भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 682, कुल 832 में से

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पृष्ठ 682

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय कठरुद्रोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! संन्यासकी विधि और आत्मतत्त्वका वर्णन हरिः ॐ एक समय देवगण भगवान् प्रजापतिके पास गये और बोले—भगवन् ! हमे ब्रह्मविद्याका उपदेश कीजिये। भगवान् प्रजापति बोले—'शिकासहित केशोंका मुण्डन करा और यज्ञोपवीतका त्याग करके, पुत्रको देखकर यों कहे— 'तुम ब्रह्मा हो, तुम यज्ञ हो, तुम वषट्कार हो, तुम ॐकार हो, तुम स्वाहा हो, तुम स्वधा हो, तुम धाता हो, तुम विधाता हो, तुम प्रतिष्ठा हो।' तब पुत्र कहे, 'मैं ब्रह्मा हूँ, में यज्ञ हूँ, मैं वषट्कार हूँ, मैं ॐकार हूँ, मैं स्वाहा हूँ, मैं स्वधा हूँ, मैं धाता हूँ, मैं विधाता हूँ, मैं त्वष्टा हूँ, मैं प्रतिष्ठा हूँ।' परिव्राजक (सन्यासी) होकर घरसे निकलनेपर जब पुत्र-कलत्रादि पीछे पीछे चलें तो उनको देखकर अश्रुपात न करे। यदि अश्रुपात करेगा तो सन्तानका नाश हो जायगा। फिर वे सब लोग सन्यासीकी प्रदक्षिणा करके इधर-उधर बिना देखे लौट जाते हे। ऐसा सन्यासी देवलोकका अधिकारी होता है। “ब्रह्मचारीके रूपमें वेदोंका अध्ययन करने एव वेद- शास्त्रानुसार ब्रह्मचर्यका पालन करनेके पश्चात् विवाहपूर्वक पुत्रोंको उत्पन्न करके, उनको सुसस्कृत बना, यथाशक्ति यज्ञ- हवन करके अपने बन्धु बान्धवों तथा गुरुजनोंसे अनुज्ञा प्राप्तकर सन्यास ग्रहण किया जा सकता हे। इस प्रकार सन्यास ग्रहण करनेवाला वनमे जाकर बारह रात्रियोंतक दुग्धसे अग्निहोत्र करे, बारह रात्रियोंतक केवल दुग्धाहारपर रहे। बारह रात्रियोंके अन्तमे त्रिगुणसम्बन्धी तथा प्रजापतिसम्बन्धी चरुको, जो तीन मिट्टीकी ठीकरीयोंपर सिद्ध किया गया हो, वैश्वानर अग्नि तथा प्रजापतिके उद्देश्यसे हवनकर अग्निहोत्रमे प्रयुक्त दारुपात्रोंको भी अग्निमें होम दे। मिट्टीके पात्रोंका जलमें विसर्जन कर दे और तैजस—स्वर्णादिके बने पदार्थोंको अपने गुरुको प्रदान कर दे। उस समय यों कहे—'तू मुझे छोड़कर दूर न जाना, और मैं तुम्हें छोड़कर दूर नहीं जाऊँगा।' कुछ शाखोंके मतसे, इसके पश्चात् गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि और आहवनीय—इन तीनों प्रकारकी यज्ञाग्नियोंसे अरणियोंके पाससे भस्मकी मुष्टि लेकर पान करे। शिकासहित केशोंका वपन कराके और यज्ञोपवीत उतारकर 'ॐ भूः स्वाहा' इस मन्त्रसे जलमें डाल दे। इसके बाद अनशन, जलप्रवेश, अग्नि- प्रवेश, वीरोंके मार्गका ग्रहण करके (पाण्डवोंकी भाँति) महा- प्रस्थान करे; अथवा किसी वृद्ध सन्यासीके आश्रममें चला जाय। दुग्ध अथवा जलके साथ जो कुछ वह भोजन करे, वही उसका सायंकालीन हवन है, प्रातःकाल जो भोजन करे, वही प्रातः- कालीन हवन है। अमावास्याको जो भोजन करता है, वही दर्श-यज्ञ है। पूर्णिमाको जो भोजन करता है, वह उसका पौर्णमास्य यज्ञ है। वसन्त ऋतुमे जो वह केश, दाढी, मूँछ, शरीर-रोएँ, नख आदि कटवाता है, वह उसका अग्निष्टोम है। सन्यास लेनेके बाद पुनः अग्न्याधान न करे, 'मृत्युर्जयमावहम्' इत्यादिक आध्यात्मिक मन्त्रोंका पाठ करे। 'स्वस्ति सर्वजीवेभ्यः'—सब जीवोंका कल्याण हो, यह कहकर केवल आत्मतत्त्वका ध्यान करता हुआ, ऊपर हाथ उठाये प्रपञ्चातीत पथमे विचरण करे, गृहहीन होकर विचरण करे। भिक्षान्नके सिवा और कुछ ग्रहण न करे। थोड़ी देर भी एक जगह न