कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 686, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें६३८ * रुद्रहृदयोपनिषद् *
[बायाँ स्तम्भ]
नमस्कार है। रुद्र ब्रह्मा हैं और उमा वाणी हैं। इन दोनों रूपोंमें रुद्र और उमाको नमस्कार। रुद्र विष्णु हैं और उमा लक्ष्मी हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र सूर्य हैं और उमा छाया हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र चन्द्रमा हैं और उमा तारा हैं, उनको और उनको नमस्कार। रुद्र दिवस हैं और उमा रात्रि हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र यज्ञ हैं और उमा वेदी हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र अग्निदेव हैं और उमा स्वाहा हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र वेद हैं और उमा शास्त्र हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र वृक्ष हैं और उमा लता हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र गन्ध हैं और उमा पुष्प हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र अर्थ हैं और उमा अक्षर हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र लिङ्ग हैं और उमा पीठ हैं। उनको और उनको नमस्कार। इस प्रकार सर्वदेवात्मक रुद्रको पृथक् पृथक् नमस्कार करे। मैं भी इन्हीं मन्त्रपदोंके द्वारा महेश्वर और पार्वतीको नमस्कार करता हूँ। मनुष्य जहाँ-जहाँ रहे, इस अर्धालीसहित मन्त्रका उच्चारण करता रहे। ब्रह्महत्यारा भी यदि जलमे प्रविष्ट होकर इस मन्त्रका जाप करे तो सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १७-२५ ॥
“जो सबका अधिष्ठान है, द्वन्द्वातीत है, सच्चिदानन्दस्वरूप, सनातन परम ब्रह्म है, मन और वाणीके अगोचर है, शुक ! उसके भलीभाँति जान लेनेपर यह सब ज्ञात हो जाता है, क्योंकि सब कुछ उसका ही स्वरूप है, उससे भिन्न कुछ भी नहीं है। दो विद्याएँ जानने योग्य हैं—वे हैं परा और अपरा। उनमें अपरा विद्या यह है—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष, तथा मुनीश्वर ! इस अपरा विद्यामें आत्मविषयके अतिरिक्त सब प्रकारके बौद्धिक ज्ञानका समावेश हो जाता है। अब परा विद्या वह है, जिसके द्वारा आत्मविषयका ज्ञान होता है। वह आत्मतत्त्व परम अविनाशी है। वह देखनेमें नहीं आता, ग्रहण नहीं किया जाता। नाम-रूप और गोत्रसे वर्जित है। उसके चक्षु और श्रोत्र नहीं हैं। वह विषयातीत है, उसके हाथ-पैर नहीं हैं, वह नित्य है, विभु है, सर्वगत है, सूक्ष्मसे सूक्ष्म है तथा वह कभी विकारको प्राप्त नहीं होता। वह सब भूतोंका प्रभव स्थान है, उस परमात्माको धीर पुरुष अपने आत्मामें देखते हैं ॥ २६-३२ ॥
[दायाँ स्तम्भ]
“जो सर्वज्ञ है—जिसे भूत-भविष्य-वर्तमानका ज्ञान है, जो सम्पूर्ण विद्याओंका आश्रय है, ज्ञान ही जिसका तप है, उसीसे भोक्ता एव अन्नरूपमें यह समस्त जगत् उत्पन्न होता है। जो जगत् सत्यकी तरह प्रतीत होता है, वह सब ब्रह्ममें उसी प्रकार स्थित है, जैसे रज्जुमे सर्प। वही यह अविनाशी ब्रह्म सत्य है, जो इसको जानता है, वह मुक्त हो जाता है। ज्ञानसे ही संसार-बन्धनका नाश होता है, कर्मसे नहीं। अतएव मुमुक्षुको विधिपूर्वक श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ अपने गुरुके पास जाना चाहिये। तब गुरु उसे ब्रह्म और आत्माके एकत्वका ज्ञान करानेवाली पराविद्या प्रदान करे। यदि पुरुष गुहामें निहित उस अक्षरब्रह्मको साक्षात् कर लेता है तो अविद्यारूपी महाग्रन्थिको काटकर वह सनातन शिवके पास पहुँच जाता है। यही वह अमृतरूप सत्य है, जो मुमुक्षुओंको जानना चाहिये ॥ ३३-३७ ॥
“प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म वह लक्ष्य कहलाता है। उसको प्रमादरहित होकर बींधना (चिन्तन करना) चाहिये तथा लक्ष्यमे घुसे हुए बाणकी भाँति ही उस ब्रह्ममें तन्मय हो जाना चाहिये। लक्ष्य अर्थात् ब्रह्म सर्वगत है। शर अर्थात् आत्मा सब ओर मुखवाला है और वेद्धा अर्थात् साधक यदि सर्वगत हो तो शिवरूप लक्ष्यकी प्राप्तिमें संशय नहीं रह जाता। जहाँ चन्द्रमा और सूर्यका विग्रह प्रकाशित नहीं होता, जहाँ वायु तथा सम्पूर्ण देवताओंकी भी गति नहीं है, वे ही ये तेजोमय परमात्मा साधकके द्वारा चिन्तन करनेपर अपने विशुद्ध एव रजोगुणरहित स्वरूपसे प्रकाशित होते हैं। इस शरीररूपी वृक्षमें जीव और ईश्वर नामके दो पक्षी निवास करते हैं। उनमें जीव कर्मोंका फल भोगता है, महेश्वर नहीं। महेश्वर कर्मफलका भोग न करते हुए केवल साक्षीरूपमें प्रकाशित हो रहा है, उसमें जीव और ईश्वरका भेद मायाके द्वारा कल्पित है। जिस प्रकार घटाकाश और महाकाश आकाशके ही कल्पित भेद हैं, उसी प्रकार परमात्माके जीव और ईश्वररूप भेद भी कल्पित हैं। वस्तुतः तो चिन्मय जीवात्मा सदा स्वतः साक्षात् शिव है। जीव और ईश्वरमें जो चित् है, वह चित्के औपाधिक आकार-भेदसे भिन्न-भिन्न प्रतीत होती है, स्वरूपतः भिन्न नहीं है, क्योंकि स्वरूपतः भेद होनेपर तो दोनोंकी चित्स्वरूपताकी ही हानि हो जायगी। (जड वस्तुमें ही स्वरूपगत भेद होता है, चित्में नहीं।) चित्से जो चित्का भेद कहा जाता है, वह चिदाकारता (चिन्मयता) से