भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 688, कुल 832 में से

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पृष्ठ 688

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय नीलरुद्रोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣲसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! भगवान् नीलरुद्रकी महिमा और शिव-विष्णुकी एकता

भगवान् नीलकण्ठ ! आपको हम अपने दिव्यधामसे नीचे पृथिवीपर अवतीर्ण होते देखते हैं। हम देखते हैं कि आप दुष्टोंका विनाश करते हुए अपने उग्र रुद्ररूपसे मयूर- पिच्छके समान गगनको ही मुकुट बनाये पृथिवीपर अवतीर्ण होते है और पृथिवीमें प्रतिष्ठित होते हैं, क्योंकि आप ही भूमिके अधीश्वर हैं। (तात्पर्य यह कि नीलकण्ठ भगवान् रुद्र अपने गगनव्यापी स्वरूपसे दिव्यधामसे पृथिवीपर अवतीर्ण होकर दुष्टोंका नाश करके पृथिवीकी रक्षा करते हैं। वे पृथिवीके अधिदेवता हैं। उनकी अष्टविध मूर्तियोंमें पृथिवी भी एक मूर्ति है। इस मन्त्रमें भगवान् शिवकी भूमिमयी मूर्तिका निर्देश है।) लोगो ! इन भगवान् नीलकण्ठको देखो, जिनका वर्ण अत्यन्त लाल है। ये प्राणियोंके जीवनस्वरूप हैं। ये भगवान् रुद्र जलमें निक्षिप्त ओषधियोंमें पधारकर पापोंका विनाश करते हैं। (जलमें ओषधियाँ डालकर उसके द्वारा अभिषेक करनेसे पापनाश होता है।) निश्चय ही तुम्हारे अकल्याणको नष्ट करनेके लिये और तुम्हारे अप्राप्त अभीष्टको प्राप्त करानेके लिये वे (योगक्षेमकारी ओषधियुक्त जलरूप भगवान् रुद्र) तुम्हारे समीप आयें। (इस मन्त्रमें भगवान् रुद्रकी जलमयी मूर्तिका निर्देश है।) क्रोधस्वरूप भगवान् रुद्र ! आपको नमस्कार। मन्यु (क्रोधावेश)-स्वरूप भगवान् भव ! आपको नमस्कार। भगवान् नीलकण्ठ ! आपकी दोनों भुजाओंको नमस्कार और आपके 'बाणको भी नमस्कार। कैलासवासी ! आप पर्वतपर (संसारसे अलग) रहकर सबका मङ्गल करते हैं। भगवन् ! जिस बाणको दुष्टोंपर फेंकनेके लिये आपने अपने हाथमें धारण किया है, गिरित्राता ! उस बाणको हमारे लिये कल्याणकारी बनाइये। उसके द्वारा पुरुषों (हमारे स्वजनो) का वध मत कीजिये।

कैलासवासिन् ! ( अपनी ) कल्याणमयी ( पवित्र ) वाणीके द्वारा हम आपके निर्मल गुणोंका वर्णन करते हैं। क्योकि यो करनेसे हमारे लिये यह समस्त जगत् दुःख- रहित तथा अनुकूल हो जायगा। आपके जो बाण हैं, वे कल्याणमय हैं। आपका धनुष कल्याणकारी होता है। आपके धनुषकी प्रत्यञ्चा भी कल्याणरूपिणी है। हे मृड ! हे मङ्गल- स्वरूप ! इन सबके द्वारा आप हमे जीवन प्रदान करते हैं। ( तात्पर्य यह कि भगवान् रुद्रका विनाशक रूप एव विनाशके समस्त साधन भगवद्भक्तोंके लिये तथा जगत्के लिये नव- जीवनका विधान करनेके लिये हैं और वास्तविक रूपमें कल्याणस्वरूप हैं।) भगवान् रुद्र ! आप पर्वतपर रहकर सबका कल्याण करनेवाले हैं। आपका जो पापहारी अघोर ( सौम्य ) स्वरूप है, आप अपने उस कल्याणकारी स्वरूपके द्वारा हमें सब ओरसे प्रकाशित करें। अर्थात् हमारे सम्मुख सदा सब ओर आपका सौम्य मङ्गलमय स्वरूप ही रहे। ये जो आपकी ताम्रवर्ण, हल्की लाल, भूरी, अत्यन्त लाल तथा और भी सहस्रों रुद्रमूर्तियाँ (किरणें) चारो ओर दिशाओंमें व्याप्त है, निश्चय ही हम स्तुतिके लिये उनकी कामना करते हैं। (यहाँ अन्तमें भगवान् रुद्रके सूर्यरूपका निर्देश है) ॥१॥ विलोहित ( अधिक रक्तवर्ण ) नीलकण्ठ भगवान् ! हमने अवतार ग्रहण करते हुए आपको देखा है। आपको (उस अवताररूपमें) या तो गोपोंने देखा है या जल भरनेवाली गोपसुन्दरियोंने देखा है। योगियोंके लिये भी दुर्दर्श आपको (उस श्यामसुन्दर-स्वरूपमें) विश्वके समस्त प्राणियोंने देखा है। उस देखे हुए श्रीकृष्णस्वरूपधारी आपको नमस्कार। (यहाँ श्रुति भगवान् रुद्र एव अवतार-विग्रहोंके एकत्वका निर्देश करती है।) मयूरपिच्छधारी (मयूर- मुकुटी) ! आपको हम नमस्कार करते हैं। आप ही महान्

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