृष्ण) स्वरूपके जो सत्त्वात्मक सहचर (गोपाल, गोपिकाएँ आदि) हैं, उन्हें हम नमस्कार करते हैं । भगवन् ! आपके शक्तिशाली किंतु इस समय प्रयुक्त न होनेवाले आयुधोंको अनेक नमस्कार ! दोनों हाथ जोड़कर मैं आपके धनुषको नमस्कार करता हूँ । अपने और शत्रुके- इन दोनों पक्षोंके गजाओंके लिये आप अपने धनुषकी प्रत्यञ्चाको उतार दीजिये । अर्थात् आप शान्तस्वरूप धारण कर लें और युद्धकी आकाङ्क्षा ही मिटा दें। भगवन् ! आपके हाथमें जो बाण हैं, उन्हें लौटा लें-तूणीरमे रख लें। अर्थात् अपनी महार मूर्ति का त्याग करके अपने परम सौम्य शिवरूपमे मुझे दर्शन दं । सहस्राक्ष, शितिखण्डी, शत बाणोंके युगपत्सन्धानकर्ता ! आप अपने धनुषको चढ़ाकर, अपने बाणोंके मुखाग्रों तीक्ष्ण करके हमारे कल्याण एवं सुखके लिये उन्हें धनुषपर चढ़ायें । (हमारे शत्रुओंके नष्ट होनेपर) आपका धनुष प्रत्यञ्चा रहित हो। वधकी क्रिया छोड़कर बाण तूणीरमे रख दिये जायँ। आपके बाण, जो पर्वतोंको भी चूर्ण करनेवाले हैं, हम आपके निषङ्ग (तरङ्ग) में प्रवेश करके कल्याणमय हों । आपके धनुषमे संधान किया हुआ बाण विश्वमें चारों ओरसे हमारी रक्षा करे। इस रक्षणके अनन्तर आप अपने उस बाणको अपने तूणीरमे रख दें। भक्तोंपर अत्यधिक कृपाकी वर्षा करनेवाले ! आपके समीप जो अमोघ बाण हैं और आपके हाथमें जो धनुष है, उनके द्वारा आप चारों ओरसे हमारा परिपालन करें । उन सर्पों (डसनेवाले जीवों) को नमस्कार, जो पृथिवी- पर रहते हैं। जो आकाशमें रहते हैं और जो स्वर्गमे रहते हैं, उन सर्पों (कष्ट देनेवाली शक्तियो) को नमस्कार । जो प्रकाशमय लोकोंमें (ग्रहोंमें) रहते हैं तथा जो सूर्यकी किरणोंम रहते हैं, जो इस जलमें रहनेवाले हैं, उन सब सर्पों (क्लेश- दायिका शक्तियो) को नमस्कार । जो वृक्षोंके बाणके रूपमे हैं, जो वनस्पतियोम रहते हैं और जो गड्डोंमें पड़े हैं, उन सब सर्पोंको नमस्कार । (इस मन्त्रमे सर्वत्र व्यापक भगवान् रुद्रके कालरूपत्वका निर्देश है।) जो भगवान् शङ्कर अपने भक्तोंके लिये नीलकण्ठ स्वरूप धारण करते हैं, अर्थात् भक्तोंके कल्याणके लिये ही जिन्होंने हालाहल पान करके उसे चिह्न रूपमें अपने गलेमें धारण किया हे, जो भगवान् अपने निज जनोंके लिये हरितवर्ण श्रीहरि रूप बन जाते हैं (यहाँ भगवान् शिव एवं भगवान् विष्णुका एकत्व प्रतिपादित है), हे ओषधियो ! उन काली पूँछवाले (महिषरूपधारी भगवान् केदारेश्वर) के लिये शीघ्र अमोघ शक्तिसम्पन्न बनो क्योंकि इससे तुम उन्हें सन्तुष्ट कर सकोगी। वे पिङ्गलवर्ण एव पिङ्गल कानोंवाले, नीलकण्ठधारी भगवान् शिव वही हैं, जिन सर्वस्वरूप, नीलशिखण्डधारी (सर्वव्यापक) भगवान् विरूपाक्ष भत्र (शङ्कर) के द्वारा देवताओके ही नहीं, अपितु वाणीका प्रयोग करनेवाले- चेतन प्राणिमात्रके पिता ब्रह्माजी मारे गये। हे वीर ! सर्व- व्यापक स्वरूपसे उन्हें ही प्रत्येक कर्ममे (व्यापक एंव कर्मरूप) देखो । यह उन (भगवान् शङ्कर) के सम्बन्धमें पूछनेकी इच्छा (शङ्का) को छोड़ दो, जिसके द्वारा हम तुम विश्वको उनसे विभिन्न कर देते हैं-उनमे अलग भाग्य मान लेते हैं। अर्थात् हम विश्वको उन्हींका रूप मानना चाहिये । जगत्कारणस्वरूप भगवान् भवको नमस्कार, महारकर्ता रुद्रको नमस्कार, जगत्का नाश करनेके लिये शत्रुरूप बने हुए प्रभुको नमस्कार, उन नीलशिखण्डधारी (गगनमुकुटी) को अथवा काले सींगोंवाले (महिषरूप केदारेश्वर नीलरुद्र) को नमस्कार तथा उन (दक्षकी) सभा (विवाहमण्डप) को सुशोभित करनेवाले कुमाररूप प्रभुको नमस्कार । जिनमे घोड़े उत्पन्न हुए, गच्चर हुए तथा चारों ओर दौड़नेवाले गधे हुए, उन नीलशिखण्डधारी (महिषरूप केदारेश्वर नीलरुद्र) को नमस्कार । सभामण्डपकी शोभा बढ़ानेवाले उन भगवान्को नमस्कार, नमस्कार ॥ ३ ॥ || अथर्ववेदीय नीलरुद्रोपनिषद् समाप्त || शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳ सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! उ० अ० ८१-८२-
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ ऋग्वेदीय सरस्वतीरहस्योपनिषद् शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! दस बीजमन्त्रोंसे युक्त ऋग्वेदके मन्त्रोंसे सरस्वतीदेवीकी स्तुति, उसका फल, नाम-रूपके सम्बन्धसे ब्रह्मकी जगत्-स्वरूपता और समाधिका वर्णन
हरिः ॐ । कथा है कि एक समय ऋषियोंने भगवान् आश्वलायनकी विधिपूर्वक पूजा करके पूछा—"भगवन् ! जिससे 'तत्' पदके अर्थभूत परमात्माका स्पष्ट बोध होता है, वह ज्ञान किस उपायसे प्राप्त हो सकता है ? किस देवताकी उपासनासे आपको तत्त्वका ज्ञान हुआ है, उसे बतलाइये ।” भगवान् आश्वलायन बोले—'मुनिवरो ! बीजमन्त्रसे युक्त दस ऋचाओंसहित सरस्वती-दशश्लोकीके द्वारा स्तुति और जप करके मैंने परासिद्धि प्राप्त की है ।' ऋषियोंने पूछा— 'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वर ! किस प्रकार और किस ध्यानसे आपको सारस्वत-मन्त्रकी प्राप्ति हुई है तथा जिससे भगवती महासरस्वती प्रसन्न हुई हैं, वह उपाय बतलाइये ।' तब वे प्रसिद्ध आश्वलायन मुनि बोले, 'इस श्री- सरस्वती दशश्लोकी महामन्त्रका मैं आश्वलायन ही ऋषि हूँ, अनुष्टुप् छन्द है, श्रीवागीश्वरी देवता हैं, 'यदवाग्' यह बीज है, 'देवी वाच' यह शक्ति है, 'प्र णो देवी' यह कीलक है, श्रीवागीश्वरी देवताके प्रीत्यर्थ इसका विनियोग है । श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, धारणा, वाग्देवता तथा महासरस्वती—इन नाम- मन्त्रोंके द्वारा अङ्गन्यास किया जाता है। (जैसे, ॐ श्रद्धायै नमो हृदयाय नम, ॐ मेधायै नमः शिरसे स्वाहा, ॐ प्रज्ञायै नम शिखायै वषट्, ॐ धारणायै नम कवचाय हुम्, ॐ वाग्देवतायै । नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ महासरस्वत्यै नम अस्त्राय फट् । )
ध्यान हिम, मुक्ताहार, कर्पूर तथा चन्द्रमाकी आभाके समान शुभ्र कान्तिवाली, कल्याण प्रदान करनेवाली, सुवर्णसदृश पीत चम्पक पुष्पोंकी मालासे विभूषित, उठे हुए सुपुष्ट कुचकुम्भोंसे मनोहर अङ्गवाली वाणी अर्थात् सरस्वतीदेवीको मैं, त्रिभूति (अष्टविध ऐश्वर्य एव निःश्रेयस )के लिये, मन और वाणी- द्वारा नमस्कार करता हूँ । 'ॐ प्र णो देवी' इस मन्त्रके भरद्वाज ऋषि हैं, गायत्री छन्द है, श्रीसरस्वती देवता हैं । ॐ नम—यह बीज, शक्ति और कीलक तीनों है। इष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये इसका विनियोग है । मन्त्रके द्वारा अङ्गन्यास होता है । 'वस्तुतः वेदान्त शास्त्रका अर्थभूत ब्रह्मतत्त्व ही एकमात्र जिनका स्वरूप है और जो नाना प्रकारके नाम-रूपोंमें व्यक्त हो रही हैं, वे सरस्वतीदेवी मेरी रक्षा करें ।' ॐ प्र णो देवी सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती धीना- मवित्र्यवतु ॥ १ ॥ ॐ-दानसे शोभा पानेवाली, अन्नसे सम्पन्न तथा स्तुति करनेवाले उपासकोंकी रक्षा करनेवाली सरस्वतीदेवी हमे अन्नसे सुरक्षित करें (अर्थात् हमे अधिक अन्न प्रदान करें) ॥१॥ 'आ नो दिव ०' इस मन्त्रके अत्रि ऋषि हैं, त्रिष्टुप् छन्द है, सरस्वती देवता हैं, ह्रीं-यह बीज, शक्ति और कीलक तीनों है।
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६४३ अभीष्ट प्रयोजनकी सिद्धिके लिये इसका विनियोग है। इसी देनेवाली तथा उत्तम बुद्धिवाले क्रियापरायण पुरुषोंको उन- मन्त्रके द्वारा अङ्गन्यास करे। का कर्तव्य सुझाती हुई सचेत करनेवाली हैं, उन सरस्वती- 'अङ्गों और उपाङ्गोंके सहित चारों वेदोंमें जिन एक ही देवीने इस यज्ञको धारण किया है॥४॥ देवताका स्तुति-गान होता है, जो ब्रह्मकी अद्वैत-शक्ति हैं, 'महो अर्ण'—इस मन्त्रके मधुच्छन्दा ऋषि हैं, गायत्री वे सरस्वतीदेवी हमारी रक्षा करें।' छन्द है, सरस्वती देवता हैं, 'सौ'—यह बीज, शक्ति और 'ह्रीं' आ नो दिवो बृहत पर्वतादा कीलक तीनों है। मन्त्रके द्वारा न्यास करे। सरस्वती यजता गन्तु यज्ञम् । 'जो अन्तर्यामीरूपसे समस्त त्रिलोकीका नियन्त्रण करती हवं देवी जुजुषाणा घृताची हैं, जो रुद्र-आदित्य आदि देवताओंके रूपमें स्थित हैं, शग्मां नो वाचमुशती शृणोतु ॥ २ ॥ वे सरस्वतीदेवी हमारी रक्षा करें।' ह्रीं-हम लोगोंके द्वारा यष्टव्य सरस्वती देवी प्रकाशमय 'सौ' महो अर्ण सरस्वती प्रचेतयति केतुना। धियो द्युलोकसे उतरकर महान् पर्वताकार मेघोंके बीचमें होती हुई विश्वा विराजति ॥ ५ ॥ हमारे यज्ञमें आगमन करें। हमारी स्तुतिसे प्रसन्न होकर वे सौं —(इस मन्त्रमें नदीरूपा सरस्वतीका स्तवन किया देवी स्वेच्छापूर्वक हमारे सम्पूर्ण सुखरूप स्तोत्रोंको सुनें ॥२॥ गया है) नदीरूपमें प्रकट हुई सरस्वतीदेवी अपने प्रवाहरूप 'पावका न' इस मन्त्रके मधुच्छन्दा ऋषि हैं, गायत्री कर्मके द्वारा अपनी अगाध जलराशिका परिचय देती हैं। और छन्द है, सरस्वती देवता है, 'श्रीं' यह बीज, शक्ति और कीलक ये ही अपने देवतारूपसे सब प्रकारकी कर्त्तव्यविषयक बुद्धि- तीनों है। इष्टार्थसिद्धिके लिये इस मन्त्रका विनियोग है। मन्त्रके को उद्दीप्त (जाग्रत्) करती हैं ॥ ५ ॥ द्वारा ही अङ्गन्यास करे। 'चत्वारि वाक्०'—इस मन्त्रके उचथ्यपुत्र दीर्घतमा 'जो वस्तुतः वर्ण, पद, वाक्य—तथा उनके अर्थोंके ऋषि हैं, त्रिष्टुप् छन्द है, सरस्वती देवता हैं, ऐं—यह बीज, रूपमें सर्वत्र व्याप्त हैं, जिनका आदि और अन्त नहीं है, जो शक्ति और कीलक तीनों है। (इष्टसिद्धिके लिये विनियोग है।) अनन्त स्वरूपवाली हैं, वे सरस्वतीदेवी मेरी रक्षा करें।' मन्त्रके द्वारा न्यास करे। 'श्रीं' पावका न सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । यज्ञं वष्टु 'जो अन्तर्दृष्टिवाले प्राणियोंके लिये नाना प्रकारके रूपोंमें धिया वसु ॥ ३ ॥ व्यक्त होकर अनुभूत हो रही हैं। जो सर्वत्र एकमात्र ज्ञप्ति— श्रीं-जो सबको पवित्र करनेवाली, अन्नसे सम्पन्न तथा बोधरूपसे व्याप्त हैं, वे सरस्वतीदेवी मेरी रक्षा करें।' कर्मोंद्वारा प्राप्त होनेवाली धनकी उपलब्धिमें कारण हैं, वे 'ऐं' चत्वारि वाक् परिमिता पदानि सरस्वतीदेवी हमारे यज्ञमें पधारनेकी कामना करें (अर्थात् तानि विदुब्राह्मणा ये मनीषिण.। यज्ञमें पधारकर उसे पूर्ण करनेमें सहायक बनें ॥ ३ ॥ गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति 'चोदयित्री०' इस मन्त्रके मधुच्छन्दा ऋषि हैं, गायत्री तुरीय वाचो मनुष्या वदन्ति ॥ ६ ॥ छन्द है, सरस्वती देवता है। 'क्लूं'—यह बीज, शक्ति और ऐं—वाणीके चार पद हैं अर्थात् समस्त वाणी चार कीलक तीनों है अभीष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये विनियोग है। भागोंमें विभक्त है—परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी । मन्त्रके द्वारा ही न्यास करे। इन सबको मनीषी—विद्वान् ब्राह्मण जानते हैं। इनमेंसे तीन 'जो अध्यात्म और अधिदैवरूपा है तथा जो देवताओं- —परा, पश्यन्ती और मध्यमा तो हृदयगुहामे स्थित हैं; की सम्यक् ईश्वरी अर्थात् प्रेरणात्मिका शक्ति हैं, जो हमारे अत वे बाहर प्रकट नहीं होतीं। परन्तु जो चौथी वाणी वैखरी भीतर मध्यमा वाणीके रूपमें स्थित हैं, वे सरस्वती- है, उसे ही मनुष्य बोलते हैं। (इस प्रकार यहाँ वाणीरूपमें देवी मेरी रक्षा करें।' सरस्वतीदेवीकी स्तुति है) ॥ ६ ॥ 'क्लूं' चोदयित्री सूनृताना चेतन्ती सुमतीना यज्ञ दधे 'यद्वाग्वदन्ति०' इस मन्त्रके भार्गव ऋषि हैं, त्रिष्टुप् सरस्वती ॥ ४ ॥ छन्द है, सरस्वती देवता हैं। ह्रीं—यह बीज, शक्ति और क्लूं-जो प्रिय एवं सत्य वचन बोलनेके लिये प्रेरणा कीलक तीनों है। मन्त्रके द्वारा न्यास करे।
६४४ * सरस्वतीरहस्योपनिषद् * 'जो नाम-जाति आदि भेदोंसे अष्टधा विकल्पित हो रही | नहीं सुन पाता, किंतु किसी किसीके लिये तो ये वाग्देवी हैं तथा साथ ही निर्विकल्पस्वरूपमे भी व्यक्त हो रही हैं, वे | अपने स्वरूपको उसी प्रकार प्रकट कर देती हैं, जैसे पतिकी सरस्वतीदेवी मेरी रक्षा करें।' | कामना करनेवाली सुन्दर वस्त्रोंसे सुशोभित भार्या अपनेको 'छ्रीं' यद् वाग्वदन्त्यविचेतनानि | पतिके समक्ष अनावृतरूपमें उपस्थित करती है ॥ ९॥ राष्ट्री देवानां निषसाद मन्द्रा। | अम्बितमे—इस मन्त्रके गृत्समद ऋषि हैं, अनुष्टुप् चतस्र ऊर्जं दुदुहे पयांसि | छन्द है, सरस्वती देवता हं, ऐं—यह बीज, शक्ति और क्व स्विद्द्या परमं जगाम ॥७॥ | कीलक तीनो है। मन्त्रके द्वारा न्यास करे । छ्रीं—राष्ट्री अर्थात् दिव्यभावको प्रकाशित करनेवाली | 'ब्रह्मज्ञानीलोग दम नाम-रूपात्मक अखिल प्रपञ्चको तथा देवताओंको आनन्दमग्न कर देनेवाली देवी वाणी | जिनमें आविष्टकर पुन' उनका ध्यान करते हैं, वे एकमात्र जिस समय अज्ञानियोको ज्ञान देती हुई यज्ञमें आसीन | ब्रह्मस्वरूपा सरस्वतीदेवी मेरी रक्षा करें।' (विराजमान) होती हैं, उस समय वे चारो दिशाओके लिये | 'ऐं' अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति । अन्न और जलका दोहन करती ह । इन मध्यमा वाक्में जो | अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि ॥१०॥ श्रेष्ठ है, वह कहाँ जाता है? ॥ ७॥ | ऐं—(परम कल्याणमयी )—माताओमें सर्वश्रेष्ठ, 'देवी वाचं' इस मन्त्रके भार्गव ऋषि हैं, त्रिष्टुप् छन्द | नदियोंमें सर्वश्रेष्ठ तथा देवियोंमें सर्वश्रेष्ठ हे सरस्वती देवी ! है, सरस्वती देवता हैं, 'सौ'—यह बीज, शक्ति और कीलक | धनाभावके कारण हम अप्रशस्त (निन्दित) मे हो रहे हैं, मा! तीनों है। मन्त्रके द्वारा न्यास करे । | हमे प्रशस्ति (धन-समृद्धि) प्रदान करो ॥ १० ॥ 'व्यक्त और अव्यक्त वाणीवाले देवादि समस्त प्राणी | जो ब्रह्माजीके मुखरूपी कमलोंके वनमें विचरनेवाली जिनका उच्चारण करते है, जो सब अभीष्ट वस्तुओंको दुग्धके | राजहंसी हं, वे सब ओरसे श्वेत कान्तिवाली सरस्वतीदेवी हमारे रूपमें प्रदान करनेवाली कामधेनु हैं, वे सरस्वतीदेवी मेरी | मनरूपी मानसमें नित्य विहार करें । हे काश्मीरपुरमें निवास रक्षा करें।' | करनेवाली शारदादेवी ! तुम्हें नमस्कार है । म नित्य तुम्हारी 'सौ.' देवी वाचमजनयन्त देवास्तां | प्रार्थना करता हूँ । मुझे विद्या (ज्ञान) प्रदान करो। अपने विश्वरूपा पशवो वदन्ति । | चार हाथोमे अक्षसूत्र, अङ्कुश, पाश और पुस्तक धारण सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना | करनेवाली तथा मुक्ताहारसे सुशोभित सरस्वती देवी मेरी धेनुर्वागस्मानुप सुष्टुतैतु ॥८॥ | वाणीमे सदा निवास करें । शङ्खके समान सुन्दर कण्ठ सौ—प्राणरूप देवोंने जिस प्रज्ञागमान वैखरी वाणीको | एव सुन्दर लाल ओठोंवाली, सब प्रकारके भूषणोंसे विभूषिता उत्पन्न किया, उसको अनेक प्रकारके प्राणी बोलते है । वे | महासरस्वती देवी मेरी जिह्वाके अग्रभागमे सुखपूर्वक कामधेनुतुल्य आनन्ददायक तथा अन्न और बल देनेवाली | विराजमान हों । जो ब्रह्माजीकी प्रियतमा सरस्वतीदेवी वाग्रूपिणी भगवती उत्तम स्तुतियोंसे सन्तुष्ट होकर हमारे | श्रद्धा, धारणा और मेधा-स्वरूपा है, वे भक्तोंके जिह्वाग्रमे समीप आयें ॥८॥ | निवासकर शम दमादि गुणोंको प्रदान करती हैं। जिनके 'उत त्व ०' इस मन्त्रके बृहस्पति ऋषि हैं, त्रिष्टुप् छन्द | केश पाश चन्द्रकलासे अलङ्कृत है तथा जो भव-सन्तापको है, सरस्वती देवता हैं, 'स'—यह बीज, शक्ति और कीलक | शमन करनेवाली सुधा-नदी हैं, उन सरस्वतीरूपा भवानीको तीनों है। (विनियोग पूर्ववत् है) मन्त्रके द्वारा न्यास करे । | मै नमस्कार करता हूँ । जिसको कवित्व, निर्भयता, भोग और 'जिनको ब्रह्मविद्यारूपसे जानकर योगी सारे बन्धनोंको | मुक्तिकी इच्छा हो, वह इन दस मन्त्रोंके द्वारा सरस्वतीदेवीकी नष्ट कर डालते और पूर्ण मार्गके द्वारा परम पदको प्राप्त होते | भक्तिपूर्वक अर्चना करके स्तुति करे । भक्ति और श्रद्धापूर्वक हैं, वे सरस्वतीदेवी मेरी रक्षा करे।' | सरस्वतीदेवीकी विधिपूर्वक अर्चना करके नित्य स्तवन करनेवाले 'स' उत त्व पश्यन्न ददर्श वाच- | भक्तको छ. महीनेके भीतर ही उनकी कृपाकी प्रतीति हो जाती मुत त्व. शृण्वन्न शृणोत्येनाम् । | है। तदनन्तर उसके मुखसे अनुपम अप्रमेय गद्य-पद्यात्मक शब्दोंके उतो त्वस्मै तन्वं विसस्रे | रूपमें ललित अक्षरोंवाली वाणी स्वयमेव निकलने लगती है । जायेव पत्य उशती सुवासा ॥९॥ | प्रायः सरस्वतीका भक्त कवि बिना दूसरोंसे सुने हुए ही ग्रन्थोंके स—कोई-कोई वाणीको देखते हुए भी नही देखता | अभिप्रायको समझ लेता है। ब्राह्मणो ! इस प्रकारका निश्चय (समझकर भी नही समझ पाता), कोई इन्हें सुनकर भी | सरस्वती देवीने अपने श्रीमुखसे ही प्रकट कियाथा। ब्रह्माके
कल्याण श्रीसरस्वती अक्षसूत्राङ्कुशधरा पाशपुस्तकधारिणी। मुक्ताहारसमायुक्ता वाचि तिष्ठतु मे सदा ॥ ( सरस्वती हृ० )