भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 505, कुल 832 में से

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पृष्ठ 505

ब्राह्मण ४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४७१

उसका ये सात अक्षितियाँ (नेत्रोंके अङ्ग) उपस्थान (स्तवन) करती हैं— उनमेंसे जो ये आँखमे लाल रेखाएँ हैं उनके द्वारा रुद्र इस मध्यप्राणके अनुगत है, नेत्रमें जो जल है उसके द्वारा मेघ, जो दर्शनशक्ति है उसके द्वारा आदित्य, जो कालिमा है उसके द्वारा अग्नि और जो शुक्लता है उसके द्वारा इन्द्र अनुगत है। नीचेके पलकद्वारा पृथिवी इसके अनुगत है एव ऊपरके पलकद्वारा द्युलोक । जो इस प्रकार जानता है, उसका अन्न क्षीण नहीं होता ॥ २ ॥ इस विषयमे यह मन्त्र है—'चमस नीचेकी ओर छिद्र- वाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ होता है, उसमें विश्वरूप यश निहित है, उसके तीरपर सात ऋषिगण (दो कान, दो नेत्र, दो नासिका और एक रसना) और वेदके द्वारा सवाद करनेवाली आठवी वाणी रहती है। जो नीचेकी ओर छिद्र- वाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ चमस है, वह सिर है; क्योकि यही नीचेकी ओर छिद्रवाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ है । उसमें विश्वरूप यश निहित है—प्राण ही विश्वरूप यश हैं, प्राणोंके विषयमें ही मन्त्र ऐसा कहता है। उसके तीरपर सात ऋषि रहते हैं, प्राण ही ऋषि है, प्राणोंके विषयमें ही मन्त्र ऐसा कहता है। वेदके द्वारा सवाद करनेवाली वाक् आठवीं है, वही वेदके द्वारा सवाद करती है। ये दोनों [ कान ] ही गोतम और भरद्वाज हैं, यह ही गोतम है और यह [ दूसरा ] भरद्वाज है। ये दोनों [नेत्र ] ही विश्वामित्र और जमदग्नि हैं, यह ही विश्वामित्र है और यह दूसरा जमदग्नि है। ये दोनों [नासारन्ध्र ] ही वसिष्ठ और कश्यप हैं, यह ही वसिष्ठ है और यह दूसरा कश्यप है। तथा वाक् ही अत्रि है, क्योकि वागिन्द्रियद्वारा ही अन्न भक्षण किया जाता है। जिसे अत्रि कहते हैं, उसका निश्चय 'अत्ति' ही नाम है। जो इस प्रकार जानता है, वह सबका अत्ता (भोक्ता) होता है, सब उसका अन्न (भोग्य) हो जाता है ॥ ३-४ ॥

तृतीय ब्राह्मण ब्रह्मके दो रूप

ब्रह्मके दो (द्विविध) रूप है—मूर्त और अमूर्त, मर्त्य और अमृत, स्थित और यत् (चर) तथा सत् और त्यत्। जो वायु और अन्तरिक्षसे भिन्न है, वह मूर्त है। यह मर्त्य है, यह स्थित है और यह सत् है । उस इस मूर्तका, इस मर्त्यका, इस स्थितका, इस सत्का यह रस है, जो कि यह तपता है। यह सत्का ही रस है । तथा वायु और अन्तरिक्ष अमूर्त हैं, ये अमृत है, ये यत् हैं और ये ही त्यत् है। उस इस अमूर्तका, इस अमृतका, इस यत्का, इस त्यत्का यह सार है, जो कि इस मण्डलमें पुरुष है, यही इस त्यत्का सार है। यह अधि दैवत-दर्शन है। अब अध्यात्म मूर्तामूर्तका वर्णन किया जाता है। जो प्राणसे तथा यह जो देहान्तर्गत आकाश है, उससे भिन्न है, यही मूर्त है। यह मर्त्य है, यह स्थित है, यह सत् है। यह जो नेत्र है, वही इस मूर्तका, इस मर्त्यका, इस स्थितका एव इस सत्का सार है। यह सत्का ही सार है। अब अमूर्तका वर्णन करते हैं—प्राण और इस शरीरके अन्तर्गत जो आकाश है, वे अमूर्त हैं, यह अमृत है, यह यत् है और यही त्यत् है। उस इस अमूर्तका, इस अमृतका, इस यत्का, इस त्यत्का यह रस है जो कि यह दक्षिण नेत्रान्तर्गत पुरुष है, यह त्यत्का ही रस है ॥ १—५ ॥ उस इस पुरुषका रूप-चमत्कार ऐसा है जैसा कुसुमसे रँगा हुआ वस्त्र हो, जैसा सफेद ऊनी वस्त्र हो, जैसा इन्द्रगोप (बीरबहूटी) हो, जैसी अग्निकी ज्वाला हो, जैसा श्वेत कमल हो, और जैसे बिजलीकी चमक हो। जो ऐसा जानता है, उसकी श्री बिजलीकी चमकके समान [ सर्वत्र एक साथ फैलनेवाली ] होती है। अब इसके पश्चात् 'नेति-नेति' यह ब्रह्मका निर्देश है। 'नेति-नेति' इससे बढकर कोई उत्कृष्ट आदेश नहीं है। 'सत्यका सत्य' यह उसका नाम है। प्राण ही सत्य हैं, उनका यह सत्य है ॥६॥

चतुर्थ याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद, याज्ञवल्क्यका मैत्रेयीको अमृतत्वके साधनरूपमें परमात्म-तत्त्वका उपदेश

'अरी मैत्रेयि !' ऐसा याज्ञवल्क्यने [ अपनी पत्नीसे ] कहा। 'मै इस स्थान (गार्हस्थ्य-आश्रम) से ऊपर (सन्यास- आश्रममें ) जानेवाला हूँ। अतः [ तेरी अनुमति लेता हूँ और चाहता हूँ ] इस (दूसरी पत्नी) कात्यायनीके साथ तेरा बँटवारा कर दूँ' ॥ १ ॥ मैत्रेयीने कहा, 'भगवन् ! यदि यह धनसे सम्पन्न