कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 676, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें६२८ * मुक्तिकोपनिषद् * [ अध्याय २
तथा प्राणवायुका निरोध अर्थात् प्राणायाम-ये प्रवल उपाय हैं। इन श्रेष्ठ युक्तियोके रहते हुए जो हठपूर्वक चित्तको निरुद्ध करनेकी चेष्टा करते हैं, वे दीपकको छोड़कर अन्धकारमें भटकते हैं। जो मूढ पुरुष हठसे चित्तको वशमें करनेका उद्योग करते हैं, वे उन्मत्त हाथीको कमल नालके तन्तुओंसे बाँधनेकी चेष्टा करते हैं । वृत्तिरूप लताओंके आश्रयभूत चित्तरूपी वृक्षके दो बीज हैं-एक है प्राणोंका स्पन्दन (गति), दूसरी दृढ भावना। प्राण वायुके सञ्चालनसे घट- घट व्यापक संवित्-समष्टि-चेतना चलायमान हो उठती है। चित्तकी एकाग्रतासे ज्ञानकी प्राप्ति होती है और उससे मुक्ति- लाभ होता है। अतएव चित्तकी एकाग्रताके साधनोंमें ध्यान- की यथोचित विधि बतलायी जाती है-॥४२-४७॥
"चित्त सर्वथा विकारहीन न हो, तो भी यशके आविर्भाव और अरिष्टके तिरोभावके क्रमसे केवल चैतन्य-चिदानन्द स्वरूप परब्रह्मका चिन्तन करो। जिस क्षण चित्त चिदानन्दमें आरूढ होता है, वह यशकी स्थिति है, और जिस क्षण उससे अलग होता है, वह अरिष्टकी स्थिति है। चित्तकी चाञ्चल्यके कारण यह स्वाभाविक स्थिति होती है, अतएव अरिष्टकी स्थितिसे पुनः-पुनः यशकी स्थितिमे चित्तको स्थापितकर परब्रह्मके चिन्तनमें लगो । अपानवायुके भीतर रोक दिये जानेपर जबतक हृदयमे प्राणवायुका उदय नहीं होता, तबतक वह कुम्भकावस्था रहती है, जिसका योगीलोग अनुभव करते हैं। और प्राण वायुके बाहर रोक दिये जानेपर जबतक अपान वायुका उदय नहीं होता, तबतक जो पूर्ण समावस्था रहती है, उसे बाह्य कुम्भक कहते हैं॥ ४८-५० ॥
"चिरकालतक ध्यानका अभ्यास करते रहनेपर जब अहङ्कार विगलित हो जाता है और मनोवृत्ति ब्रह्माकारमें प्रवाहित होने लगती है, तब उसे सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं। जब चित्त- की सारी वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं, उस समय परमानन्द प्रदान करनेवाली असम्प्रज्ञात नामकी समाधि होती है, जो योगियोंको प्रिय है। इस समाधिकी अवस्थामें कुछ भी मान नहीं होता। हो कैसे, उस स्थितिमे मन और बुद्धिका अस्तित्त्वतक नहीं रहता, केवल चित्स्वरूपकी अवस्थिति होती है। इस समाधिमे चित्त निरालम्ब होकर कैवल्य स्थिति- मे रहता है, मुनिलोग इस समाधिकी भावना करते हैं। इस समाधिमें ऊपर, नीचे और बीचमें-सर्वत्र शिवस्वरूप पूर्ण ब्रह्म ही अनुभूत होते हैं, यह समाधि परमार्थ अर्थात् मोक्ष- स्वरूप है तथा साक्षात् ब्रह्माके मुखसे उपदिष्ट हुई है ॥५१-५४॥
"दृढ भावनाके द्वारा पूर्वापरका विचार छोड़कर चित्त जो पदार्थके स्वरूपको ग्रहण करता है, उस चित्तविकारको वासना कहते हैं। कपिश्रेष्ठ ! आत्मा चित्तके तीव्र संवेगसे जैसी भावना करता है, इतर वासनाओंसे मुक्त होकर वह शीघ्र वैसा ही बन जाता है। इस प्रकारका पुरुष वासनाके वशीभूत होकर जो कुछ देखता है, उसीको सद्वस्तु-यथार्थ मानकर मोहको प्राप्त होता है। वासनाके वेगकी विभिन्नताके कारण चित्त अपने वासनात्मक स्वरूपको नहीं छोड़ता। एक वासनाके छोड़ते छोड़ते दूसरी वासनामें रमने लगता है। जिस प्रकार नशेके कारण पुरुषकी विवेकबुद्धि नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार वह दुर्बुद्धि भ्रान्त होकर सब कुछ देखता है। वासना दो प्रकारकी होती है-शुद्ध और मलिन । मलिन वासना आवागमनमे डालती है और शुद्ध वासना मनुष्यको जन्म- मृत्युसे छुड़ाती है। ज्ञानीजन कहते हैं कि मलिन वासना निविड़ अहङ्कार और घन अज्ञानस्वरूप होती है, वह पुनर्जन्म प्रदान करती है ॥ ५५-६० ॥
"जिस प्रकार बीजके अच्छी प्रकार भुन जानेपर उससे अङ्कुर नहीं उत्पन्न होता, उसी प्रकार संसार-वासनाके नष्ट हो जानेपर पुनर्जन्म नहीं होता। अतएव दग्ध बीजके समान स्थिति होनी चाहिये । वायुनन्दन ! चबाये हुएको चबानेके समान नाना शास्त्रोंकी व्यर्थ आलोचनासे क्या लाभ, प्रयत्न होना चाहिये भीतरी प्रकाशको खोजनेके लिये। कपिशार्दूल ! दर्शन और अदर्शन अर्थात् सत् ख्याति और असत्-ख्याति दोनों- को छोड़कर जो स्वयं कैवल्यरूपमें स्थित रहता है, वह ब्रह्मविद् नहीं, स्वयं ब्रह्मस्वरूप ही है। चारों वेदोंका और अनेकों शास्त्रोंका अध्ययन करके भी जो ब्रह्मतत्त्वको नहीं जानता, वह परमानन्दसे उसी प्रकार वञ्चित रहता है, जैसे कलछुल भोजनके पदार्थोंमें रहती हुई भी उनके रसको नहीं जानती । जिसका अपने शरीरकी अपवित्र गन्धको प्रत्यक्ष करके भी उससे विराग नहीं होता, उसको चिराग पैदा करनेवाला दूसरा कौन सा उपदेश दिया जा सकता है ॥ ६१-६४ ॥
"शरीर अत्यन्त मलयुक्त है और आत्मा अत्यन्त निर्मल है, दोनोंके भेद को जानकर किसकी शुचिताका उपदेश किया जाय। जो वासनासे बँधा है, वही बद्ध है, और वासनाओंका नाश ही मोक्ष है। अतएव वासनाओंका सम्यक्रूपसे परित्याग करके मोक्ष-प्राप्तिकी वासनाका भी त्याग करो । पहले मानसी वासनाओंका त्याग करके विषय वासनाओंका भी त्याग करो; और मोक्षादिकी शुद्ध-निर्दोष वासनाओंको ग्रहण करो ।