भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 689, कुल 832 में से

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पृष्ठ 689
  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६४१ शक्तिशाली इन्द्र हैं । (देवराज इन्द्र नहीं, जो अनुगोमे पराजित होते हैं । यहाँ गोविन्दसे तात्पर्य है ।) अथवा आप अपने भक्तोंके सामने हजारों (असंख्य) नेत्रोंसे सम्पन्न विराट्रूपम भी प्रकट होते हैं। और आपके उस (श्रीकृष्ण) स्वरूपके जो सत्त्वात्मक सहचर (गोपाल, गोपिकाएँ आदि) हैं, उन्हें हम नमस्कार करते हैं । भगवन् ! आपके शक्तिशाली किंतु इस समय प्रयुक्त न होनेवाले आयुधोंको अनेक नमस्कार ! दोनों हाथ जोड़कर मैं आपके धनुषको नमस्कार करता हूँ । अपने और शत्रुके- इन दोनों पक्षोंके गजाओंके लिये आप अपने धनुषकी प्रत्यञ्चाको उतार दीजिये । अर्थात् आप शान्तस्वरूप धारण कर लें और युद्धकी आकाङ्क्षा ही मिटा दें। भगवन् ! आपके हाथमें जो बाण हैं, उन्हें लौटा लें-तूणीरमे रख लें। अर्थात् अपनी महार मूर्ति का त्याग करके अपने परम सौम्य शिवरूपमे मुझे दर्शन दं । सहस्राक्ष, शितिखण्डी, शत बाणोंके युगपत्सन्धानकर्ता ! आप अपने धनुषको चढ़ाकर, अपने बाणोंके मुखाग्रों तीक्ष्ण करके हमारे कल्याण एवं सुखके लिये उन्हें धनुषपर चढ़ायें । (हमारे शत्रुओंके नष्ट होनेपर) आपका धनुष प्रत्यञ्चा रहित हो। वधकी क्रिया छोड़कर बाण तूणीरमे रख दिये जायँ। आपके बाण, जो पर्वतोंको भी चूर्ण करनेवाले हैं, हम आपके निषङ्ग (तरङ्ग) में प्रवेश करके कल्याणमय हों । आपके धनुषमे संधान किया हुआ बाण विश्वमें चारों ओरसे हमारी रक्षा करे। इस रक्षणके अनन्तर आप अपने उस बाणको अपने तूणीरमे रख दें। भक्तोंपर अत्यधिक कृपाकी वर्षा करनेवाले ! आपके समीप जो अमोघ बाण हैं और आपके हाथमें जो धनुष है, उनके द्वारा आप चारों ओरसे हमारा परिपालन करें । उन सर्पों (डसनेवाले जीवों) को नमस्कार, जो पृथिवी- पर रहते हैं। जो आकाशमें रहते हैं और जो स्वर्गमे रहते हैं, उन सर्पों (कष्ट देनेवाली शक्तियो) को नमस्कार । जो प्रकाशमय लोकोंमें (ग्रहोंमें) रहते हैं तथा जो सूर्यकी किरणोंम रहते हैं, जो इस जलमें रहनेवाले हैं, उन सब सर्पों (क्लेश- दायिका शक्तियो) को नमस्कार । जो वृक्षोंके बाणके रूपमे हैं, जो वनस्पतियोम रहते हैं और जो गड्डोंमें पड़े हैं, उन सब सर्पोंको नमस्कार । (इस मन्त्रमे सर्वत्र व्यापक भगवान् रुद्रके कालरूपत्वका निर्देश है।) जो भगवान् शङ्कर अपने भक्तोंके लिये नीलकण्ठ स्वरूप धारण करते हैं, अर्थात् भक्तोंके कल्याणके लिये ही जिन्होंने हालाहल पान करके उसे चिह्न रूपमें अपने गलेमें धारण किया हे, जो भगवान् अपने निज जनोंके लिये हरितवर्ण श्रीहरि रूप बन जाते हैं (यहाँ भगवान् शिव एवं भगवान् विष्णुका एकत्व प्रतिपादित है), हे ओषधियो ! उन काली पूँछवाले (महिषरूपधारी भगवान् केदारेश्वर) के लिये शीघ्र अमोघ शक्तिसम्पन्न बनो क्योंकि इससे तुम उन्हें सन्तुष्ट कर सकोगी। वे पिङ्गलवर्ण एव पिङ्गल कानोंवाले, नीलकण्ठधारी भगवान् शिव वही हैं, जिन सर्वस्वरूप, नीलशिखण्डधारी (सर्वव्यापक) भगवान् विरूपाक्ष भत्र (शङ्कर) के द्वारा देवताओके ही नहीं, अपितु वाणीका प्रयोग करनेवाले- चेतन प्राणिमात्रके पिता ब्रह्माजी मारे गये। हे वीर ! सर्व- व्यापक स्वरूपसे उन्हें ही प्रत्येक कर्ममे (व्यापक एंव कर्मरूप) देखो । यह उन (भगवान् शङ्कर) के सम्बन्धमें पूछनेकी इच्छा (शङ्का) को छोड़ दो, जिसके द्वारा हम तुम विश्वको उनसे विभिन्न कर देते हैं-उनमे अलग भाग्य मान लेते हैं। अर्थात् हम विश्वको उन्हींका रूप मानना चाहिये । जगत्कारणस्वरूप भगवान् भवको नमस्कार, महारकर्ता रुद्रको नमस्कार, जगत्का नाश करनेके लिये शत्रुरूप बने हुए प्रभुको नमस्कार, उन नीलशिखण्डधारी (गगनमुकुटी) को अथवा काले सींगोंवाले (महिषरूप केदारेश्वर नीलरुद्र) को नमस्कार तथा उन (दक्षकी) सभा (विवाहमण्डप) को सुशोभित करनेवाले कुमाररूप प्रभुको नमस्कार । जिनमे घोड़े उत्पन्न हुए, गच्चर हुए तथा चारों ओर दौड़नेवाले गधे हुए, उन नीलशिखण्डधारी (महिषरूप केदारेश्वर नीलरुद्र) को नमस्कार । सभामण्डपकी शोभा बढ़ानेवाले उन भगवान्‌को नमस्कार, नमस्कार ॥ ३ ॥ || अथर्ववेदीय नीलरुद्रोपनिषद् समाप्त || शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳ सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! उ० अ० ८१-८२-