कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१६वें अध्यायमे वर्णित असुर मानवके लक्षणोंका मिलान
१३८ ५. महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सारा मानव-समाज बड़े वेगसे इसी असुरभावकी ओर दौड़ रहा है। व्यक्तिगत सकुचित स्वार्थने उसको महान् लक्ष्यसे च्युत कर दिया है। पता नहीं इसका क्या परिणाम होगा । गीताके १६वें अध्यायमे वर्णित असुर मानवके लक्षणोंका मिलान करनेसे आजका मानव समाज उसमें प्रायः पूरा उतरता है ।] दया और दानके पश्चात् एक त्रुटि शेष रह जाती है । वह है इन्द्रियनिग्रह । देवता अपने देवत्वके पदसे इसीके अभावसे गिर जाता है । एक कामी पुरुषका कहीं मान नहीं होता। जब इन्द्रियाँ अपने विषयसे पृथक् होने लगती है तो उनकी अन्तर्वृत्ति हो जाती है। गीताके १६ वें अध्यायमें कहा है— त्रिविध नरकस्येद द्वारं नाशनमात्मन । काम क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रय त्यजेत् ॥ (२१) 'काम, क्रोध और लोभ तीनों आत्माके नाशक और नरकके द्वार हैं। इसलिये इनको त्यागना ही चाहिये ।' य शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुख न परा गतिम् ॥ (गीता १६ । २३) 'जोवेद शास्त्रविहित विधिको छोड़कर (कामनासे प्रेरित होकर) मनमाना काम करते हैं, उनको न तो फलकी सिद्धि होती है, न सुख मिलता है, न मोक्षकी ही प्राप्ति होती है।' (४) त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययन दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीय। अत्यन्तमात्मान- माचार्यकुलेऽवसादयन् । सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति, ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति । (छान्दोग्य० २ । २३ । १) धर्मके तीन भाग हैं। यज्ञ, स्वाध्याय और दान मिलकर प्रथम स्कन्ध या भाग होता है । तपस्या ही दूसरा भाग है। आचार्यकुलमें रहता हुआ अपनेको जो तपस्वी बनाता, है यह तीसरा भाग है। वे सभी पुण्यलोकवाले होते हैं, परतु इनमेसे ब्रह्मनिष्ठ मुक्तिको पाता है। यज्ञ यज्ञके सम्बन्धमें मुण्डकोपनिषद्में उपदेश है— यदा लेलायते ह्यर्चि समिद्धे हव्यवाहने । तदाज्यभागावन्तरेणाहुती प्रतिपादयेत् ॥ 'जब अग्नि भलीभाँति जलायी जा चुके और उसमे लौ उठने लगे तब उसमें घी, सामग्री आदिकी आहुतियाँ श्रद्धा- पूर्वक देनी चाहिये । क्योंकि हवनको जलानेवाली अग्नि 'हव्यवाहन' है। अर्थात् हविको सूक्ष्म करके वायुमण्डलमें फैला देती है। इससे वायु शुद्ध होकर रोगके कीटाणु नष्ट हो जाते हैं, और स्वास्थ्यको लाभ पहुँचता है। यज्ञके रसायनशास्त्र (Chemistry के अनुसार Aldehydes नामरू वायु (Gas) पैदा होती है, जो रोगोंको दूर करनेवाली तथा स्वास्थ्यवर्द्धक होती है। आश्वलायन गृह्यसूत्रमे यज्ञके ये लाभ बतलाये ह— ॐ अयंत इध्म आत्मा जातवेदस्तेन इध्यम्ब वर्धस्व च इद्धय वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन अन्नाद्येन समेधय स्वाहा। (८।२०।२२) 'हे अग्नि ! तू प्रज्वलित होकर हमको प्रज्वलित कर । तू बढ ओर हमको भी बढा प्रजया अर्थात् मतानसे, पशुओसे, आत्मज्ञानसे तथा अन्नमे । यज्ञमे इन चारों पदाथार्की प्राप्ति हो जाती है।' यज्ञमे हव्य पदार्थ सूक्ष्म होकर रोगोंको नाश करते हुए, पुष्टिदायक पदार्थोसे गरीरको पुष्ट करते हैं । पहले हलवाई कभी भी दुबले नहीं देखे जाते थे। क्योंकि वे कढाईके पास बैठकर असली घीकी वाष्पको बराबर ग्रहण करते रहनेसे पुष्ट हो जाते थे। यह है घीके वाष्पका प्रभाव । जब यह बाष्प अन्य ओषधियों तथा सौम्य पदाथंके वाष्पसे युक्त होकर शरीरमें प्रवेश करेगी तो उसके लाभसे गरीर तथा मस्तिष्क पुष्ट होगा और मन शान्त होगा। इनके गान्त होनेपर उपर्युक्त लाभ अर्थात् सन्तान, पशु आदि ऐश्वर्यशाली पदार्थोंकी प्राप्ति होती ही है। मुण्डकोपनिषद्मे कहते हैं— यस्याग्निहोत्रमदर्शमपौर्णमास- मचातुर्मास्यमनाग्रयणमतिथिवर्जितं च । अहुतमवैश्वदेवमविधिना हुत- मासप्तमास्तस्य लोकान् हिनस्ति ॥ काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा । स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वा ॥ एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकाल चाहुतयो ह्याददायन् । त नयन्त्येता. सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥
- कल्याण-मार्ग * १३९ एह्येहीति तमाहुतय सुवर्चस सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति। प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य एष वः पुण्य सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥ ( १।२।३–६) 'यज्ञ कई प्रकारके हैं। अग्निहोत्र जिसका नित्य साय और प्रातः करनेका विधान है। दूसरी दर्श-इष्टि, जो अमावस्याको की जानी है, और पौर्णमास-इष्टि जो पूर्णिमाको की जाती है। तीसरी चातुर्मास्य-इष्टि जो वर्षाऋतुमे की जाती है। चौथी आग्रयण-इष्टि, पाँचवीं अतिथि-यज्ञ, छठा वैश्वदेवयज्ञ है। जो गृहस्थ इन यज्ञोंको नहीं करता, उसके सात लोक नष्ट हो जाते हैं। काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिङ्गिनी, विश्वरुची-ये अग्निकी सात जिह्वाएँ हैं। जो लोग इस प्रकार प्रदीप्त अग्निमें आहुतियाँ देते हैं, उनकी आहुतियोंको सूर्यकी किरणें उस स्थानपर पहुँचा देती हैं, जहाँ देवोंके पति अर्थात् ब्रह्मका निवास है। ये आहुतियाँ सूर्यकी किरणोंके साथ चलती हुई मानो यजमानको बड़ी मीठी बोलीमें पुण्यलोककी ओर बुलाती हैं। तात्पर्य यह है कि नित्य श्रद्धाके साथ यज्ञ करनेसे जीवन पवित्र होता है और परलोक बनता है।' अध्ययन तैत्तिरीय उपनिषद्में शिक्षाका विषय मुख्यतया प्रतिपादित किया है। उसमें स्वाध्यायके विषयमे लिखा है— ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च। तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च। दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्नयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च । अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । मानुषं च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यमिति सत्यवचा राथीतर । तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टि । स्वाध्याय-प्रवचने एवेति नाको मौद्गल्य । तद्धि तपस्तद्धि तप ॥ (१।९।१) 'ऋत अर्थात् सृष्टिके नियमोंको यानी विज्ञान (Science) को पढ़ो-पढ़ाओ। स्वाध्याय कहते हैं स्वय पढनेको एवं प्रवचन कहते हैं दूसरोंके पढ़ानेको। तपके साथ पढ़ो-पढ़ाओ। तप कहते हैं सात्विक श्रमको। इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए पढ़ो-पढाओ। शान्तिपूर्वक पढो-पढाओ। अग्नि (शक्ति 'Power' अर्थात् भौतिक विज्ञान एवं इंजिनियरिंग) को पढो-पढाओ। अग्निहोत्रको करते हुए पढो पढाओ। अतिथिकी सेवा करते हुए पढ़ो-पढाओ। मनुष्यमात्रके कल्याणपर विचार करते हुए पढ़ो-पढाओ। प्रजा अर्थात् सर्वसाधारणके हितका ध्यान करते हुए पढो-पढ़ाओ। प्रजन अर्थात् सन्तानवृद्धिकी समस्याओंपर विचार करते हुए पढो पढाओ। इसके अन्तर्गत केवल मनुष्यकी नहीं वर पशु-पक्षी तथा वृक्षादिकी उत्पत्ति तथा वृद्धिके नियम भी आ जाते हैं। अपनी जातिके हितकी कामनासे पढ़े। राथीतर आचार्यका मत है कि सत्यभाषण सबसे बड़ी चीज है। सत्यभाषण कभी न छोड़ना चाहिये। पौरुशिष्टि आचार्यका कथन है कि तप मुख्य हैं, तपपर बल देना चाहिये। मुद्गल आचार्यके शिष्य नाक स्वाध्याय और प्रवचन-पर बहुत बल देते हैं।' स्वाध्यायसे मस्तिष्कवृद्धिके साथ-साथ आत्मिक उन्नति भी होती है। जैसा मन सोचता है, वैसा बोलता है। जैसा बोलता है, वैसा करता है। दूसरे, पुराना अनुभव बराबर प्राप्त होता रहता है और हमें क्षेत्र मिलता है कि उन अनुभवोंमें हम वृद्धि कर सकें। जहाँ पठन-पाठनकी क्रिया नहीं है, वहाँ पैतृक अनुभव न प्राप्त होनेसे क्रमशः ज्ञान-वृद्धि रुक जाती है। यही ऋषि-ऋण है, जो तीन ऋणोंमेसे एक है, जिसके पालनार्थ हम यज्ञोपवीत धारण करते हैं। गृहस्थियोंको प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा स्वाध्याय करते रहना चाहिये। कभी छोड़ना नहीं चाहिये। दान धर्मकी तीसरी शाखा दान है। उपनिषदोंमें कहा है— श्रद्धया देयम् । अश्रद्धया देयम् । श्रिया देयम् । ह्रिया देयम् । भिया देयम् । संविदा देयम् । 'श्रद्धासे देना चाहिये, अश्रद्धासे देना चाहिये। सौन्दर्यसे देना चाहिये। लोक लज्जासे देना चाहिये। भय अर्थात् पाप-पुण्यके विचारसे देना चाहिये। संविदा अर्थात् ज्ञानपूर्वक दो।' अर्थात् जैसा ऊपर कहा जा चुका है कि मनुष्यमात्रके कल्याणको समझकर देना चाहिये। दान पापोंकी वृद्धि करनेवाला न हो। धर्मका दूसरा स्कन्ध तप है। अर्थात् इन्द्रियदमनके साथ-साथ आत्मोन्नतिके लिये घोर परिश्रम करना तप है। तीसरा स्कन्ध है कि नियमके साथ आचार्यकुलमें नियमित समयके लिये निवास करना। गृहस्थ अपनी सन्तान तथा अन्य बालकोंको शिक्षा-दान कराकर इस नियमका पालन कर सकते हैं।
१४० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * आध्यात्मिक मार्गमे अग्रसर होनेके लिये आहारशुद्धिमे ओंकारका (भगवन्नामका ) जाप कर रहा होता हूँ । काम चलना चाहिये । और अपने अंदर दया, दान और आता होगा तो मेरे मनकी ड्योढीको बंद पाकर लौट जाता इन्द्रियदमनकी भावनाको बढाना चाहिये । निरन्तर होगा ।' अतः मनको खाली न रखना सबमे उत्तम यज्ञ करते हुए अध्ययनको भी वरावर करते रहना ब्रह्मचर्यका साधन है । चाहिये । आहारशुद्धि, यज्ञ और दान कर्म हैं, जिनको इन साधनों को अपनानेसे मनुष्यका कल्याण होता है, प्रयत्नसे कर सकते हैं । दया स्वयं आहारशुद्धिमे पैदा और राष्ट्रका भी कल्याण होता है । एक विद्वान् धर्मात्मा होने लगती है । आहारका प्रभाव इन्द्रियदमनपर पड़ता है । योगी राष्ट्रकी गतिविधियोको बदल देना है । ऐसे पुरुष देवता दूसरे, अध्ययन मनोविचारोंको भी शुद्ध करता है । हो जाते हैं । जिनमे दिव्य गुण हो, वह देवता है । धन्य है स्वामी दयानन्दमे जब बगालके प्रसिद्ध नेता अश्विनीकुमार- वह राष्ट्र जहाँ ऐसा देव-समाज प्रमुख हो । जहाँ असुर अर्थात् ने ब्रह्मचर्यके साधनोपर प्रश्न करते हुए पूछा कि 'महाराज ! स्वार्थी, क्रूरकर्मा तथा दुराचारी व्यक्तियोंका प्राधान्य है, आपने यह ऊँची स्थिति किस साधना और किस उपायमे वहीं कष्ट है, दुःख है और निश्चित पराभव है। हमारे राष्ट्रके प्राप्त की है ?' तो उन्होंने बड़ा ही सुन्दर उत्तर दिया कि नेता, हमारे राज्यके सूत्रधार इसी उपनिषद् धर्मको पालन 'इसका उपाय बड़ा सरल है। मे कभी अपने मनको खाली करते हुए राष्ट्रको परमोन्नत दशामें पहुँचा सकते हैं । नहीं रहने देता । मै हर समय किसी-न किसी काममें लगा 'ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति' । वेद कहता है कि रहता हूँ । कभी वेदभाष्य, कभी वेदाङ्गप्रकाश लिखना, 'ब्रह्मचर्य और तपसे राजा राष्ट्रकी रक्षा करता है ।' धर्मके कभी दर्शकोंके प्रश्नोंका समाधान, कभी शास्त्रार्थ और कभी इन नियमोंपर चलना ही ब्रह्मचर्य है, तप है । ये ही नियम पत्रोत्तर लिखवाता हूँ। जब कोई और काम नहीं होता तो महाराज जनककी तरह व्यक्तिको विदेह बना सकते हैं । उपनिषत्सार ( रचयिता—श्रीभवदेवजी झा ) यही सब उपनिषदोंका सार । सार-रूप केवल ईश्वर है, यह संसार असार ॥ १ ॥ क्षणभङ्गुर दुर्लभ मानव-तन, विषय सभी निस्सार । बरबस इस मनको वशमें कर, करो आत्म उद्धार ॥ २ ॥ भू-मण्डलके कण-कणमें है, विभुका ही विस्तार । सबमें जीव समान जानकर, करो तुल्य-व्यवहार ॥ ३ ॥ अनासक्त होकर करना है, निज आहार-विहार । अहंकार-परिहार न जबतक, नहीं कर्म-निस्तार ॥ ४ ॥ सत्य-शोध ही भव-रोगोंका, एक मात्र उपचार । आत्म-बोध ही पहुँचाता है, जगन्मुक्तिके द्वार ॥ ५ ॥ देही अजर-अमर-अक्षर है, देह विकारागार । यही देह-देही-विवेक ही, देता पार उतार ॥ ६ ॥ है स्वरूप-विस्मृति ही माया, और ब्रह्म ओंकार । निर्गुण-सगुण एक ईश्वर है, निराकार-साकार ॥ ७ ॥ 'मैं' हूँ निर्व्यापार न मेरा, नाम-रूप-आकार । 'मैं' भी वही ब्रह्म हूँ, सत्-चित्-सुखका पारावार ॥ ८ ॥
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भगवान् श्रीरामचन्द्र और औपनिषद ब्रह्म
( लेखक—प० श्रीरामकिङ्करजी उपाध्याय )
[बायाँ स्तम्भ]
गिरिराज हिमालयके सर्वोच्च शिखरका नाम है—कैलास (आनन्दका निवास स्थान) । सचमुच आनन्द यहाँ मूर्तिमान् होकर निवास करता है। यह है भगवान् भूतभावन शिवकी, क्रीडास्थली । इस शिखरके ही एकान्त शान्त प्रदेशमें एक है विशाल वट-वृक्ष, जिसे भगवान् शिवका विश्रामस्थल कहा जाता है। पर यह विश्राम शब्द भी है सांकेतिक ही—
सो सुख धाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक विश्रामा ॥
—मानकर शम्भु विश्रामके मिस यहाँ आकर प्रभु-प्रेममे तन्मय हो उनके नाम-रूपका स्मरण करते रहते हैं ।
एक दिन शशाङ्कशेखर अपने गणोंसे बिना कुछ कहे ही वटकी सुशीतल छायामें व्याघ्रचर्म बिछा सहज ही जा विराजे । गिरिराज-नन्दिनी भवानी सुअवसर देख अनिमन्त्रित होनेपर भी भगवान् शिवके चरणोंमे जाकर प्रणत हुईं । परम कृपालु महेशने उनके मानरहित प्रेमको देखकर उनका सत्कार करते हुए बैठनेको आसन दिया । शैलजाके हृदयमें पूर्वजन्मसे ही एक सन्देह गूँज रहा था। उसको पूर्ण रीतिसे निवृत्त कर लेना ही उन्हें उचित जान पड़ा। प्रमथेशकी आज्ञा पाकर उन्होंने प्रश्न किया—'प्रभु ! मैने वेदवक्ता मुनियोंके मुखसे ब्रह्मका जो वर्णन सुना है, उसमें उन्हें व्यापक, विरज, अज, अकल, अनीह और अभेद आदि नामोंसे सम्बोधित किया गया है। क्या ऐसे ब्रह्मका अवतार सम्भव है ?'
ब्रह्म जो व्यापक विरज अज अकल अनीह अभेद । सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानन वेद ॥
हाँ, त्रैलोक्य पालक भगवान् विष्णुका अवतार राम-रूपमे होता है। यह मैने ऋषियोंके मुखसे सुना है। परंतु ब्रह्मका अवतार तो बुद्धिमे न आनेवाली बात है। उपनिषदोंमे भी विशेषरूपसे निर्गुण निर्विशेषका वर्णन आता है, यह भी मैंने सुना है। क्या उपनिषत्-कथित निर्गुण-निर्विशेष ब्रह्म और रघुवंशशिरोमणि राममें कोई भेद नहीं ? आस्तिकोंके लिये तो श्रुति ही परम प्रमाण है। और जब वह निर्गुण ब्रह्मके वर्णनको ही विशेषरूपसे अपना लक्ष्य बनाती है, तब सगुण-साकार रामके प्रति आपका यह प्रेममय भाव कुछ समझमें नहीं आता। राम ही ब्रह्म है, क्या यह आपका स्वतन्त्र मत है ? आपसे बढ़कर वेदार्थका ज्ञाता और कौन है ?
[दायाँ स्तम्भ]
तुम्ह त्रिभुवन गुर वेद बखाना । आन जीव पांवर का जाना ॥ अस्तु । प्रभु जे मुनि परमारथवादी । कहहि राम कहँ ब्रह्म अनादी ॥ रामु सो अवध नृपनि सुत सोई। की अज अगुन अलखगति कोई ॥ जौं अनीह व्यापक विभु कोऊ। कहहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ ॥
अपर्णाकी छलविहीन वाणी सुनकर कामारि परम प्रसन्न हुए, क्योंकि इसी मिससे उन्हे प्रभुके गुणानुवाद गानेका एक सुअवसर प्राप्त हो गया । प्रभुके रूप-गुणका स्मरण होते ही गङ्गाधरके नेत्रोंमे प्रेमाश्रु छलक पड़े। हृदयसे भक्तिकी एक नव-मन्दाकिनी निकलकर भगवती भवानीको आप्लावित और शीतल करने लगी—
मगन ध्यानरस दंड जुग पुनि मन बाहेर कीन्ह । रघुपति चरित महेस तब हरषित बरनै लीन्ह ॥
उत्तर देते हुए भगवान् शिवने कहा—उमा ! प्रभु-विषयक प्रश्न तो सदा ही परम कल्याणकारी है। पर तुम्हारा यह कहना मुझे रुचिकर नहीं लगा कि क्या 'वेद-प्रतिपादित ब्रह्म ही राम है ?' ऐसा सन्देह तो वेदार्थका ठीक ज्ञान न रखनेवाले ही करते हैं।
कहहि सुनहि अस अधम नर ग्रसे जे मोह पिसाच । पाषंडी हरि-पद विमुख जानहि झूठ न साँच ॥
शिवे ! वास्तवमें 'ब्रह्म-तत्त्व' अचिन्त्य ही है। इसीलिये वेदोंने भी उसका वर्णन 'नेति, नेति' रूपसे ही किया है ।
नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद निरुपाधि अनूपा ॥
तुमने कहा कि 'राम ही ब्रह्म हैं। क्या यह आपका स्वतन्त्र मत है ?' पर तुम्हारा यह कथन समीचीन नहीं। श्रुति-विरुद्ध तो भगवत्-कथन भी आस्तिकोंको मान्य नहीं। इसीसे तो बुद्ध भगवान्के प्रति श्रद्धाका भाव रखते हुए भी उनकी वेद विरुद्ध कथित बातोको कोई भी आस्तिक स्वीकार नहीं करता—
अतुलित महिमा वेद की तुलसी कीन्ह विचार । ज निन्दत निन्दित भयो विदित बुद्ध अवतार ॥
इसलिये मै जो कुछ कहूँगा, वह श्रुति-सम्मत ही कहूँगा। जैसा मैने पूर्वमें ही कहा कि वेद भी उस ब्रह्मके स्वरूपका यथार्थ निर्देश करनेमें मौन ही रहते हैं। तुम्हारा यह कथन किसी अंशमें यद्यपि ठीक ही है कि उपनिषदोंमें निर्गुण अचिन्त्यरूपका
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१४२ ॐ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॐ ही विशेषरूपसे निर्देश किया गया है। पर यह तो असमर्थताके कारण ही, क्योंकि निर्गुण व्यापक रूपसे तो उसका समझाना कुछ सरल भी है। पर उसके दिव्य चिदानन्दमय सौन्दर्य- माधुर्य-सुधा समुद्र सगुण-साकार मगल विग्रहके असमोर्ध्व अचिन्त्यानन्त कल्याण-गुणगण और उसकी मुनि मन हारिणी कमनीय रूप माधुरीका न तो यथार्थतः वर्णन ही किया जा सकता है, न उसे समझाया ही जा सकता है— निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन न जानइ कोइ । सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ ॥ निर्गुण रूप तो विचारगम्य है और विचारका उत्पादन साधनोंसे सभव है। पर सगुण स्वरूप तो बिना प्रेमके समझा ही नहीं जा सकता। और प्रेम साधनसे उत्पन्न नहीं किया जा सकता। वह तो प्रभु-कृपासे ही सम्भव है। इसलिये जहाँ- तक साधन-बल है, वहाँतकके स्वरूपका निर्देश कर सगुण- स्वरूपका केवल सकेत करते हुए ही उपनिषद् मौन हो जाते हैं। वेद तो स्वय श्रीभगवान्के दर्शन एव उनके प्रेमकी सदा आकाङ्क्षा करते रहते हैं। इसीलिये तो नृपालचूडामणि मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीराघवेन्द्रके राज्याभिषेकके अवसर- पर चारों वेद 'बदी वेष' मे प्रभुके स्वरूपका विशद विवेचन करते हुए अन्तमें कहते है— ज ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मन-पर ध्यावहीं । ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं ॥ करुनायतन प्रभु सदुनाकर देव यह वर माँगहीं । मन वचन कर्म विकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं ॥ वास्तवमे प्राकृतगुणरहित सगुण ब्रह्म वर्ण्य है ही नहीं। वे तो प्रेम ही करनेयोग्य है। वर्णन तो निर्गुणका ही सम्भव है। इसीसे अगस्त्यजीने प्रभुके चिन्मय स्वरूपका विवेचन करते हुए अन्तमें कहा— जद्यपि ब्रह्म अखड अनता । अनुभवगम्य मजहि जेहि सता ॥ अस तव रूप बखानउँ जानउँ । फिरिफिरि सगुन ब्रह्मरति मानउँ ॥ जबतक प्रभु कृपा किंवा सत-कृपासे हृदयमे प्रेमका प्राकट्य न हो जाय, तबतक प्रभुकी मङ्गलमयी लीलाका वर्णन सार्थक नहीं। गिर्रिजे ! मैं स्वय भी अनधिकारीके प्रति इसका उपदेश नहीं करता। तुम्हे मै अपनी एक चोरी बता रहा हूँ। बात उस समयकी है, जब तुम दक्ष तनया सतीके रूपमे मेरे निकट थी, उस समय तुम्हारा चित्त बड़ा ही सशय-ग्रस्त था। इसीसे जब मैने सुना कि प्रभु अपनी दिव्य लीलाका प्राकट्य करनेके लिये अयोध्यामें अवतरित हो गये है, तब मैंने इस सुखवादका सुनाना तुमसे उचित न समझा। क्योंकि रसका प्रसङ्ग सच्चा रसिक ही समझ सकता है। हाँ, मैने परमप्रभु- प्रेमी काकभुशुण्डिको अवश्य ही साथ ले लिया। औरउ एकु कहउँ निज चोरी। सुनि गिरिजा अति दृढ मति तोरी ॥ कागभुसुडि सग हम दोऊ । मनुज रूप जानइ नहि कोऊ ॥ परमानन्द प्रेम सुख फूले । वीथिन्ह फिरहि मगन मन भूले ॥ पर अयोध्याकी वीथियोंमे विहरण करनेपर भी बिना प्रभु दर्शनके हमारी तृप्ति न हुई। तब हम दोनोंने गुरु-शिष्य- रूपसे ज्योतिषीका बाना बनाया और अपने गुणका ख्यापन करनेके लिये अयोध्याके राजप्रासादकी दासियोंके पुत्रोंके हाथ देखने प्रारम्भ किये। अन्तम दासियोंने जाकर कौसल्या अम्बासे इसकी सूचना दी— अग्रह आजु आगनि एक आयो । बूढो बडो प्रमाणिक ब्राह्मन सकर नाम सुहायो ॥ अन्तमें हम दोनोंकी मनोकामना पूर्ण हुई और कौसल्या अम्बाने अपने लालका भविष्य जाननेकी इच्छासे हमें भीतर बुलवा लिया। गिर्रिजे ! शिशु-ब्रह्मके इस नव-नील- नीरद दिव्य वपुपुको निहारकर नेत्रोंको जो आनन्द हुआ, वह वर्णनातीत है। वह उपनिषत् कथित व्यापक ब्रह्म कौसल्या अम्बाकी नन्ही सी गोदीमें पड़ा मन्द-मन्द मुसकरा रहा था। सर्वतन्त्र-स्वतन्त्रकी यह प्रेमपराधीनता देख मेरे मुखसे बरबस ही निकल पड़ा कि— ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन विगत विनोद । सो अज प्रेम-भगति-वस कौसल्या कें गोद ॥ प्रिये ! शिशु ब्रह्मकी यह अद्भुत झाँकी, वाणीका नहीं, नेत्रका विषय है। रूप सरूहि नहि कहि श्रुति सेषा । सो जानइ सपनेहुँ जहि देखा ॥ प्रभु सोभा सुख जानहि नयना। कहि किमि सकहि तिन्हहि नहिं बयना॥ मङ्गलमय प्रभुके श्रीकरारविन्दोंको अपने हाथमें ले मैने कालातीत प्रभुका भविष्य-कथन भी कर डाला। इस सौभाग्य- सुखसे मे कुछ कालमें वञ्चित कर दिया गया। क्यों, उन अनीह प्रभु लीला प्रेम-विहारीको बुभुक्षा सता रही थी और वह पूर्णकाम वात्सल्य सुधारिपूर्ण पवित्र मातृ-स्तनोंका पान करनेके लिये अत्यन्त लालायित हो रहा था। प्रभुकी इस परम कौतूहलमयी लीलाका वार बार स्मरण करता हुआ मे कैलास- शिखरपर लौट आया। पर लौटनेपर भी यह रहस्य मैंने उस समय तुम (सती) से छिपा ही रक्खा और आज उसे तब व्यक्त कर रहा हूँ, जब तुम्हारे हृदयमे प्रभुको पहचाननेकी सच्ची जिज्ञासा जाग्रत् हो गयी है।
- भगवान् श्रीरामचन्द्र और औपनिषद ब्रह्म * १४३ निर्गुण निराकार ब्रह्मकी उपनिषत्-कथित पद्धतिसे उपासनाके पश्चात् ही प्रभुके पुनीत पाद-पद्मोंमे प्रेम उत्पन्न होता है। उपनिषद्-ज्ञानकी परिसमाप्तिपर ही प्रभु-प्रेमका पावन प्रारम्भ होता है— जहँ लगि साधन वेद बखानी। सब कर फल हरि भगति भवानी ॥ सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई। गमकूपा काहू इक पाई ॥ ज्ञान-वैराग्यके द्वारा जिन्होंने अपने सच्चे नेत्रोको प्राप्त कर लिया है, उपनिषद् केवल उन्हीको रघुवगमणिके इस स्वरूपका सकेत करते हैं। अब मै तुम्हारे प्रश्नोंकी ओर आता हूँ। तुम्हारा यह कथन 'अगुण सगुण कैसे हो सकता है?' इसके लिये केवल जलका उदाहरण देना पर्याप्त है। जैसे जल वर्फ रूपमें परिणत होकर भी जल ही रहता है—उसमे कोई विकृति नहीं आती, उसी तरह निर्गुणका सगुण रूपमे परिणत होना है— जो गुनरहित सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहि जैसें ॥ तुम्हारा यह कथन भी सर्वथा भ्रान्त ही है—'व्यापक एकदेशीय हुए बिना अवतरित कैसे होसकता है?' वास्तवमें अवतरित होनेपर भी सर्व देश उनमें ही निवास करते हैं। एक देशमें उनका दर्शन तो हमारे नेत्रकी सीमित शक्तिके कारण ही प्रतीत होता है। यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो सर्वव्यापकताकी सच्ची सिद्धि तो प्रभुके प्राकट्यकालमें ही सम्भव है, क्योंकि निर्गुण-निराकार रूपसे वह सर्वत्र है ही, इसका क्या प्रमाण ? उसका होना तो केवल माना हुआ ही है, क्योंकि वह रूपवान् तो है नहीं। अवतारकालमे एक देशमें प्रतीत होते हुए भी 'सर्वदेश उसमें है और वह सर्व-देशमें है' यह स्पष्ट रूपसे सिद्ध हो जाता है। एक बार परम भक्त कागजीको ऐसा ही सदेह हो गया था। श्रीदशरथजीके मणिमय प्राङ्गणमें शिशु-ब्रह्म बाल-क्रीड़ामें निमग्न था। महाभाग काग भी कौसल्यानन्दनकी इस मङ्गलमयीलीलाका आनन्द लेनेके लिये 'लघु वायस वपु' धारण कर उनके निकट ही विचरण कर रहा था। अचानक प्रभुको एक विनोद सूझा। कागको और भी निकट बुलानेके लिये अपने हाथका मालपुआ उसकी ओर बढ़ा दिया। पर ज्यों ही प्रसादके लोभसे भुशुण्डि निकट आया, त्यों ही प्रभुने अपने श्रीकरारविन्दोंको खींच लिया। इस प्रकारका विनोद कुछ क्षणोंतक चलता रहा। कागके हृदयमें एक नवीन प्रश्न उठ खड़ा हुआ, प्रभुको न पकड़ सकनेकी इस असमर्थता-को देखकर— प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह । कवन चरित्र करत प्रभु चिदानन्द-सदोह ॥ फिर क्या था। प्रभुने अपनी भुजाएँ फैला दीं पकड़नेके लिये और काग भी अपनी सम्पूर्ण शक्तिके साथ उड़ चला। अपनी इस अवस्थाका वर्णन उसने इन शब्दोंमें किया है— सप्तावरन भेद करि जहाँ लगे गति मोरि । गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि व्याकुल भयउँ बहोरि ॥ लौटकर आना पड़ा प्रभुके उन्हीं अभयप्रद चरणोंमें। पर प्रभुने सोचा सर्वव्यापकताके दर्शनको अधूरा ही क्यों छोड़ा जाय। मुस्कराकर राघवेन्द्रने मुँह खोला और तुरंत कागको उदरस्थ कर लिया। तब दिखायी पड़ा कागको वह आश्चर्यमय कौतुक, जिसका वर्णन उसने इन शब्दोंमे किया है— उदर माझ सुनु अडजराया। देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया ॥ अति विचित्र तहँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका ॥ कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा। अगनित उडगन रवि रजनीसा ॥ अगनित लोकपाल जम काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला ॥ सागर सरि सर विपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि विस्तारा ॥ सुर मुनि सिद्ध नाग नर किन्नर। चारि प्रकार जीव सचराचर ॥ जो नहि देखा नहि सुना जो मनहूँ न समाइ । सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि विधि जाइ ॥ एक एक ब्रह्मांड महुँ रहउँ बरष सत एक । एहि बिधि देखत फिरतँ मैं अंड कटाह अनेक ॥ इस प्रकार रामने भक्त कागको अपनी सर्वकारणता और सर्वाश्रयता दिखला दी। × × × × वास्तवमे अवतार-कालमे भी ब्रह्म एक देशमें सीमित नहीं हो जाता। जैसे सूर्यमण्डल उतना लघु नहीं, जितना हमारे लघु नेत्रोंसे दीखता है, वह तो अकेला ही समग्र ब्रह्माण्डको प्रकाशित करता रहता है। उसी तरह ब्रह्मका एक देशमें प्रतीत होनेमे भी अपना भ्रम ही मानना चाहिये। वहाँ भी वह सर्व-देशीय ही है, एकदेशीय नहीं। रविमंडल देखत लघु लागा। उदयँ तासु त्रिभुवन तम भागा ॥ तुम्हारा यह कथन कि वह देह कैसे धारण कर सकता है? यह भी ब्रह्म रामके देहका ठीक स्वरूप न जाननेके कारण ही है। क्या उसका शरीर साधारण प्राणियोंका-सा पञ्चतत्त्वोंसे निर्मित है? वास्तवमें प्रभुमें तो देह-देहीका कोई भेद है ही नहीं, इसीलिये उनके देहको भी सच्चिदानन्दघन-विग्रह कहा जाता है।
१४४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * चिदानंदमय देह तुम्हारी । विगत विकार जान अधिकारी ॥ सच्चिदानन्दमय होनेसे उनको इन मायिक नेत्रोंसे देखा भी नहीं जा सकता। प्रभुका स्वरूप इन्द्रियोंका विषय है ही नहीं, इसीसे वाल्मीकिजीने प्रभुकी वन्दना करते हुए कहा— गम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर । अविगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह ॥ गिरिजे ! सृष्टिकी एक भी वस्तुका समग्र रूपसे वर्णन नहीं किया जा सकता, फिर सर्वमय और सर्वकारण एव साथ ही सर्वपर तथा सर्व कारणकारणातीत ब्रह्म रामका विवेचन बुद्धि या वाणीसे कैसे सम्भव है। प्रकाश्य प्रकाशकको प्रकाशित करे, क्या यह कभी देखा-सुना गया है ? राम तो इन्द्रिय, मन, देवता—सभीके प्रकाशक, जीवके भी परम प्रकाशक हैं। फिर अपनी उस बुद्धिसे हम उनके ठीक स्वरूप समझने या समझानेकी चेष्टा करें, यह कितनी हास्यास्पद बात है ? विषय करन सुर जीव समेता । सकल एक तें एक सचेता ॥ सव कर परम प्रकासक जोई । राम अनादि अवधपति सोई ॥ इसीलिये कहना पड़ता है— राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी । मत हमार अस सुनहि सयानी ॥ वे अवतार ही क्यों लेते हैं ? इसका भी ठीक उत्तर नहीं दिया जा सकता ? यह है भी उनके स्वरूपके अनुरूप ही । यदि ठीक बताया जा सकता तो वे भी ज्ञात विषयोंकी श्रेणीमें आ जाते । उनके अवतरित होनेके विषयमे प्रत्येक व्यक्ति अपनी भावनाके अनुरूप ही अर्थ लेता है। देवता समझते हैं— हमारी रक्षाके लिये, धार्मिक मुनि समझते हैं धर्मरक्षाके लिये और राक्षसोंको भी यह सोचनेका अधिकार है कि वे उन्हें गति देनेके लिये आते हैं। वास्तवमें देखा जाय तो प्रभुके अवतार लेनेसे सभी जीवोंको कुछ-न कुछ प्राप्त होता है। वे तो कारणातीत होनेसे सहज ही अवतरित होते हैं, पर उनके इस सहज कारुण्यसे असंख्य जीवोंको सन्मार्ग और कल्याणकी प्राप्ति हो जाती है। अथवा यह भी कहा जा सकता है कि जिन अमलात्मा परमहंसोंने निर्गुणोपासनासे अपने कर्म-बन्धनोंका सर्वथा उच्छेद कर डाला है और ज्ञाननिष्ठामें सर्वथा परिनिष्ठित हैं, उनके ऊपर प्रसन्न होकर उनको अपने इस सच्चिदानन्द- विग्रहका प्रत्यक्ष दर्शन और भक्तियोगमें प्रवृत्त करानेके लिये ही प्रभु अवतरित होते हैं। शुभे ! सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमारोंको तो तुम जानती ही हो, उनका दिव्य-देह भौतिक नहीं, जिनकी सदा एकही-सी बाल्यावस्था बनी रहती है और नित्य निरन्तर ब्रह्मानन्दमे सर्वथा परिनिष्ठ हैं, जिन्हें मूर्तिमान् वेद कहना भी अत्युक्ति न होगी— ब्रह्मानंद सदा लयलीना । देखत बालक बहुरूपारीना ॥ रूप धरे जनु चारिउ बेदा । समदरसी मुनि विगत बिभेदा ॥ उन्होने भी जिस समय आनन्दकन्द प्रभुका श्रीअवध धाममे दर्शन किया, सारी ज्ञाननिष्ठाको बहा दिया । करते भी क्या, प्रभुके कोटि-कन्दर्प कमनीय श्रीअङ्गके दर्शनका प्रभाव ही ऐसा है। उन्होंने मनको निष्ठायुक्त बनाये रखनेकी बड़ी चेष्टा की, पर— मुनि रघुवर छवि अतुल बिलोकी । भए मगन मन सके न रोकी ॥ नेत्र स्थिर हो गये, पलके भी नहीं गिरतीं, प्रेमसे प्रभुके श्रीचरणोंमें बार-बार प्रणाम करते हैं और फिर तो उन्हें इस स्वरूपमें इतना अधिक आनन्द आया कि उन्होने सदा-सर्वदाके लिये प्रभुसे प्रेमभक्तिकी ही कामना की। परमानद कृपायतन मन परिपूरन काम । प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम ॥ क्या ब्रह्मविद्वरिष्ठ सनकादि-जैसे परम तत्त्वज्ञ और वेदार्थके यथार्थ ज्ञाता किसी साधारण राजकुमारको किंवा किसी लौकिक रूपको देखकर इस प्रकार विह्वल हो सकते हैं ? इससे तुम समझ सकती हो कि मै ही नहीं, अपितु अन्य सभी वेदान्तपरिनिष्ठ महापुरुष रघुवंशशिरोमणि सच्चिदानन्दविग्रह भगवान् श्रीराघवेन्द्रको ब्रह्मसे अभिन्न ही नहीं—उनसे बढ़कर मानते हैं और ब्रह्मानन्दको भुलाकर उनकी भक्तिमे सलग्न हो जाते हैं। भेद तो उनको ही जान पड़ता है जो वासनामलिन और ज्ञाननेत्रविहीन हैं। यदि ऐसे लोग वेदका नाम लेकर भी भेदका प्रतिपादन करें तो उन्हें नास्तिक और वेदज्ञानशून्य ही समझना चाहिये । उनकी बातपर ध्यान न देना ही उचित है। अज्ञ अकोविद अंध अभागी । काई विषय मुकुर मन लागी ॥ लंपट कपटी कुटिल बिसेषी । सपनेहुँ सत सभा नहि देखी ॥ कहहि ते वेद असमत बानी । जिन्ह कें सूझ न लाभु नहि हानी ॥ और तब भगवान् पञ्चमुख शङ्करने अपना दृढ मत व्यक्त करते हुए पाँचों मुखोंसे कहा कि 'जिन्हें वेद ऐसा
- भगवान् श्रीरामचन्द्र और औपनिषद ब्रह्म * १४५ कहते हैं, वे ही रघुवंश-शिरोमणि राम मेरे स्वामी हैं— ( १ ) पुरुष प्रसिद्ध प्रकास निधि प्रगट परावर नाथ । रघुकुलमनि मम स्वामि सोइ कहि सिवँ नायउ माथ ॥ ( २ ) विषय करन सुर जीव समेता । सकल एक तें एक सचेता ॥ सब कर परम प्रकासक जोई । राम अनादि अवधपति सोई ॥ ( ३ ) जौं सपने सिर काटै कोई । बिनु जागें न दूरि दुख होई ॥ जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई । गिरिजा सोइ कृपालु रघुराई ॥ ( ४ ) बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना । कर बिनु करम करइ विधि नाना ॥ आननरहित सकल रस भोगी । बिनु बानी बक्ता बड जोगी ॥ तन बिनु परस नयन बिनु देखा । ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा ॥ जेहि इमि गावहिं वेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान । सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान ॥ ( ५ ) कासीं मरत जतु अवलोकी । जासु नाम बल करउँ बिलोकी ॥ सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी । रघुबर सब उर अन्तरजामी ॥ और अन्तमे उपसहार करते हुए भगवान् शङ्करने कहा— अस निज हृदयँ बिचारि तज संसय भजु राम पद । सुनु गिरिराजकुमारि भ्रम-तम रविकर बचन मम ॥ कल्याणमय शिवकी भ्रमभञ्जक वचनावलीको सुनकर गिरिराजकन्दिनीका सारा संदेह जाता रहा और राघवेन्द्र श्रीरामके श्रीचरणोंमें उन्हें अनुपम अनुराग हो गया । भगवान् शङ्करके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए वे बोलीं— ससिकर सम सुनि गिरा तुम्हारी । मिटा मोह सरदातप भारी ॥ तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ । राम स्वरूप जानि मोहि परेऊ ॥ नाथ कृपाँ अब गयउ विषादा । सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा ॥ श्रीपार्वतीजी ही नहीं, भूतभावन भगवान् शिवके इस पवित्र भाषणसे वहाँका कण-कण अपनेको कृतकृत्य अनुभव करने लगा । उपर्युक्त विवेचनसे अवधेशशिरोमणि भगवान् श्रीरामका औपनिषद ब्रह्मसे अभेद ही नहीं सिद्ध होता, बल्कि उनके विशेषज्ञत्वका भी प्रतिपादन होता है । श्रीरामचरितमानसमें ऐसे प्रसङ्ग और भी हैं, उनमेंसे एक प्रसङ्गको संक्षेपमे लिखकर लेख समाप्त किया जाता है । भगवान् श्रीराघवेन्द्र तथा उनके अनुज श्रीलक्ष्मणजी महामुनि गुरु विश्वामित्रजीके साथ मिथिला पधारते हैं । विश्वामित्रजीकी आज्ञासे नगरसे बाहर सभी एक सुन्दर आम्र- वाटिका में ठहरते हैं । यह समाचार जब श्रीमिथिलेशको मिलता है तो वे परम प्रसन्न होकर पवित्र मन्त्री, सैनिक, ब्राह्मण, श्रेष्ठ गुरु और जातिके सरदारोंको साथ लेकर मुनिराजके दर्शनार्थ पधारते हैं । उस समय श्रीराघवेन्द्र अनुज श्रीलक्ष्मण- जी के साथ पुष्पवाटिका देखने गये हुए थे । उनके पीछेसे सौभाग्यशाली महाराज जनक मुनिराजको साष्टाङ्ग प्रणाम करके और उनका आशीर्वाद प्राप्त करके एवं अन्यान्य ब्राह्मणोंको सादर नमस्कार करके मुनिकी आज्ञासे वहाँ- बैठ जाते हैं । इतनेमें ही मृदु-वयस किशोर, नेत्रानन्द-दाता, विश्वचित्त-चौर श्याम-गौर दोनों भ्राता वहाँ आ पहुँचते हैं । उनके वहाँ पहुँचते ही इतना सहज प्रभाव पड़ता है कि सभी तेज- ज्ञान-वयोवृद्ध, योगीन्द्र, मुनीन्द्र, वीरेन्द्र, विप्रेन्द्र आदिके सहित जीवन्मुक्त शिरोमणि तथा सच्चे जिज्ञासुओंको ब्रह्म-तत्त्वका उपदेश देनेवाले विदेहराज जनक सहसा उठ खड़े होते हैं और अपने-आप बैठना भूल जाते हैं । मुनि विश्वामित्रके बैठानेपर बैठते हैं । उस समय सबकी क्या दशा होती है और प्रेम-सुधा-सागर-निमग्न विदेहराज मुनिराजसे क्या पूछते हैं, इसको रामचरितमानसकी भाषामे ही सुनिये— भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता । वारि विलोचन पुलकित गाता ॥ मूरति मधुर मनोहर देखी । भयउ विदेहु विदेहु विसेषी ॥ प्रेममगन मनु जानि नृपु करि विवेकु धरि धीर । बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गभीर ॥ कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक । मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक॥ ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा । उभय वेष धरि की सोइ आवा ॥ सहज विरागरूप मनु मोरा । थकित होत जिमि चंद-चकोरा ॥ इन्हहि विलोकत अति अनुरागा । बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा ॥ जिनके दिव्य मधुर सौन्दर्यके दर्शनमात्रसे सहज वैराग्य- मय चित्तवाले जनक चकोर बनकर श्रीराघवेन्द्रके मुखचन्द्रको निर्निमेष देखते रह जाते हैं, इतना आत्यन्तिक प्रेमानन्द उत्पन्न होता है कि उनका ब्रह्मानन्दमें नित्य-निमग्न मन उसे छोड़ देनेको बाध्य होता है और आँखोंसे आँसू बहाते हुए गद्गद होकर वे बड़ी गम्भीरताके साथ जिन सौन्दर्य-सुधा- निधिका सच्चा परिचय जानना चाहते हैं, वे रामचरितमानसके श्रीराघवेन्द्र साक्षात् औपनिषद ब्रह्म हैं या ब्रह्मसे भी बढ़कर कोई परम तत्त्वविशेष हैं, इसका विचार विज्ञ और रसिक पाठक ही करें । उ० अं० १९–२०—
जैन उपनिषदोंका सार ( रचयिता—श्रीसूरजचन्दजी सत्यप्रेमी 'डाँगीजी' ) आनन्द शान्तिमय हम, मंगल-स्वरूप पायें। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समायैं ॥ध्रु०॥ कल्याणमय शरण है परमात्म-भाव अपना। जगका ममत्व सारा, समझा अनित्य सपना ॥ हम हैं सदा अकेले, क्यों मुग्ध मन बनायें। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समायैं ॥ १ ॥ अपवित्र देहमें अब आसक्ति छोड़ देंगे। मिथ्यात्व अव्रतोंसे निज वृत्ति मोड़ देंगे ॥ सम्यक्त्व धर्म संयम तपमें हृदय रमायें। अविचल विमल सुपदमै अविलम्ब जा समायैं ॥ २ ॥ परदेश लोक सारा, निज देश सिद्धि-थल है। लोकाग्र स्थित हमारा प्यारा अनन्त थल है ॥ निर्ग्रन्थ गुरु मिले जब सत्पन्थ क्यों भुलायें। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समायैं ॥ ३ ॥ अर्हन्त देवका जब रूपस्थ ध्यान ध्याया। पद और पिंडको भी उस रूपमें मिलाया ॥ सब नाम रूप तज कर फिर लोकमें न आये। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समायैं ॥ ४ ॥ निश्चय अवाच्य ही है, व्यवहार सब कथन है। पर्याय दृष्टिसे ही, यह आगमन गमन है ॥ द्रव्यार्थ नय अपेक्षा हम मुक्त ही कहायें। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समायैं ॥ ५ ॥ जब तक स्वदेहमें हम, तब तक न ध्येय पूरा। आलस्य भावसे क्यों, कर्तव्य हो अधूरा ॥ पर तुच्छ वासनाका बन्धन नहीं लगायें। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समायैं ॥ ६ ॥ क्या सूर्य-चन्द्रने भी कुछ अंधकार जाना। अज्ञान तम हटाया, यह लोक शब्द माना ॥ निजमें अकर्म बनकर, भव कर्म भय मिटाये। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समायैं ॥ ७ ॥ आनन्द शान्तिमय हम, मंगल-स्वरूप पायें। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समाये ॥
भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र और औपनिषद ब्रह्म पद्मयोनि, प्रपञ्चनिर्माता पितामहके नेत्रोंसे अश्रुके निर्झर झर रहे थे। व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्रके नवजलधर श्याम अङ्ग, अङ्गोंमें विद्युत्प्रभ पीताम्बर, कर्णयुगलमे गुञ्जानिर्मित अवतंस, चूडापर राजित मयूरपिच्छ, वक्षःस्थलपर वनमाला, हस्तपुटमें दधिमिश्रित ग्रास, काँखमे दबे हुए वेत्र एव शृङ्ग, कटिफेंटमें खोंसी हुई मुरली, सुकोमल चरण-सरोज—इनकी शोभा, इनके आलोकमें वेद-उपनिषद् ज्ञानके प्रथम अनुभवी उन आदि ऋषि ब्रह्माका समस्त सञ्चित ज्ञान हतप्रभ हो चुका था। जिनके स्वरूपका साक्षात् वर्णन करनेमें श्रुतियाँ सर्वथा असमर्थ हैं, केवलमात्र स्वरूपसे अतिरिक्त वस्तुओका निषेध- मात्र करती हैं— अस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहितमस्नेहमच्छायमतमो- ऽवाय्वनाकाशमसङ्गमरासमगन्धमचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनो- ऽतेजस्कमप्राणममुखममात्रमनन्तरमबाह्यम् । (बृहदारण्यक० ३ । ८ । ८) 'वह न स्थूल है, न अणु है, न क्षुद्र है, न विशाल है, न अरुण है, न द्रव है, न छाया है, न तम है, न वायु है, न आकाश है, न सङ्ग है, न रस है, न गन्ध है, न नेत्र है, न कर्ण है, न वाणी है, न मन है, न तेज है, न प्राण है, न मुख है, न माप है, उसमें न अन्तर है, न बाहर है।' —इस प्रकार निरसन करते-करते जहाँ जाकर वे परिसमाप्त हो जाती हैं, जिनमे अपने आपको खो बैठती हैं, जिनमें अपना अस्तित्व विलीन कर सफल हो जाती हैं— यच्छ्रुतयस्त्वयि हि फलन्त्यतन्निरसनेन भवन्निधना । (श्रीमद्भागवत वेदस्तुति १०। ८७ । ४१) —वे आज स्वयं ब्रह्माके सामने दृष्टिके विषय होकर खड़े थे। इतना ही नहीं, क्षणभर-पूर्व उनके अपने निर्निमेष नयनोंने देखा था—व्रजेन्द्रतनयके पार्श्ववर्ती वे समस्त गोवत्स, गोपशिशु, नव-नील-नीरद-वर्ण, पीतपट्टाम्बर- परिशोभित शङ्ख-चक्र गदा पद्म करधारी, मणिमुकुटधारी, मणिकुण्डल मुक्ताहारशोभित, वनमाली चतुर्भुजके रूपमें परिणत हो गये थे। उनमेसे प्रत्येक मूर्तिके वक्षःस्थलमे श्रीवत्स, भुआओंमें अङ्गद, हाथोंमे रत्नमय वलय एव कङ्कण, चरणोंमे नूपुर एव कड़े, कटिदेशमें करधनी, अङ्गुलियोंमे अङ्गुरीयक (अँगूठी) विराजित थी। अतिशय भाग्यशाली भक्तोंके द्वारा समर्पित नव-तुलसीकी मालाएँ नख से सिखपर्यन्त समस्त अङ्गोंमें आभरण बनी थीं, चन्द्रज्योत्स्ना सी मन्द मुसकान अधरोंपर नृत्य कर रही थी। अरुणिम नेत्रोंकी चितवनसे मधु झर रहा था। अरुण नेत्र मानो रजके प्रतीक थे, भक्तोंके अन्तस्तलमें, क्षण क्षणमें नव-नव मनोरथ (सेवा-वासना) का सृजन कर रहे थे और वह उज्ज्वल हास मानो सत्त्वका प्रतीक था, जो अधरोंपर नाच-नाचकर भक्तोंके मनोरथका पालन कर रहा था। फिर अगणित असख्य ब्रह्मा वहाँ उपस्थित थे, ब्रह्मा ही नहीं, उनसे लेकर तृणपर्यन्त समस्त चराचर जीव मूर्तिमान् होकर उपस्थित थे और नृत्य-गीत- सहित यथायोग्य विविध उपहार समर्पित करते हुए उन अनन्त चतुर्भुज मूर्तियोंकी उपासना कर रहे थे। अणिमादि सिद्धियाँ, माया विद्या आदि विविध शक्तियाँ, महत्तत्त्व आदि चौबीस तत्त्वोंके अधिष्ठातृदेवता—सभी सेवाकी प्रतीक्षा में उन्हें घेरे खड़े थे। प्रकृति क्षोभमें हेतु काल, प्रकृति-परिणाममें हेतु स्वभाव, वासनाका उद्बोधक सस्कार, काम, कर्म, गुण आदि—इन सबके अधिष्ठातृदेवता उन प्रत्येक भगवद्रूपकी अर्चना कर रहे थे। भगवत्-प्रभावके समक्ष उन देवोंकी सत्ता- महत्ता नगण्य बन चुकी थी। ब्रह्माने देखा—वे अगणित भगवद्रूप—ओह ! सब के सब त्रिकालाबाधित सत्य हैं। ज्ञान- स्वरूप—स्वप्रकाश है। अनन्त हैं। आनन्दस्वरूप हैं। एक- रस हैं। इनके अचिन्त्य, अनन्त, माहात्म्यकी उपलब्धि तो उपनिषद्—आत्मज्ञानकी दृष्टि रखनेवाले पुरुषोंके लिये भी सम्भव नही— सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तय । अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषददृशाम् ॥ (श्रीमद्भा० १० । १३ । ५४) आज ब्रह्मा 'सत्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' * परब्रह्म सत्य है, ज्ञानस्वरूप है, अनन्तस्वरूप है, 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म'+ परब्रह्म विज्ञानस्वरूप है, आनन्दस्वरूप है, इन श्रुतियोंसे प्रतिपाद्य तत्त्वको प्रत्यक्ष देख चुके थे। जिन परब्रह्मात्मक गोपेन्द्रतनय श्रीकृष्णचन्द्रकी स्वप्रकाश-शक्तिसे यह परिदृश्यमान सचराचर विश्व प्रकाशित होता है, उनके नित्य पार्षद—गोपशिशुओं- को, गोवत्सोंको ब्रह्माने आज उपर्युक्त रूपमे एक साथ एक समय देखा था—
* तैत्तिरीय० २ । १ । १ + बृहदारण्यक० ३ । ९ । २८
१४८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * एवं सकृद्ददृशांज परब्रह्मात्मनोऽखिलान् । यस्य भासा सर्वमिद विभाति सचराचरम् ॥ (श्रीमद्भा० १० । १३ । ५५) यह देखकर उनकी क्या दशा हुई थी, यह वे ही जानते थे। फिर तो उनकी दशासे करुणार्द्र हुए श्रीकृष्णचन्द्रने अपनी योग- मायाकी यवनिका हटा दी थी और तब उन्होंने देखा था— वही वृन्दावन है, वही ठीक पहलेकी भाँति अद्वय, अनन्त, ज्ञानस्वरूप परब्रह्म अपने प्रिय गोप शिशुओंको, गोवत्सोंको ढूँढता फिर रहा है, लीलारस पानमे प्रमत्त है, दधिमिश्रित ग्रास भी कर-कमलोंमें ठीक वैसे ही सुशोभित है— तत्रोद्वहत्पशुपवंशशिशुत्वनाट्य ब्रह्माद्वय परमनन्तमगाधबोधम्। वत्सान् सखीनिव पुरा परितो विचिन्व- देक सपाणिकवलं परमेष्ठ्यचष्ट ॥ (श्रीमद्भा० १० । १३ । ६१) पितामह देखकर विह्वल हो गये । श्रीकृष्णचन्द्रको असंख्य प्रणाम कर चुकनेपर उन्हें कहीं धैर्य आया था। फिर भी आँखोंसे अनर्गल अश्रु प्रवाह बह रहा था तथा अश्रुपूरित कण्ठसे वे व्रजेन्द्रनन्दन—नरकृति परब्रह्मका स्तवन कर रहे थे। अन्तस्तलमें पश्चात्तापकी ज्वाला जल रही थी—'आह ! कहाँ इतना क्षुद्र मैं, और कहाँ इतने महान् नन्दनन्दन श्रीकृष्णचन्द्र ! मैं अपनी क्षुद्र मायासे इतने महान्को मोहित करने चला था। इस गुरु अपराधके लिये क्षमा कैसे मिलेगी ?' पर नहीं !—आशाकी एक किरण परमेष्ठीके अन्तस्तलमें सञ्चित एक श्रुतिने जगा दी । 'यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन्समाहितम् ।'* इस परब्रह्मका जो कुछ भी यहाँ है और जो कुछ भी नहीं है, वह सब सम्यक् प्रकारसे इसीमे स्थित है । वेदगर्भ आनन्दप्लुत होकर स्तुतिमें पुकार उठे—"अधोक्षज ! शिशु अपनी जननीके गर्भमें रहता है, अज्ञानवश न जाने कितनी बार चरणोंसे प्रहार करता है, किंतु माता क्या इससे रुष्ट होती है ? फिर तुम्हीं बताओ श्रीकृष्णचन्द्र ! 'है' और 'नहीं है' इन शब्दोंसे लक्षित कोई भी वस्तु तुम्हारी कुक्षि—उदरसे बाहर है क्या ? अनन्त ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्डगत समस्त जीव- समुदाय, समस्त वस्तुएँ—सब कुछ तो तुम्हारे भीतर अवस्थित है। तुम्हारे किसी एक क्षुद्रतम देशमें अवस्थित प्राणीको तुम्हारी
- छान्दोग्योपनिषद् ८ । १ । ३ अनन्त महिमा, अनन्त स्वरूपका ज्ञान हो, यह भी कभी सम्भव है ? तुम्हें न जानकर तुम्हारे प्रति जो कोई भी कुछ सोच लेगा, कर लेगा—वह अनुचित, अयथार्थ होनेपर तुम क्या रुष्ट हो जाओगे ? नहीं, कदापि नहीं । अबोध शिशुकी भाँति ही, तुम्हारी महिमासे अनभिज्ञ रहकर मैने यह अपराध किया है, तुम मुझे निश्चय क्षमा करोगे"— उत्क्षेपणं गर्भगतस्य पादयो किं कल्पते मातुरधोक्षजागमे। किमस्तिनास्तीत्यपदेशभूषित तवास्ति कुक्षे कियदप्यनन्त ॥ (श्रीमद्भा० १० । १४ । १०) विधाताने सारा वेदज्ञान लगा दिया था इस प्रयासमे कि कदाचित् किसी अशमे व्रजेन्द्रनन्दनकी महिमाके क्षुद्रतम अशको भी वे स्पर्श कर सकें । कहते कहते वे श्रान्त नहीं होते थें, किंतु सहसा अब उनके चित्तमे ब्रजवासियोंका स्फुरण हो आया । वे ब्रजवासियोकी महिमाका कीर्तन करने लगे— अहो भाग्यमहो भाग्य नन्दगोपव्रजौकसाम् । यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्म सनातनम् ॥ (श्रीमद्भा० १० । १४ । ३२ ) 'अहो ! ब्रजराज, व्रजवासी गोपोंका ही भाग्य धन्य है । वस्तुतः उनका ही अहोभाग्य है । परमानन्दस्वरूप सनातन परिपूर्ण ब्रह्म जिनका सुहृद्, मित्र, पुत्र, कलत्र प्रियजन होकर रहे, उनके अनन्त असीम सौभाग्यका क्या कहना ?' फिर तो पितामहमे एक ही चाह बची थी और उसे पूर्ण करनेके लिये वे प्रार्थना कर रहे थे— तद् भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्या यद् गोकुलेऽपि कतमाङ्घ्रिरजोऽभिषेकम् । यज्जीवितं तु निखिलं भगवान् मुकुन्द- स्त्वद्यापि यत्पदरजः श्रुतिमृग्यमेव ॥ (श्रीमद्भा० १० । १४ । ३४) 'गोपेन्द्रतनय ! अनादिकालसे अबतक श्रुतियाँ तुम्हारी चरणधूलिकी खोज कर रही हैं, किंतु पा नहीं रही हैं । फिर साक्षात् तुम्हें कैसे पा सकेंगी ? पर इन व्रजवासियोने तुम्हें पा लिया । पाकर एकमात्र तुम्हे ही अपना जीवनसर्वस्व बनाया । अतः प्रभो ! मेरे लिये परम सौभाग्यकी बात एक ही है । वह यह कि मनुष्यलोकमें और फिर वृन्दावनमें, और वहाँ भी नन्दगोकुलमें कीट, पतङ्ग, तृण, गुल्म आदिमें-
[Page Header] ⁕ भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र और औपनिषद् ब्रह्म ⁕ १४९
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से कुछ भी होकर—किसी योनिका कुछ भी बनकर मेरा जन्म हो जाय तथा इन ब्रजवासियोंमेंसे किसी एककी भी चरणधूलि-कणका स्पर्श पाकर मैं कृतार्थ हो जाऊँ, ब्रह्मपद मुझे नहीं चाहिये नाथ।'— कहू मोहि ब्रज-रेनु देहु बृंदावन बासा। माँगौं यहै प्रमाद और मेरै नहिं आसा॥ जोँ भावै सोइ करहु तुम, लता सिखा द्रुम, गेहू। ग्वाल गाय को भूत करौँ मानि सत्य व्रत एहु॥ जौ दरसन नर नाग अमर सुरपतिहूँ न पायौँ। भोजन जुग गए बीति अब मोहूँ न लखायौँ॥ दहि ब्रज यह रस नित्य हेँ, में अब समुझ्यौँ आह। बृंदावन-रज हूँ रहौँ ब्रह्म लोक न सुहाइ॥ जगद्विधाताने उन परब्रह्म श्रीकृष्णचन्द्रकी तीन परिक्रमा की और वे अपने घामकी ओर चल पड़े। यह है उपनिषत्- प्रतिपादित परब्रह्मकी एक झाँकी, जो एक बार वेदज्ञानके आदि-आचार्य, आदि-ऋषि ब्रह्माको हुई थी। एक बार देवर्षि नारदको भी परब्रह्मकी विचित्र ही झाँकी हुई थी। नन्दप्राङ्गणकी धूलिमें परब्रह्म लोट रहा था, एव समीपे खड़ी यशोदारानी हँस रहीं थीं। वीणाकी झंकार करते, हरिगुण गाते देवर्षि सौभाग्यसे वहीं जा पहुँचे। वहाँ जो कुछ देखा, उमपर न्यौछावर हो गये। वोल उठे— किं ब्रूमस्त्व्वा यशोदे कति कति सुकृतक्षेत्रवृन्द्वानि पूर्वं गत्वा कीदृग्विधानै कति कति सुकृतान्यर्जितानि त्वयैव। नो शक्रो न स्वयम्भूर्न च मदनरिपुर्यस्य लेभे प्रसादं तत पूर्ण ब्रह्म भूमौ विलुठति चिलपत् क्रोडमारोढुकामम्॥ 'यशोदे! ब्रजेश्वरि! तुम्हें क्या कहूँ, न जाने तुमने किन- किन पुण्यक्षेत्रोंमे जाकर किन-किन विधि-विधानोंसे कितने- कितने पुण्य सञ्चय किये हैं, जिसके फलस्वरूप तुम्हे यह अनुपम सौभाग्य प्राप्त हुआ। सुरेन्द्रने जिसके कृपाकटाक्षके दर्शन नहीं पाये, कमलयोनिन जिसक कृपा नहीं पायी, मदनारि महादेवने जिसकी अनुभूति नहीं की, वह कृपा, वह प्रसाद तुम्हें मिला। ओह! वह पूर्णब्रह्म तुम्हारी गोदमे चढ़नेके लिये रो-रोकर पृथिवीपर लोट रहा है और तुम उसे उठा नहीं रही हो। तुम्हारे सौभाग्यकी यही तो चरम सीमा है व्रजरानी।' अस्तु, ब्रह्मको क्रन्दन करते देखकर देवर्षिका रोम- रोम खिल उठा, हरिगुणके स्थानपर वे यशोदारानीका सुयश गाते चल पड़े।
[Right Column]
लीलाशुक्रको भी एक झाँकी मिली। उन्होंने देखा— आगे-आगे परब्रह्म भागा जा रहा है, पीछे पीछे गोपमहिषी श्रीयशोदा उसे पकड़नेके लिये, हाथमे छड़ी लेकर दौड़ी जा रही है। शुकने एक दृष्टि परब्रह्मकी ओर डाली और फिर परब्रह्मकी जननीकी ओर। परब्रह्म एव जननीकी चालमें अन्तर अवश्य था, वह उस दौड़मे आगे बढ रहा था, जननी श्रीअङ्गोंकी स्थूलताके कारण अस्त व्यस्त होकर पीछे होती जा रही थी- जसु पै तैसैं जाइ न जाइ, श्रोनी-भर अरु कोमरु पाइ। खसत जु सिर तैं सुमन सुदेस, जनु चरनन पर रीझे केस। आगे फूल की वरषा करें, निन पर ब्रजरानी पग धरें। पर इससे क्या हुआ। जननीने परब्रह्मके हाथ पकड़ ही लिये— जोगीजन-मन जहाँ न जाहीं, इत सब वेद पर चिल्लाहीं॥ ताहि जसोमति पकरति भई, रहपट एक बदन पर दई॥ तथा फिर? उसे पकड़कर ऊखलसे बाँध दिया— जद्यपि अस ईश्वर जगदीस, जाके वस विधि, विप्नु, गिरीस। ताहि जसोमति बाँधति मई, रसना प्रेममई दृढ नई॥ × × × × जिन बाँध्यो सुर असुर नाग मुनि प्रनऊ कर्मकी डोरी। सोइ अविच्छिन्न ब्रह्म जसुमति हठि बाँध्यो सरुन न छोरी॥ × × × × निगम सार देखौ गोकुल हरि। जाकौ दूरि ठरस देवनिर्सों, सो बाँध्यौ जसुमति ऊखल धरि॥ लीलांशुक इस झाँकीपर न्यौछावर हो गये। पुकार उठे- परमिसमुपदेशमाद्रियध्वं निगमवनेषु नितान्तखेदखित्ना। विचिन्ुत भवनेषु वल्लवीना- मुपनिषदर्थमुलूखले निवद्धम्॥ 'अरे, ओ ब्रह्मको ढूँढनेवालो ! इधर सुनो, वेदान्त-वन- में परब्रह्मको ढूँढते-ढूँढते तुम उसे न पाकर दुःखसे अतिशय खिन्न हो रहे हो। इधर आ जाओ, मे तुम्हें परम उपदेश दे रहा हूँ, उसका आदर करो। सुनो। गोपसुन्दरियोंके भवनोंमें उसे ढूँढो। यह देखो—यहाँ उपनिषद्का अर्थ उलूखलमें बँधा पड़ा है। इसे ढूँढ लो, पा लो।' शुकका यह उपदेश अनन्त आकाशमें विलीन हो गया। पर नष्ट नहीं हो गया। उसके अक्षर-अक्षर वर्तमान हैं। इसलिये
१५० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * किसी श्रान्त पथिकने, परब्रह्मके अन्वेषणमे निराश हुए किसी मनीषीने इसे हठात् सुन लिया । इस ओर आया और उसे परब्रह्म मिल गये । आनन्दोन्मत्त हुए उसके प्राण गाने लगे- निगमतरो प्रतिशाखं मृगित मिलितं न तत्परं ब्रह्म । मिलितं मिलितमिदानीं गोपवधूटीपटाञ्चले नद्धम् ॥ ‘ओह ! कितना परिश्रम किया था, वेदान्त-वृक्षकी प्रत्येक शाखा ढूंढ ली थी, पर वह परब्रह्म तो नहीं ही मिला । पर देखो ! देखो ! मिल गया ! मिल गया ! अब मिला है, वह रहा, गोपसुन्दरीके अञ्चलसे सनद्ध होकर वह परब्रह्म अवस्थित है !’ एकने परब्रह्मकी अनुभूति ऐसे की थी-वह चित्तसरोवर- में निमग्न हो चुका था । सहसा अनुभूति हुई-मैं हूँ; मेरी एक देह भी है, मन भी है, बुद्धि भी है, प्राण भी है । ये देह आदि तत्त्वतः क्या हैं ? चिदानन्दसरोवरकी लहरें हैं, इतना ही कहना सम्भव है, वस्तुतः अचिन्त्य हैं, अतर्क्य हैं, अनिर्वचनीय हैं । अस्तु, उसने अनुभव किया-‘हाँ ! मैं तो एक गोपसुन्दरी हूँ ! ठीक, ये कौन हैं ? मेरी सखियाँ हैं । और यह क्या है ? उस गोपसुन्दरीने उस ओर देखा । देखते ही वह हृदय नेत्रोंमें, प्राणोंमें समा गया । विक्षिप्त-सी हुई वह दौड़ चली । उसकी सखियाँ उससे पूछ रही थीं, पर उसे बाह्यज्ञान नहीं था । बड़ी देरके पश्चात् बाह्यचेतना- का सञ्चार हुआ और वह बोली- शृणु सखि ! कौतुकमेकं नन्दनिकेताङ्गने मया दृष्टम् । गो धूलिधूसरिताङ्गो नृत्यति वेदान्तसिद्धान्तः ॥ ‘री सखि ! सुन ! मैने एक कौतुक देखा है । नन्द- प्रासादके प्राङ्गणमे चली गयी थी । वहाँ देखा-अरे ! यहाँ तो वेदान्तका सिद्धान्त नृत्य कर रहा है ! आह बहिन ! और क्या बताऊँ ! नृत्यशील उस परब्रह्मके नवमेघश्यामले अङ्ग गोधूलिसे सन रहे थे, समस्त अङ्ग धूलिधूसरित थे । उस छविको कैसे बताऊँ ।’ एक और भाग्यवान्ने नन्दभवनमें परब्रह्मको देखा था । वह तो लौटा नहीं । उसके प्राकृत शरीरके मन, प्राण, इन्द्रियों- में उस अनुभूतिकी छाया पड़ी और वाणी बोल उठी- श्रुतिमपरे स्मृतिमपरे भारतमपरे भजन्तु भवभीता । अहमिह नन्दं वन्दे यस्यालिन्दे परं ब्रह्म ॥ ‘जो संसारके भयसे डरे हुए हों, वे भले ही कोई तो कोई स्मृतिका, कोई महाभारतका भजन करें । मैं तो नन्दबाबाका भजन करता हूँ, उन्हें प्रणाम करता हूँ जिनके अलिन्ददेश (बाहरके चबूतरे) पर साक्षात् परब्रह्म विराजित हैं।’ उसीकी चित्तभूमिपर परब्रह्मकी एक और अभिनव झाँकीकी छाया पड़ी और वह गाने लगा- कं प्रति कथयितुमीशे सम्प्रति को वा प्रतीतिमायातु । गोपत्तितनयाकुञ्जे गोपवधूटीविटं ब्रह्म ॥ ‘किससे जाकर कहूँ ? और कह देनेपर भी मेरी इस विचित्र अनुभूतिपर विश्वास ही कौन करने लगा; किंतु मत करें, सत्य तो सत्य ही रहेगा । ओह ! मैने देखा है- रविनन्दिनी श्रीयमुनाके पुलिनपर एक निकुञ्जमें एक गोप- सुन्दरीके विशुद्ध प्रेमामृतके पानसे मत्त हुआ, रसलम्पट हुआ, परब्रह्म क्रीड़ामें सलग्न है ।’ भक्त रसखानने भी परब्रह्मका अनुभव किया । आत्म- विस्मृत हो गये । उस अनुभूतिका रस इतना मादक था कि वाणी नियन्त्रणमे न रही । बुद्धि विशुद्ध हो, इन्द्रियाँ सयंमित हों, दिनचर्या परम सात्विक हो, विषय छूट गये हों, राग- द्वेषका अभाव हो गया हो, ब्रह्मकी ओर वृत्ति सदा एकतान लगी हो, उत्कृष्ट वैराग्य हो, अहङ्कार, बल, दर्प, काम, क्रोध, परिग्रह, ममतासे मन सर्वथा अलग हो गया हो, नित्य शान्ति- की धारा अन्तःकरणको प्लावित करती हो*-उसके सामने यह अनुभूति प्रकाशित करनेमे आपत्ति नही, किंतु इससे पूर्व तो इस अनुभूतिको सुनकर कोई समझेगा ही नहीं, सुनना भी नहीं चाहेगा और कदाचित् सुनकर, दुर्बलतावश दुरुपयोग भी कर लेगा । पर ‘रसखान’ स्वयं तो कहते समय, मन-इन्द्रियोंसे मदाके लिये सम्बन्ध तोड़ चुके थे, अवश्य ही लोकदृष्टिमें ज्यों- के त्यों थे । किसीने पूछा उनसे परब्रह्मका पता और ब्रह्मरस- मे निमग्न रसखानकी वाणी सरलतावश सङ्केत कर बैठी- ब्रह्म मैं ढूँढयो पुरानन गानन, वेद रिचा सुनि चौगुने चायन । देख्यो सुन्यो कबहूँ न कितू, वह कैसे सरूप औ कैसे सुभायन ॥ टेरत हेरत हारि पर्यो रसखानि, बतायो न लोग लुगायन । देखो, दुन्यो वह कुञ्ज-कुटीरमें, बैठो पलोटत राधिका पायन ॥
- बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च । शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् । विमुच्य निर्मम शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ (गीता १८ । ५१-५३)
- भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र और औपनिषद ब्रह्म * १५१ भक्त सूरदासकी ज्योतिहीन आँखोंमें भी परब्रह्मकी ज्योति जाग उठी और उन्होंने भी— यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे- ऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । तथा विद्वाञ्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ (मुण्डक० ३ । २ । ८) 'जिस प्रकार निरन्तर बहती हुई नदियाँ अपने नाम-रूप- को त्यागकर समुद्रमें अस्त हो जाती हैं उसी प्रकार विद्वान् नाम-रूपसे मुक्त होकर परात्पर दिव्य पुरुषको प्राप्त हो जाता है।' —ऐसा ही वर्णन अपने एक गीतमें सुनाया। वेगाने लगे— जैसे सरिता मिली सिंधुसों उलटि प्रवाह न आवे हो । तैसे सूर कमल-मुख निरखत चित इत उत न डुलावे हो ॥ $\times\quad\quad\times\quad\quad\times\quad\quad\times$ सरिता निकट तडागके हो दोनों कूर बिदारि । नाम मिट्यो सरिता भई अब कौन निवरे वारि ॥ $\times\quad\quad\times\quad\quad\times\quad\quad\times$ विधि भाजन ओछो रच्यो हो लीलाससिंधु अपार । उलटि मगन तामें भयौ अब कौन निकासनहार ॥ परब्रह्मका वास्तविक पूर्ण अनुभव तो वहाँ ही है, जहाँ हमारा मन, हमारी इन्द्रियाँ मरें नहीं, अपितु उम चिदा- नन्द-रसका स्पर्श पाकर अमर हो जायें। परब्रह्म रसरूप है, उस रसको पाकर ही पुरुष आनन्दका अनुभव करता है— रसो वै स । रसꣳह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति । (तैत्तिरीय० २ । ७) फिर वह किसीको मारे, यह सम्भव नहीं। यह सत्य है— 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।'* इन्द्रियोंके सहित मन परब्रह्मको न पाकर लौट आता है, किंतु यदि वह स्वयं मन-इन्द्रियोंमें उतर आवे तो उसे कौन रोक सकता है ? क्या उसपर भी कोई बन्धन है ? और वास्तव- में तो वह मिलता ही है उसे, जिसे वह स्वय वरण करता है, वरण करके अपने स्वरूपको उसके प्रति अभिव्यक्त कर देता है— यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ (कठ० १। २ । २३) अतः यह तो वरण करनेवालेकी इच्छा है कि वह अपने किस स्वरूपमे किसका वरण करे। वह तो सर्वतन्त्रस्वतन्त्र है, श्रुतियोंकी सीमामें नहीं है। इसीलिये कभी-कभी वह मन- इन्द्रियोंमें भी अपना चिदानन्दमय रस भरकर वहाँ क्रीड़ा करने लग जाता है। नरकृति परब्रह्म श्रीकृष्णचन्द्रने तो यही किया। चाहनेवालेके मन-इन्द्रियोंमें भी वे अपना स्वरूपभूत रस देकर स्वयं उसका रस लेने लगे— परम रस पायो ब्रजकी नारि । जो रस ब्रह्मादिकनों दुर्लभ सो रस दियो मुरारि ॥ दरसन सुख नयननको दीनों रसनाको गुन गान । बचन सुनन श्रवननको दीनों बदन अधर-रस पान ॥ आलिंगन दीनो सब अंगन भुजन दियो भुजबंध । दीनी चरन बिचित्र गति रसकी नासाको सुख गंध ॥ दियो काम सुख भोग परमफल त्वचा रोम आनंद । ढिग बैठिबो दियो नितबन लै ऊछंग नंदनंद ॥ मनको दियो सदा रस-भावन सुख-समूहकी खान । रसिक-चरन-रज ब्रजबुवतिनकी अति दुर्लभ जिय जान ॥ ऐसे रसमय परब्रह्म नन्दनन्दन श्रीकृष्णचन्द्रसे चित्तवृत्ति- का जुड़ जाना ही उपनिषद्के स्वाध्यायका फल है। यही उपनिषद्-ज्ञानका मधुर परिणाम है। सच्ची बात तो यह है कि उपनिषद्की ज्ञानसरिताएँ जब प्रेम-समुद्रमें जाकर— उसमें घुल-मिलकर अपने पृथक् अस्तित्वको सर्वथा छिपा लेती हैं, तभी नित्य नवीन, सौन्दर्य-माधुर्य-सुधा-रस-सिन्धु योगीन्द्र-मुनीन्द्र-परिसेवित-पादारविन्द परब्रह्म मदनमोहन ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्रके दिव्य नित्य चिदानन्दरसमय स्वरूप-साम्राज्यमें प्रवेशका पथ मिलता है। इस रस-साम्राज्यमें किञ्चित् प्रवेश पाकर किन्हीं एक परम विद्वान् महात्माने मुक्तकण्ठसे कहा था— ध्यानाभ्यासवशीकृतेन मनसा तन्निर्गुणं निष्क्रियं ज्योतिः किंचन योगिनो यदि परं पश्यन्ति पश्यन्तु ते । अस्माकं तु तदेव लोचनचमत्काराय भूयाच्चिरं कालिन्दीतटकुञ्जकुहर-पुलीनोदरे किमपि यन्नीलं महो धावति ॥ वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात् पीताम्बरादरुणविम्बफलाधरोष्ठात् । पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात् कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने ॥* 'यदि योगीजन ध्यानके अभ्याससे वशमे किये हुए मनके द्वारा उस निर्गुण, निष्क्रिय एव अनिर्वचनीय परम ज्योतिका दर्शन करते हैं तो वे करते रहें, हमारे नेत्रोंमें तो वह एकमात्र श्याममय प्रकाश ही चिरन्तन कालतक चमत्कार उत्पन्न करता
- तैत्तिरीय० २ । ४
- देखिये गोता मधुसूदनी टीका अध्याय १३ और १५ की टीका
१५२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * रहे, जो कि श्रीयमुनाजीके उभय तटोंके भीतर इधर-उधर दौड़ता फिरता है।' 'जिसके दोनों हाथ बाँसुरी बजाते हुए शोभा पा रहे हैं, श्रीअङ्गोंकी कान्ति नूतन जलधरके समान श्याम है, शरीरपर पीताम्बर सुशोभित है, ओष्ठ पके हुए विम्बाफलके समान लाल- लाल हैं, परम सुन्दर मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान आनन्ददायक है और नेत्र विकसित कमलकी सी शोभा धारण करते हैं, उस श्रीकृष्णसे बढ़कर या उससे परे किसी श्रेष्ठ तत्त्वको मैं नहीं जानता।' यही नहीं, श्रीकृष्णके प्रेम साम्राज्यमे अन्तमे क्या दशा हो जाती है, एक अनुभवीकी वाणी सुनिये— अद्वैतवीथीपथिकैरुपास्याः स्वाराज्यसिंहासनलब्धदीक्षाः । शठेन केनापि वयं हठेन दासीकृता गोपवधूविटेन ॥ 'अद्वैतकी वीथियोंमें विचरनेवाले पथिक (साधक) जिन- को अपना उपास्य गुरुदेव मानते हैं तथा आत्मराज्यके सिंहासनपर जिनका अभिषेक हो चुका है; ऐसे होते हुए भी हमें गोपाङ्गनाओंसे प्रेम रखनेवाले किसी छलियेने हठपूर्वक अपना दास बना लिया है'— यह तो बड़ोंकी बातें हैं। हमारे-जैसे लोगोंकी तो एक- मात्र यही आकाङ्क्षा होनी चाहिये कि हमारी चित्त चकईं भवसागरके तटसे उड़कर अनन्त पारावाररहित श्रीकृष्ण-रस- सिन्धुके तटपर अपना नित्य निवास बना ले; बस— चकई री चल चरन-सरोवर जहाँ नहि प्रेम-वियोग । जहँ भ्रम-निसा होत नहि कबहूँ सो सायर सुख-जोग ॥ सनक-से हस, मीन सन-मुनिजन, नख रविप्रभा प्रकास । प्रफुल्लित कमल निमिष नहि ससि उर गुंजन निगम सुबास ॥ जेहि सर सुभग मुक्ति मुक्ताफल विमल सुकृत-जल पीजै । सो सर छोड़ि कुबुद्धि विहगम इहाँ रहे कहा कीजै ॥ जहँ श्री सहस सहित हरि क्रीड़त सोभित सूरदास । अब न सुहाय विषय-रस छीर वह समुद्रकी आस ॥
उपनिषत् उप-समीप, निषत्-निषीदति-बैठनेवाला । जो उस परमतत्त्वके समीप पहुँचाकर चुपचाप बैठ जाता है, वह उपनिषद् है। परमतत्त्व अवर्णनीय है, नाना प्रकारके वर्णनोंका अभिप्राय 'नेति-नेति' में है। वर्णन और बोध-ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेयकी त्रिपुटीसे परे अनुभूति-स्वरूप परमतत्त्व है। उपनिषद्-ज्ञानकी परिसमाप्ति अनुभूतिके क्षेत्रमे होती है। भगवान् आद्य शङ्कराचार्यके दो वाक्य स्मरण आ रहे हैं— 'ईश्वरानुग्रहादेव पुमानद्वैतवासना' और— 'कथं त्वत्कटाक्ष विना तत्त्वबोधः' अनुभूति—आवरणका विनाश—त्रिपुटीकी परिसमाप्ति तो भगवदनुग्रहसे ही सम्भव है । जहाँ उपनिषद्की समाप्ति होती है, वहींसे अनुग्रहकी प्रतीक्षा—उपासनाका प्रारम्भ होता है । अनुग्रहकी प्रतीक्षारूप उपासना भगवान्को अत्यन्त समीप ला देती है। वेदत्रयी कर्मकाण्ड है। कर्मके द्वारा मलकी निवृत्ति होनेपर एकाग्रताकी प्राप्तिके लिये ज्ञानकाण्ड—उपनिषद्का विधान है। यह विक्षेप-चाञ्चल्यकी निवृत्ति करेगा। जहाँ विविधता, अनेकता है ही नहीं, वहाँ चञ्चलता क्यों ? किसलिये ? कहाँ ? स्थैर्यकी प्रतिष्ठा होनेपर भावका उद्रेक होता है। उपासना आरम्भ होती है। उसका रूप है—भगवत्कृपाकी प्रतीक्षा। कृपाके बिना आवरण निवृत्त जो नहीं होता। यों तो प्रत्येक साधन अपनेमें पूर्ण है निष्ठाका आधार मिलनेपर; किंतु क्रम भी होता ही है। उपनिषद्का लक्ष्य ?—परनिर्वाणकी प्राप्ति, अभेद ! सायुज्य कहे तो भी बाधा नही । अन्तर इतना ही है कि उपनिषद् परनिर्वाणकी प्राप्ति श्रवण-मनन-निदिध्यासनसे कराता है और असुर द्वेषसे सायुज्य प्राप्त करते है—अभेद; दूरी है उसमे । उपासना—नित्य सान्निध्य—भागवतीय ज्ञान, वह तो उपनिषद्की समाप्तिसे प्रारम्भ होता है। वहाँ तो— 'सालोक्यसाष्टिसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत । दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥' 'सुकृति निरादरि भगति लुभाने' है । —सुदर्शन
4 उपलब्ध उपनिषद्-ग्रन्थोंकी सूची उपनिषदोंकी बडी महिमा है। ज्ञानकी चरम सीमा ही उपनिषद्के नामसे प्रसिद्ध हुई है। वैदिक वाङ्मयका शीर्ष-स्थान उपनिषद् है—इस कथनमात्रसे ही उपनिषदोंकी लोकोत्तर महत्ता स्पष्ट हो जाती है। प्राचीन कालमे औपनिषद ज्ञानका बडा महत्त्व था। ऊँचे-से-ऊँचे अधिकारी ही इस विद्यामें पारङ्गत होते थे। वैदिक कालसे ही उपनिषदोंके स्वाध्याय-की परम्परा प्रचलित हुई है। अतः कुछ उपनिषद् तो वेदके ही अंशविशेष हैं। कुछ ब्राह्मणभाग और आरण्यकोंके अन्तर्गत हैं। कुछ इनकी अपेक्षा अर्वाचीन होनेपर भी आजसे बहुत प्राचीन कालके हैं तथा कुछ उपनिषद्-ग्रन्थ ऐसे भी है, जिनपर विशेष देश, काल, परिस्थिति तथा मतका प्रभाव पड़ा जान पड़ता है। उपनिषद्-ग्रन्थ प्राचीन हों या अर्वाचीन—सभी ज्ञानप्रधान हैं। सबका आविर्भाव किसी-न-किसी गूढ तत्त्व या रहस्यका प्रकाशन करनेके लिये ही हुआ है। अतः इनके स्वाध्यायसे ज्ञानकी वृद्धि ही होती है—यह निश्चितरूपसे कहा जा सकता है। मुक्तिकोपनिषद्मे एक सौ आठ उपनिषदोंके नाम आते हैं। वे सभी ‘निर्णयसागर प्रेस’ बम्बईसे मूल गुटका-के रूपमें प्रकाशित हैं। इसके सिवा, ‘अडियार लाइब्रेरी’ मद्राससे भी उपनिषदोंका एक संग्रह प्रकाशित हुआ है, जो अनेक भागोंमें विभक्त है। उस संग्रहमें लगभग १७९ उपनिषदोंका प्रकाशन हो गयाहै। इसके अतिरिक्त ‘गुजराती प्रिंटिंग प्रेस’ बम्बईसे मुद्रित उपनिषद्-वाक्य-महाकोषमें २२३ उपनिषदों-की नामावली दी गयी है। इनमें दो उपनिषद्—१ उपनिप-त्स्तुति तथा २ देव्युपनिषद् नं० २ की चर्चा शिवरहस्यनामक ग्रन्थमे की गयी है। ये दोनों अभीतक उपलब्ध न हो सकी हैं। शेष २२१ उपनिषदोंके वाक्यग्रंथ इस महाकोषमे संकलित हुए हैं। इनमें भी माण्डूक्यकारिकाके चार प्रकरण चार जगह गिने गये हैं, इन सबकी एक सख्या मानें तो २१८ ही सख्या होती है। कई उपनिषदें एक ही नामकी दो-तीन जगह आयी हैं, पर वे स्वतन्त्र ग्रन्थ हैं। इस प्रकार सबपर दृष्टिपात करनेसे यह निश्चित होता है कि अबतक लगभग २२० उपनिषदें प्रकाशमें आ चुकी हैं। और भी प्रकाशित हुई होंगी तथा कितनी ही अत्र भी अप्रकाशित रूपमे उपलब्ध हो सकती हैं। प्राचीन कालसे ही अद्वितीय ज्ञान-विज्ञानशाली भारतवर्षमें जान विज्ञानकी अपरिमित ग्रन्थ-राशिका होना आश्चर्यकी बात नहीं है। भारतपर एक-एक करके अनेक बार विदेशी दस्युओंके आक्रमण हुए और उनके द्वारा हमारी प्राचीन हस्तलिखित कितनी ही पुस्तकों तथा पुस्तकालयोंको भस्मावशेष कर दिया गया। इतनेपर भी जो कुछ शेष है, उसका भी यदि भारतीय जन आदरपूर्वक अनुशीलन करें तो पूर्वजोकी ज्ञान-ज्योति अब भी इस देशमे प्रकाशित हो सकती है। यहाँ उपर्युक्त २२० उपनिषदोकी नामावली अकारादि क्रमसे दी जा रही है—
१ अक्षमालोपनिषद् २. अक्षि-उपनिषद् ३. अथर्वाङ्गिरसोपनिषद् ४. अथर्वशिर उपनिषद् ५ अद्वयतारकोपनिषद् ६ अद्वैतोपनिषद् ७. अद्वैतभावनोपनिषद् ८ अध्यात्मोपनिषद् ९. अनुभवसारोपनिषद् १० अन्नपूर्णोपनिषद् ११ अमनस्कोपनिषद् १२ अमृतनादोपनिषद् १३. अमृतबिन्दूपनिषद् (ब्रह्मबिन्दूपनिषद्) १४ अरुणोपनिषद् १५. अल्लोपनिषद् १६. अवधूतोपनिषद् (वाक्यात्मक एव पद्यात्मक) १७. अवधूतोपनिषद् (पद्यात्मक) १८. अव्यक्तोपनिषद् १९. आचमनोपनिषद् २०. आत्मपूजोपनिषद् २१ आत्मप्रबोधोपनिषद् (आत्मबोधोपनिषद्) २२ आत्मोपनिषद् (वाक्यात्मक) २३. आत्मोपनिषद् (पद्यात्मक) २४. आथर्वणद्वितीयोपनिषद् (वाक्यात्मक एव मन्त्रात्मक) २५ आयुर्वेदोपनिषद् २६. आरुणिकोपनिषद् (आरुणेय्युपनिषद्) २७. आर्षेयोपनिषद् २८ आश्रमोपनिषद् २९ इतिहासोपनिषद् (वाक्यात्मक एव पद्यात्मक) ३० ईशावास्योपनिषद् उपनिषत्स्तुति (शिवरहस्यान्तर्गत, अभीतक अनुपलब्ध) ३१. ऊर्ध्वपुण्ड्रोपनिषद् (वाक्यात्मक एव पद्यात्मक) ३२. एकाक्षरोपनिषद्
३३ ऐतरेयोपनिषद् (अध्यायात्मक) ७४. तारोपनिषद्
१५४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ३३ ऐतरेयोपनिषद् (अध्यायात्मक) ७४. तारोपनिषद् ३४. ऐतरेयोपनिषद् (खण्डात्मक) ७५. तुरीयातीतोपनिषद् (तीतावधूतो०) ३५ ऐतरेयोपनिषद् (अध्यायात्मक) ७६. तुरीयोपनिषद् ३६. कठरुद्रोपनिषद् (कण्ठोपनिषद्) ७७. तुलस्युपनिषद् ३७ कठोपनिषद् ७८. तेजोबिन्दूपनिषद् ३८ कठश्रुत्युपनिषद् ७९. तैत्तिरीयोपनिषद् ३९. कलिसंतरणोपनिषद् (हरिनामोपनिषद्) ८०. त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् ४० कात्यायनोपनिषद् ८१. त्रिपुरातापिन्युपनिषद् ४१ कामराजकीलितोद्धारोपनिषद् ८२. त्रिपुरोपनिषद् ४२. कालाग्निरुद्रोपनिषद् ८३. त्रिपुरामहोपनिषद् ४३. कालिकोपनिषद् ८४. त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद् ४४. कालीमेधादीक्षितोपनिषद् ८५. त्रिसुपर्णोपनिषद् ४५ कुण्डिकोपनिषद् ८६. दक्षिणामूर्त्युपनिषद् ४६ कृष्णोपनिषद् ८७. दत्तात्रेयोपनिषद् ४७ केनोपनिषद् ८८. दत्तोपनिषद् ४८. कैवल्योपनिषद् ८९. दुर्वासोपनिषद् ४९. कौलोपनिषद् ९०. (१) देव्युपनिषद् (पद्यात्मक एव मन्त्रात्मक) ५० कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् (२) देव्युपनिषद् (शिवरहस्यान्तर्गत—अनुपलब्ध) ५१ क्षुरिकोपनिषद् ९१. द्वयोपनिषद् ५२ गणपत्यथर्वशीर्षोपनिषद् ९२. ध्यानबिन्दूपनिषद् ५३ गणेशपूर्वतापिन्युपनिषद् (वरदपूर्वतापिन्युपनिषद्) ९३. नादबिन्दूपनिषद् ५४. गणेशोत्तरतापिन्युपनिषद् (वरदोत्तरतापिन्युपनिषद्) ९४ नारदपरिव्राजकोपनिषद् ५५. गर्भोपनिषद् ९५. नारदोपनिषद् ५६. गान्धर्वोपनिषद् ९६. नारायणपूर्वतापिन्युपनिषद् ५७. गायत्र्युपनिषद् ९७ नारायणोत्तरतापिन्युपनिषद् ५८ गायत्रीरहस्योपनिषद् ९८ नारायणोपनिषद् (नारायणाथर्वशीर्ष) ५९. गारुडोपनिषद् (वाक्यात्मक एव मन्त्रात्मक) ९९. निरालम्बोपनिषद् ६०. गुह्यकाल्युपनिषद् १००. निरुक्तोपनिषद् ६१. गुह्यषोढान्यासोपनिषद् १०१ निर्वाणोपनिषद् ६२. गोपालपूर्वतापिन्युपनिषद् १०२. नीलरुद्रोपनिषद् ६३. गोपालोत्तरतापिन्युपनिषद् १०३. नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषद् ६४. गोपीचन्दनोपनिषद् १०४. नृसिंहषट्चक्रोपनिषद् ६५. चतुर्वेदोपनिषद् १०५. नृसिंहोत्तरतापिन्युपनिषद् ६६. चाक्षुषोपनिषद् (चक्षुरुपनिषद्, चक्षूरोगोपनिषद्, १०६. पञ्चब्रह्मोपनिषद् नेत्रोपनिषद्) १०७. परब्रह्मोपनिषद् ६७ चित्युपनिषद् १०८. परमहंसपरिव्राजकोपनिषद् ६८. छागलेयोपनिषद् १०९ परमहंसोपनिषद् ६९. छान्दोग्योपनिषद् ११० पारमात्मिकोपनिषद् ७०. जावालदर्शनोपनिषद् १११. पारायणोपनिषद् ७१. जाबालोपनिषद् ११२ पाशुपतब्रह्मोपनिषद् ७२. जाबाल्युपनिषद् ११३. पिण्डोपनिषद् ७३ तारसारोपनिषद् ११४ पीताम्बरोपनिषद्
- उपलब्ध उपनिषद्-ग्रन्थोंकी सूची * \hfill १५५
११५. पुरुषसूक्तोपनिषद् \hfill १५१. याज्ञवल्क्योपनिषद् ११६. पैङ्गलोपनिषद् \hfill १५२. योगकुण्डल्युपनिषद् ११७. प्रणवोपनिषद् (पद्यात्मक) \hfill १५३ योगचूडामण्युपनिषद् ११८. प्रणवोपनिषद् (वाक्यात्मक) \hfill १५४ (१) योगतत्त्वोपनिषद् ११९ प्रश्नोपनिषद् \hfill १५५. (२) योगतत्त्वोपनिषद् १२०. प्राणाग्निहोत्रोपनिषद् \hfill १५६. योगराजोपनिषद् १२१ बटुकोपनिषद् (वटुकोपनिषद्) \hfill १५७ योगशिखोपनिषद् १२२. बह्वृचोपनिषद् \hfill १५८ योगोपनिषद् १२३. वाष्कलमन्त्रोपनिषद् \hfill १५९. राजश्यामलरहस्योपनिषद् १२४. विल्वोपनिषद् (पद्यात्मक) \hfill १६०. राधिकोपनिषद् (वाक्यात्मक) १२५. " (वाक्यात्मक) \hfill १६१. राधोपनिषद् (प्रपाठात्मक) १२६. बृहज्जाबालोपनिषद् \hfill १६२. रामपूर्वतापिन्युपनिषद् १२७. बृहदारण्यकोपनिषद् \hfill १६३. रामरहस्योपनिषद् १२८. ब्रह्मविद्योपनिषद् \hfill १६४ रामोत्तरतापिन्युपनिषद् १२९. ब्रह्मोपनिषद् \hfill १६५ रुद्रहृदयोपनिषद् १३० भगवद्गीतोपनिषद् \hfill १६६. रुद्राक्षजाबालोपनिषद् १३१. भस्मतरणोपनिषद् \hfill १६७. रुद्रोपनिषद् १३२ भस्मजाबालोपनिषद् \hfill १६८. लक्ष्म्युपनिषद् १३३. भावनोपनिषद् (कापिलोपनिषद्) \hfill १६९. लाङ्गलोपनिषद् १३४ भिक्षुकोपनिषद् \hfill १७० लिङ्गोपनिषद् १३५. मठान्नायोपनिषद् \hfill १७१. वज्रपञ्जरोपनिषद् १३६ मण्डलब्राह्मणोपनिषद् \hfill १७२. वज्रसूचिकोपनिषद् १३७. मन्त्रिकोपनिषद् (चूलिकोपनिषद्) \hfill १७३ वनदुर्गापनिषद् १३८. मल्लायुपनिषद् \hfill १७४. वराहोपनिषद् १३९ महानारायणोपनिषद् (बृहन्नारायणोपनिषद्, उत्तर- \hfill १७५ वासुदेवोपनिषद् नारायणोपनिषद्) \hfill १७६. विश्रामोपनिषद् १४० महावाक्योपनिषद् \hfill १७७ विष्णुहृदयोपनिषद् १४१. महोपनिषद् \hfill १७८. शरभोपनिषद् १४२. माण्डूक्योपनिषद् \hfill १७९. शाट्यायनीयोपनिषद् १४३. माण्डूक्योपनिषत्कारिका \hfill १८०. शाण्डिल्योपनिषद् (क) आगम \hfill १८१. शारीरकोपनिषद् (ख) अलातशान्ति \hfill १८२ (१) शिवसङ्कल्पोपनिषद् (ग) वैतथ्य \hfill १८३. (२) शिवसङ्कल्पोपनिषद् (घ) अद्वैत \hfill १८४ शिवोपनिषद् १४४ मुक्तिकोपनिषद् \hfill १८५. शुकरहस्योपनिषद् १४५. मुण्डकोपनिषद् \hfill १८६. शौनकोपनिषद् १४६ मुद्गलोपनिषद् \hfill १८७ श्यामोपनिषद् १४७ मृत्युलाङ्गलोपनिषद् \hfill १८८ श्रीकृष्णपुरुषोत्तमसिद्धान्तोपनिषद् १४८. मैत्रायण्युपनिषद् \hfill १८९. श्रीचक्रोपनिषद् १४९ मैत्रेय्युपनिषद् \hfill १९०. श्रीविद्यातारकोपनिषद् १५० यज्ञोपवीतोपनिषद् \hfill १९१. श्रीसूक्तम् \hfill १९२ श्वेताश्वतरोपनिषद्
१५६ ⁘ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ⁘ १९३ षोढोपनिषद् २०७ सिद्धान्तसारोपनिषद् १९४ सङ्कर्षणोपनिषद् २०८ सीतोपनिषद् १९५ सदानन्दोपनिषद् २०९. सुदर्शनोपनिषद् १९६ सन्न्यासोपनिषद् २१०. सुबालोपनिषद् १९७. सन्यासोपनिषद् ( अध्यायात्मक ) २११ सुमुख्युपनिषद् १९८ ,, ( वाक्यात्मक ) २१२ सूर्यनारायणोपनिषद् १९९ सरस्वतीरहस्योपनिषद् २१३. सूर्योपनिषद् २०० सर्वसारोपनिषद् ( सर्वोप० ) २१४ सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद् २०१. स ह वै उपनिषद् २१५ स्कन्दोपनिषद् २०२ सहितोपनिषद् २१६. स्वसंवेद्योपनिषद् २०३ सामरहस्योपनिषद् २१७. हयग्रीवोपनिषद् २०४ सावित्र्युपनिषद् २१८ हंसषोढोपनिषद् २०५. सिद्धान्तविष्ठलोपनिषद् २१९. हंसोपनिषद् २०६ सिद्धान्तशिखोपनिषद् २२०. हेरम्बोपनिषद् उपनिषद् हिंदू-जातिके प्राण हैं ( लेखक—भक्त रामशरणदासजी ) उपनिषद् हिंदू-जातिके प्राण हैं । यदि हिंदू-जाति जीवित रह सकती है तो वह उपनिषदोंके द्वारा ही रह सकती है । जिस समय भारतकी प्रत्येक सन्तान उपनिषदोंकी इस शिक्षाको कि, आत्मा अमर है—कभी मरता नहीं, याद रखता था और आत्माकी अमरतामें विश्वास रखता था, उस समय वह धर्म, गौ, स्वजाति, स्वधर्म और सभ्यता-संस्कृतिकी रक्षाके लिये उल्लासके साथ मृत्युका आलिङ्गन करता था और प्राण देकर उन्हें बचाता था । इस प्रकार वह हिंदूधर्मकी पंताकाको शानसे फहराता था, कभी झुकने नहीं देता था । यवनकालमे हजारों-लाखों क्षत्रियोंने धर्मरक्षा, चोटी जनेऊकी रक्षा- के लिये सिर दे दिये । श्रीगुरुगोविन्दसिंहजीके लाल दीवारोमे हँसते हँसते चुने गये । मतीराम आरेसे चीरे जानेपर भी हँसते रहे । बन्दावीरका मास नोचवाया गया, पर उसने उफ तक नहीं की । यह सब क्या था ? यह था उपनिषदोंकी शिक्षाका चमत्कार, जिससे आत्माकी अमरतामे विश्वास कर भारतयोंने धर्म-देशके लिये मर-मिटना सीखा था। जिस दिनसे हमने उपनिषदोंसे मुख मोड़ा और गंदे साहित्यको अपनाया, तभीसे हमारा घोर पतन हो गया । अतः यदि फिरसे भारतका और हिंदू-जातिका उत्थान करना है तो उपनिषदोंकी शरणमे आना होगा और आत्माकी अमरतामे और विश्वमे एक ही परमात्माकी व्यापकतापर विश्वास कर शरीरका मोह दूर करना होगा । महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्यदेवने भी हिंदू-जातिका घोर पतन होते देख कलि- संतरणोपनिषद्का सहारा ले उसके बताये हुए महामन्त्र— हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥ —का जप और इसीका कीर्तन कराकर लोगोको जगाया । श्रीहरिनामके बलपर हिंदू-जातिका कल्याण कर दिखाया । कलिपावनावतार गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी महाराजने श्रीरामनाम-महिमाको जान स्वय तो प्रभु श्रीरामका साक्षात्कार किया ही, लाखोंको श्रीरामनाम-मन्त्र देकर सन्मार्गपर लगाया और देश-धर्मकी डूबती नैयाको बचाया । इस प्रकार हिंदू-जाति जिस समय उपनिषदोंके बताये मार्गपर चलती थी, उन्नतिके शिखरपर थी और जिस दिन इसने इनसे मुख मोड़ा, इसका पतन हो गया । आज भी यदि हिंदू-जाति अपनी भूलको समझ ले और उपनिषदोंके मार्गपर चले तो इसमे तनिक भी सन्देह नहीं कि यह पुनः सच्ची उन्नतिके शिखरपर पहुँच जायगी ।
अध्यात्मवाद ( रचयिता—प० श्रीरघुनाथप्रसादजी शास्त्री 'साधक' ) जागो पुनः अमर भारतमें, ओ अजेय अध्यात्मवाद ! देश-जाति-जनता-उर-नभमें, आज घिरे घन-सघन-विषाद् । अनाचार, अतिचार, पाप, पर-पीडनकी रणभेरी है । अपना स्वत्व सुरक्षित करने, पर-विनाशकी ढेरी है । सर्व-स्वत्व-संरक्षित करने, हरने आततायी अतिवाद , निर्भय रण-प्रांगणमें आकर, गाओ ब्राह्मी-विजयनिनाद् । ओ अजेय अध्यात्मवाद ! भेद-भाव बहु भाँति भरे हैं, बन्धु-भावना लुप्त हुई । सहयोगिता, सुसेवा, समता, प्रेम-भावना सुप्त हुई । अन्तर्दाह कलह-कायरता, कलुषित काम-क्रोध दुर्वाद । आकर शीघ्र समाज जातिके, दूर करो सब निंद्य विवाद । ओ अजेय अध्यात्मवाद ! विविध मतोंके पन्थ-प्रवर्त्तन, गतिमय बहु विध अग जगमें । व्यापक, शास्त्र, समर्थन करते स्वयं सिद्ध बन प्रति पगमें । किन्तु मानवोंको कर पाये वे गत-संशय तनिक न आज । ओ वेदान्तकेसरी ! गर्जन करो, मिटा दो गीदड़-गाज । ओ अजेय अध्यात्मवाद ! वर्गवाद, श्रमवाद अनेकों, वर्तमान जगतीतलमें । संघर्ष-भूमिका रचते, नित उत्पाती प्रतिपलमें । शान्त, महाप्रभु शंकरके ओ ! चिरपरिचित अद्वैतवाद । करो समन्वय सभी वर्गके, करके यावत् शान्त विवाद । ओ अजेय अध्यात्मवाद ! व्यापक आत्म-तत्त्व चेतनका, मानवको दे करके ज्ञान । ऐक्य-भावना-निष्ठ, इष्ट हो, 'साधक' विश्व-जगत् उत्थान । आदिस्रोत कल्याण ! ध्यानमय श्रवण समुत्सुक शुभ संवाद । सरस-सुधा-सम-वरद प्राप्त कर सरसित, सागर-सम आह्लाद । जागो पुनः अमर भारतमें—ओ अजेय अध्यात्मवाद ! ओ अजेय अध्यात्मवाद !