कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण ४ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४७१
ब्राह्मण ४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४७१
उसका ये सात अक्षितियाँ (नेत्रोंके अङ्ग) उपस्थान (स्तवन) करती हैं— उनमेंसे जो ये आँखमे लाल रेखाएँ हैं उनके द्वारा रुद्र इस मध्यप्राणके अनुगत है, नेत्रमें जो जल है उसके द्वारा मेघ, जो दर्शनशक्ति है उसके द्वारा आदित्य, जो कालिमा है उसके द्वारा अग्नि और जो शुक्लता है उसके द्वारा इन्द्र अनुगत है। नीचेके पलकद्वारा पृथिवी इसके अनुगत है एव ऊपरके पलकद्वारा द्युलोक । जो इस प्रकार जानता है, उसका अन्न क्षीण नहीं होता ॥ २ ॥ इस विषयमे यह मन्त्र है—'चमस नीचेकी ओर छिद्र- वाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ होता है, उसमें विश्वरूप यश निहित है, उसके तीरपर सात ऋषिगण (दो कान, दो नेत्र, दो नासिका और एक रसना) और वेदके द्वारा सवाद करनेवाली आठवी वाणी रहती है। जो नीचेकी ओर छिद्र- वाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ चमस है, वह सिर है; क्योकि यही नीचेकी ओर छिद्रवाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ है । उसमें विश्वरूप यश निहित है—प्राण ही विश्वरूप यश हैं, प्राणोंके विषयमें ही मन्त्र ऐसा कहता है। उसके तीरपर सात ऋषि रहते हैं, प्राण ही ऋषि है, प्राणोंके विषयमें ही मन्त्र ऐसा कहता है। वेदके द्वारा सवाद करनेवाली वाक् आठवीं है, वही वेदके द्वारा सवाद करती है। ये दोनों [ कान ] ही गोतम और भरद्वाज हैं, यह ही गोतम है और यह [ दूसरा ] भरद्वाज है। ये दोनों [नेत्र ] ही विश्वामित्र और जमदग्नि हैं, यह ही विश्वामित्र है और यह दूसरा जमदग्नि है। ये दोनों [नासारन्ध्र ] ही वसिष्ठ और कश्यप हैं, यह ही वसिष्ठ है और यह दूसरा कश्यप है। तथा वाक् ही अत्रि है, क्योकि वागिन्द्रियद्वारा ही अन्न भक्षण किया जाता है। जिसे अत्रि कहते हैं, उसका निश्चय 'अत्ति' ही नाम है। जो इस प्रकार जानता है, वह सबका अत्ता (भोक्ता) होता है, सब उसका अन्न (भोग्य) हो जाता है ॥ ३-४ ॥
तृतीय ब्राह्मण ब्रह्मके दो रूप
ब्रह्मके दो (द्विविध) रूप है—मूर्त और अमूर्त, मर्त्य और अमृत, स्थित और यत् (चर) तथा सत् और त्यत्। जो वायु और अन्तरिक्षसे भिन्न है, वह मूर्त है। यह मर्त्य है, यह स्थित है और यह सत् है । उस इस मूर्तका, इस मर्त्यका, इस स्थितका, इस सत्का यह रस है, जो कि यह तपता है। यह सत्का ही रस है । तथा वायु और अन्तरिक्ष अमूर्त हैं, ये अमृत है, ये यत् हैं और ये ही त्यत् है। उस इस अमूर्तका, इस अमृतका, इस यत्का, इस त्यत्का यह सार है, जो कि इस मण्डलमें पुरुष है, यही इस त्यत्का सार है। यह अधि दैवत-दर्शन है। अब अध्यात्म मूर्तामूर्तका वर्णन किया जाता है। जो प्राणसे तथा यह जो देहान्तर्गत आकाश है, उससे भिन्न है, यही मूर्त है। यह मर्त्य है, यह स्थित है, यह सत् है। यह जो नेत्र है, वही इस मूर्तका, इस मर्त्यका, इस स्थितका एव इस सत्का सार है। यह सत्का ही सार है। अब अमूर्तका वर्णन करते हैं—प्राण और इस शरीरके अन्तर्गत जो आकाश है, वे अमूर्त हैं, यह अमृत है, यह यत् है और यही त्यत् है। उस इस अमूर्तका, इस अमृतका, इस यत्का, इस त्यत्का यह रस है जो कि यह दक्षिण नेत्रान्तर्गत पुरुष है, यह त्यत्का ही रस है ॥ १—५ ॥ उस इस पुरुषका रूप-चमत्कार ऐसा है जैसा कुसुमसे रँगा हुआ वस्त्र हो, जैसा सफेद ऊनी वस्त्र हो, जैसा इन्द्रगोप (बीरबहूटी) हो, जैसी अग्निकी ज्वाला हो, जैसा श्वेत कमल हो, और जैसे बिजलीकी चमक हो। जो ऐसा जानता है, उसकी श्री बिजलीकी चमकके समान [ सर्वत्र एक साथ फैलनेवाली ] होती है। अब इसके पश्चात् 'नेति-नेति' यह ब्रह्मका निर्देश है। 'नेति-नेति' इससे बढकर कोई उत्कृष्ट आदेश नहीं है। 'सत्यका सत्य' यह उसका नाम है। प्राण ही सत्य हैं, उनका यह सत्य है ॥६॥
चतुर्थ याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद, याज्ञवल्क्यका मैत्रेयीको अमृतत्वके साधनरूपमें परमात्म-तत्त्वका उपदेश
'अरी मैत्रेयि !' ऐसा याज्ञवल्क्यने [ अपनी पत्नीसे ] कहा। 'मै इस स्थान (गार्हस्थ्य-आश्रम) से ऊपर (सन्यास- आश्रममें ) जानेवाला हूँ। अतः [ तेरी अनुमति लेता हूँ और चाहता हूँ ] इस (दूसरी पत्नी) कात्यायनीके साथ तेरा बँटवारा कर दूँ' ॥ १ ॥ मैत्रेयीने कहा, 'भगवन् ! यदि यह धनसे सम्पन्न
४७२ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय २
[बायाँ स्तम्भ] सारी पृथिवी मेरी हो जाय तो क्या मैं उससे किसी प्रकार अमर हो सकती हूँ ?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'नहीं, भोग- सामग्रियोंसे सम्पन्न मनुष्योंका जैसा जीवन होता है, वैसा ही तेरा भी जीवन हो जायगा। धनसे अमृतत्वकी तो आशा है ही नहीं' ॥ २ ॥ मैत्रेयीने कहा, 'जिससे मैं अमर नहीं हो सकती, उन भोगोंको लेकर मैं क्या करूँगी ? श्रीमान् जो कुछ अमृतत्वका साधन जानते हों, वही मुझे बतलावें' ॥ ३ ॥ याज्ञवल्क्यजीने कहा, 'धन्य ! अरी मैत्रेयि, तू पहले भी मेरी प्रिया रही है और इस समय भी मुझे प्रिय लगने- वाली ही बात कह रही है। अच्छा आ, बैठ जा; मैं तेरे प्रति उस (अमरत्व) की व्याख्या करूँगा, तू व्याख्यान किये हुए मेरे वाक्योंके अर्थका चिन्तन करना' ॥ ४ ॥ उन्होंने कहा-'अरी मैत्रेयि ! यह निश्चय है कि पतिके प्रयोजनके लिये पति प्रिय नहीं होता, आत्माके अपने ही प्रयोजनके लिये पति प्रिय होता है; स्त्रीके प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया नहीं होती, अपने ही प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया होती है, पुत्रोंके प्रयोजनके लिये पुत्र प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजन- के लिये पुत्र प्रिय होते हैं; धनके प्रयोजनके लिये धन प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये धन प्रिय होता है; ब्राह्मणके प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय होता है; क्षत्रियके प्रयोजनके लिये क्षत्रिय प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये क्षत्रिय प्रिय होता है, लोकोंके प्रयोजनके लिये लोक प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये लोक प्रिय होते हैं, देवताओंके प्रयोजनके लिये देवता प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये देवता प्रिय होते हैं, प्राणियोंके प्रयोजनके लिये प्राणी प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये प्राणी प्रिय होते हैं, तथा सबके प्रयोजनके लिये सब प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये सब प्रिय होते हैं। अरी मैत्रेयि ! यह आत्मा- अपना-आप ही दर्शनीय, श्रवणीय, मननीय और ध्यान किये जाने योग्य है। मैत्रेयि ! इस आत्माके ही दर्शन, श्रवण, मनन एव विज्ञानसे इस सबका ज्ञान हो जाता है ॥ ५ ॥ ब्राह्मणजाति उसे परास्त कर देती है, जो ब्राह्मणजातिको आत्मासे भिन्न जानता है। क्षत्रियजाति उसे परास्त कर देती है, जो क्षत्रियजातिको आत्मासे भिन्न देखता है। लोक उसे परास्त कर देते हैं, जो लोकोंको आत्मासे भिन्न देखता है। देवगण उसे परास्त कर देते हैं, जो देवताओंको आत्मासे
[दायाँ स्तम्भ] भिन्न देखता है। भूतगण उसे परास्त कर देते हैं, जो भूतोंको आत्मासे भिन्न देखता है। सभी उसे परास्त कर देते हैं, जो सबको आत्मासे भिन्न देखता है। यह ब्राह्मणजाति, यह क्षत्रियजाति, ये लोक, ये देवगण, ये भूतगण और ये सब जो कुछ भी हैं, सब आत्मा ही है ॥ ६ ॥ इसमें दृष्टान्त ऐसा है कि जिस प्रकार बजती हुई दुन्दुभि (नकारे) के बाह्य शब्दोको कोई पकड़ नहीं सकता, किंतु दुन्दुभि या दुन्दुभिके आघातको पकड़ लेनेसे उसका शब्द भी पकड़ लिया जाता है। यह [दूसरा दृष्टान्त] ऐसा है- जैसे कोई बजाये जाते हुए शङ्खके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं होता, किंतु शङ्खके अथवा शङ्खके बजानेको ग्रहण करनेसे उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है। वह [तीसरा दृष्टान्त] ऐसा है-जैसे कोई बजायी जाती हुई वीणाके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं होता, किंतु वीणा या वीणाके स्वरका ग्रहण होनेपर उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है। वह [चौथा दृष्टान्त है-] जिस प्रकार जिसका ईंधन गीला है, ऐसे आधान किये हुए अग्निसे पृथक् धूआँ निकलता है, हे मैत्रेयि ! इसी प्रकार ये जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वाङ्गिरस (अथर्ववेद), इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, मन्त्रविवरण और अर्थवाद हैं, वे सब इस परमात्माके ही निःश्वास हैं ॥ ७-१० ॥ दृष्टान्त है-जिस प्रकार समस्त जलोंका समुद्र एक अयन (आश्रय स्थान) है, इसी प्रकार समस्त स्पशोंका त्वचा एक अयन है, इसी प्रकार समस्त गन्धोंका दोनों नासिकाएँ एक अयन हैं, इसी प्रकार समस्त रसोंका जिह्वा एक अयन है, इसी प्रकार समस्त रूपोंका चक्षु एक अयन है, इसी प्रकार समस्त शब्दोंका श्रोत्र एक अयन है, इसी प्रकार समस्त सङ्कल्पोंका मन एक अयन है, इसी प्रकार समस्त विद्याओका हृदय एक अयन है, इसी प्रकार समस्त कर्मोंका हस्त एक अयन है, इसी प्रकार समस्त आनन्दोंका उपस्थ एक अयन है और इसी प्रकार समस्त विसर्गोंका पायु एक अयन है, इसी प्रकार समस्त मार्गोंका चरण एक अयन है और इसी प्रकार समस्त वेदोका वाणी एक अयन है ॥ ११ ॥ इसमें यह दृष्टान्त है-जिस प्रकार जलमे डाला हुआ नमकका डला जलमें ही घुल-मिल जाता है, उसे जलसे निकालनेके लिये कोई समर्थ नहीं होता तथा जहाँ-जहाँसे भी जल लिया जाय वह नमकीन ही जान पड़ता है, हे मैत्रेयि ! उसी प्रकार यह परमात्म-तत्त्व अनन्त, अपार और विज्ञानघन ही है। यह इन [सत्यशब्दवाच्य] भूतोंसे प्रकट होकर उन्हींके
ब्राह्मण ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * । ४७३
साथ अदृश्य हो जाता है; देहेन्द्रियभावसे मुक्त होनेपर इसकी कोई विशेष सञ्ज्ञा नहीं रहती । हे मैत्रेयि ! ऐसा मैं तुझसे कहता हूँ'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा ॥ १२ ॥ उस मैत्रेयीने कहा, 'शरीरपातके अनन्तर कोई सञ्ज्ञा नहीं रहती—ऐसा कहकर ही श्रीमान्ने मुझे मोहमें डाल दिया है।' याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे मैत्रेयि ! मैं मोहका उपदेश नहीं कर रहा हूँ, अरी ! यह तो उस परमात्माका विज्ञान कराने- के लिये पर्याप्त है' ॥ १३ ॥ जहाँ (अविद्यावस्था में) द्वैत सा होता है, वहीं अन्य अन्यको सूँघता है, अन्य अन्यको देखता है, अन्य अन्यको सुनता है, अन्य अन्यका अभिवादन करता है, अन्य अन्य- का मनन करता है तथा अन्य अन्यको जानता है; किंतु जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, वहाँ किसके द्वारा किसे सूँघे, किसके द्वारा किसे देखे, किसके द्वारा किसे सुने, किसके द्वारा किसका अभिवादन करे, किसके द्वारा किसका मनन करे और किसके द्वारा किसे जाने ? जिसके द्वारा इस सबको जानता है, उसे किसके द्वारा जाने ? अरी मैत्रेयि ! विज्ञाताको किसके द्वारा जाने ? ॥ १४ ॥
पञ्चम ब्राह्मण मधुविद्याका उपदेश, आत्माका विविध रूपोंमें वर्णन यह पृथिवी समस्त भूतोंका मधु है और सब भूत इस पृथिवीके मधु हैं। इस पृथिवीमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्मशारीर तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। ये जल समस्त भूतोंके मधु हैं और समस्त भूत इन जलोंके मधु हैं। इन जलोंमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म रैतस तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह अग्नि समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस अग्निके मधु हैं। इस अग्निमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म वाङ्मय तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह वायु समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस वायुके मधु हैं। इस वायुमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्मप्राणरूप तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह आदित्य समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस आदित्यके मधु हैं। यह जो इस आदित्यमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म चाक्षुष तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। ये दिशाएँ समस्त भूतोंका मधु हैं तथा समस्त भूत इन दिशाओंके मधु हैं। यह जो इन दिशाओंमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म श्रोत्रसम्बन्धी प्रातिश्रुत्क (प्रत्येक श्रवणवेलामें रहनेवाला) तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह चन्द्रमा समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस चन्द्रमाके मधु हैं। यह जो इस चन्द्रमामें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म मनःसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह विद्युत् समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस विद्युत्के मधु हैं। यह जो इस विद्युत्में तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म तैजस तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह मेघ समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस मेघके मधु हैं। यह जो इस मेघमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म शब्द एव स्वरसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह आकाश समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस आकाशके मधु हैं। यह जो इस आकाशमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म हृदयाकाशरूप तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ] यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह धर्म समस्त उ० अ० ६०-६१-
४७४ , ' बृहदारण्यकोपनिषद् ' [ अध्याय २ भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस धर्मके मधु हैं । इस धर्ममें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म धर्मसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह सत्य समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस सत्यके मधु हैं। यह जो इस सत्यमे तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म- सत्यसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ] । यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह मनुष्यजाति समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस मनुष्यजातिके मधु हैं। यह जो इस मनुष्यजातिमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म मानुष तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस श्रुतिद्वारा बतलाया गया है]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह आत्मा (देह) समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस आत्माके मधु हैं। यह जो इस आत्मामें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह आत्मा तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। वह यह आत्मा समस्त भूतोंका अधिपति एव समस्त भूतोंका राजा है। इस विषयमें दृष्टान्त- जिस प्रकार रथकी नाभि और रथकी नेमिमें सारे अरे समर्पित रहते हैं, इसी प्रकार इस परमात्मामें समस्त भूत, समस्त देव, समस्त लोक, समस्त जीवन और ये सभी आत्माएँ समर्पित हैं [ सभी उस परमात्मासे जुड़े हुए और उसीके सहारे स्थित हैं।] ॥ १-१५॥ इस पूर्वोक्त मधुको दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिने अश्विनीकुमारोंसे कहा था । इस मधुको देखते हुए ऋषि (मन्त्र) ने कहा- मेघ जिस प्रकार वृष्टि करता है, उसी प्रकार हे नराकार अश्विनी- कुमारो ! मैं लाभके लिये किये हुए तुम दोनोंका वह उग्र दक्ष कर्म प्रकट किये देता हूँ, जिस मधुका दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिने तुम्हारे प्रति अश्वके सिरसे वर्णन किया था ॥ १६ ॥ उस इस मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको उपदेश किया । इसे देखते हुए ऋषि (मन्त्रद्रष्टा) ने कहा है-हे अश्विनीकुमारो ! तुम दोनों आथर्वण दध्यङ्के लिये घोड़ेका सिर लाये । उसने सत्यपालन करते हुए तुम्हें त्वाष्ट्र (सूर्यसम्बन्धी) मधुका उपदेश किया तथा हे शत्रुहिंसक ! जो [ आत्मज्ञानसम्बन्धी ] गोपनीय मधु था [ वह भी तुमसे कहा ] ॥ १७ ॥ इस पूर्वोक्त मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको उपदेश किया। इसे देखते हुए ऋषिने कहा-परमात्माने दो पैरोंवाले शरीर बनाये और चार पैरोंवाले शरीर बनाये। पहले वह पुरुष-परमात्मा पक्षी होकर शरीरोंमें प्रविष्ट हो गया । वह यह पुरुष समस्त पुरों ( शरीरों ) मे पुरिशय है। ऐसा कुछ भी नहीं है, जो परमात्मासे न ढका हो तथा ऐसा भी कुछ नहीं है, जिसमे परमात्माका प्रवेश न हुआ हो-जो उससे व्याप्त न हो ॥ १८ ॥ इस पूर्वोक्त मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको उपदेश किया। यह देखते हुए ऋषिने कहा-वह रूप रूपके प्रतिरूप हो गया। इसका वह रूप प्रतिख्यापन (प्रकट) करनेके लिये है। ईश्वर मायासे अनेकरूप प्रतीत होता है। [ शरीररूप रथमें जोड़े हुए ] इसके घोड़े सौ (नाड़ियां) और दस (इन्द्रियाँ) हैं। यह (परमेश्वर) ही हरि (इन्द्रिय- रूप अश्व ) है, यही दस, सहस्र, अनेक और अनन्त है। वह यह ब्रह्म अपूर्व (कारणरहित), अनपर (कार्यरहित), अनन्तर (विजातीय द्रव्यसे रहित) और अबाह्य है। यह आत्मा ही सबका अनुभव करनेवाला ब्रह्म है। यही समस्त वेदान्तोंका अनुशासन (उपदेश) है ॥ १९ ॥ षष्ठ ब्राह्मण मधुविद्याकी परम्पराका वर्णन अब [ मधुकाण्डका ] वंश बतलाया जाता है- पौतिमाष्यने गौपवनसे, गौपवनने पौतिमाष्यसे, पौतिमाष्यने गौपवनसे, गौपवनने कौशिकसे, कौशिकने कौण्डिन्यसे, ने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने कौशिकसे और गौतमसे, गौतमने आग्निवेश्यसे, आग्निवेश्यने शाण्डिल्यसे और आनभिम्लातसे, आनभिम्लातने आनभिम्लातसे, आनभिम्लातने आनभिम्लातसे, आनभिम्लातने गौतमसे, गौतमने सैतव और प्राचीनयोग्यसे, सैतव और प्राचीनयोग्यने पाराशर्यसे, पाराशर्यने
ब्राह्मण ६ ] $\qquad$ $\div$ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति $\div$ $\qquad$ ४७५ भारद्वाजसे, भारद्वाजने भारद्वाजसे और गौतमसे, गौतमने $\quad$ वत्सनपात् बाभ्रवने पन्था सौभरसे, पन्था सौभरने अयास्य भारद्वाजसे, भारद्वाजने पाराशर्यसे, पाराशर्यने वैजवापायनसे, $\quad$ आङ्गिरससे, अयास्य आङ्गिरसने आभूति त्वाष्ट्रसे, आभूति वैजवापायनने कौशिकायनिसे, कौशिकायनिने घृतकौशिकसे, $\quad$ त्वाष्ट्रने विश्वरूप त्वाष्ट्रमे, विश्वरूप त्वाष्ट्रने अश्विनीकुमारोंसे, घृतकौशिकने पाराशर्यायणसे, पाराशर्यायणने पाराशर्यसे, $\quad$ अश्विनीकुमारोंने दध्यङ्ङाथर्वणसे, दध्यङ्ङाथर्वणने अथर्वा पाराशर्यने जातूकण्यंसे, जातूकर्ण्यने आसुरायणमे और यास्कसे, $\quad$ दैवमे, अथर्वा दैवने प्राध्वसन मृत्युने, प्राध्वसन मृत्युने आसुरायणने त्रैवणिसे, त्रैवणिने औपजन्धनिसे, औपजन्धनिने $\quad$ प्रध्वन्सनसे, प्रध्वन्सनने एकर्षिसे, एकर्षिने विप्रचित्तिसे, आसुरिसे, आसुरिने भारद्वाजने, भारद्वाजने आत्रेयसे, आत्रेयने $\quad$ विप्रचित्तिने व्यष्टिने, व्यष्टिने सनातनसे, सनातनने सनातनसे, माण्टिसे, माण्टिने गौतममे, गौतमने गौतमसे, गौतमने वात्स्यसे, $\quad$ सनातनने सनगसे, सनगने परमेष्ठीसे और परमेष्ठीने ब्रह्मासे वात्स्यने शाण्डिल्यमे, शाण्डिल्यने कैशोर्य काप्यसे, कैशोर्य $\quad$ [ इसे प्राप्त किया ] । ब्रह्मा स्वयम्भू—है, ब्रह्माको नमस्कार काप्यने कुमारहारितमे, कुमारहारितने गालवसे, गालवने $\quad$ है ॥ १-३ ॥ विदर्भीकौण्डिन्यमे विदर्भीकौण्डिन्यने वत्सनपात बाभ्रवसे, ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त
तृतीय अध्याय
ॐ तृतीय अध्याय प्रथम ब्राह्मण जनकके यज्ञमें याज्ञवल्क्य और अश्वलका संवाद
विदेहदेशमें रहनेवाले राजा जनकने एक बड़ी दक्षिणावाले यज्ञद्वारा यजन किया। उसमें कुरु और पाञ्चाल देशोंके ब्राह्मण एकत्रित हुए । उस राजा जनकको यह जाननेकी इच्छा हुई कि 'इन ब्राह्मणोंमें अनुवचन (प्रवचन) करनेमें सबसे बढ़कर कौन है ?' इसलिये उसने एक सहस्र गौएँ गोशालामें रोक लीं। उनमेंसे प्रत्येकके सींगोंमें दस दस पाद सुवर्ण बँधे हुए थे ॥ १ ॥ उसने उनसे कहा—'पूज्य ब्राह्मणगण ! आपमें जो ब्रह्मनिष्ठ हो, वह इन गौओंको ले जाय।' किंतु उन ब्राह्मणोंका साहस न हुआ। तब याज्ञवल्क्यने अपने ही ब्रह्मचारीसे कहा, 'हे सौम्य सामश्रवा ! तू इन्हें ले जा।' तब वह उन्हें ले चला। इससे वे ब्राह्मण 'यह हम सबमें अपनेको ब्रह्मनिष्ठ कैसे कहता है' इस प्रकार कहते हुए क्रुद्ध हो गये। विदेहराज जनकका होता अश्वल था, उसने याज्ञवल्क्यसे पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! हम सबमें क्या तुम ही ब्रह्मनिष्ठ हो ?' उसने कहा, 'ब्रह्मनिष्ठको तो हम नमस्कार करते हैं, हम तो गौओंकी ही इच्छावाले हैं।' इसीसे होता अश्वलने उससे प्रश्न करनेका निश्चय किया ॥ २ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह सब जो मृत्युसे व्याप्त है, मृत्युद्वारा स्वाधीन किया हुआ है, उस मृत्युकी व्याप्तिका यजमान किस साधनसे अतिक्रमण करता है?' [ इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—] 'वह यजमान होता ऋत्विकूरूप अग्निसे और वाक्से उसका अतिक्रमण कर सकता है । वाक् ही यज्ञका होता है, यह जो वाक् है, वही यह अग्नि है, वह होता है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है' ॥ ३ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह जो कुछ है, सब दिन और रात्रिसे व्याप्त है, सब दिन और रात्रिके अधीन है। तब किस साधनके द्वारा यजमान दिन और रात्रिकी व्याप्तिका अतिक्रमण कर सकता है ?' [ इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—] 'अध्वर्यु ऋत्विक् और चक्षुरूप आदित्य- के द्वारा । अध्वर्यु यज्ञका चक्षु ही है। अतः यह जो चक्षु है, वह यह आदित्य है और वह अध्वर्यु है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है' ॥ ४ ॥
'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह जो कुछ है, सब पूर्वपक्ष और अपरपक्षसे व्याप्त है, सब पूर्वपक्ष और अपर- पक्षद्वारा वशमे किया हुआ है। किस उपायसे यजमान पूर्वपक्ष और अपरपक्षकी व्याप्तिसे पार होकर मुक्त होता है ?' [ इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—] 'उद्गाता ऋत्विकूसे और वायुरूप प्राणसे; क्योकि उद्गाता यज्ञका प्राण ही है। तथा यह जो प्राण है, वही वायु है, वही उद्गाता है, वही मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है' ॥ ५ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह जो अन्तरिक्ष है, वह निरालम्ब सा है। अतः यजमान किस आलम्बनसे स्वर्गलोकमें चढता है ?' [ इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—] 'ब्रह्मा ऋत्विजके द्वारा और मनरूप चन्द्रमासे । ब्रह्मा यज्ञका मन ही है। और यह जो मन है; वही यह चन्द्रमा है, वह ब्रह्मा है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है।' इस प्रकार अतिमोक्षोंका वर्णन हुआ, अब सम्पदोंका निरूपण किया जाता है ॥ ६ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'आज कितनी ऋचाओके द्वारा होता इस यज्ञमें शस्त्र शसन करेगा ?' [ याज्ञवल्क्यने कहा—] 'तीनके द्वारा।' [ अश्वल—] 'वे तीन कौन-सी हैं ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'पुरोनुवाक्या, याज्या और तीसरी शस्या।' [ अश्वल— ] 'इनसे यजमान किसको जीतता है ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'यह जितना भी प्राणिसमुदाय है [ उस सबको जीत लेता है] ' ॥ ७ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'आज इस यज्ञमे यह अध्वर्यु कितनी आहुतियाँ होम करेगा ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'तीन।' [ अश्वल—] 'वे तीन कौन कौन-सी है ?' [ याज्ञ- वल्क्य— ] 'जो होम की जानेपर प्रज्वल्लित होती हैं, जो होम की जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं और जो होम की जानेपर पृथ्वीके ऊपर लीन हो जाती हैं।' [ अश्वल—] 'इनके द्वारा यजमान किसको जीतता है ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'जो होम की जानेपर प्रज्वलित होती हैं, उनसे यजमान देवलोकको ही जीत लेता है, क्योंकि देवलोक मानो देदीप्यमान हो रहा है। जो होम की जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं, उनसे वह पितृलोकको ही जीत लेता है; क्योंकि पितृलोक मानो अत्यन्त
कल्याण
ब्रह्मचारियोंको याज्ञवल्क्यका आदेश
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ब्राह्मण २ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४७७
ब्राह्मण २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४७७ शब्द करनेवाला है । जो होम की जानेपर पृथ्वीपर लीन हो जाती हैं, उनसे मनुष्यलोकको ही जीतता है क्योंकि मनुष्यलोक अधोवर्ती-सा है' ॥ ८ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'आज यह ब्रह्मा यज्ञमें दक्षिणकी ओर बैठकर कितने देवताओंद्वारा यज्ञकी रक्षा करता है ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'एकके द्वारा ।' [ अश्वल— ] 'वह एक देवता कौन है ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'वह मन ही है। मन अनन्त है और विश्वेदेव भी अनन्त हैं, अत उस मनसे यजमान अनन्त लोकको जीत लेता है' ॥ ९ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'आज इस यज्ञमे उद्गाता कितनी स्तोत्रिया ऋचाओंका स्तवन करेगा ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'तीनका ।' [ अश्वल— ] 'वे तीन कौन-सी हैं ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'पुरोनुवाक्या, याज्या और तीसरी शस्या ।' [ अश्वल—] 'इनमें जो शरीरान्तर्वर्ती है, वे कौन-सी हैं ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'प्राण ही पुरोनुवाक्या है, अपान याज्या है और व्यान शस्या है।' [अश्वल—] 'इनसे यजमान किनपर जय प्राप्त करता है?' [याज्ञवल्क्य—] 'पुरोनुवाक्यासे पृथिवीलोकपर ही जय प्राप्त करता है, तथा याज्यासे अन्तरिक्ष- लोकपर और शस्यासे द्युलोकपर विजय प्राप्त करता है।' इसके पश्चात् होता अश्वल चुप हो गया ॥ १० ॥
द्वितीय ब्राह्मण याज्ञवल्क्य और आर्तभागका संवाद फिर उस (याज्ञवल्क्य) से जारत्कारव आर्तभागने पूछा, वह बोला, 'याज्ञवल्क्य ! ग्रह कितने हैं और अतिग्रह कितने हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] 'आठ ग्रह हैं और आठ अतिग्रह हैं।' [ आर्तभाग—] 'वे जो आठ ग्रह और आठ अतिग्रह हैं, वे कौन-से हैं ?' ॥ १ ॥ प्राण ही ग्रह है, वह अपानरूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणी अपानसे ही गन्धोंको सूँघता है। वाक् ही ग्रह है, वह नामरूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणी वाक्से ही नामोका उच्चारण करता है। जिह्वा ही ग्रह है, वह रसरूप अतिग्रहमे गृहीत है, क्योंकि प्राणी जिह्वासे ही रसोंको विशेष- रूपसे जानता है। चक्षु ही ग्रह है, वह रूप-रूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणी चक्षुसे ही रूपोंको देखता है। श्रोत्र ही ग्रह है, वह शब्दरूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योकि प्राणी श्रोत्रसे ही शब्दोंको सुनता है। मन ही ग्रह है, वह कामरूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणी मनसे ही कामोंकी कामना करता है। हस्त ही ग्रह है, वे कर्मरूप अतिग्रहसे गृहीत हैं क्योंकि प्राणी हस्तसे ही कर्म करता है। त्वचा ही ग्रह है, वह स्पर्शरूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणी त्वचासे ही स्पर्शोको जानता है। इस प्रकार ये आठ ग्रह हैं और आठ अतिग्रह हैं ॥ २-९ ॥' 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा, 'यह जो कुछ है सब मृत्युका खाद्य है, सो वह देवता कौन है, जिसका खाद्य मृत्यु है ?' [इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—] 'अग्नि ही मृत्यु है, वह जलका खाद्य है। [ इस प्रकारके जानसे ] पुनर्मृत्युका पराजय होता है' ॥ १० ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा, 'जिस समय यह मनुष्य मरता है, उस समय इसके प्राणोंका उत्क्रमण होता है या नहीं ?' 'नहीं, नहीं' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'वे यहाँ ही लीन हो जाते हैं। वह फूल जाता है अर्थात् वायुको भीतर खींचता है और वायुसे पूर्ण हुआ ही मृत होकर पड़ा रहता है' ॥ ११ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा, 'जिस समय यह पुरुष मरता है, उस समय इसे क्या नहीं छोड़ता ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'नाम नहीं छोड़ता, नाम अनन्त ही हैं, विश्वेदेव भी अनन्त ही हैं, इस आनन्त्यदर्शनके द्वारा वह अनन्त लोकको ही जीत लेता है' ॥ १२ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा, 'जिस समय इस मृतपुरुषकी वाणी अग्निमें लीन हो जाती है तथा प्राण वायुमें, चक्षु आदित्यमे, मन चन्द्रमामें, श्रोत्र दिशामे, शरीर पृथिवीमे, हृदयाकाश भूताकाशमें, रोम ओषधियोंमें और केश वनस्पतियोंमें लीन हो जाते हैं तथा रक्त और वीर्य जलमें स्थापित हो जाते हैं, उस समय यह पुरुष कहाँ रहता है ?' [याज्ञवल्क्य—] 'प्रियदर्शन आर्तभाग ! तू मुझे अपना हाथ पकड़ा, हम दोनों ही इस प्रश्नका उत्तर जानेंगे, यह प्रश्न जनसमुदायमे होने योग्य नहीं है।' तब उन दोनोंने उठकर [ एकान्तमें ] विचार किया । उन्होंने जो कुछ कहा, वह कर्म ही कहा, तथा जिसकी प्रशंसा की, वह कर्मकी ही प्रशंसा की। वह यह कि पुरुष पुण्यकर्मसे पुण्यवान् होता है और पापकर्मसे पापी होता है। इसके पीछे जारत्कारव आर्तभाग चुप हो गया ॥ १३ ॥
४७८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३
४७८ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ३ तृतीय ब्राह्मण याज्ञवल्क्य और लाह्यायनि भुज्युका संवाद फिर इस याज्ञवल्क्यसे लाह्यायनि भुज्युने पूछा, वह [ याज्ञवल्क्य--] 'यह लोक बत्तीस देवरथाह्न्य* है। उसे बोला; 'याज्ञवल्क्य ! हम व्रताचरण करते हुए मद्रदेशमें विचर चारों ओरसे दूनी पृथिवी घेरे हुए है। उस पृथिवीको सब रहे थे कि कपिगोत्रोत्पन्न पतञ्चलके घर पहुंचे। उसकी पुत्री ओरसे दूना समुद्र घेरे हुए है। सो जितनी पतली छुरेकी धार गन्धर्वसे गृहीत थी। (अर्थात् उसपर गन्धर्वका आवेश होती है, अथवा जितना सूक्ष्म मक्खीका पख होता है, उतना था ) हमने उससे पूछा, 'तू कौन है ?' वह बोला, 'आङ्गिरस उन अण्डकपालोंके मध्यमें आकाश है। इन्द्र (चित्य अग्नि ) सुधन्वा हूँ।' जब उससे लोकोंके अन्तके विषयमें पूछा तो ने पक्षी होकर उन पारिक्षितोंको वायुको दिया। उन्हें वायु हमने उससे यो कहा, 'पारिक्षित कहाँ रहे ? पारिक्षित कहाँ अपने स्वरूपमें स्थापितकर वहाँ ले गया, जहाँ अश्वमेधयाजी रहे ? सो हम तुमसे पूछते हैं कि 'पारिक्षित कहाँ रहे ?' ॥१॥ रहते हैं; इस प्रकार उस गन्धर्वने वायुकी ही प्रशंसा की थी। उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'उस गन्धर्वने निश्चय यह कहा अतः वायु ही व्यष्टि है और वायु ही समष्टि है। जो ऐसा था कि वे वहाँ चले गये, जहाँ अश्वमेध यज्ञ करनेवाले जाते जानता है, वह पुनर्मृत्युको जीत लेता है।' तब लाह्यायनि हैं। [भुज्यु--] 'अच्छा तो, अश्वमेधयाजी कहो जाते हैं ?' भुज्यु चुप हो गया ॥ २ ॥ चतुर्थ ब्राह्मण याज्ञवल्क्य और चाक्रायण उपस्तका संवाद फिर उस याज्ञवल्क्यसे चाक्रायण उपस्तने पूछा; वह और दौड़ना दिखाकर ] कहे कि यह (चलनेवाला) बैल बोला, 'याज्ञवल्क्य ! जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म और सर्वान्तर है, यह (दौड़नेवाला) घोड़ा है, उसी प्रकार तुम्हारा यह आत्मा है, उसकी मेरे प्रति व्याख्या करो।' [ याज्ञवल्क्य--] कथन है; अतः जो भी साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म और सर्वान्तर 'यह तेरा आत्मा ही सर्वान्तर है।' [ उपस्त-] 'याज्ञवल्क्य ! आत्मा है, उसे तुम स्पष्टतया बतलाओ।' [ याज्ञवल्क्य--] वह सर्वान्तर कौन-सा है ?' [ याज्ञवल्क्य--] 'जो प्राणसे 'यह तेरा आत्मा सर्वान्तर है।' [उपस्त-] 'हे याज्ञवल्क्य ! प्राणक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है; जो अपानसे वह सर्वान्तर कौन सा है ?' [ याज्ञवल्क्य--] 'तुम दृष्टिके अपान क्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है, जो द्रष्टाको नहीं देख सकते, श्रुतिके श्रोताको नहीं सुन सकते, व्यानसे व्यानक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है, मतिके मन्ताका मनन नहीं कर सकते, विज्ञातिके विज्ञाताको जो उदानसे उदानक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर नहीं जान सकते । तुम्हारा यह आत्मा सर्वान्तर है, इससे है। यह तेरा आत्मा सर्वान्तर है' ॥ १ ॥ भिन्न आर्त (नाशवान् ) है।' इसके पश्चात् चाक्रायण उपस्त उस चाक्रायण उपस्तने कहा, 'जिस प्रकार कोई [चलना चुप हो गया ॥ २ ॥ पञ्चम ब्राह्मण याज्ञवल्क्य और कहोलका संवाद; ब्रह्म और आत्माकी व्याख्या फिर उस याज्ञवल्क्यसे कौषीतकेय कहोलने पूछा; उसने पिपासा, शोक, मोह, जरा और मृत्युसे परे है, उस पूर्वोक्त 'याज्ञवल्क्य !' इस प्रकार सम्बोधित करके कहा--'जो भी आत्माको ही जानकर ब्राह्मण पुत्रैषणा, वित्तैषणा और साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म और सर्वान्तर आत्मा है, उसकी तुम लोकैषणासे अलग हटकर भिक्षाचर्यासे विचरते हैं। जो भी मेरे प्रति व्याख्या करो।' [यह सुनकर याज्ञवल्क्यने कहा-] पुत्रैषणा है, वही वित्तैषणा है और जो वित्तैषणा है, वही 'यह तुम्हारा आत्मा सर्वान्तर है।' [ कहोल--] 'याज्ञवल्क्य ! लोकैषणा है। ये दोनों ही [साध्य-साधनेच्छाएँ] एषणाएँ वह सर्वान्तर कौन-सा है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'जो क्षुधा, ही हे। अतः ब्राह्मण पाण्डित्य (आत्मज्ञान) का पूर्णतया सम्पादन करके आत्मज्ञानरूप बलसे स्थित रहनेकी इच्छा करे।
- सूर्यके रथकी गतिने एक दिनमें ससारका जितना भाग नापा जाय उसे 'देवरथाह्न्य' कहते हैं।
ब्राह्मण ७ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४७९
ब्राह्मण ७ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४७९ फिर बाल्य और पाण्डित्यको पूर्णतया प्राप्तकर वह मुनि होता | जिस प्रकार भी हो, ऐसा ही ब्राह्मण होता है, इससे भिन्न और है तथा अमौन और मौनका पूर्णतया सम्पादन करके ब्राह्मण | सब आर्त ( नाशवान् ) है ।' तब कौषीतकेय कहोल चुप ( कृतकृत्य ) होता है। वह किस प्रकार ब्राह्मण होता है ? | हो गया ॥ १ ॥
षष्ठ ब्राह्मण याज्ञवल्क्य और गार्गीका संवाद
फिर इस याज्ञवल्क्यसे वचक्नुकी पुत्री गार्गीने पूछा, | 'हे गार्गि ! नक्षत्रलोकोंमें ।' [गार्गी—] 'नक्षत्रलोक किसमें वह बोली, 'याज्ञवल्क्य ! यह जो कुछ है, सब जलमे ओतप्रोत | ओतप्रोत हैं ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'हे गार्गि ! देवलोकोंमे ।' है, किंतु वह जल किसमे ओतप्रोत है ?' [ याज्ञवल्क्य—] | [गार्गी—] 'देवलोक किसमें ओतप्रोत है ?' [याज्ञवल्क्य—] 'हे गार्गि ! वायुमे ।' [ गार्गी—] 'वायु किसमें ओतप्रोत | 'हे गार्गि ! इन्द्रलोकोंमें ।' [ गार्गी—] 'इन्द्रलोक किसमें है ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'हे गार्गि ! अन्तरिक्षलोकोंमे ।' | ओतप्रोत है ?' [याज्ञवल्क्य—] 'हे गार्गि ! प्रजापतिलोकोंमे ।' [ गार्गी— ] 'अन्तरिक्षलोक किसमें ओतप्रोत है ?' | [गार्गी—] 'प्रजापतिलोक किसमे ओतप्रोत हैं ?' [याज्ञवल्क्य—] [ याज्ञवल्क्य—] 'हे गार्गि ! गन्धर्वलोकोंमें ।' [ गार्गी—] | 'हे गार्गि ! ब्रह्मलोकोंमें ।' [गार्गी—] 'ब्रह्मलोक किसमें 'गन्धर्वलोक किसमें ओतप्रोत है ?' [याज्ञवल्क्य—] 'हे गार्गि ! | ओतप्रोत है ?' इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—'हे गार्गि ! अतिप्रश्न आदित्यलोकोंमें ।' [ गार्गी—] 'आदित्यलोक किसमे ओत- | मत कर । तेरा मस्तक न गिर जाय ! तू, जिसके विषयमे प्रोत ह ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'हे गार्गि ! चन्द्रलोकोंमें ।' | अतिप्रश्न नहीं करना चाहिये, उस देवताके विषयमें अतिप्रश्न [गार्गी—] 'चन्द्रलोक किसमे ओतप्रोत हैं ?' [याज्ञवल्क्य—] | कर रही है। हे गार्गि ! तू अतिप्रश्न न कर ।' तब वचक्नुकी पुत्री गार्गी उपरत हो गयी ॥ १ ॥
सप्तम ब्राह्मण याज्ञवल्क्य तथा आरुणि उद्दालकका संवाद, आत्माके स्वरूपका वर्णन
फिर इस याज्ञवल्क्यसे आरुणि उद्दालकने पूछा, वह | उन (काप्य आदि) से सूत्र और अन्तर्यामीको बताया । बोला, 'याज्ञवल्क्य ! हम मद्रदेशमें यज्ञशास्त्रका अध्ययन करते | उसे मैं जानता हूँ । हे याज्ञवल्क्य ! यदि उस सूत्र और हुए कपिगोत्रोत्पन्न पतञ्चलके घर रहते थे । उसकी भार्या | अन्तर्यामीको न जाननेवाले होकर ब्रह्मवेत्ताकी स्वभूत गौओंको गन्धर्वद्वारा गृहीत थी । हमने उस (गन्धर्व) से पूछा, 'तू | ले जाओगे तो तुम्हारा मस्तक गिर जायगा ।' [याज्ञवल्क्य—] कौन है ?' उसने कहा, 'मैं आथर्वण कबन्ध हूँ ।' उसने | 'हे गौतम ! मैं उस सूत्र और अन्तर्यामीको जानता हूँ ।' कपिगोत्रीय पतञ्चल और उसके याज्ञिकोंसे पूछा, 'काप्य ! | [उद्दालक—] 'ऐसा तो जो कोई भी कह सकता है—'मैं क्या तुम उस सूत्रको जानते हो, जिसके द्वारा यह लोक, | जानता हूँ, मैं जानता हूँ' [किंतु यों व्यर्थ ढोल पीटनेसे क्या परलोक और सारे भूत ग्रथित हैं ?' तब उस काप्य पतञ्चलने | लाभ ? यदि वास्तवमें तुम्हें उसका ज्ञान है तो] जिस प्रकार कहा, 'भगवन् ! मैं उसे नहीं जानता ।' उसने पतञ्चल काप्य | तुम जानते हो वह कहो' ॥ १ ॥ और याज्ञिकोंसे कहा, 'काप्य ! क्या तुम उस अन्तर्यामीको | उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'गौतम ! वायु ही वह सूत्र है, जानते हो जो इस लोक, परलोक और समस्त भूतोंको | गौतम ! वायुरूप सूत्रके द्वारा ही यह लोक, परलोक और भीतरसे नियमित करता है ?' उस पतञ्चल काप्यने कहा, | समस्त भूतसमुदाय गुथे हुए हैं। हे गौतम ! इसीसे मरे हुए 'भगवन् ! मै उसे नहीं जानता ।' उसने पतञ्चल काप्य और | पुरुषको ऐसा कहते हैं कि इसके अग विक्षस्त (विशीर्ण) याज्ञिकोंसे कहा, 'काप्य ! जो कोई उस सूत्र और उस | हो गये हैं, क्योंकि हे गौतम ! वे वायुरूप सूत्रसे ही सग्रथित अन्तर्यामीको जानता है, वह ब्रह्मवेत्ता है, वह लोकवेत्ता है, | होते हैं ।' [आरुणि—] 'हे याज्ञवल्क्य ! ठीक है, यह तो वह देववेत्ता है, वह वेदवेत्ता है, वह भूतवेत्ता है, वह आत्म- | ऐसा ही है, अब तुम अन्तर्यामीका वर्णन करो' ॥ २ ॥ वेत्ता है और वह सर्ववेत्ता है ।' तथा इसके पश्चात् गन्धर्वने | जो पृथिवीमें रहनेवाला पृथिवीके भीतर है, जिसे पृथिवी
४८० * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ३ नहीं जानती जिसका पृथिवी शरीर है और जो भीतर रहकर पृथिवीका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो जलमें रहनेवाला जलके भीतर है, जिसे जल नहीं जानता, जल जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर जलका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो अग्निमे रहनेवाला अग्निके भीतर है, जिसे अग्नि नहीं जानता, अग्नि जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर अग्निका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो अन्तरिक्षमें रहनेवाला अन्तरिक्षके भीतर है, जिसे अन्तरिक्ष नहीं जानता, अन्तरिक्ष जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर अन्तरिक्षका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो वायुमें रहनेवाला वायुके भीतर है, जिसे वायु नहीं जानता, वायु जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर वायुका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो द्युलोकमें रहनेवाला द्युलोकके भीतर है, जिसे द्युलोक नहीं जानता, द्युलोक जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर द्युलोकका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो आदित्यमें रहनेवाला आदित्यके भीतर है, जिसे आदित्य नहीं जानता, आदित्य जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर आदित्यका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो दिशाओमें रहनेवाला दिशाओंके भीतर है, जिसे दिशाएँ नहीं जानतीं, दिशाएँ जिसका शरीर हैं और जो भीतर रहकर दिशाओंका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो चन्द्रमा और ताराओंमें रहनेवाला चन्द्रमा और ताराओंके भीतर है, जिसे चन्द्रमा और ताराएँ नहीं जानतीं, चन्द्रमा और ताराएँ जिसका शरीर हैं और जो भीतर रहकर चन्द्रमा और ताराओंका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो आकाशमें रहनेवाला आकाशके भीतर है, जिसे आकाश नहीं जानता आकाश जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर आकाशका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो तममें रहनेवाला तमके भीतर है, जिसे तम नहीं जानता, तम जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर तमका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो तेजमे रहनेवाला तेजके भीतर है, जिसे तेज नहीं जानता, तेज जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर तेजका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। यह अधिदैवत-दर्शन हुआ, आगे अधिभूत-दर्शन है ॥ ३-१४ ॥ जो समस्त भूतोमे स्थित रहनेवाला समस्त भूतोके भीतर है, जिसे समस्त भूत नहीं जानते, समस्त भूत जिसके शरीर हैं और जो भीतर रहकर समस्त भूतोका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। यह अधिभूतदर्शन है, अब अध्यात्मदर्शन कहा जाता है। जो प्राणमें रहनेवाला प्राणके भीतर है, जिसे प्राण नहीं जानता, प्राण जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर प्राणका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो वाणीमें रहनेवाला वाणीके भीतर है, जिसे वाणी नहीं जानती, वाणी जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर वाणीका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो नेत्रमें रहने- वाला नेत्रके भीतर है, जिसे नेत्र नहीं जानता, नेत्र जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर नेत्रका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो श्रोत्रमे रहने- वाला श्रोत्रके भीतर है, जिसे श्रोत्र नहीं जानता, श्रोत्र जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर श्रोत्रका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो मनमें रहनेवाला मनके भीतर है, जिसे मन नहीं जानता, मन जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर मनका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो त्वक्में रहनेवाला त्वक्के भीतर है, जिसे त्वक् नहीं जानती, त्वक् जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर त्वक्का नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो विज्ञान- मे रहनेवाला विज्ञानके भीतर है, जिसे विज्ञान नही जानता, विज्ञान जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर विज्ञानका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो वीर्यमे रहनेवाला वीर्यके भीतर है, जिसे वीर्य नहीं जानता, वीर्य जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर वीर्यका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। वह दिखायी न देनेवाला किंतु देखनेवाला है, सुनायी न देनेवाला किंतु सुननेवाला है, मननका विषय न होनेवाला किंतु मनन करनेवाला है और विशेषतया ज्ञात न होनेवाला किंतु विशेष- रूपसे जाननेवाला है, यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। इससे भिन्न सब नाशवान् है। इसके पश्चात् अरुणका पुत्र उद्दालक प्रश्न करनेसे निवृत्त हो गया ॥ १५-२३ ॥
अष्टम ब्राह्मण
ब्राह्मण ८ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४८१ अष्टम ब्राह्मण याज्ञवल्क्य-गार्गीका संवाद, अक्षरके नामसे आत्मस्वरूपका वर्णन [बायाँ स्तम्भ] फिर वाचक्नवीने कहा, 'पूजनीय ब्राह्मणगण ! अब मै इनमे दो प्रश्न पूछूँगी । यदि ये मेरे उन प्रश्नोंका उत्तर दे देंगे तो फिर आपमेंसे कोई भी इन्हें ब्रह्मसम्बन्धी वादमे नहीं जीत सकेगा ।' [ ब्राह्मण—] 'अच्छा गार्गि ! पूछ' ॥ १ ॥ वह बोली, 'याज्ञवल्क्य ! जिस प्रकार काशी या विदेह- का रहनेवाला कोई वीर-वशज पुरुष प्रत्यञ्चाहीन धनुषपर प्रत्यञ्चा चढाकर शत्रुओंको अत्यन्त पीडा देनेवाले दो फलवाले शर हाथमें लेकर खड़ा होता है, उसी प्रकार मैं दो प्रश्न लेकर तुम्हारे सामने उपस्थित होती हूँ, तुम मुझे उनका उत्तर दो ।' इसपर याज्ञवल्क्यने कहा, 'गार्गि ! पूछ' ॥ २ ॥ वह बोली, 'याज्ञवल्क्य ! जो द्युलोकसे ऊपर है, जो पृथिवीके नीचे है और जो द्युलोक और पृथिवीके मध्यमे है और स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं तथा जिन्हें भूत, वर्तमान और भविष्य—इस प्रकार कहते हैं, वे किसमें ओतप्रोत हैं ?' ॥ ३ ॥ उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'गार्गि ! जो द्युलोकसे ऊपर, पृथिवीसे नीचे और जो द्युलोक एव पृथिवीके मध्यमे है और स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं तथा जिन्हें भूत, वर्तमान एव भविष्य—इस प्रकार कहते हैं, वे सब आकाशमें ओतप्रोत हैं' ॥ ४ ॥ वह बोली, 'याज्ञवल्क्य ! आपको नमस्कार है, जिन्होंने मुझे इस प्रश्नका उत्तर दे दिया; अब आप दूसरे प्रश्नके लिये तैयार हो जाइये ।' [ याज्ञवल्क्य—] 'गार्गि ! पूछ' ॥ ५ ॥ वह बोली, 'याज्ञवल्क्य ! जो द्युलोकसे ऊपर है, जो पृथिवीसे नीचे है और जो द्युलोक और पृथिवीके मध्यमे है और स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं तथा जिन्हें भूत, वर्तमान और भविष्य—इस प्रकार कहते हैं, वे किसमें ओतप्रोत हैं ?' ॥ ६ ॥ उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'गार्गि ! जो द्युलोकसे ऊपर, पृथिवीसे नीचे और जो द्युलोक एव पृथिवीके मध्यमें है तथा स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं और जिन्हें भूत, वर्तमान और भविष्य—इस प्रकार कहते हैं, वे सब आकाशमे ही ओतप्रोत हैं।' [ गार्गी—] 'किंतु आकाश किसमें ओतप्रोत है ?' ॥ ७ ॥ [दायाँ स्तम्भ] उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'गार्गि ! उस इस तत्त्वको तो ब्रह्मवेत्ता अक्षर कहते हैं, वह न मोटा है, न पतला है, न छोटा है, न बड़ा है, न लाल है, न द्रव है, न छाया है, न तम (अन्धकार ) है, न वायु है, न आकाश है, न सगवान् है, न रस है, न गन्ध है, न नेत्र है, न कान है, न वाणी है, न मन है, न तेज है, न प्राण है, न मुख है, न माप है, उसमे न भीतर है, न बाहर है; वह कुछ भी नहीं खाता, उसे कोई भी नहीं खाता' ॥ ८ ॥ 'गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमे सूर्य और चन्द्रमा विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित रहते हैं । हे गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमें द्युलोक और पृथिवी विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित रहते हैं । हे गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमे निमेष, मुहूर्त, दिन-रात, अर्धमास (पक्ष ), मास, ऋतु और संवत्सर विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित रहते हैं। हे गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमे पूर्ववाहिनी एव अन्य नदियाँ श्वेत पर्वतोंसे बहती हैं तथा अन्य पश्चिमवाहिनी नदियाँ जिस-जिस दिशाको बहने लगती हैं, उसीका अनुसरण करती रहती हैं । हे गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमे मनुष्य दाताकी प्रशंसा करते हैं तथा देवगण यजमानका और पितृगण दर्वीहोमका अनुवर्तन करते हैं। गार्गि ! जो कोई इस लोकमे इस अक्षरको न जानकर हवन करता, यज्ञ करता और अनेकों सहस्र वर्षपर्यन्त तप करता है, उसका वह सब कर्म अन्तवाला ही होता है । जो कोई भी इस अक्षरको बिना जाने इस लोकसे मरकर जाता है, वह कृपण (दीन ) है और हे गार्गि ! जो इस अक्षरको जानकर इस लोकसे मरकर जाता है, वह ब्राह्मण है। हे गार्गि ! यह अक्षर स्वयं दृष्टिका विषय नहीं, किन्तु द्रष्टा है, श्रवणका विषय नहीं, किन्तु श्रोता है, मननका विषय नहीं, किन्तु मन्ता है, स्वयं अविज्ञात रहकर दूसरोंका विज्ञाता है । इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है, इससे भिन्न कोई श्रोता नहीं है, इससे भिन्न कोई मन्ता नहीं है और इससे भिन्न कोई विज्ञाता नहीं है। हे गार्गि ! निश्चय इस अक्षरमे ही आकाश ओत- प्रोत है' ॥ ९–११ ॥ उस गार्गीने कहा, 'पूज्य ब्राह्मणगण ! आपलोग इसीको
४८२ ः बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३
४८२ *ः बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ३ बहुत मानें कि इन याज्ञवल्क्यजीसे आपको नमस्कारद्वारा ही वादमें जीतनेवाला नहीं है।' तदनन्तर वचक्नुकी पुत्री गार्गी छुटकारा मिल जाय । आपमेंसे कोई भी कभी इन्हें ब्रह्मविषयक चुप हो गयी ॥ १२ ॥ नवम ब्राह्मण याज्ञवल्क्य-शाकल्यका संवाद और याज्ञवल्क्यकी विजय इसके पश्चात् इस याज्ञवल्क्यसे शाकल्य विदग्धने पूछा, रुलाते हैं; इसलिये रोदनके कारण होनेसे 'रुद्र' कहलाते है' ॥४॥ 'याज्ञवल्क्य ! कितने देवगण हैं ?' तब याज्ञवल्क्यने इस आगे [ शाकल्य—] 'आदित्य कौन हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] कही जानेवाली निविद्से ही उनकी संख्याका प्रतिपादन 'संवत्सरके अवयवभूत ये बारह मास ही आदित्य हैं; क्योंकि किया । 'वैश्वदेवकी निविद्में अर्थात् देवताओंकी सख्या ये इस सबका आदान (ग्रहण) करते हुए चलते हैं, इसलिये बतानेवाले मन्त्रपदोंमें जितने बतलाये गये हैं, वे तीन और आदित्य हैं' ॥ ५ ॥ तीन सौ तथा तीन और तीन सहस्र (तीन हजार तीन सौ [ शाकल्य—] 'इन्द्र कौन है और प्रजापति कौन है?' छः ) है ।' [ तब शाकल्यने ] 'ठीक है' ऐसा कहा । फिर [ याज्ञवल्क्य—] 'स्तनयित्नु (विद्युत्) ही इन्द्र है और यज्ञ पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं ?' याज्ञवल्क्यने कहा, प्रजापति है ।' [ शाकल्य— ] 'स्तनयित्नु कौन है ?' 'तैंतीस' । [ शाकल्यने ] 'ठीक है' ऐसा कहा और पूछा 'तो, [ याज्ञवल्क्य—] 'वज्र ।' [ शाकल्य—] 'यज्ञ कौन याज्ञवल्क्य ! कितने देव हे ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'छः' । है?' [ याज्ञवल्क्य—] 'पशुगण' ॥ ६ ॥ [शाकल्यने] 'ठीक है' ऐसा कहा और फिर पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! [ शाकल्य—] 'छः देवगण कौन हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] कितने देव हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] 'तीन ।' [ शाकल्यने ] 'अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य और द्युलोक—ये 'ठीक है' ऐसा कहा और पुनः पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने छः देवगण है । ये वसु आदि तैंतीस देवताओंके रूपमें अग्नि देव हं ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'दो।' [ शाकल्यने ] 'ठीक आदि छः ही हैं' ॥ ७ ॥ है' ऐसा कहा और पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं ?' [ शाकल्य—] 'वे तीन देव कौन हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] [ याज्ञवल्क्य—] 'डेढ ।' [ शाकल्यने ] 'ठीक है' ऐसा कहा 'ये तीन लोक ही तीन देव हैं। इन्हींमे ये सब देव अन्तर्भूत और पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं ?' [ याज्ञवल्क्य—] है।' [ शाकल्य—] 'वे दो देव कौन हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] 'एक।' [ शाकल्यने ] 'ठीक है' ऐसा कहा और पूछा 'वे 'अन्न और प्राण ।' [ शाकल्य—] 'डेढ़ देव कौन हैं?' तीन और तीन सौ तथा तीन और तीन सहस्र देव कौन-से [ याज्ञवल्क्य—] 'जो यह बहता है' ॥ ८ ॥ हं ?' ॥ १ ॥ यहाँ ऐसा कहते है—'यह जो वायु है, एकही-सा बहता उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'ये तो इनकी महिमाएँ ही है। है, फिर यह अध्यर्ध—डेढ किस प्रकार है ?' [ उत्तर—] देवगण तो तैंतीस ही हैं।' [ शाकल्य—] 'वे तैंतीस देव 'क्योंकि इसीमें यह सब ऋद्धिको प्राप्त होता है, इसलिये यह कौन-से है ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह अध्यर्ध (डेढ) है।' [ शाकल्य—] 'एक देव कौन है ?' आदित्य—ये इकतीस देवगण है तथा इन्द्र और प्रजापतिके [ याज्ञवल्क्य—] 'प्राण; वह ब्रह्म है, उसीको 'त्यत्' ऐसा सहित तैंतीस है' ॥ २ ॥ कहते हैं' ॥ ९ ॥ [ शाकल्य—] 'वसु कौन हैं?' [याज्ञवल्क्य—] 'अग्नि, [ शाकल्य—] 'पृथिवी ही जिसका आयतन है तथा पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, द्युलोक, चन्द्रमा और अग्नि लोक (दर्शनशक्ति) और मन ज्योति (सकल्प- नक्षत्र—ये वसु हं, इन्हींमें यह सब जगत् निहित है, इसीसे विकल्पका साधन) है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म ये वसु हं' ॥ ३ ॥ कार्य-कारणसमूहका परम आश्रय जानता है, वही ज्ञाता (पण्डित) [ शाकल्य—] 'रुद्र कौन है' [ याज्ञवल्क्य—] 'पुरुषमें है। याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका ये दस प्राण ( इन्द्रियाँ) और ग्यारहवाँ आत्मा (मन) । अभिमान कर रहे हो !']।' [याज्ञवल्क्य—] 'जिसे तुम सम्पूर्ण ये जिस समय इस मरणशील शरीरसे उत्क्रमण करते हैं, उस आध्यात्मिक कार्य-करण-सघातका परम आश्रय बतलाते हो, समय रुलाते हं, अत उत्क्रमणकालमे अपने सम्बन्धियोंको
ब्राह्मण ९ ] ४ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४८३
ब्राह्मण ९ ] ४ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४८३ उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ । यह जो शारीर-पुरुष है, वही यह है। शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—],'अच्छा, उसका देवता कौन है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'अमृत' ऐसा कहा ॥ १० ॥ [ शाकल्य—] 'काम ही जिसका आयतन है, हृदय लोक है और मन ज्योति है, उस पुरुषको जो भी सम्पूर्ण आध्यात्मिक कार्य-करण-समूहका परम आश्रय जानता है, वही ज्ञाता है। याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो ! ] ।' [ याज्ञवल्क्य—] 'जिसे तुम सम्पूर्ण आध्यात्मिक कार्य-करण-सघातका परम आश्रय बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ । जो भी यह काममय पुरुष है, वही यह है । हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—] 'उसका कौन देवता है ?' तब याज्ञवल्क्यने कहा—'स्त्रियाँ' ॥ ११ ॥ [ शाकल्य—] 'रूप ही जिसका आयतन है, चक्षु लोक हैं और मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करण-समूहका परम आश्रय जानता है, वही ज्ञाता है। हे याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो ! ] ।' [याज्ञवल्क्य—] 'तुम जिसे सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करण-समूहका परम आश्रय बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ । जो भी यह आदित्यमे पुरुष है, वही यह है। हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—] 'उसका देवता कौन है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'सत्य' ऐसा कहा ॥ १२ ॥ [ शाकल्य—] 'आकाश ही जिसका आयतन है, श्रोत्र लोक है और मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करण-समूहका परम आश्रय जानता है, वही ज्ञाता है। हे याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो ! ] ।' [ याज्ञवल्क्य—] 'तुम जिसे सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करण-समूहका परम आश्रय कहते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ । जो भी यह श्रोत्रसम्बन्धी प्रातिश्रुत्क पुरुष है, वही यह है; हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—] 'उसका कौन देवता है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'दिशाएँ' ऐसा कहा ॥ १३ ॥ [ शाकल्य—] 'तम ही जिसका आयतन है, हृदय लोक है, मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य- करण-समूहका परम आश्रय जानता है, वही ज्ञाता है, याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो ! ] ।' [ याज्ञवल्क्य—] 'तुम जिसे समस्त आध्यात्मिक कार्य-करण-समूहका परम आश्रय बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ । जो भी यह छायामय पुरुष है, वही यह है । हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—] 'उसका कौन देवता है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'मृत्यु' ऐसा कहा ॥ १४ ॥ [ शाकल्य—] 'रूप ही जिसका आयतन है, नेत्र लोक हैं और मन ज्योति है, उस पुरुषको जो भी सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करण-सघातका परम आश्रय जानता है, वही ज्ञाता है। हे याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो ! ] ।' [याज्ञवल्क्य—] 'तुम जिसे सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य करण-सघातका परम आश्रय बतलाते हो, उस पुरुषको तो म जानता हूँ । जो भी यह आदर्श (दर्पण) के भीतर पुरुष है, वही यह है । हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—] 'उसका देवता कौन है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'असु' ऐसा कहा ॥ १५ ॥ [ शाकल्य—] 'जल ही जिसका आयतन है, हृदय लोक है और मन ज्योति है, उस पुरुषको जो भी सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करण-सघातका परम आश्रय जानता है, वही ज्ञाता है। हे याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही विद्वान् होनेका अभिमान कर रहे हो ! ] ।' [ याज्ञवल्क्य—] 'जिसे तुम सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करण-समूहका परम आश्रय बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ । जो भी यह जलमे पुरुष है, वही यह है। हे शाकल्य ! और बोलो।' [शाकल्य—] 'उसका कौन देवता है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'वरुण' ऐसा कहा ॥ १६ ॥ [ शाकल्य—] 'वीर्य ही जिसका आयतन है, हृदय लोक है और मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करण सघातका परम आश्रय जानता है, वही ज्ञाता है। हे याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही विद्वान् होनेका अभिमान कर रहे हो ! ]' [याज्ञवल्क्य—] 'जिसे तुम सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करण-सघातका परम आश्रय बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ । जो भी यह पुत्ररूप पुरुष है, वही यह है । हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—] 'उसका कौन देवता है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'प्रजापति' ऐसा कहा ॥ १७ ॥ 'शाकल्य !' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'इन ब्राह्मणोंने निश्चय ही तुम्हें अगारे निकालनेका चिमटा बना रक्खा है' ॥ १८ ॥ 'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा शाकल्यने कहा, 'यह जो तुम इन कुरुपाञ्चालदेशीय ब्राह्मणोंपर आक्षेप करते हो सो क्या तुम ब्रह्मवेत्ता हो—ऐसा समझकर करते हो ?' [ याज्ञवल्क्य— मेरा ब्रह्मज्ञान यह है कि ] 'मैं देवता और प्रतिष्ठाके सहित
४८४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३
४८४ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ३
दिशाओ का ज्ञान रखता हूँ।' [ शाकल्य-] 'यदि तुम देवता और प्रतिष्ठाके सहित दिशाओंको जानते हो [ तो बताओ ] उस पूर्वदिशामे तुम किस देवतासे युक्त हो ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'वहाँ मै आदित्य (सूर्य) देवतावाला हूँ।' [शाकल्य-] 'वह आदित्य किसमे प्रतिष्ठित है?' [याज्ञवल्क्य-] 'नेत्रमे ।' [ शाकल्य-] 'नेत्र किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य--] 'रूपोंमे, क्योंकि पुरुष नेत्रसे ही रूपोंको देखता है।' [ शाकल्य-] 'रूप किसमे प्रतिष्ठित है ?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'हृदयमे, क्योंकि पुरुष हृदयसे ही रूपोको जानता है, अतः हृदयमे ही रूप प्रतिष्ठित है।' [शाकल्य-] 'हे याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ १९-२० ॥
'इस दक्षिण दिशामे तुम कौन-से देवतावाले हो ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'यमदेवतावाला हूँ।' [शाकल्य-] 'वह यमदेवता किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'यज्ञमें।' [ शाकल्य-] 'यज्ञ किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'दक्षिणामे ।' [ शाकल्य-] 'दक्षिणा किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'श्रद्धामे, क्योंकि जब पुरुष श्रद्धा करता है, तभी दक्षिणा देता है, अतः श्रद्धामे ही दक्षिणा प्रतिष्ठित है।' [ शाकल्य-] 'श्रद्धा किसमें प्रतिष्ठित है ?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'हृदयमे, क्योकि हृदयमे ही पुरुष श्रद्धाको जानता है, अत हृदयमे ही श्रद्धा प्रतिष्ठित है।' [ शाकल्य-] 'याज्ञवल्क्य । यह बात ऐसी ही है' ॥ २१ ॥
'इस पश्चिम दिशामे तुम कौन-से देवतावाले हो ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'वरुणदेवतावाला हूँ।' [ शाकल्य-] 'वह वरुण किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'जलमें ।' [ शाकल्य-] 'जल किसमें प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'वीर्यमे । [ शाकल्य-] 'वीर्य किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'हृदयमे, इसीसे पिताके अनुरूप उत्पन्न हुए पुत्रको लोग कहते है कि यह मानो पिताके हृदयसे ही निकला है, मानो पिताके हृदयसे ही बना हे, क्योकि हृदयमें ही वीर्य स्थित रहता है।' [ शाकल्य-] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २२ ॥
'उस उत्तर दिशामे तुम किस देवतावाले हो ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'सोमदेवतावाला हूँ ।' [ शाकल्य-] 'वह सोम किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'दीक्षा मे ।' [ शाकल्य-] 'दीक्षा किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'सत्यमे, क्योकिदीक्षित पुरुषमे कहते हैं कि सत्य बोलो, क्योंकि सत्यमें ही दीक्षा प्रतिष्ठित है।' [ शाकल्य-] 'सत्य किसमें प्रतिष्ठित है ?' 'हृदयमे ।' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। 'क्योंकि पुरुष हृदयसे ही सत्यको जानता है, अतः हृदयमें ही सत्य प्रतिष्ठित है।' [शाकल्य-] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २३ ॥
'इस ध्रुवा दिशामे तुम कौन देवतावाले हो ?' [याज्ञवल्क्य-] 'अग्निदेवतावाला हूँ ।' [ शाकल्य-] 'वह अग्नि किसमें प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'वाकमें ।' [ शाकल्य-] 'वाक् किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'हृदयमें ।' [ शाकल्य-] 'हृदय किसमें प्रतिष्ठित है ?' ॥ २४ ॥
याज्ञवल्क्यने 'अहल्लिक ! (प्रेत !) ऐसा सम्बोधन करके कहा-'जिस समय तुम इसे हमसे अलग मानते हो, उस समय यदि यह (हृदय-आत्मा) हमसे अलग हो जाय तो इस शरीरको कुत्ते खा जायँ अथवा इसे पक्षी चोंच मारकर मथ डालें' ॥ २५ ॥
'तुम (शरीर) और आत्मा (हृदय) किसमें प्रतिष्ठित हो ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'प्राणमे ।' [ शाकल्य-] 'प्राण किसमें प्रतिष्ठित है ?' 'अपानमें ।' 'अपान किसमें प्रतिष्ठित है ?' 'व्यानमें ।' 'व्यान किसमें प्रतिष्ठित है ?' 'उदानमें ।' 'उदान किसमे प्रतिष्ठित है ?' 'समानमें।' 'जिसका [मधुकाण्डमें] 'नेति-नेति' ऐसा कहकर निरूपण किया गया है, वह आत्मा अगृह्य है-वह ग्रहण नहीं किया जा सकता, अशीर्य है-वह शीर्ण (नष्ट) नहीं होता, असङ्ग है-वह सक्त नहीं होता, असित है-वह व्यथित और हिंसित नहीं होता। ये आठ (पृथिवी आदि) आयतन हैं, आठ (अग्नि आदि) लोक हैं, आठ (अमृतादि) देव हैं और आठ (शारीरादि) पुरुष हैं। वह जो उन पुरुषोंको निश्चयपूर्वक जानकर उनका अपने हृदयमे उपसहार करके औपाधिक धर्मोका अतिक्रमण किये हुए है, उस औपनिषद पुरुषको मै पूछता हूँ, यदि तुम मुझे उसे स्पष्टतया न बतला सकोगे तो तुम्हारा मस्तक गिर जायगा।' याज्ञवल्क्यने यो कहा, किंतु शाकल्य उसे नहीं जानता था, इसलिये बता नहीं सका एव उसका मस्तक गिर गया। यही नहीं, अपितु चोरलोग उसकी हड्डियोंको कुछ और समझकर चुरा ले गये ॥ २६ ॥
फिर याज्ञवल्क्यने कहा, 'पूजनीय ब्राह्मणगण ! आपमेंसे जिसकी इच्छा हो, वह मुझसे प्रश्न करे। अथवा आप सभी मुझसे प्रश्न करें। इसी प्रकार आपमेंसे जिसकी इच्छा हो, उससे मैं प्रश्न करता हूँ या आप सभीसे मै प्रश्न करता हूँ।' किंतु उन ब्राह्मणोंका साहस न हुआ ॥ २७ ॥
' ब्राह्मण ९] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४८५
' ब्राह्मण ९] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४८५
याज्ञवल्क्यने उनसे इन श्लोकोंद्वारा प्रश्न किया—वनस्पति (विशालता आदि गुणोंसे युक्त) वृक्ष जैसा (जिन धर्मोंसे युक्त) होता है, पुरुष (जीवका शरीर) भी वैसा ही (उन्हीं धर्मोंसे सम्पन्न) होता है—यह बिल्कुल सत्य है। वृक्षके पत्ते होते हैं और पुरुषके शरीरमें पत्तोंकी जगह रोम होते हैं; पुरुषके शरीरमे जो त्वचा (चाम) है, उसकी समतामें इस वृक्षके बाहरी भागमे छाल होती है। पुरुषकी त्वचासे ही रक्त निकलता है और वृक्षकी भी त्वचा (छाल) से ही गोंद निकलता है। वृक्ष और पुरुषकी इस समानताके कारण ही जिस प्रकार आघात लगनेपर वृक्षमे रस निकलता है, उसी प्रकार चोट खाये हुए पुरुष शरीरसे रक्त प्रवाहित होता है। पुरुषके शरीरमे मास होते हैं और वनस्पतिके शकर (छालका भीतरी अग), पुरुषके स्नायु (शिरा) होते हैं और वृक्षमें किनाट (शकरके भी भीतरका अगविशेष)। वह किनाट स्नायुकी ही भाँति स्थिर होता है। पुरुषके स्नायु जालके भीतर जैसे हड्डियाँ होती हैं, वैसे ही वृक्षमें किनाटके भीतर काष्ठ है तथा मज्जा तो दोनोंमें मज्जाके ही समान निश्चित की गयी है। किंतु यदि वृक्षको काट दिया जाता है तो वह अपने मूलसे पुन. और भी नवीन होकर अङ्कुरित हो आता है, इसी प्रकार यदि मनुष्यको मृत्यु काट डाले तो वह (वृक्षकी भाँति) किस मूलसे उत्पन्न होगा ?। वह वीर्यसे उत्पन्न होता है—ऐसा तो मत कहो, क्योंकि वीर्य तो जीवित पुरुषसे ही उत्पन्न होता है [मृत पुरुषसे नहीं]। वृक्ष भी [केवल तनेसे ही नहीं उत्पन्न होता, ] बीजसे भी उत्पन्न होता है; किंतु बीजसे उत्पन्न होनेवाला वृक्ष भी कट जानेके पश्चात् पुन: अङ्कुरित होकर उत्पन्न होता है, यह प्रत्यक्ष देखा गया है। पर यदि वृक्षको जड़सहित उखाड़ दिया जाय तो वह फिर उत्पन्न नहीं होगा, इसी प्रकार यदि मनुष्यका मृत्यु छेदन कर दे तो वह किस मूलसे उत्पन्न होता है ?। [यदि ऐसा माना जाय कि ] पुरुष तो उत्पन्न हो ही गया है, अतः फिर उत्पन्न नहीं होता [तो यह ठीक नहीं, क्योकि वह मरकर पुन. उत्पन्न होता ही है ] ऐसी दशामें मृत्युके पश्चात् इसे पुन. कोन उत्पन्न करेगा ? [यह प्रश्न है, ब्राह्मणोंने इसका कोई उत्तर नहीं दिया, इसलिये श्रुति स्वय ही उसका निर्देश करती है—] विज्ञान आनन्द ब्रह्म है, वह धनदाता (कर्म करनेवाले यजमान) की परम गति है और ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मवेत्ताका भी परम आश्रय है॥ १-७ ॥॥ २८ ॥
॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥
चतुर्थ अध्याय
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ॐ चतुर्थ अध्याय प्रथम ब्राह्मण जनक-याज्ञवल्क्य संवाद
[बायाँ स्तम्भ]
विदेह जनक आसनपर स्थित था। तभी उसके पास याज्ञवल्क्यजी आये। उनसे [जनकने] कहा, 'याज्ञवल्क्यजी ! कैसे पधारे ? पशुओंकी इच्छासे, अथवा सूक्ष्मान्त [प्रश्न श्रवण करने] के लिये ?' 'राजन् ! मैं दोनोंके लिये आया हूँ' ऐसा [ याज्ञवल्क्यने ] कहा ॥ १ ॥
[ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो कहा है, वह हम सुनें।' [जनक-] 'मुझसे शिलिनके पुत्र जित्वाने कहा है कि वाक् ही ब्रह्म है।' [याज्ञवल्क्य-] "जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस शिलिनके पुत्रने 'वाक् ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि न बोलनेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? किन्तु क्या उसने उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?" [ जनक-] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'राजन् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! वह मुझे आप बतलाइये।' [याज्ञवल्क्य-] "वाक् ही उसका आयतन है और आकाश प्रतिष्ठा है; उसकी 'प्रज्ञा' इस प्रकार उपासना करे।" [ जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! प्रज्ञता क्या है ?' 'राजन् ! वाक् ही प्रज्ञता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे सम्राट् ! वाक्से ही बन्धुका ज्ञान होता है और राजन् ! ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, अनुव्याख्यान, व्याख्यान, इष्ट, हुत, आशित (भूखेको अन्न खिलानेसे होनेवाले धर्म), पायित (प्यासेको पानी पिलानेसे होनेवाले धर्म), यह लोक, परलोक और समस्त भूत वाक्से ही जाने जाते हैं। हे सम्राट् ! वाक् ही परब्रह्म है। इस प्रकार उपासना करनेवालेको वाक् नहीं त्यागती, सम्पूर्ण भूत उसको उपहार देते हैं। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' विदेहराज जनकने कहा—'मैं आपको—जिनसे हाथीके समान बैल उत्पन्न हों ऐसी—सहस्र गौएं देता हूँ।' उस याज्ञवल्क्यने कहा—'मेरे पिताजीका सिद्धान्त था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ २ ॥
[ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी [आचार्य] ने जो भी कहा है, वह हम सुनें।' [जनक-] "मुझसे शुल्वके पुत्र उदङ्कने
[दायाँ स्तम्भ]
'प्राण ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है।" [याज्ञवल्क्य-] "जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस शुल्वके पुत्रने 'प्राण ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि प्राणक्रिया न करनेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? किन्तु क्या उसने उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?" [जनक-] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'राजन् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! वह मुझे आप बतलाइये।' [ याज्ञवल्क्य-] "प्राण ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, उसकी 'प्रिय' इस रूपसे उपासना करे ।" [ जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! प्रियता क्या है ?' 'हे सम्राट् ! प्राण ही प्रियता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'राजन् ! प्राणके लिये ही लोग अयाज्यसे यजन कराते हैं, प्रतिग्रह न लेनेयोग्यसे प्रतिग्रह लेते हैं तथा जिस दिशामें जाते हैं, उसमें ही वधकी आशङ्का करते हैं। हे सम्राट् ! यह सब प्राणके लिये ही होता है। हे राजन् ! प्राण ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसे प्राण नहीं त्यागता, उसको सब भूत उपहार देते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' 'मैं आपको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक सहस्र गौएँ देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा। याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ३ ॥
[ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है, वह हम सुनें।' [जनक-] "मुझसे वृष्णके पुत्र बर्बुने कहा है कि 'चक्षु ही ब्रह्म है'।" [ याज्ञवल्क्य-] "जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस वार्ष्णेने 'चक्षु ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि न देखनेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?" [जनक-] 'मुझे नहीं बतलाये।' [याज्ञवल्क्य-] 'हे सम्राट् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! वह मुझे आप बतलाइये।' [ याज्ञवल्क्य-] "चक्षु ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, इसकी 'सत्य' इस रूपसे उपासना करे।" [जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! सत्यता क्या है?' 'हे राजन् ! चक्षु ही सत्यता
ब्राह्मण १ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४५७
है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। “हे सम्राट् ! चक्षुसे देखनेवालेसे ही 'क्या तूने देखा' ऐसा जब कहा जाता है और वह कहता है कि 'मैने देखा' तो वह सत्य होता है। राजन् ! चक्षु ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसका चक्षु त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार देते है और वह देव होकर देवोको प्राप्त होता है। 'मै आपको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक सहस्र गौएँ देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा । उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नही ले जाना चाहिये' ॥ ४ ॥ [ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है, वह हम सुनें।' [ जनक-] “मुझसे भारद्वाज-गोत्रोत्पन्न गर्दभीविपीतने कहा है कि 'श्रोत्र ही ब्रह्म है'।" [ याज्ञवल्क्य-] “जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस भारद्वाजने 'श्रोत्र ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि न सुनने- वालेको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?” [ जनक-] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'हे सम्राट् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! वह मुझे आप बतलाइये।' [ याज्ञवल्क्य-] “श्रोत्र ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, तथा इसकी 'अनन्त' इस रूपसे उपासना करे।” [ जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! अनन्तता क्या है ?' 'हे सम्राट् ! दिशाएँ ही अनन्तता हैं' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'इसीसे हे सम्राट् ! कोई भी जिस किसी दिशाको जाता है, वह उसका अन्त नहीं पाता; क्योंकि दिशाएँ अनन्त हैं और हे सम्राट् ! दिशाएँ ही श्रोत्र हैं। श्रोत्र ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, श्रोत्र उसका त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार देते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' 'मै आपको हाथीके समान हृष्ट- पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक सहस्र गौएँ देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा। याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ५ ॥ [ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है, वह हम सुनें।' [ जनक-] “मुझसे जबालाके पुत्र सत्यकामने कहा है कि 'मन ही ब्रह्म है'।" [ याज्ञवल्क्य-] “जैसे मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस जबालके पुत्रने 'मन ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि मनोहीनको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा बतलाये हैं।” [ जनक-] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'हे सम्राट् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! वह मुझे आप बतलाइये।' [ याज्ञवल्क्य-] “मन ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, इसकी 'आनन्द' इस रूपसे उपासना करे।” [ जनक-] 'याज्ञवल्क्य ! आनन्दता क्या है ?' 'हे सम्राट् ! मन ही आनन्दता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे राजन् ! मनसे ही स्त्रीकी इच्छा करता है; उसमें अनुरूप पुत्र उत्पन्न होता है, वह आनन्द है। हे सम्राट् ! मन ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसे मन नहीं त्यागता, सब भूत उसका उपकार करते हैं तथा वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' 'मै आपको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक सहस्र गौएँ देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा । याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ६ ॥ [ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है वह हम सुनें।' [ जनक-] “मुझसे विदग्ध शाकल्यने कहा है कि 'हृदय ही ब्रह्म है'।" [ याज्ञवल्क्य-] “जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् पुरुष उपदेश करे, उसी प्रकार उस शाकल्यने 'हृदय ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि हृदयहीनको क्या मिल सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?” [ जनक-] 'मुझे नहीं बतलाये ।' [ याज्ञवल्क्य-] 'हे सम्राट् ! यह तो एक पादवाला ही ब्रह्म है।' [ जनक-] 'याज्ञवल्क्य ! वह मुझे आप बतलाइये।' [ याज्ञवल्क्य-] “हृदय ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है तथा इसकी 'स्थिति' इस रूपसे उपासना करे।” [जनक-] 'याज्ञवल्क्य ! स्थितता क्या है?' 'हे सम्राट् ! हृदय ही स्थितता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'राजन् ! हृदय ही समस्त भूतोंका आयतन है, हृदय ही सब भूतोंकी प्रतिष्ठा है और हृदयमें ही समस्त भूत प्रतिष्ठित होते हैं। हे सम्राट् ! हृदय ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसका हृदय त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार समर्पण करते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' वैदेह जनकने कहा, 'मैं आपको हाथीके समान
द्वितीय ब्राह्मण
४८८ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ४
हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक सहस्र गौएँ देता हूँ।' उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ७ ॥ याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको
द्वितीय ब्राह्मण
याज्ञवल्क्यका जनकको उपदेश
विदेहराज जनकने कूर्च [ नामक एक विशेष प्रकारके आसन ] से उठकर [ याज्ञवल्क्यके ] समीप जाकर कहा, 'याज्ञवल्क्यजी! आपको नमस्कार है, मुझे उपदेश कीजिये।' उस ( याज्ञवल्क्य ) ने कहा, 'राजन् ! जिस प्रकार लंबे मार्गको जानेवाला पुरुष सम्यक् प्रकारसे रथ या नौकाका आश्रय ले, उसी प्रकार तुम इन उपनिषदों ( उपासनाओं ) से युक्त प्राणादि ब्रह्मोंकी उपासना कर समाहितचित्त हो गये हो। इस प्रकार तुम पूज्य, श्रीमान्, अधीतवेद और उक्तोपनिषदक (जिसे आचार्यने उपनिषद्का उपदेश कर दिया है-ऐसे ) हो गये हो। इतना होनेपर भी बताओ तुम इस शरीरसे छूटकर कहाँ जाओगे ?' [ जनक-] 'भगवन् ! मैं कहाँ जाऊँगा, सो मुझे मालूम नहीं है।' [याज्ञवल्क्य-] 'अब मैं तुम्हें वही बतलाऊँगा जहाँ तुम जाओगे।' [ जनक-] 'भगवान् मुझे बतलावें' ॥ १ ॥
'यह जो दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, इन्ध नामवाला है, उसी इस पुरुषको इन्ध होते हुए भी परोक्षरूपसे इन्द्र कहते हैं, क्योंकि देवगण मानो परोक्षप्रिय हैं, प्रत्यक्षसे द्वेष करनेवाले हैं। और यह जो बायें नेत्रमें पुरुषरूप है, वह इस (इन्द्र) की पत्नी विराट् (अन्न) है, उन दोनोंका यह सस्ताव (मिलनका स्थान) है जो कि यह हृदयान्तर्गत आकाश है। उन दोनोंका यह अन्न है जो कि यह हृदयान्तर्गत लाल पिण्ड है। उन दोनोंका यह प्रावरण है जो कि यह हृदयान्तर्गत जाल सा है। उन दोनोंका यह मार्ग—सञ्चार करनेका द्वार है जो कि यह हृदयसे ऊपरकी ओर नाड़ी जाती है। जिस प्रकार सहस्र भागोंमें विभक्त हुआ केश होता है, वैसी ही ये हिता नामकी नाड़ियां हृदयके भीतर स्थित हैं। इन्हींके द्वारा जाता हुआ यह अन्न [ शरीर ] में जाता है; इसीसे इस (स्थूल-शरीराभिमानी वैश्वानर ) से यह (सूक्ष्मदेहाभिमानी तैजस ) सूक्ष्मतर आहार ग्रहण करनेवाला ही होता है ॥ २-३ ॥
उस विद्वान्के पूर्वदिशा पूर्व प्राण है, दक्षिणदिशा दक्षिण प्राण है, पश्चिमदिशा पश्चिम प्राण है, उत्तरदिशा उत्तर प्राण है, ऊपरकी दिशा ऊपरके प्राण है, नीचेकी दिशा नीचेके प्राण हैं और सम्पूर्ण दिशाएँ सम्पूर्ण प्राण हैं। वह यह 'नेति नेति' रूपसे वर्णन किया हुआ आत्मा अग्राह्य है—वह ग्रहण नहीं किया जाता, वह अशीर्य है—जीर्ण ( नष्ट ) नहीं होता, असङ्ग है—उसका सङ्ग नहीं होता, वह अबद्ध है—व्यथित नहीं होता और क्षीण नहीं होता। हे जनक ! तू निश्चय अभयको प्राप्त हो गया है'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। उस विदेहराज जनकने कहा, 'भगवन् याज्ञवल्क्य! जिन आपने मुझे अभय ब्रह्मका ज्ञान कराया है, उन आपको अभय प्राप्त हो, आपको नमस्कार है, ये विदेह देश और यह मैं आपके अधीन हैं' ॥ ४ ॥
तृतीय ब्राह्मण
याज्ञवल्क्यके द्वारा आत्माके स्वरूपका कथन
विदेहराज जनकके पास याज्ञवल्क्य गये। उनका विचार था मैं कुछ उपदेश नहीं करूँगा। किंतु पहले कभी विदेहराज जनक और याज्ञवल्क्यने अग्निहोत्रके विषयमें परस्पर सवाद किया था, उस समय याज्ञवल्क्यने उसे वर दिया था और उसने इच्छानुसार प्रश्न करना ही माँगा था। यह वर याज्ञवल्क्यने उसे दे दिया था, अतः उनसे पहले राजाने ही प्रश्न किया—॥ १ ॥
'याज्ञवल्क्यजी ! यह पुरुष किस ज्योतिवाला है ?' 'हे सम्राट् ! यह आदित्यरूप ज्योतिवाला है'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'यह आदित्यरूप ज्योतिसे ही बैठता, सब ओर जाता, कर्म करता और लौट आता है।' 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है'। [ जनक— ] 'याज्ञवल्क्य ! आदित्यके अस्त हो जानेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला होता है ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'उस समय चन्द्रमा ही इसकी ज्योति होता है; चन्द्रमारूप ज्योतिके द्वारा ही यह बैठता, इधर-उधर जाता, कर्म करता और लौट आता है।' [ जनक— ] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है। याज्ञवल्क्यजी ! आदित्यके अस्त हो जानेपर तथा चन्द्रमाके अस्त हो जानेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला होता है ?' 'अग्नि ही इसकी ज्योति होता है। यह अग्निरूप ज्योतिके द्वारा ही बैठता, इधर-उधर जाता, कर्म करता और लौट आता है।'