कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 687, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 687
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६३९ नहीं, अपितु जडरूप उपाधिके ही कारण है। यदि भेद स्वरूप सर्वसाक्षी परमात्माको वे ही पुरुष देखते हैं, जिनके है तो वह भेद जडरूप ही है। चित् तो सर्वत्र एक दोष क्षीण हो गये हैं; जो मायासे आवृत्त हैं, वे इतर प्राणी ही होती है। युक्ति और प्रमाणसे चित्की एकता नहीं देख सकते। जिस महायोगीको इस प्रकार स्वरूप-ज्ञान ही निश्चित होती है, इसलिये जब पुरुषको चित्के हो गया है, उस पूर्णस्वरूपताको प्राप्त हुए सिद्ध महात्माका एकत्वका परिज्ञान हो जाता है, तब वह न शोकको प्राप्त होता कहीं आना-जाना नहीं होता। जिस प्रकार एक और पूर्ण है न मोहको। वह केवल अद्वैत परमानन्दस्वरूप शिव- आकाश कहीं नहीं जाता, उसी प्रकार अपने आत्मतत्त्वका भावको प्राप्त हो जाता है। समस्त जगत्का अधिष्ठान वह अनुभव करनेवाला ज्ञानी महात्मा कहीं नहीं जाता। जो सत्यस्वरूप चिद्घन परमात्मा है। मुनिलोग उसे ‘अहम् मुनि निश्चयपूर्वक उस परम ब्रह्मको जानता है, वह अपने अस्मि’ (वह परमात्मा मैं ही हूँ) ऐसा निश्चय करके स्वरूपमें स्थित हो, सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म ही हो जाता शोकरहित हो जाते हैं। अपने अन्तःकरणमें स्वयञ्ज्योतिः- है” ॥ ३८-५२ ॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय रुद्रहृदयोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! आठ गुणोंसे युक्त आत्माको जाननेका फल य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच। (छान्दोग्य० ८। ७। १) प्रजापतिने कहा-जो आत्मा पापरहित, जरा (बुढ़ापा) रहित, मृत्युरहित, शोकहीन, भूखसे रहित, प्याससे रहित, सत्यकाम और सत्यसङ्कल्प (इन आठ स्वभावगत गुणोंसे युक्त) है, उसे खोजना चाहिये, उसे जानना चाहिये। जो उसको खोजकर जान लेता है, वह सब लोकोंको और समस्त कामनाओंको प्राप्त हो जाता है।