भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 680, कुल 832 में से

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पृष्ठ 680

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ कृष्णयजुर्वेदीय कैवल्योपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! आत्माका स्वरूप तथा उसे जाननेका उपाय

महर्षि आश्वलायन भगवान् प्रजापति ब्रह्माजीके पास विधिपूर्वक समिधा हाथमे लेकर गये और बोले, 'भगवन् ! सदा सतजनोंके द्वारा परिसेवित, अत्यन्त गोप्य तथा अतिशय श्रेष्ठ उस ब्रह्मविद्याका मुझे उपदेश कीजिये, जिसके द्वारा विद्वान्‌लोग शीघ्र ही सारे पापोंको नष्ट करके परात्पर पुरुष—परब्रह्मको प्राप्त होते हैं।' ब्रह्माजीने उन महर्षिसे कहा—'आश्वलायन ! तुम उस परात्पर तत्त्वको श्रद्धा, भक्ति, ध्यान और योगके द्वारा जाननेका यत्न करो। उसकी प्राप्ति न कर्मके द्वारा होती है, न सन्तान अथवा धनके द्वारा। ब्रह्मज्ञानियोंने केवल त्यागके द्वारा अमृतत्वको प्राप्त किया है। स्वर्गलोकसे भी ऊपर गुहामें अर्थात् बुद्धिके गह्वरमें स्थित होकर जो ब्रह्मलोक प्रकाशित है, उसमे यति-सयमशील योगीजन प्रवेश करते हैं। जिन्होंने वेदान्तके सविशेष ज्ञानसे तथा श्रवण, मनन और निदिध्यासनके द्वारा परम तत्त्वका निश्चय कर लिया है, वे शुद्ध अन्त.करणवाले योगीजन संन्यास-योगके द्वारा ब्रह्मलोकमें जाकर कल्पके अन्तमें अमृतस्वरूप होकर मुक्त हो जाते हैं। स्नानादिसे शुद्ध होनेके अनन्तर निर्जन स्थानमें सुखसे बैठकर, ग्रीवा, सिर और शरीरको सीधे रखकर सारी इन्द्रियोंका निरोध करके भक्ति-पूर्वक अपने गुरुको प्रणाम करके सन्यास-आश्रममें स्थित योगीलोग अपने हृदय-कमलमें रजोगुणरहित, विशुद्ध, दुःख-शोकातीत आत्मतत्त्वका विशदरूपसे चिन्तन करते है। इस प्रकार जो अचिन्त्य है, अव्यक्त और अनन्तरूप है, कल्याणमय है, प्रशान्त है, अमृत है, जो ब्रह्म अर्थात् निखिल ब्रह्माण्डका मूल कारण है; जिसका आदि, मध्य और अन्त नही, जो एक अर्थात् अद्वितीय है, विभु और चिदानन्द है, रूपरहित और अद्भुत है, उस उमासहित अर्थात् ब्रह्मविद्याके साथ परमेश्वरको, समस्त चराचरके स्वामीको, प्रगान्तस्वरूप, त्रिलोचन, नीलकण्ठ महादेव अर्थात् परात्पर परब्रह्मको—जो सब भूतोंका मूल कारण है, सबका साक्षी है तथा अविद्यासे परे प्रकाशमान हो रहा है, उसको मुनिलोग ध्यानके द्वारा प्राप्त करते हैं ॥ १-७ ॥

'वही ब्रह्मा है, वही शिव है, वही इन्द्र है, वही अक्षर—अविनाशी परमात्मा है, वही विष्णु है; वह प्राण है, वह काल है, अग्नि है, वह चन्द्रमा है। जो कुछ हो चुका है और जो भविष्यमें होनेवाला है, वह सब वही है, उस सनातन तत्त्वको जानकर प्राणी मृत्युके परे चला जाता है। इसके अतिरिक्त मुक्तिका दूसरा कोई मार्ग नहीं है। जो आत्माको सब भूतोंमें देखता है तथा सब भूतोको आत्मामें देखता है, वह परब्रह्मको प्राप्त करता है; दूसरे किसी उपायसे नहीं। आत्मा—अन्तःकरणको नीचेकी अरणि तथा प्रणवको ऊपरकी अरणि बनाकर ज्ञानीजन ज्ञानरूपी मन्थनके अभ्यासद्वारा ससार-बन्धनको नष्ट कर देते हैं—ज्ञानाग्निमें जला डालते हैं। वही प्राणी मायाके वश अत्यन्त मोहग्रस्त होकर शरीरको ही अपना स्वरूप मान सब प्रकारके कर्मोंको करता है। वही जाग्रत् अवस्थामें स्त्री, अन्न पान आदि नाना प्रकारके

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