कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 520, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें४८४ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ३
दिशाओ का ज्ञान रखता हूँ।' [ शाकल्य-] 'यदि तुम देवता और प्रतिष्ठाके सहित दिशाओंको जानते हो [ तो बताओ ] उस पूर्वदिशामे तुम किस देवतासे युक्त हो ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'वहाँ मै आदित्य (सूर्य) देवतावाला हूँ।' [शाकल्य-] 'वह आदित्य किसमे प्रतिष्ठित है?' [याज्ञवल्क्य-] 'नेत्रमे ।' [ शाकल्य-] 'नेत्र किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य--] 'रूपोंमे, क्योंकि पुरुष नेत्रसे ही रूपोंको देखता है।' [ शाकल्य-] 'रूप किसमे प्रतिष्ठित है ?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'हृदयमे, क्योंकि पुरुष हृदयसे ही रूपोको जानता है, अतः हृदयमे ही रूप प्रतिष्ठित है।' [शाकल्य-] 'हे याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ १९-२० ॥
'इस दक्षिण दिशामे तुम कौन-से देवतावाले हो ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'यमदेवतावाला हूँ।' [शाकल्य-] 'वह यमदेवता किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'यज्ञमें।' [ शाकल्य-] 'यज्ञ किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'दक्षिणामे ।' [ शाकल्य-] 'दक्षिणा किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'श्रद्धामे, क्योंकि जब पुरुष श्रद्धा करता है, तभी दक्षिणा देता है, अतः श्रद्धामे ही दक्षिणा प्रतिष्ठित है।' [ शाकल्य-] 'श्रद्धा किसमें प्रतिष्ठित है ?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'हृदयमे, क्योकि हृदयमे ही पुरुष श्रद्धाको जानता है, अत हृदयमे ही श्रद्धा प्रतिष्ठित है।' [ शाकल्य-] 'याज्ञवल्क्य । यह बात ऐसी ही है' ॥ २१ ॥
'इस पश्चिम दिशामे तुम कौन-से देवतावाले हो ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'वरुणदेवतावाला हूँ।' [ शाकल्य-] 'वह वरुण किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'जलमें ।' [ शाकल्य-] 'जल किसमें प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'वीर्यमे । [ शाकल्य-] 'वीर्य किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'हृदयमे, इसीसे पिताके अनुरूप उत्पन्न हुए पुत्रको लोग कहते है कि यह मानो पिताके हृदयसे ही निकला है, मानो पिताके हृदयसे ही बना हे, क्योकि हृदयमें ही वीर्य स्थित रहता है।' [ शाकल्य-] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २२ ॥
'उस उत्तर दिशामे तुम किस देवतावाले हो ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'सोमदेवतावाला हूँ ।' [ शाकल्य-] 'वह सोम किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'दीक्षा मे ।' [ शाकल्य-] 'दीक्षा किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'सत्यमे, क्योकिदीक्षित पुरुषमे कहते हैं कि सत्य बोलो, क्योंकि सत्यमें ही दीक्षा प्रतिष्ठित है।' [ शाकल्य-] 'सत्य किसमें प्रतिष्ठित है ?' 'हृदयमे ।' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। 'क्योंकि पुरुष हृदयसे ही सत्यको जानता है, अतः हृदयमें ही सत्य प्रतिष्ठित है।' [शाकल्य-] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २३ ॥
'इस ध्रुवा दिशामे तुम कौन देवतावाले हो ?' [याज्ञवल्क्य-] 'अग्निदेवतावाला हूँ ।' [ शाकल्य-] 'वह अग्नि किसमें प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'वाकमें ।' [ शाकल्य-] 'वाक् किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'हृदयमें ।' [ शाकल्य-] 'हृदय किसमें प्रतिष्ठित है ?' ॥ २४ ॥
याज्ञवल्क्यने 'अहल्लिक ! (प्रेत !) ऐसा सम्बोधन करके कहा-'जिस समय तुम इसे हमसे अलग मानते हो, उस समय यदि यह (हृदय-आत्मा) हमसे अलग हो जाय तो इस शरीरको कुत्ते खा जायँ अथवा इसे पक्षी चोंच मारकर मथ डालें' ॥ २५ ॥
'तुम (शरीर) और आत्मा (हृदय) किसमें प्रतिष्ठित हो ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'प्राणमे ।' [ शाकल्य-] 'प्राण किसमें प्रतिष्ठित है ?' 'अपानमें ।' 'अपान किसमें प्रतिष्ठित है ?' 'व्यानमें ।' 'व्यान किसमें प्रतिष्ठित है ?' 'उदानमें ।' 'उदान किसमे प्रतिष्ठित है ?' 'समानमें।' 'जिसका [मधुकाण्डमें] 'नेति-नेति' ऐसा कहकर निरूपण किया गया है, वह आत्मा अगृह्य है-वह ग्रहण नहीं किया जा सकता, अशीर्य है-वह शीर्ण (नष्ट) नहीं होता, असङ्ग है-वह सक्त नहीं होता, असित है-वह व्यथित और हिंसित नहीं होता। ये आठ (पृथिवी आदि) आयतन हैं, आठ (अग्नि आदि) लोक हैं, आठ (अमृतादि) देव हैं और आठ (शारीरादि) पुरुष हैं। वह जो उन पुरुषोंको निश्चयपूर्वक जानकर उनका अपने हृदयमे उपसहार करके औपाधिक धर्मोका अतिक्रमण किये हुए है, उस औपनिषद पुरुषको मै पूछता हूँ, यदि तुम मुझे उसे स्पष्टतया न बतला सकोगे तो तुम्हारा मस्तक गिर जायगा।' याज्ञवल्क्यने यो कहा, किंतु शाकल्य उसे नहीं जानता था, इसलिये बता नहीं सका एव उसका मस्तक गिर गया। यही नहीं, अपितु चोरलोग उसकी हड्डियोंको कुछ और समझकर चुरा ले गये ॥ २६ ॥
फिर याज्ञवल्क्यने कहा, 'पूजनीय ब्राह्मणगण ! आपमेंसे जिसकी इच्छा हो, वह मुझसे प्रश्न करे। अथवा आप सभी मुझसे प्रश्न करें। इसी प्रकार आपमेंसे जिसकी इच्छा हो, उससे मैं प्रश्न करता हूँ या आप सभीसे मै प्रश्न करता हूँ।' किंतु उन ब्राह्मणोंका साहस न हुआ ॥ २७ ॥