भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 832 में से

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१४८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * एवं सकृद्ददृशांज परब्रह्मात्मनोऽखिलान् । यस्य भासा सर्वमिद विभाति सचराचरम् ॥ (श्रीमद्भा० १० । १३ । ५५) यह देखकर उनकी क्या दशा हुई थी, यह वे ही जानते थे। फिर तो उनकी दशासे करुणार्द्र हुए श्रीकृष्णचन्द्रने अपनी योग- मायाकी यवनिका हटा दी थी और तब उन्होंने देखा था— वही वृन्दावन है, वही ठीक पहलेकी भाँति अद्वय, अनन्त, ज्ञानस्वरूप परब्रह्म अपने प्रिय गोप शिशुओंको, गोवत्सोंको ढूँढता फिर रहा है, लीलारस पानमे प्रमत्त है, दधिमिश्रित ग्रास भी कर-कमलोंमें ठीक वैसे ही सुशोभित है— तत्रोद्वहत्पशुपवंशशिशुत्वनाट्य ब्रह्माद्वय परमनन्तमगाधबोधम्। वत्सान् सखीनिव पुरा परितो विचिन्व- देक सपाणिकवलं परमेष्ठ्यचष्ट ॥ (श्रीमद्भा० १० । १३ । ६१) पितामह देखकर विह्वल हो गये । श्रीकृष्णचन्द्रको असंख्य प्रणाम कर चुकनेपर उन्हें कहीं धैर्य आया था। फिर भी आँखोंसे अनर्गल अश्रु प्रवाह बह रहा था तथा अश्रुपूरित कण्ठसे वे व्रजेन्द्रनन्दन—नरकृति परब्रह्मका स्तवन कर रहे थे। अन्तस्तलमें पश्चात्तापकी ज्वाला जल रही थी—'आह ! कहाँ इतना क्षुद्र मैं, और कहाँ इतने महान् नन्दनन्दन श्रीकृष्णचन्द्र ! मैं अपनी क्षुद्र मायासे इतने महान्को मोहित करने चला था। इस गुरु अपराधके लिये क्षमा कैसे मिलेगी ?' पर नहीं !—आशाकी एक किरण परमेष्ठीके अन्तस्तलमें सञ्चित एक श्रुतिने जगा दी । 'यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन्समाहितम् ।'* इस परब्रह्मका जो कुछ भी यहाँ है और जो कुछ भी नहीं है, वह सब सम्यक् प्रकारसे इसीमे स्थित है । वेदगर्भ आनन्दप्लुत होकर स्तुतिमें पुकार उठे—"अधोक्षज ! शिशु अपनी जननीके गर्भमें रहता है, अज्ञानवश न जाने कितनी बार चरणोंसे प्रहार करता है, किंतु माता क्या इससे रुष्ट होती है ? फिर तुम्हीं बताओ श्रीकृष्णचन्द्र ! 'है' और 'नहीं है' इन शब्दोंसे लक्षित कोई भी वस्तु तुम्हारी कुक्षि—उदरसे बाहर है क्या ? अनन्त ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्डगत समस्त जीव- समुदाय, समस्त वस्तुएँ—सब कुछ तो तुम्हारे भीतर अवस्थित है। तुम्हारे किसी एक क्षुद्रतम देशमें अवस्थित प्राणीको तुम्हारी

  • छान्दोग्योपनिषद् ८ । १ । ३ अनन्त महिमा, अनन्त स्वरूपका ज्ञान हो, यह भी कभी सम्भव है ? तुम्हें न जानकर तुम्हारे प्रति जो कोई भी कुछ सोच लेगा, कर लेगा—वह अनुचित, अयथार्थ होनेपर तुम क्या रुष्ट हो जाओगे ? नहीं, कदापि नहीं । अबोध शिशुकी भाँति ही, तुम्हारी महिमासे अनभिज्ञ रहकर मैने यह अपराध किया है, तुम मुझे निश्चय क्षमा करोगे"— उत्क्षेपणं गर्भगतस्य पादयो किं कल्पते मातुरधोक्षजागमे। किमस्तिनास्तीत्यपदेशभूषित तवास्ति कुक्षे कियदप्यनन्त ॥ (श्रीमद्भा० १० । १४ । १०) विधाताने सारा वेदज्ञान लगा दिया था इस प्रयासमे कि कदाचित् किसी अशमे व्रजेन्द्रनन्दनकी महिमाके क्षुद्रतम अशको भी वे स्पर्श कर सकें । कहते कहते वे श्रान्त नहीं होते थें, किंतु सहसा अब उनके चित्तमे ब्रजवासियोंका स्फुरण हो आया । वे ब्रजवासियोकी महिमाका कीर्तन करने लगे— अहो भाग्यमहो भाग्य नन्दगोपव्रजौकसाम् । यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्म सनातनम् ॥ (श्रीमद्भा० १० । १४ । ३२ ) 'अहो ! ब्रजराज, व्रजवासी गोपोंका ही भाग्य धन्य है । वस्तुतः उनका ही अहोभाग्य है । परमानन्दस्वरूप सनातन परिपूर्ण ब्रह्म जिनका सुहृद्, मित्र, पुत्र, कलत्र प्रियजन होकर रहे, उनके अनन्त असीम सौभाग्यका क्या कहना ?' फिर तो पितामहमे एक ही चाह बची थी और उसे पूर्ण करनेके लिये वे प्रार्थना कर रहे थे— तद् भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्या यद् गोकुलेऽपि कतमाङ्घ्रिरजोऽभिषेकम् । यज्जीवितं तु निखिलं भगवान् मुकुन्द- स्त्वद्यापि यत्पदरजः श्रुतिमृग्यमेव ॥ (श्रीमद्भा० १० । १४ । ३४) 'गोपेन्द्रतनय ! अनादिकालसे अबतक श्रुतियाँ तुम्हारी चरणधूलिकी खोज कर रही हैं, किंतु पा नहीं रही हैं । फिर साक्षात् तुम्हें कैसे पा सकेंगी ? पर इन व्रजवासियोने तुम्हें पा लिया । पाकर एकमात्र तुम्हे ही अपना जीवनसर्वस्व बनाया । अतः प्रभो ! मेरे लिये परम सौभाग्यकी बात एक ही है । वह यह कि मनुष्यलोकमें और फिर वृन्दावनमें, और वहाँ भी नन्दगोकुलमें कीट, पतङ्ग, तृण, गुल्म आदिमें-