भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 515, कुल 832 में से

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पृष्ठ 515

ब्राह्मण ७ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४७९ फिर बाल्य और पाण्डित्यको पूर्णतया प्राप्तकर वह मुनि होता | जिस प्रकार भी हो, ऐसा ही ब्राह्मण होता है, इससे भिन्न और है तथा अमौन और मौनका पूर्णतया सम्पादन करके ब्राह्मण | सब आर्त ( नाशवान् ) है ।' तब कौषीतकेय कहोल चुप ( कृतकृत्य ) होता है। वह किस प्रकार ब्राह्मण होता है ? | हो गया ॥ १ ॥

षष्ठ ब्राह्मण याज्ञवल्क्य और गार्गीका संवाद

फिर इस याज्ञवल्क्यसे वचक्नुकी पुत्री गार्गीने पूछा, | 'हे गार्गि ! नक्षत्रलोकोंमें ।' [गार्गी—] 'नक्षत्रलोक किसमें वह बोली, 'याज्ञवल्क्य ! यह जो कुछ है, सब जलमे ओतप्रोत | ओतप्रोत हैं ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'हे गार्गि ! देवलोकोंमे ।' है, किंतु वह जल किसमे ओतप्रोत है ?' [ याज्ञवल्क्य—] | [गार्गी—] 'देवलोक किसमें ओतप्रोत है ?' [याज्ञवल्क्य—] 'हे गार्गि ! वायुमे ।' [ गार्गी—] 'वायु किसमें ओतप्रोत | 'हे गार्गि ! इन्द्रलोकोंमें ।' [ गार्गी—] 'इन्द्रलोक किसमें है ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'हे गार्गि ! अन्तरिक्षलोकोंमे ।' | ओतप्रोत है ?' [याज्ञवल्क्य—] 'हे गार्गि ! प्रजापतिलोकोंमे ।' [ गार्गी— ] 'अन्तरिक्षलोक किसमें ओतप्रोत है ?' | [गार्गी—] 'प्रजापतिलोक किसमे ओतप्रोत हैं ?' [याज्ञवल्क्य—] [ याज्ञवल्क्य—] 'हे गार्गि ! गन्धर्वलोकोंमें ।' [ गार्गी—] | 'हे गार्गि ! ब्रह्मलोकोंमें ।' [गार्गी—] 'ब्रह्मलोक किसमें 'गन्धर्वलोक किसमें ओतप्रोत है ?' [याज्ञवल्क्य—] 'हे गार्गि ! | ओतप्रोत है ?' इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—'हे गार्गि ! अतिप्रश्न आदित्यलोकोंमें ।' [ गार्गी—] 'आदित्यलोक किसमे ओत- | मत कर । तेरा मस्तक न गिर जाय ! तू, जिसके विषयमे प्रोत ह ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'हे गार्गि ! चन्द्रलोकोंमें ।' | अतिप्रश्न नहीं करना चाहिये, उस देवताके विषयमें अतिप्रश्न [गार्गी—] 'चन्द्रलोक किसमे ओतप्रोत हैं ?' [याज्ञवल्क्य—] | कर रही है। हे गार्गि ! तू अतिप्रश्न न कर ।' तब वचक्नुकी पुत्री गार्गी उपरत हो गयी ॥ १ ॥

सप्तम ब्राह्मण याज्ञवल्क्य तथा आरुणि उद्दालकका संवाद, आत्माके स्वरूपका वर्णन

फिर इस याज्ञवल्क्यसे आरुणि उद्दालकने पूछा, वह | उन (काप्य आदि) से सूत्र और अन्तर्यामीको बताया । बोला, 'याज्ञवल्क्य ! हम मद्रदेशमें यज्ञशास्त्रका अध्ययन करते | उसे मैं जानता हूँ । हे याज्ञवल्क्य ! यदि उस सूत्र और हुए कपिगोत्रोत्पन्न पतञ्चलके घर रहते थे । उसकी भार्या | अन्तर्यामीको न जाननेवाले होकर ब्रह्मवेत्ताकी स्वभूत गौओंको गन्धर्वद्वारा गृहीत थी । हमने उस (गन्धर्व) से पूछा, 'तू | ले जाओगे तो तुम्हारा मस्तक गिर जायगा ।' [याज्ञवल्क्य—] कौन है ?' उसने कहा, 'मैं आथर्वण कबन्ध हूँ ।' उसने | 'हे गौतम ! मैं उस सूत्र और अन्तर्यामीको जानता हूँ ।' कपिगोत्रीय पतञ्चल और उसके याज्ञिकोंसे पूछा, 'काप्य ! | [उद्दालक—] 'ऐसा तो जो कोई भी कह सकता है—'मैं क्या तुम उस सूत्रको जानते हो, जिसके द्वारा यह लोक, | जानता हूँ, मैं जानता हूँ' [किंतु यों व्यर्थ ढोल पीटनेसे क्या परलोक और सारे भूत ग्रथित हैं ?' तब उस काप्य पतञ्चलने | लाभ ? यदि वास्तवमें तुम्हें उसका ज्ञान है तो] जिस प्रकार कहा, 'भगवन् ! मैं उसे नहीं जानता ।' उसने पतञ्चल काप्य | तुम जानते हो वह कहो' ॥ १ ॥ और याज्ञिकोंसे कहा, 'काप्य ! क्या तुम उस अन्तर्यामीको | उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'गौतम ! वायु ही वह सूत्र है, जानते हो जो इस लोक, परलोक और समस्त भूतोंको | गौतम ! वायुरूप सूत्रके द्वारा ही यह लोक, परलोक और भीतरसे नियमित करता है ?' उस पतञ्चल काप्यने कहा, | समस्त भूतसमुदाय गुथे हुए हैं। हे गौतम ! इसीसे मरे हुए 'भगवन् ! मै उसे नहीं जानता ।' उसने पतञ्चल काप्य और | पुरुषको ऐसा कहते हैं कि इसके अग विक्षस्त (विशीर्ण) याज्ञिकोंसे कहा, 'काप्य ! जो कोई उस सूत्र और उस | हो गये हैं, क्योंकि हे गौतम ! वे वायुरूप सूत्रसे ही सग्रथित अन्तर्यामीको जानता है, वह ब्रह्मवेत्ता है, वह लोकवेत्ता है, | होते हैं ।' [आरुणि—] 'हे याज्ञवल्क्य ! ठीक है, यह तो वह देववेत्ता है, वह वेदवेत्ता है, वह भूतवेत्ता है, वह आत्म- | ऐसा ही है, अब तुम अन्तर्यामीका वर्णन करो' ॥ २ ॥ वेत्ता है और वह सर्ववेत्ता है ।' तथा इसके पश्चात् गन्धर्वने | जो पृथिवीमें रहनेवाला पृथिवीके भीतर है, जिसे पृथिवी