कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 164, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें१५० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * किसी श्रान्त पथिकने, परब्रह्मके अन्वेषणमे निराश हुए किसी मनीषीने इसे हठात् सुन लिया । इस ओर आया और उसे परब्रह्म मिल गये । आनन्दोन्मत्त हुए उसके प्राण गाने लगे- निगमतरो प्रतिशाखं मृगित मिलितं न तत्परं ब्रह्म । मिलितं मिलितमिदानीं गोपवधूटीपटाञ्चले नद्धम् ॥ ‘ओह ! कितना परिश्रम किया था, वेदान्त-वृक्षकी प्रत्येक शाखा ढूंढ ली थी, पर वह परब्रह्म तो नहीं ही मिला । पर देखो ! देखो ! मिल गया ! मिल गया ! अब मिला है, वह रहा, गोपसुन्दरीके अञ्चलसे सनद्ध होकर वह परब्रह्म अवस्थित है !’ एकने परब्रह्मकी अनुभूति ऐसे की थी-वह चित्तसरोवर- में निमग्न हो चुका था । सहसा अनुभूति हुई-मैं हूँ; मेरी एक देह भी है, मन भी है, बुद्धि भी है, प्राण भी है । ये देह आदि तत्त्वतः क्या हैं ? चिदानन्दसरोवरकी लहरें हैं, इतना ही कहना सम्भव है, वस्तुतः अचिन्त्य हैं, अतर्क्य हैं, अनिर्वचनीय हैं । अस्तु, उसने अनुभव किया-‘हाँ ! मैं तो एक गोपसुन्दरी हूँ ! ठीक, ये कौन हैं ? मेरी सखियाँ हैं । और यह क्या है ? उस गोपसुन्दरीने उस ओर देखा । देखते ही वह हृदय नेत्रोंमें, प्राणोंमें समा गया । विक्षिप्त-सी हुई वह दौड़ चली । उसकी सखियाँ उससे पूछ रही थीं, पर उसे बाह्यज्ञान नहीं था । बड़ी देरके पश्चात् बाह्यचेतना- का सञ्चार हुआ और वह बोली- शृणु सखि ! कौतुकमेकं नन्दनिकेताङ्गने मया दृष्टम् । गो धूलिधूसरिताङ्गो नृत्यति वेदान्तसिद्धान्तः ॥ ‘री सखि ! सुन ! मैने एक कौतुक देखा है । नन्द- प्रासादके प्राङ्गणमे चली गयी थी । वहाँ देखा-अरे ! यहाँ तो वेदान्तका सिद्धान्त नृत्य कर रहा है ! आह बहिन ! और क्या बताऊँ ! नृत्यशील उस परब्रह्मके नवमेघश्यामले अङ्ग गोधूलिसे सन रहे थे, समस्त अङ्ग धूलिधूसरित थे । उस छविको कैसे बताऊँ ।’ एक और भाग्यवान्ने नन्दभवनमें परब्रह्मको देखा था । वह तो लौटा नहीं । उसके प्राकृत शरीरके मन, प्राण, इन्द्रियों- में उस अनुभूतिकी छाया पड़ी और वाणी बोल उठी- श्रुतिमपरे स्मृतिमपरे भारतमपरे भजन्तु भवभीता । अहमिह नन्दं वन्दे यस्यालिन्दे परं ब्रह्म ॥ ‘जो संसारके भयसे डरे हुए हों, वे भले ही कोई तो कोई स्मृतिका, कोई महाभारतका भजन करें । मैं तो नन्दबाबाका भजन करता हूँ, उन्हें प्रणाम करता हूँ जिनके अलिन्ददेश (बाहरके चबूतरे) पर साक्षात् परब्रह्म विराजित हैं।’ उसीकी चित्तभूमिपर परब्रह्मकी एक और अभिनव झाँकीकी छाया पड़ी और वह गाने लगा- कं प्रति कथयितुमीशे सम्प्रति को वा प्रतीतिमायातु । गोपत्तितनयाकुञ्जे गोपवधूटीविटं ब्रह्म ॥ ‘किससे जाकर कहूँ ? और कह देनेपर भी मेरी इस विचित्र अनुभूतिपर विश्वास ही कौन करने लगा; किंतु मत करें, सत्य तो सत्य ही रहेगा । ओह ! मैने देखा है- रविनन्दिनी श्रीयमुनाके पुलिनपर एक निकुञ्जमें एक गोप- सुन्दरीके विशुद्ध प्रेमामृतके पानसे मत्त हुआ, रसलम्पट हुआ, परब्रह्म क्रीड़ामें सलग्न है ।’ भक्त रसखानने भी परब्रह्मका अनुभव किया । आत्म- विस्मृत हो गये । उस अनुभूतिका रस इतना मादक था कि वाणी नियन्त्रणमे न रही । बुद्धि विशुद्ध हो, इन्द्रियाँ सयंमित हों, दिनचर्या परम सात्विक हो, विषय छूट गये हों, राग- द्वेषका अभाव हो गया हो, ब्रह्मकी ओर वृत्ति सदा एकतान लगी हो, उत्कृष्ट वैराग्य हो, अहङ्कार, बल, दर्प, काम, क्रोध, परिग्रह, ममतासे मन सर्वथा अलग हो गया हो, नित्य शान्ति- की धारा अन्तःकरणको प्लावित करती हो*-उसके सामने यह अनुभूति प्रकाशित करनेमे आपत्ति नही, किंतु इससे पूर्व तो इस अनुभूतिको सुनकर कोई समझेगा ही नहीं, सुनना भी नहीं चाहेगा और कदाचित् सुनकर, दुर्बलतावश दुरुपयोग भी कर लेगा । पर ‘रसखान’ स्वयं तो कहते समय, मन-इन्द्रियोंसे मदाके लिये सम्बन्ध तोड़ चुके थे, अवश्य ही लोकदृष्टिमें ज्यों- के त्यों थे । किसीने पूछा उनसे परब्रह्मका पता और ब्रह्मरस- मे निमग्न रसखानकी वाणी सरलतावश सङ्केत कर बैठी- ब्रह्म मैं ढूँढयो पुरानन गानन, वेद रिचा सुनि चौगुने चायन । देख्यो सुन्यो कबहूँ न कितू, वह कैसे सरूप औ कैसे सुभायन ॥ टेरत हेरत हारि पर्यो रसखानि, बतायो न लोग लुगायन । देखो, दुन्यो वह कुञ्ज-कुटीरमें, बैठो पलोटत राधिका पायन ॥
- बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च । शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् । विमुच्य निर्मम शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ (गीता १८ । ५१-५३)