भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 508, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 508

४७४ , ' बृहदारण्यकोपनिषद् ' [ अध्याय २ भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस धर्मके मधु हैं । इस धर्ममें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म धर्मसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह सत्य समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस सत्यके मधु हैं। यह जो इस सत्यमे तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म- सत्यसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ] । यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह मनुष्यजाति समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस मनुष्यजातिके मधु हैं। यह जो इस मनुष्यजातिमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म मानुष तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस श्रुतिद्वारा बतलाया गया है]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह आत्मा (देह) समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस आत्माके मधु हैं। यह जो इस आत्मामें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह आत्मा तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। वह यह आत्मा समस्त भूतोंका अधिपति एव समस्त भूतोंका राजा है। इस विषयमें दृष्टान्त- जिस प्रकार रथकी नाभि और रथकी नेमिमें सारे अरे समर्पित रहते हैं, इसी प्रकार इस परमात्मामें समस्त भूत, समस्त देव, समस्त लोक, समस्त जीवन और ये सभी आत्माएँ समर्पित हैं [ सभी उस परमात्मासे जुड़े हुए और उसीके सहारे स्थित हैं।] ॥ १-१५॥ इस पूर्वोक्त मधुको दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिने अश्विनीकुमारोंसे कहा था । इस मधुको देखते हुए ऋषि (मन्त्र) ने कहा- मेघ जिस प्रकार वृष्टि करता है, उसी प्रकार हे नराकार अश्विनी- कुमारो ! मैं लाभके लिये किये हुए तुम दोनोंका वह उग्र दक्ष कर्म प्रकट किये देता हूँ, जिस मधुका दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिने तुम्हारे प्रति अश्वके सिरसे वर्णन किया था ॥ १६ ॥ उस इस मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको उपदेश किया । इसे देखते हुए ऋषि (मन्त्रद्रष्टा) ने कहा है-हे अश्विनीकुमारो ! तुम दोनों आथर्वण दध्यङ्के लिये घोड़ेका सिर लाये । उसने सत्यपालन करते हुए तुम्हें त्वाष्ट्र (सूर्यसम्बन्धी) मधुका उपदेश किया तथा हे शत्रुहिंसक ! जो [ आत्मज्ञानसम्बन्धी ] गोपनीय मधु था [ वह भी तुमसे कहा ] ॥ १७ ॥ इस पूर्वोक्त मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको उपदेश किया। इसे देखते हुए ऋषिने कहा-परमात्माने दो पैरोंवाले शरीर बनाये और चार पैरोंवाले शरीर बनाये। पहले वह पुरुष-परमात्मा पक्षी होकर शरीरोंमें प्रविष्ट हो गया । वह यह पुरुष समस्त पुरों ( शरीरों ) मे पुरिशय है। ऐसा कुछ भी नहीं है, जो परमात्मासे न ढका हो तथा ऐसा भी कुछ नहीं है, जिसमे परमात्माका प्रवेश न हुआ हो-जो उससे व्याप्त न हो ॥ १८ ॥ इस पूर्वोक्त मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको उपदेश किया। यह देखते हुए ऋषिने कहा-वह रूप रूपके प्रतिरूप हो गया। इसका वह रूप प्रतिख्यापन (प्रकट) करनेके लिये है। ईश्वर मायासे अनेकरूप प्रतीत होता है। [ शरीररूप रथमें जोड़े हुए ] इसके घोड़े सौ (नाड़ियां) और दस (इन्द्रियाँ) हैं। यह (परमेश्वर) ही हरि (इन्द्रिय- रूप अश्व ) है, यही दस, सहस्र, अनेक और अनन्त है। वह यह ब्रह्म अपूर्व (कारणरहित), अनपर (कार्यरहित), अनन्तर (विजातीय द्रव्यसे रहित) और अबाह्य है। यह आत्मा ही सबका अनुभव करनेवाला ब्रह्म है। यही समस्त वेदान्तोंका अनुशासन (उपदेश) है ॥ १९ ॥ षष्ठ ब्राह्मण मधुविद्याकी परम्पराका वर्णन अब [ मधुकाण्डका ] वंश बतलाया जाता है- पौतिमाष्यने गौपवनसे, गौपवनने पौतिमाष्यसे, पौतिमाष्यने गौपवनसे, गौपवनने कौशिकसे, कौशिकने कौण्डिन्यसे, ने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने कौशिकसे और गौतमसे, गौतमने आग्निवेश्यसे, आग्निवेश्यने शाण्डिल्यसे और आनभिम्लातसे, आनभिम्लातने आनभिम्लातसे, आनभिम्लातने आनभिम्लातसे, आनभिम्लातने गौतमसे, गौतमने सैतव और प्राचीनयोग्यसे, सैतव और प्राचीनयोग्यने पाराशर्यसे, पाराशर्यने