भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 678, कुल 832 में से

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पृष्ठ 678

ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय गर्भोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! गर्भकी उत्पत्ति एवं वृद्धिके प्रकार

ॐ शरीर पञ्चात्मक, पाँचोंमें वर्तमान, छः आश्रयोंवाला, छः गुणोंके योगसे युक्त, सात धातुओंसे निर्मित, तीन मलोंसे दूषित, दो योनियोंसे युक्त तथा चार प्रकारके आहारसे पोषित होता है । पञ्चात्मक कैसे है ? पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश (—इनसे रचा हुआ होनेके कारण) शरीर पञ्चात्मक है । इस शरीरमें पृथिवी क्या है ? जल क्या है ? तेज क्या है ? वायु क्या है ? और आकाश क्या है ? इस शरीरमें जो कठिन तत्त्व है, वह पृथिवी है, जो द्रव है, वह जल है, जो उष्ण है, वह तेज है, जो सञ्चार करता है, वह वायु है, जो छिद्र है, वह आकाश कहलाता है । इनमें पृथिवी धारण करती है, जल एकत्रित करता है, तेज प्रकाशित करता है, वायु अवयवोंको यथास्थान रखता है, आकाश अवकाश प्रदान करता है । इसके अतिरिक्त श्रोत्र शब्दको ग्रहण करनेमे, त्वचा स्पर्श करनेमें, नेत्र रूप ग्रहण करनेमें, जिह्वा रसका आस्वादन करनेमें, नासिका सूँघनेमें, उपस्थ आनन्द लेनेमे तथा पायु मलोत्सर्ग- के कार्यमें लगा रहता है । जीव बुद्धिद्वारा ज्ञान प्राप्त करता है, मनके द्वारा सङ्कल्प करता है, वाक् इन्द्रियसे बोलता है। शरीर छः आश्रयोवाला कैसे है ? इसलिये कि वह मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कटु और कषाय—इन छ. रसोंका आस्वादन करता है । षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद—ये सप्त स्वर तथा इष्ट, अनिष्ट और प्रणिधानकारक (प्रणवादि) शब्द मिलाकर दस प्रकारके शब्द (स्वर) होते हैं । शुक्ल, रक्त, कृष्ण, धूम्र, पीत, कपिल और पाण्डुर—ये सप्त रूप (रंग) हैं ॥ १ ॥

सात धातुओंसे निर्मित कैसे है ? जब देवदत्तनामक व्यक्तिको द्रव्य आदि भोग्य विषय जुड़ते हैं, तब उनके परस्पर अनुकूल होनेके कारण षड्रस पदार्थ प्राप्त होते हैं—जिनसे रस बनता है । रससे रुधिर, रुधिरसे मास, माससे मेद, मेदसे स्नायु, स्नायुसे अस्थि, अस्थिसे मज्जा और मज्जासे शुक्र—ये सात धातुएँ उत्पन्न होती हैं । पुरुषके शुक्र और स्त्रीके रक्तके संयोगसे गर्भका निर्माण होता है । ये सब धातुएँ हृदयमे रहती हैं, हृदयमें अन्तराग्नि उत्पन्न होती है, अग्निकेस्थानमें पित्त, पित्तके स्थानमें वायु और वायु- से हृदयका निर्माण सृजन-क्रमसे होता है ॥ २ ॥ ऋतुकालमें सम्यक् प्रकारसे गर्भाधान होनेपर एक रात्रि- में शुक्र शोणितके संयोगसे कलल बनता है । सात रातमें बुद्बुद बनता है । एक पक्षमें उसका पिण्ड (स्थूल आकार) बनता है । वह एक मासमें कठिन होता है । दो महीनोंमें वह सिरसे युक्त होता है, तीन महीनोंमें पैर बनते हैं, पश्चात् चौथे महीने गुल्फ (पैरकी घुट्टियाँ), पेट तथा कटि-प्रदेश तैयार हो जाते है । पाँचवें महीने पीठकी रीढ तैयार होती है । छठे महीने मुख, नासिका, नेत्र और श्रोत्र बन जाते हैं । सातवें महीने जीवसे युक्त होता है । आठवें महीने सब लक्षणोंसे पूर्ण हो जाता है । पिताके शुक्रकी अधिकतासे पुत्र, माताके रुधिरकी अधिकतासे पुत्री तथा शुक्र और शोणित दोनोंके तुल्य होनेसे नपुंसक संतान उत्पन्न होती है । व्याकुल चित्त होकर समागम करनेसे अन्धी, कुबड़ी, खोड़ी तथा बौनी संतान उत्पन्न होती है । परस्पर वायुके सङ्घर्षसे शुक्र दो भागोंमें बँटकर सूक्ष्म हो जाता है, उससे युग्म