कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 685, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय रुद्रहृदयोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! भगवान् रुद्रकी सर्वश्रेष्ठता, सर्वस्वरूपता और ब्रह्मस्वरूपता हरिः ॐ रुद्रहृदय, योगकुण्डली, भस्मजाबाल, रुद्राक्षजाबाल और गणपति-ये पाँच उपनिषद् प्रणवके मूल तत्त्वको बतलाते हैं । ये श्रुतिके महावाक्य हैं, ब्रह्म- ज्ञानात्मक अग्निहोत्रके ये पाँच महामन्त्र हैं, अथवा मुक्तिकी प्राप्तिके लिये पाँच ब्रह्म अर्थात् मन्त्रात्मक अग्निहोत्र हैं ॥ १ ॥ श्रीशुकदेवजीने व्यासजीके चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम किया और बोले, 'भगवन् ! बतलाइये, सब वेदोंमें किस एक देवताका प्रतिपादन हुआ है और किसमें सारे देवता वास करते हैं ? किसकी सेवा पूजा करनेसे सर्वदा सब देवता मुझपर प्रसन्न रहेंगे ?' श्रीशुकदेवजीकी इस बातको सुनकर उनके पिता उनसे बोले- 'शुक ! सुनो - भगवान् रुद्र सर्वदेवस्वरूप हैं, और सब देवता रुद्रस्वरूप हैं । रुद्रके दक्षिण पार्श्वमें सूर्यभगवान्, ब्रह्माजी तथा गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि और आहवनीय-ये तीन प्रकारके अग्निदेव स्थित हैं। वामपार्श्वमें भगवती उमा, विष्णुभगवान् और सोम- ये तीन हैं । जो भगवती उमा हैं, वही विष्णुभगवान् हैं और जो विष्णुभगवान् हैं, वही चन्द्रमा हैं। जो गोविन्दको नमस्कार करते हैं, वे शङ्करजीको नमस्कार करते हैं। और जो भक्तिपूर्वक विष्णुभगवान्की "अर्चना करते हैं, वे वृषभध्वज अर्थात् शङ्करजीकी ही पूजा करते हैं। जो विरूपाक्ष अर्थात् भगवान् आशुतोषसे द्वेष करते हैं, वे जनार्दनसे ही द्वेष करते हैं। जो रुद्रको नहीं जानते, वे केशवको भी नहीं जानते । रुद्रसे बीज उत्पन्न होता है और उस बीजकी योनि (अर्थात् क्षेत्र) विष्णुभगवान् हैं । जो रुद्र हैं, वे स्वयं ब्रह्मा हैं और जो ब्रह्मा हैं, वे अग्निदेव हैं। रुद्र ब्रह्मा और विष्णुस्वरूप हैं। और अग्नि-सोमात्मक समस्त जगत् भी रुद्र ही है। सृष्टिमें जितने पुँल्लिङ्ग प्राणी हैं, सब महेश्वर हैं और जितने स्त्रीलिङ्ग प्राणी हैं, सब भगवती उमा हैं। सारी स्थावर और जङ्गमस्वरूप सृष्टि उमा-महेश्वररूप है । समस्त व्यक्त जगत् उमाका स्वरूप है । और अव्यक्त जगत् महेश्वरका स्वरूप है । उमा और शङ्करका योग ही विष्णु कहलाता है । जो उन विष्णुभगवान्को भक्तिपूर्वक नमस्कार करते हैं, वे आत्मा, परमात्मा और अन्तरात्मा - इस त्रिविध आत्माको जानकर परमात्माको प्राप्त होते हैं । अन्तरात्मा ब्रह्मा हैं और परमात्मा महेश्वर हैं । और सभी प्राणियोंके सनातन आत्मा विष्णुभगवान् हैं । इस त्रिलोकी- रूप वृक्षके, जिसके तने और शाखाएँ भूमिपर फैली हुई हैं, अग्रभाग विष्णु है । मध्य (तना) ब्रह्मा हैं और मूलभाग भगवान् महेश्वर हैं । विष्णु कार्यरूप हैं, ब्रह्मा क्रियारूप हैं और महेश्वर कारण-स्वरूप हैं । प्रयोजनके अनुसार रुद्रने अपनी एक ही मूर्तिको तीन प्रकारसे व्यवस्थित किया है । धर्म रुद्रस्वरूप है, जगत् विष्णुस्वरूप है और समस्त ज्ञान ब्रह्मस्वरूप हैं । 'श्रीरुद्र रुद्र रुद्र' इस प्रकारसे जो बुद्धिमान् जपता है, इससे समस्त देवोंका कीर्तन हो जानेके कारण वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २-१६ ॥ “पुरुष रुद्रस्वरूप हैं और स्त्रियाँ उमास्वरूपा हैं-इन दोनों प्रकारके रूपोंमें भगवान् रुद्र और भगवती उमाको