कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 161, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंभगवान् श्रीकृष्णचन्द्र और औपनिषद ब्रह्म पद्मयोनि, प्रपञ्चनिर्माता पितामहके नेत्रोंसे अश्रुके निर्झर झर रहे थे। व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्रके नवजलधर श्याम अङ्ग, अङ्गोंमें विद्युत्प्रभ पीताम्बर, कर्णयुगलमे गुञ्जानिर्मित अवतंस, चूडापर राजित मयूरपिच्छ, वक्षःस्थलपर वनमाला, हस्तपुटमें दधिमिश्रित ग्रास, काँखमे दबे हुए वेत्र एव शृङ्ग, कटिफेंटमें खोंसी हुई मुरली, सुकोमल चरण-सरोज—इनकी शोभा, इनके आलोकमें वेद-उपनिषद् ज्ञानके प्रथम अनुभवी उन आदि ऋषि ब्रह्माका समस्त सञ्चित ज्ञान हतप्रभ हो चुका था। जिनके स्वरूपका साक्षात् वर्णन करनेमें श्रुतियाँ सर्वथा असमर्थ हैं, केवलमात्र स्वरूपसे अतिरिक्त वस्तुओका निषेध- मात्र करती हैं— अस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहितमस्नेहमच्छायमतमो- ऽवाय्वनाकाशमसङ्गमरासमगन्धमचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनो- ऽतेजस्कमप्राणममुखममात्रमनन्तरमबाह्यम् । (बृहदारण्यक० ३ । ८ । ८) 'वह न स्थूल है, न अणु है, न क्षुद्र है, न विशाल है, न अरुण है, न द्रव है, न छाया है, न तम है, न वायु है, न आकाश है, न सङ्ग है, न रस है, न गन्ध है, न नेत्र है, न कर्ण है, न वाणी है, न मन है, न तेज है, न प्राण है, न मुख है, न माप है, उसमें न अन्तर है, न बाहर है।' —इस प्रकार निरसन करते-करते जहाँ जाकर वे परिसमाप्त हो जाती हैं, जिनमे अपने आपको खो बैठती हैं, जिनमें अपना अस्तित्व विलीन कर सफल हो जाती हैं— यच्छ्रुतयस्त्वयि हि फलन्त्यतन्निरसनेन भवन्निधना । (श्रीमद्भागवत वेदस्तुति १०। ८७ । ४१) —वे आज स्वयं ब्रह्माके सामने दृष्टिके विषय होकर खड़े थे। इतना ही नहीं, क्षणभर-पूर्व उनके अपने निर्निमेष नयनोंने देखा था—व्रजेन्द्रतनयके पार्श्ववर्ती वे समस्त गोवत्स, गोपशिशु, नव-नील-नीरद-वर्ण, पीतपट्टाम्बर- परिशोभित शङ्ख-चक्र गदा पद्म करधारी, मणिमुकुटधारी, मणिकुण्डल मुक्ताहारशोभित, वनमाली चतुर्भुजके रूपमें परिणत हो गये थे। उनमेसे प्रत्येक मूर्तिके वक्षःस्थलमे श्रीवत्स, भुआओंमें अङ्गद, हाथोंमे रत्नमय वलय एव कङ्कण, चरणोंमे नूपुर एव कड़े, कटिदेशमें करधनी, अङ्गुलियोंमे अङ्गुरीयक (अँगूठी) विराजित थी। अतिशय भाग्यशाली भक्तोंके द्वारा समर्पित नव-तुलसीकी मालाएँ नख से सिखपर्यन्त समस्त अङ्गोंमें आभरण बनी थीं, चन्द्रज्योत्स्ना सी मन्द मुसकान अधरोंपर नृत्य कर रही थी। अरुणिम नेत्रोंकी चितवनसे मधु झर रहा था। अरुण नेत्र मानो रजके प्रतीक थे, भक्तोंके अन्तस्तलमें, क्षण क्षणमें नव-नव मनोरथ (सेवा-वासना) का सृजन कर रहे थे और वह उज्ज्वल हास मानो सत्त्वका प्रतीक था, जो अधरोंपर नाच-नाचकर भक्तोंके मनोरथका पालन कर रहा था। फिर अगणित असख्य ब्रह्मा वहाँ उपस्थित थे, ब्रह्मा ही नहीं, उनसे लेकर तृणपर्यन्त समस्त चराचर जीव मूर्तिमान् होकर उपस्थित थे और नृत्य-गीत- सहित यथायोग्य विविध उपहार समर्पित करते हुए उन अनन्त चतुर्भुज मूर्तियोंकी उपासना कर रहे थे। अणिमादि सिद्धियाँ, माया विद्या आदि विविध शक्तियाँ, महत्तत्त्व आदि चौबीस तत्त्वोंके अधिष्ठातृदेवता—सभी सेवाकी प्रतीक्षा में उन्हें घेरे खड़े थे। प्रकृति क्षोभमें हेतु काल, प्रकृति-परिणाममें हेतु स्वभाव, वासनाका उद्बोधक सस्कार, काम, कर्म, गुण आदि—इन सबके अधिष्ठातृदेवता उन प्रत्येक भगवद्रूपकी अर्चना कर रहे थे। भगवत्-प्रभावके समक्ष उन देवोंकी सत्ता- महत्ता नगण्य बन चुकी थी। ब्रह्माने देखा—वे अगणित भगवद्रूप—ओह ! सब के सब त्रिकालाबाधित सत्य हैं। ज्ञान- स्वरूप—स्वप्रकाश है। अनन्त हैं। आनन्दस्वरूप हैं। एक- रस हैं। इनके अचिन्त्य, अनन्त, माहात्म्यकी उपलब्धि तो उपनिषद्—आत्मज्ञानकी दृष्टि रखनेवाले पुरुषोंके लिये भी सम्भव नही— सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तय । अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषददृशाम् ॥ (श्रीमद्भा० १० । १३ । ५४) आज ब्रह्मा 'सत्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' * परब्रह्म सत्य है, ज्ञानस्वरूप है, अनन्तस्वरूप है, 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म'+ परब्रह्म विज्ञानस्वरूप है, आनन्दस्वरूप है, इन श्रुतियोंसे प्रतिपाद्य तत्त्वको प्रत्यक्ष देख चुके थे। जिन परब्रह्मात्मक गोपेन्द्रतनय श्रीकृष्णचन्द्रकी स्वप्रकाश-शक्तिसे यह परिदृश्यमान सचराचर विश्व प्रकाशित होता है, उनके नित्य पार्षद—गोपशिशुओं- को, गोवत्सोंको ब्रह्माने आज उपर्युक्त रूपमे एक साथ एक समय देखा था—
* तैत्तिरीय० २ । १ । १ + बृहदारण्यक० ३ । ९ । २८