भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 832 में से

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पृष्ठ 163

[Page Header] ⁕ भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र और औपनिषद् ब्रह्म ⁕ १४९


[Left Column]

से कुछ भी होकर—किसी योनिका कुछ भी बनकर मेरा जन्म हो जाय तथा इन ब्रजवासियोंमेंसे किसी एककी भी चरणधूलि-कणका स्पर्श पाकर मैं कृतार्थ हो जाऊँ, ब्रह्मपद मुझे नहीं चाहिये नाथ।'— कहू मोहि ब्रज-रेनु देहु बृंदावन बासा। माँगौं यहै प्रमाद और मेरै नहिं आसा॥ जोँ भावै सोइ करहु तुम, लता सिखा द्रुम, गेहू। ग्वाल गाय को भूत करौँ मानि सत्य व्रत एहु॥ जौ दरसन नर नाग अमर सुरपतिहूँ न पायौँ। भोजन जुग गए बीति अब मोहूँ न लखायौँ॥ दहि ब्रज यह रस नित्य हेँ, में अब समुझ्यौँ आह। बृंदावन-रज हूँ रहौँ ब्रह्म लोक न सुहाइ॥ जगद्विधाताने उन परब्रह्म श्रीकृष्णचन्द्रकी तीन परिक्रमा की और वे अपने घामकी ओर चल पड़े। यह है उपनिषत्- प्रतिपादित परब्रह्मकी एक झाँकी, जो एक बार वेदज्ञानके आदि-आचार्य, आदि-ऋषि ब्रह्माको हुई थी। एक बार देवर्षि नारदको भी परब्रह्मकी विचित्र ही झाँकी हुई थी। नन्दप्राङ्गणकी धूलिमें परब्रह्म लोट रहा था, एव समीपे खड़ी यशोदारानी हँस रहीं थीं। वीणाकी झंकार करते, हरिगुण गाते देवर्षि सौभाग्यसे वहीं जा पहुँचे। वहाँ जो कुछ देखा, उमपर न्यौछावर हो गये। वोल उठे— किं ब्रूमस्त्व्वा यशोदे कति कति सुकृतक्षेत्रवृन्द्वानि पूर्वं गत्वा कीदृग्विधानै कति कति सुकृतान्यर्जितानि त्वयैव। नो शक्रो न स्वयम्भूर्न च मदनरिपुर्यस्य लेभे प्रसादं तत पूर्ण ब्रह्म भूमौ विलुठति चिलपत् क्रोडमारोढुकामम्॥ 'यशोदे! ब्रजेश्वरि! तुम्हें क्या कहूँ, न जाने तुमने किन- किन पुण्यक्षेत्रोंमे जाकर किन-किन विधि-विधानोंसे कितने- कितने पुण्य सञ्चय किये हैं, जिसके फलस्वरूप तुम्हे यह अनुपम सौभाग्य प्राप्त हुआ। सुरेन्द्रने जिसके कृपाकटाक्षके दर्शन नहीं पाये, कमलयोनिन जिसक कृपा नहीं पायी, मदनारि महादेवने जिसकी अनुभूति नहीं की, वह कृपा, वह प्रसाद तुम्हें मिला। ओह! वह पूर्णब्रह्म तुम्हारी गोदमे चढ़नेके लिये रो-रोकर पृथिवीपर लोट रहा है और तुम उसे उठा नहीं रही हो। तुम्हारे सौभाग्यकी यही तो चरम सीमा है व्रजरानी।' अस्तु, ब्रह्मको क्रन्दन करते देखकर देवर्षिका रोम- रोम खिल उठा, हरिगुणके स्थानपर वे यशोदारानीका सुयश गाते चल पड़े।


[Right Column]

लीलाशुक्रको भी एक झाँकी मिली। उन्होंने देखा— आगे-आगे परब्रह्म भागा जा रहा है, पीछे पीछे गोपमहिषी श्रीयशोदा उसे पकड़नेके लिये, हाथमे छड़ी लेकर दौड़ी जा रही है। शुकने एक दृष्टि परब्रह्मकी ओर डाली और फिर परब्रह्मकी जननीकी ओर। परब्रह्म एव जननीकी चालमें अन्तर अवश्य था, वह उस दौड़मे आगे बढ रहा था, जननी श्रीअङ्गोंकी स्थूलताके कारण अस्त व्यस्त होकर पीछे होती जा रही थी- जसु पै तैसैं जाइ न जाइ, श्रोनी-भर अरु कोमरु पाइ। खसत जु सिर तैं सुमन सुदेस, जनु चरनन पर रीझे केस। आगे फूल की वरषा करें, निन पर ब्रजरानी पग धरें। पर इससे क्या हुआ। जननीने परब्रह्मके हाथ पकड़ ही लिये— जोगीजन-मन जहाँ न जाहीं, इत सब वेद पर चिल्लाहीं॥ ताहि जसोमति पकरति भई, रहपट एक बदन पर दई॥ तथा फिर? उसे पकड़कर ऊखलसे बाँध दिया— जद्यपि अस ईश्वर जगदीस, जाके वस विधि, विप्नु, गिरीस। ताहि जसोमति बाँधति मई, रसना प्रेममई दृढ नई॥ × × × × जिन बाँध्यो सुर असुर नाग मुनि प्रनऊ कर्मकी डोरी। सोइ अविच्छिन्न ब्रह्म जसुमति हठि बाँध्यो सरुन न छोरी॥ × × × × निगम सार देखौ गोकुल हरि। जाकौ दूरि ठरस देवनिर्सों, सो बाँध्यौ जसुमति ऊखल धरि॥ लीलांशुक इस झाँकीपर न्यौछावर हो गये। पुकार उठे- परमिसमुपदेशमाद्रियध्वं निगमवनेषु नितान्तखेदखित्ना। विचिन्ुत भवनेषु वल्लवीना- मुपनिषदर्थमुलूखले निवद्धम्॥ 'अरे, ओ ब्रह्मको ढूँढनेवालो ! इधर सुनो, वेदान्त-वन- में परब्रह्मको ढूँढते-ढूँढते तुम उसे न पाकर दुःखसे अतिशय खिन्न हो रहे हो। इधर आ जाओ, मे तुम्हें परम उपदेश दे रहा हूँ, उसका आदर करो। सुनो। गोपसुन्दरियोंके भवनोंमें उसे ढूँढो। यह देखो—यहाँ उपनिषद्का अर्थ उलूखलमें बँधा पड़ा है। इसे ढूँढ लो, पा लो।' शुकका यह उपदेश अनन्त आकाशमें विलीन हो गया। पर नष्ट नहीं हो गया। उसके अक्षर-अक्षर वर्तमान हैं। इसलिये