भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 684

है । जो सब विशेषोंसे रहित परानन्दरूप तत्त्व है, वहाँ शब्दकी प्रवृत्ति कैसे हो । इस कारण यह मन सूक्ष्म और व्यावृत्त अर्थात् सीमित शक्तिसम्पन्न होकर सर्वत्र गमन करता है । क्योंकि श्रोत्र, त्वक्, नेत्र आदि ज्ञानेन्द्रियाँ तथा शब्द, स्पर्श आदि उनके विषय एवं वाक्, पाणि आदि कर्मेन्द्रियाँ सीमित शक्तिसम्पन्न हैं । अतएव परतत्त्वको प्राप्त करनेमें ये समर्थ नहीं हैं । जो साधक उस द्वन्द्वरहित, निर्गुण, सत्य स्वरूप और विज्ञानघन ब्रह्मानन्दको 'यह मेरा ही स्वरूप है'— इस प्रकार जान लेता है, उसे कहीं भी भय नहीं होता । इस प्रकार जो अपने इन्द्रियोंका स्वामी अपने गुरुके उपदेशसे आत्मसाक्षात्कारके द्वारा ब्रह्मानन्दको जानता है, वह साधु- असाधु कर्मोंके द्वारा कभी सतत नहीं होता । विषय तापक हैं और चित्त ताप्य है, चित्त और उसके विषयोंसे यह अखिल जगत् विभासित हो रहा है । परन्तु वेदान्त-शास्त्रके वाक्योंके ज्ञानसे यह प्रत्यगात्माके रूपमें अनुभूत होता है । शुद्ध-बुद्ध-मुक्त- स्वभाव ब्रह्म, ईश्वर चैतन्य, जीव-चैतन्य, प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और फल—ये सप्तविध तत्त्व कहे गये हैं, जिनमें व्यवहारोंकों लेकर भेद है । मायाकृत उपाधियोंसे अत्यन्त मुक्त ब्रह्म —शुद्ध चैतन्य कहलाता है । मायाके सम्बन्धसे वह ईश है, अविद्याके वशीभूत वही जीव है, तथा अन्तःकरणके सम्बन्धसे वही प्रमाता—ज्ञाता कहलाता है । उस अन्तःकरणकी वृत्तिके सम्बन्धसे वह प्रमाण संज्ञाको प्राप्त होता है । वह चैतन्य जबतक अज्ञात है, तबतक प्रमेय-कोटिमें आता है और वही ज्ञात हो जानेपर फल कहलाता है । अतएव बुद्धिमान् पुरुष अपने-आपको 'मैं सब उपाधियोंसे मुक्त हूँ'—इस प्रकार चिन्तन करे । इस प्रकार जो तत्त्वतः जानता है, वह ब्रह्मतत्त्वको प्राप्त करनेयोग्य हो जाता है । मैंने समस्त वेदान्तके सिद्धान्तोंका सार यथार्थतः कहा है । जीव स्वयं—अपने ही कर्मोंसे उत्पन्न होता है, स्वयं ही मरता है और स्वय ही अवशिष्ट रहता है । यह सब आत्माकी क्रीडा है, आत्माके सिवा कोई दूसरा तत्त्व नहीं है । यही उपनिषद्—रहस्य है" ॥ २६-४३ ॥

॥ कृष्णयजुर्वेदीय कठरुद्रोपनिषद् समाप्त ॥

शान्तिपाठ

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

देहनाशसे आत्माका नाश नहीं

घटावभासको भानुर्घटनाशे न नश्यति । देहावभासकः साक्षी देहनाशे न नश्यति ॥ (आत्मप्रबोध० १८)

'जैसे घड़ेका प्रकाशक सूर्य घड़ेके नाश हो जानेपर नष्ट नहीं होता, वैसे ही देहका प्रकाशक साक्षी (आत्मा) देहके नाशने नाशको नहीं प्राप्त होता ।'