कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 518, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें४८२ *ः बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ३ बहुत मानें कि इन याज्ञवल्क्यजीसे आपको नमस्कारद्वारा ही वादमें जीतनेवाला नहीं है।' तदनन्तर वचक्नुकी पुत्री गार्गी छुटकारा मिल जाय । आपमेंसे कोई भी कभी इन्हें ब्रह्मविषयक चुप हो गयी ॥ १२ ॥ नवम ब्राह्मण याज्ञवल्क्य-शाकल्यका संवाद और याज्ञवल्क्यकी विजय इसके पश्चात् इस याज्ञवल्क्यसे शाकल्य विदग्धने पूछा, रुलाते हैं; इसलिये रोदनके कारण होनेसे 'रुद्र' कहलाते है' ॥४॥ 'याज्ञवल्क्य ! कितने देवगण हैं ?' तब याज्ञवल्क्यने इस आगे [ शाकल्य—] 'आदित्य कौन हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] कही जानेवाली निविद्से ही उनकी संख्याका प्रतिपादन 'संवत्सरके अवयवभूत ये बारह मास ही आदित्य हैं; क्योंकि किया । 'वैश्वदेवकी निविद्में अर्थात् देवताओंकी सख्या ये इस सबका आदान (ग्रहण) करते हुए चलते हैं, इसलिये बतानेवाले मन्त्रपदोंमें जितने बतलाये गये हैं, वे तीन और आदित्य हैं' ॥ ५ ॥ तीन सौ तथा तीन और तीन सहस्र (तीन हजार तीन सौ [ शाकल्य—] 'इन्द्र कौन है और प्रजापति कौन है?' छः ) है ।' [ तब शाकल्यने ] 'ठीक है' ऐसा कहा । फिर [ याज्ञवल्क्य—] 'स्तनयित्नु (विद्युत्) ही इन्द्र है और यज्ञ पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं ?' याज्ञवल्क्यने कहा, प्रजापति है ।' [ शाकल्य— ] 'स्तनयित्नु कौन है ?' 'तैंतीस' । [ शाकल्यने ] 'ठीक है' ऐसा कहा और पूछा 'तो, [ याज्ञवल्क्य—] 'वज्र ।' [ शाकल्य—] 'यज्ञ कौन याज्ञवल्क्य ! कितने देव हे ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'छः' । है?' [ याज्ञवल्क्य—] 'पशुगण' ॥ ६ ॥ [शाकल्यने] 'ठीक है' ऐसा कहा और फिर पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! [ शाकल्य—] 'छः देवगण कौन हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] कितने देव हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] 'तीन ।' [ शाकल्यने ] 'अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य और द्युलोक—ये 'ठीक है' ऐसा कहा और पुनः पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने छः देवगण है । ये वसु आदि तैंतीस देवताओंके रूपमें अग्नि देव हं ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'दो।' [ शाकल्यने ] 'ठीक आदि छः ही हैं' ॥ ७ ॥ है' ऐसा कहा और पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं ?' [ शाकल्य—] 'वे तीन देव कौन हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] [ याज्ञवल्क्य—] 'डेढ ।' [ शाकल्यने ] 'ठीक है' ऐसा कहा 'ये तीन लोक ही तीन देव हैं। इन्हींमे ये सब देव अन्तर्भूत और पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! कितने देव हैं ?' [ याज्ञवल्क्य—] है।' [ शाकल्य—] 'वे दो देव कौन हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] 'एक।' [ शाकल्यने ] 'ठीक है' ऐसा कहा और पूछा 'वे 'अन्न और प्राण ।' [ शाकल्य—] 'डेढ़ देव कौन हैं?' तीन और तीन सौ तथा तीन और तीन सहस्र देव कौन-से [ याज्ञवल्क्य—] 'जो यह बहता है' ॥ ८ ॥ हं ?' ॥ १ ॥ यहाँ ऐसा कहते है—'यह जो वायु है, एकही-सा बहता उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'ये तो इनकी महिमाएँ ही है। है, फिर यह अध्यर्ध—डेढ किस प्रकार है ?' [ उत्तर—] देवगण तो तैंतीस ही हैं।' [ शाकल्य—] 'वे तैंतीस देव 'क्योंकि इसीमें यह सब ऋद्धिको प्राप्त होता है, इसलिये यह कौन-से है ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह अध्यर्ध (डेढ) है।' [ शाकल्य—] 'एक देव कौन है ?' आदित्य—ये इकतीस देवगण है तथा इन्द्र और प्रजापतिके [ याज्ञवल्क्य—] 'प्राण; वह ब्रह्म है, उसीको 'त्यत्' ऐसा सहित तैंतीस है' ॥ २ ॥ कहते हैं' ॥ ९ ॥ [ शाकल्य—] 'वसु कौन हैं?' [याज्ञवल्क्य—] 'अग्नि, [ शाकल्य—] 'पृथिवी ही जिसका आयतन है तथा पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, द्युलोक, चन्द्रमा और अग्नि लोक (दर्शनशक्ति) और मन ज्योति (सकल्प- नक्षत्र—ये वसु हं, इन्हींमें यह सब जगत् निहित है, इसीसे विकल्पका साधन) है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म ये वसु हं' ॥ ३ ॥ कार्य-कारणसमूहका परम आश्रय जानता है, वही ज्ञाता (पण्डित) [ शाकल्य—] 'रुद्र कौन है' [ याज्ञवल्क्य—] 'पुरुषमें है। याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका ये दस प्राण ( इन्द्रियाँ) और ग्यारहवाँ आत्मा (मन) । अभिमान कर रहे हो !']।' [याज्ञवल्क्य—] 'जिसे तुम सम्पूर्ण ये जिस समय इस मरणशील शरीरसे उत्क्रमण करते हैं, उस आध्यात्मिक कार्य-करण-सघातका परम आश्रय बतलाते हो, समय रुलाते हं, अत उत्क्रमणकालमे अपने सम्बन्धियोंको