कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१५० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * किसी श्रान्त पथिकने, परब्रह्मके अन्वेषणमे निराश हुए किसी मनीषीने इसे हठात् सुन लिया । इस ओर आया और उसे परब्रह्म मिल गये । आनन्दोन्मत्त हुए उसके प्राण गाने लगे- निगमतरो प्रतिशाखं मृगित मिलितं न तत्परं ब्रह्म । मिलितं मिलितमिदानीं गोपवधूटीपटाञ्चले नद्धम् ॥ ‘ओह ! कितना परिश्रम किया था, वेदान्त-वृक्षकी प्रत्येक शाखा ढूंढ ली थी, पर वह परब्रह्म तो नहीं ही मिला । पर देखो ! देखो ! मिल गया ! मिल गया ! अब मिला है, वह रहा, गोपसुन्दरीके अञ्चलसे सनद्ध होकर वह परब्रह्म अवस्थित है !’ एकने परब्रह्मकी अनुभूति ऐसे की थी-वह चित्तसरोवर- में निमग्न हो चुका था । सहसा अनुभूति हुई-मैं हूँ; मेरी एक देह भी है, मन भी है, बुद्धि भी है, प्राण भी है । ये देह आदि तत्त्वतः क्या हैं ? चिदानन्दसरोवरकी लहरें हैं, इतना ही कहना सम्भव है, वस्तुतः अचिन्त्य हैं, अतर्क्य हैं, अनिर्वचनीय हैं । अस्तु, उसने अनुभव किया-‘हाँ ! मैं तो एक गोपसुन्दरी हूँ ! ठीक, ये कौन हैं ? मेरी सखियाँ हैं । और यह क्या है ? उस गोपसुन्दरीने उस ओर देखा । देखते ही वह हृदय नेत्रोंमें, प्राणोंमें समा गया । विक्षिप्त-सी हुई वह दौड़ चली । उसकी सखियाँ उससे पूछ रही थीं, पर उसे बाह्यज्ञान नहीं था । बड़ी देरके पश्चात् बाह्यचेतना- का सञ्चार हुआ और वह बोली- शृणु सखि ! कौतुकमेकं नन्दनिकेताङ्गने मया दृष्टम् । गो धूलिधूसरिताङ्गो नृत्यति वेदान्तसिद्धान्तः ॥ ‘री सखि ! सुन ! मैने एक कौतुक देखा है । नन्द- प्रासादके प्राङ्गणमे चली गयी थी । वहाँ देखा-अरे ! यहाँ तो वेदान्तका सिद्धान्त नृत्य कर रहा है ! आह बहिन ! और क्या बताऊँ ! नृत्यशील उस परब्रह्मके नवमेघश्यामले अङ्ग गोधूलिसे सन रहे थे, समस्त अङ्ग धूलिधूसरित थे । उस छविको कैसे बताऊँ ।’ एक और भाग्यवान्ने नन्दभवनमें परब्रह्मको देखा था । वह तो लौटा नहीं । उसके प्राकृत शरीरके मन, प्राण, इन्द्रियों- में उस अनुभूतिकी छाया पड़ी और वाणी बोल उठी- श्रुतिमपरे स्मृतिमपरे भारतमपरे भजन्तु भवभीता । अहमिह नन्दं वन्दे यस्यालिन्दे परं ब्रह्म ॥ ‘जो संसारके भयसे डरे हुए हों, वे भले ही कोई तो कोई स्मृतिका, कोई महाभारतका भजन करें । मैं तो नन्दबाबाका भजन करता हूँ, उन्हें प्रणाम करता हूँ जिनके अलिन्ददेश (बाहरके चबूतरे) पर साक्षात् परब्रह्म विराजित हैं।’ उसीकी चित्तभूमिपर परब्रह्मकी एक और अभिनव झाँकीकी छाया पड़ी और वह गाने लगा- कं प्रति कथयितुमीशे सम्प्रति को वा प्रतीतिमायातु । गोपत्तितनयाकुञ्जे गोपवधूटीविटं ब्रह्म ॥ ‘किससे जाकर कहूँ ? और कह देनेपर भी मेरी इस विचित्र अनुभूतिपर विश्वास ही कौन करने लगा; किंतु मत करें, सत्य तो सत्य ही रहेगा । ओह ! मैने देखा है- रविनन्दिनी श्रीयमुनाके पुलिनपर एक निकुञ्जमें एक गोप- सुन्दरीके विशुद्ध प्रेमामृतके पानसे मत्त हुआ, रसलम्पट हुआ, परब्रह्म क्रीड़ामें सलग्न है ।’ भक्त रसखानने भी परब्रह्मका अनुभव किया । आत्म- विस्मृत हो गये । उस अनुभूतिका रस इतना मादक था कि वाणी नियन्त्रणमे न रही । बुद्धि विशुद्ध हो, इन्द्रियाँ सयंमित हों, दिनचर्या परम सात्विक हो, विषय छूट गये हों, राग- द्वेषका अभाव हो गया हो, ब्रह्मकी ओर वृत्ति सदा एकतान लगी हो, उत्कृष्ट वैराग्य हो, अहङ्कार, बल, दर्प, काम, क्रोध, परिग्रह, ममतासे मन सर्वथा अलग हो गया हो, नित्य शान्ति- की धारा अन्तःकरणको प्लावित करती हो*-उसके सामने यह अनुभूति प्रकाशित करनेमे आपत्ति नही, किंतु इससे पूर्व तो इस अनुभूतिको सुनकर कोई समझेगा ही नहीं, सुनना भी नहीं चाहेगा और कदाचित् सुनकर, दुर्बलतावश दुरुपयोग भी कर लेगा । पर ‘रसखान’ स्वयं तो कहते समय, मन-इन्द्रियोंसे मदाके लिये सम्बन्ध तोड़ चुके थे, अवश्य ही लोकदृष्टिमें ज्यों- के त्यों थे । किसीने पूछा उनसे परब्रह्मका पता और ब्रह्मरस- मे निमग्न रसखानकी वाणी सरलतावश सङ्केत कर बैठी- ब्रह्म मैं ढूँढयो पुरानन गानन, वेद रिचा सुनि चौगुने चायन । देख्यो सुन्यो कबहूँ न कितू, वह कैसे सरूप औ कैसे सुभायन ॥ टेरत हेरत हारि पर्यो रसखानि, बतायो न लोग लुगायन । देखो, दुन्यो वह कुञ्ज-कुटीरमें, बैठो पलोटत राधिका पायन ॥
- बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च । शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् । विमुच्य निर्मम शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ (गीता १८ । ५१-५३)
- भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र और औपनिषद ब्रह्म * १५१ भक्त सूरदासकी ज्योतिहीन आँखोंमें भी परब्रह्मकी ज्योति जाग उठी और उन्होंने भी— यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे- ऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । तथा विद्वाञ्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ (मुण्डक० ३ । २ । ८) 'जिस प्रकार निरन्तर बहती हुई नदियाँ अपने नाम-रूप- को त्यागकर समुद्रमें अस्त हो जाती हैं उसी प्रकार विद्वान् नाम-रूपसे मुक्त होकर परात्पर दिव्य पुरुषको प्राप्त हो जाता है।' —ऐसा ही वर्णन अपने एक गीतमें सुनाया। वेगाने लगे— जैसे सरिता मिली सिंधुसों उलटि प्रवाह न आवे हो । तैसे सूर कमल-मुख निरखत चित इत उत न डुलावे हो ॥ $\times\quad\quad\times\quad\quad\times\quad\quad\times$ सरिता निकट तडागके हो दोनों कूर बिदारि । नाम मिट्यो सरिता भई अब कौन निवरे वारि ॥ $\times\quad\quad\times\quad\quad\times\quad\quad\times$ विधि भाजन ओछो रच्यो हो लीलाससिंधु अपार । उलटि मगन तामें भयौ अब कौन निकासनहार ॥ परब्रह्मका वास्तविक पूर्ण अनुभव तो वहाँ ही है, जहाँ हमारा मन, हमारी इन्द्रियाँ मरें नहीं, अपितु उम चिदा- नन्द-रसका स्पर्श पाकर अमर हो जायें। परब्रह्म रसरूप है, उस रसको पाकर ही पुरुष आनन्दका अनुभव करता है— रसो वै स । रसꣳह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति । (तैत्तिरीय० २ । ७) फिर वह किसीको मारे, यह सम्भव नहीं। यह सत्य है— 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।'* इन्द्रियोंके सहित मन परब्रह्मको न पाकर लौट आता है, किंतु यदि वह स्वयं मन-इन्द्रियोंमें उतर आवे तो उसे कौन रोक सकता है ? क्या उसपर भी कोई बन्धन है ? और वास्तव- में तो वह मिलता ही है उसे, जिसे वह स्वय वरण करता है, वरण करके अपने स्वरूपको उसके प्रति अभिव्यक्त कर देता है— यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ (कठ० १। २ । २३) अतः यह तो वरण करनेवालेकी इच्छा है कि वह अपने किस स्वरूपमे किसका वरण करे। वह तो सर्वतन्त्रस्वतन्त्र है, श्रुतियोंकी सीमामें नहीं है। इसीलिये कभी-कभी वह मन- इन्द्रियोंमें भी अपना चिदानन्दमय रस भरकर वहाँ क्रीड़ा करने लग जाता है। नरकृति परब्रह्म श्रीकृष्णचन्द्रने तो यही किया। चाहनेवालेके मन-इन्द्रियोंमें भी वे अपना स्वरूपभूत रस देकर स्वयं उसका रस लेने लगे— परम रस पायो ब्रजकी नारि । जो रस ब्रह्मादिकनों दुर्लभ सो रस दियो मुरारि ॥ दरसन सुख नयननको दीनों रसनाको गुन गान । बचन सुनन श्रवननको दीनों बदन अधर-रस पान ॥ आलिंगन दीनो सब अंगन भुजन दियो भुजबंध । दीनी चरन बिचित्र गति रसकी नासाको सुख गंध ॥ दियो काम सुख भोग परमफल त्वचा रोम आनंद । ढिग बैठिबो दियो नितबन लै ऊछंग नंदनंद ॥ मनको दियो सदा रस-भावन सुख-समूहकी खान । रसिक-चरन-रज ब्रजबुवतिनकी अति दुर्लभ जिय जान ॥ ऐसे रसमय परब्रह्म नन्दनन्दन श्रीकृष्णचन्द्रसे चित्तवृत्ति- का जुड़ जाना ही उपनिषद्के स्वाध्यायका फल है। यही उपनिषद्-ज्ञानका मधुर परिणाम है। सच्ची बात तो यह है कि उपनिषद्की ज्ञानसरिताएँ जब प्रेम-समुद्रमें जाकर— उसमें घुल-मिलकर अपने पृथक् अस्तित्वको सर्वथा छिपा लेती हैं, तभी नित्य नवीन, सौन्दर्य-माधुर्य-सुधा-रस-सिन्धु योगीन्द्र-मुनीन्द्र-परिसेवित-पादारविन्द परब्रह्म मदनमोहन ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्रके दिव्य नित्य चिदानन्दरसमय स्वरूप-साम्राज्यमें प्रवेशका पथ मिलता है। इस रस-साम्राज्यमें किञ्चित् प्रवेश पाकर किन्हीं एक परम विद्वान् महात्माने मुक्तकण्ठसे कहा था— ध्यानाभ्यासवशीकृतेन मनसा तन्निर्गुणं निष्क्रियं ज्योतिः किंचन योगिनो यदि परं पश्यन्ति पश्यन्तु ते । अस्माकं तु तदेव लोचनचमत्काराय भूयाच्चिरं कालिन्दीतटकुञ्जकुहर-पुलीनोदरे किमपि यन्नीलं महो धावति ॥ वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात् पीताम्बरादरुणविम्बफलाधरोष्ठात् । पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात् कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने ॥* 'यदि योगीजन ध्यानके अभ्याससे वशमे किये हुए मनके द्वारा उस निर्गुण, निष्क्रिय एव अनिर्वचनीय परम ज्योतिका दर्शन करते हैं तो वे करते रहें, हमारे नेत्रोंमें तो वह एकमात्र श्याममय प्रकाश ही चिरन्तन कालतक चमत्कार उत्पन्न करता
- तैत्तिरीय० २ । ४
- देखिये गोता मधुसूदनी टीका अध्याय १३ और १५ की टीका
१५२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * रहे, जो कि श्रीयमुनाजीके उभय तटोंके भीतर इधर-उधर दौड़ता फिरता है।' 'जिसके दोनों हाथ बाँसुरी बजाते हुए शोभा पा रहे हैं, श्रीअङ्गोंकी कान्ति नूतन जलधरके समान श्याम है, शरीरपर पीताम्बर सुशोभित है, ओष्ठ पके हुए विम्बाफलके समान लाल- लाल हैं, परम सुन्दर मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान आनन्ददायक है और नेत्र विकसित कमलकी सी शोभा धारण करते हैं, उस श्रीकृष्णसे बढ़कर या उससे परे किसी श्रेष्ठ तत्त्वको मैं नहीं जानता।' यही नहीं, श्रीकृष्णके प्रेम साम्राज्यमे अन्तमे क्या दशा हो जाती है, एक अनुभवीकी वाणी सुनिये— अद्वैतवीथीपथिकैरुपास्याः स्वाराज्यसिंहासनलब्धदीक्षाः । शठेन केनापि वयं हठेन दासीकृता गोपवधूविटेन ॥ 'अद्वैतकी वीथियोंमें विचरनेवाले पथिक (साधक) जिन- को अपना उपास्य गुरुदेव मानते हैं तथा आत्मराज्यके सिंहासनपर जिनका अभिषेक हो चुका है; ऐसे होते हुए भी हमें गोपाङ्गनाओंसे प्रेम रखनेवाले किसी छलियेने हठपूर्वक अपना दास बना लिया है'— यह तो बड़ोंकी बातें हैं। हमारे-जैसे लोगोंकी तो एक- मात्र यही आकाङ्क्षा होनी चाहिये कि हमारी चित्त चकईं भवसागरके तटसे उड़कर अनन्त पारावाररहित श्रीकृष्ण-रस- सिन्धुके तटपर अपना नित्य निवास बना ले; बस— चकई री चल चरन-सरोवर जहाँ नहि प्रेम-वियोग । जहँ भ्रम-निसा होत नहि कबहूँ सो सायर सुख-जोग ॥ सनक-से हस, मीन सन-मुनिजन, नख रविप्रभा प्रकास । प्रफुल्लित कमल निमिष नहि ससि उर गुंजन निगम सुबास ॥ जेहि सर सुभग मुक्ति मुक्ताफल विमल सुकृत-जल पीजै । सो सर छोड़ि कुबुद्धि विहगम इहाँ रहे कहा कीजै ॥ जहँ श्री सहस सहित हरि क्रीड़त सोभित सूरदास । अब न सुहाय विषय-रस छीर वह समुद्रकी आस ॥
उपनिषत् उप-समीप, निषत्-निषीदति-बैठनेवाला । जो उस परमतत्त्वके समीप पहुँचाकर चुपचाप बैठ जाता है, वह उपनिषद् है। परमतत्त्व अवर्णनीय है, नाना प्रकारके वर्णनोंका अभिप्राय 'नेति-नेति' में है। वर्णन और बोध-ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेयकी त्रिपुटीसे परे अनुभूति-स्वरूप परमतत्त्व है। उपनिषद्-ज्ञानकी परिसमाप्ति अनुभूतिके क्षेत्रमे होती है। भगवान् आद्य शङ्कराचार्यके दो वाक्य स्मरण आ रहे हैं— 'ईश्वरानुग्रहादेव पुमानद्वैतवासना' और— 'कथं त्वत्कटाक्ष विना तत्त्वबोधः' अनुभूति—आवरणका विनाश—त्रिपुटीकी परिसमाप्ति तो भगवदनुग्रहसे ही सम्भव है । जहाँ उपनिषद्की समाप्ति होती है, वहींसे अनुग्रहकी प्रतीक्षा—उपासनाका प्रारम्भ होता है । अनुग्रहकी प्रतीक्षारूप उपासना भगवान्को अत्यन्त समीप ला देती है। वेदत्रयी कर्मकाण्ड है। कर्मके द्वारा मलकी निवृत्ति होनेपर एकाग्रताकी प्राप्तिके लिये ज्ञानकाण्ड—उपनिषद्का विधान है। यह विक्षेप-चाञ्चल्यकी निवृत्ति करेगा। जहाँ विविधता, अनेकता है ही नहीं, वहाँ चञ्चलता क्यों ? किसलिये ? कहाँ ? स्थैर्यकी प्रतिष्ठा होनेपर भावका उद्रेक होता है। उपासना आरम्भ होती है। उसका रूप है—भगवत्कृपाकी प्रतीक्षा। कृपाके बिना आवरण निवृत्त जो नहीं होता। यों तो प्रत्येक साधन अपनेमें पूर्ण है निष्ठाका आधार मिलनेपर; किंतु क्रम भी होता ही है। उपनिषद्का लक्ष्य ?—परनिर्वाणकी प्राप्ति, अभेद ! सायुज्य कहे तो भी बाधा नही । अन्तर इतना ही है कि उपनिषद् परनिर्वाणकी प्राप्ति श्रवण-मनन-निदिध्यासनसे कराता है और असुर द्वेषसे सायुज्य प्राप्त करते है—अभेद; दूरी है उसमे । उपासना—नित्य सान्निध्य—भागवतीय ज्ञान, वह तो उपनिषद्की समाप्तिसे प्रारम्भ होता है। वहाँ तो— 'सालोक्यसाष्टिसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत । दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥' 'सुकृति निरादरि भगति लुभाने' है । —सुदर्शन
4 उपलब्ध उपनिषद्-ग्रन्थोंकी सूची उपनिषदोंकी बडी महिमा है। ज्ञानकी चरम सीमा ही उपनिषद्के नामसे प्रसिद्ध हुई है। वैदिक वाङ्मयका शीर्ष-स्थान उपनिषद् है—इस कथनमात्रसे ही उपनिषदोंकी लोकोत्तर महत्ता स्पष्ट हो जाती है। प्राचीन कालमे औपनिषद ज्ञानका बडा महत्त्व था। ऊँचे-से-ऊँचे अधिकारी ही इस विद्यामें पारङ्गत होते थे। वैदिक कालसे ही उपनिषदोंके स्वाध्याय-की परम्परा प्रचलित हुई है। अतः कुछ उपनिषद् तो वेदके ही अंशविशेष हैं। कुछ ब्राह्मणभाग और आरण्यकोंके अन्तर्गत हैं। कुछ इनकी अपेक्षा अर्वाचीन होनेपर भी आजसे बहुत प्राचीन कालके हैं तथा कुछ उपनिषद्-ग्रन्थ ऐसे भी है, जिनपर विशेष देश, काल, परिस्थिति तथा मतका प्रभाव पड़ा जान पड़ता है। उपनिषद्-ग्रन्थ प्राचीन हों या अर्वाचीन—सभी ज्ञानप्रधान हैं। सबका आविर्भाव किसी-न-किसी गूढ तत्त्व या रहस्यका प्रकाशन करनेके लिये ही हुआ है। अतः इनके स्वाध्यायसे ज्ञानकी वृद्धि ही होती है—यह निश्चितरूपसे कहा जा सकता है। मुक्तिकोपनिषद्मे एक सौ आठ उपनिषदोंके नाम आते हैं। वे सभी ‘निर्णयसागर प्रेस’ बम्बईसे मूल गुटका-के रूपमें प्रकाशित हैं। इसके सिवा, ‘अडियार लाइब्रेरी’ मद्राससे भी उपनिषदोंका एक संग्रह प्रकाशित हुआ है, जो अनेक भागोंमें विभक्त है। उस संग्रहमें लगभग १७९ उपनिषदोंका प्रकाशन हो गयाहै। इसके अतिरिक्त ‘गुजराती प्रिंटिंग प्रेस’ बम्बईसे मुद्रित उपनिषद्-वाक्य-महाकोषमें २२३ उपनिषदों-की नामावली दी गयी है। इनमें दो उपनिषद्—१ उपनिप-त्स्तुति तथा २ देव्युपनिषद् नं० २ की चर्चा शिवरहस्यनामक ग्रन्थमे की गयी है। ये दोनों अभीतक उपलब्ध न हो सकी हैं। शेष २२१ उपनिषदोंके वाक्यग्रंथ इस महाकोषमे संकलित हुए हैं। इनमें भी माण्डूक्यकारिकाके चार प्रकरण चार जगह गिने गये हैं, इन सबकी एक सख्या मानें तो २१८ ही सख्या होती है। कई उपनिषदें एक ही नामकी दो-तीन जगह आयी हैं, पर वे स्वतन्त्र ग्रन्थ हैं। इस प्रकार सबपर दृष्टिपात करनेसे यह निश्चित होता है कि अबतक लगभग २२० उपनिषदें प्रकाशमें आ चुकी हैं। और भी प्रकाशित हुई होंगी तथा कितनी ही अत्र भी अप्रकाशित रूपमे उपलब्ध हो सकती हैं। प्राचीन कालसे ही अद्वितीय ज्ञान-विज्ञानशाली भारतवर्षमें जान विज्ञानकी अपरिमित ग्रन्थ-राशिका होना आश्चर्यकी बात नहीं है। भारतपर एक-एक करके अनेक बार विदेशी दस्युओंके आक्रमण हुए और उनके द्वारा हमारी प्राचीन हस्तलिखित कितनी ही पुस्तकों तथा पुस्तकालयोंको भस्मावशेष कर दिया गया। इतनेपर भी जो कुछ शेष है, उसका भी यदि भारतीय जन आदरपूर्वक अनुशीलन करें तो पूर्वजोकी ज्ञान-ज्योति अब भी इस देशमे प्रकाशित हो सकती है। यहाँ उपर्युक्त २२० उपनिषदोकी नामावली अकारादि क्रमसे दी जा रही है—
१ अक्षमालोपनिषद् २. अक्षि-उपनिषद् ३. अथर्वाङ्गिरसोपनिषद् ४. अथर्वशिर उपनिषद् ५ अद्वयतारकोपनिषद् ६ अद्वैतोपनिषद् ७. अद्वैतभावनोपनिषद् ८ अध्यात्मोपनिषद् ९. अनुभवसारोपनिषद् १० अन्नपूर्णोपनिषद् ११ अमनस्कोपनिषद् १२ अमृतनादोपनिषद् १३. अमृतबिन्दूपनिषद् (ब्रह्मबिन्दूपनिषद्) १४ अरुणोपनिषद् १५. अल्लोपनिषद् १६. अवधूतोपनिषद् (वाक्यात्मक एव पद्यात्मक) १७. अवधूतोपनिषद् (पद्यात्मक) १८. अव्यक्तोपनिषद् १९. आचमनोपनिषद् २०. आत्मपूजोपनिषद् २१ आत्मप्रबोधोपनिषद् (आत्मबोधोपनिषद्) २२ आत्मोपनिषद् (वाक्यात्मक) २३. आत्मोपनिषद् (पद्यात्मक) २४. आथर्वणद्वितीयोपनिषद् (वाक्यात्मक एव मन्त्रात्मक) २५ आयुर्वेदोपनिषद् २६. आरुणिकोपनिषद् (आरुणेय्युपनिषद्) २७. आर्षेयोपनिषद् २८ आश्रमोपनिषद् २९ इतिहासोपनिषद् (वाक्यात्मक एव पद्यात्मक) ३० ईशावास्योपनिषद् उपनिषत्स्तुति (शिवरहस्यान्तर्गत, अभीतक अनुपलब्ध) ३१. ऊर्ध्वपुण्ड्रोपनिषद् (वाक्यात्मक एव पद्यात्मक) ३२. एकाक्षरोपनिषद्
३३ ऐतरेयोपनिषद् (अध्यायात्मक) ७४. तारोपनिषद्
१५४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ३३ ऐतरेयोपनिषद् (अध्यायात्मक) ७४. तारोपनिषद् ३४. ऐतरेयोपनिषद् (खण्डात्मक) ७५. तुरीयातीतोपनिषद् (तीतावधूतो०) ३५ ऐतरेयोपनिषद् (अध्यायात्मक) ७६. तुरीयोपनिषद् ३६. कठरुद्रोपनिषद् (कण्ठोपनिषद्) ७७. तुलस्युपनिषद् ३७ कठोपनिषद् ७८. तेजोबिन्दूपनिषद् ३८ कठश्रुत्युपनिषद् ७९. तैत्तिरीयोपनिषद् ३९. कलिसंतरणोपनिषद् (हरिनामोपनिषद्) ८०. त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् ४० कात्यायनोपनिषद् ८१. त्रिपुरातापिन्युपनिषद् ४१ कामराजकीलितोद्धारोपनिषद् ८२. त्रिपुरोपनिषद् ४२. कालाग्निरुद्रोपनिषद् ८३. त्रिपुरामहोपनिषद् ४३. कालिकोपनिषद् ८४. त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद् ४४. कालीमेधादीक्षितोपनिषद् ८५. त्रिसुपर्णोपनिषद् ४५ कुण्डिकोपनिषद् ८६. दक्षिणामूर्त्युपनिषद् ४६ कृष्णोपनिषद् ८७. दत्तात्रेयोपनिषद् ४७ केनोपनिषद् ८८. दत्तोपनिषद् ४८. कैवल्योपनिषद् ८९. दुर्वासोपनिषद् ४९. कौलोपनिषद् ९०. (१) देव्युपनिषद् (पद्यात्मक एव मन्त्रात्मक) ५० कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् (२) देव्युपनिषद् (शिवरहस्यान्तर्गत—अनुपलब्ध) ५१ क्षुरिकोपनिषद् ९१. द्वयोपनिषद् ५२ गणपत्यथर्वशीर्षोपनिषद् ९२. ध्यानबिन्दूपनिषद् ५३ गणेशपूर्वतापिन्युपनिषद् (वरदपूर्वतापिन्युपनिषद्) ९३. नादबिन्दूपनिषद् ५४. गणेशोत्तरतापिन्युपनिषद् (वरदोत्तरतापिन्युपनिषद्) ९४ नारदपरिव्राजकोपनिषद् ५५. गर्भोपनिषद् ९५. नारदोपनिषद् ५६. गान्धर्वोपनिषद् ९६. नारायणपूर्वतापिन्युपनिषद् ५७. गायत्र्युपनिषद् ९७ नारायणोत्तरतापिन्युपनिषद् ५८ गायत्रीरहस्योपनिषद् ९८ नारायणोपनिषद् (नारायणाथर्वशीर्ष) ५९. गारुडोपनिषद् (वाक्यात्मक एव मन्त्रात्मक) ९९. निरालम्बोपनिषद् ६०. गुह्यकाल्युपनिषद् १००. निरुक्तोपनिषद् ६१. गुह्यषोढान्यासोपनिषद् १०१ निर्वाणोपनिषद् ६२. गोपालपूर्वतापिन्युपनिषद् १०२. नीलरुद्रोपनिषद् ६३. गोपालोत्तरतापिन्युपनिषद् १०३. नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषद् ६४. गोपीचन्दनोपनिषद् १०४. नृसिंहषट्चक्रोपनिषद् ६५. चतुर्वेदोपनिषद् १०५. नृसिंहोत्तरतापिन्युपनिषद् ६६. चाक्षुषोपनिषद् (चक्षुरुपनिषद्, चक्षूरोगोपनिषद्, १०६. पञ्चब्रह्मोपनिषद् नेत्रोपनिषद्) १०७. परब्रह्मोपनिषद् ६७ चित्युपनिषद् १०८. परमहंसपरिव्राजकोपनिषद् ६८. छागलेयोपनिषद् १०९ परमहंसोपनिषद् ६९. छान्दोग्योपनिषद् ११० पारमात्मिकोपनिषद् ७०. जावालदर्शनोपनिषद् १११. पारायणोपनिषद् ७१. जाबालोपनिषद् ११२ पाशुपतब्रह्मोपनिषद् ७२. जाबाल्युपनिषद् ११३. पिण्डोपनिषद् ७३ तारसारोपनिषद् ११४ पीताम्बरोपनिषद्
- उपलब्ध उपनिषद्-ग्रन्थोंकी सूची * \hfill १५५
११५. पुरुषसूक्तोपनिषद् \hfill १५१. याज्ञवल्क्योपनिषद् ११६. पैङ्गलोपनिषद् \hfill १५२. योगकुण्डल्युपनिषद् ११७. प्रणवोपनिषद् (पद्यात्मक) \hfill १५३ योगचूडामण्युपनिषद् ११८. प्रणवोपनिषद् (वाक्यात्मक) \hfill १५४ (१) योगतत्त्वोपनिषद् ११९ प्रश्नोपनिषद् \hfill १५५. (२) योगतत्त्वोपनिषद् १२०. प्राणाग्निहोत्रोपनिषद् \hfill १५६. योगराजोपनिषद् १२१ बटुकोपनिषद् (वटुकोपनिषद्) \hfill १५७ योगशिखोपनिषद् १२२. बह्वृचोपनिषद् \hfill १५८ योगोपनिषद् १२३. वाष्कलमन्त्रोपनिषद् \hfill १५९. राजश्यामलरहस्योपनिषद् १२४. विल्वोपनिषद् (पद्यात्मक) \hfill १६०. राधिकोपनिषद् (वाक्यात्मक) १२५. " (वाक्यात्मक) \hfill १६१. राधोपनिषद् (प्रपाठात्मक) १२६. बृहज्जाबालोपनिषद् \hfill १६२. रामपूर्वतापिन्युपनिषद् १२७. बृहदारण्यकोपनिषद् \hfill १६३. रामरहस्योपनिषद् १२८. ब्रह्मविद्योपनिषद् \hfill १६४ रामोत्तरतापिन्युपनिषद् १२९. ब्रह्मोपनिषद् \hfill १६५ रुद्रहृदयोपनिषद् १३० भगवद्गीतोपनिषद् \hfill १६६. रुद्राक्षजाबालोपनिषद् १३१. भस्मतरणोपनिषद् \hfill १६७. रुद्रोपनिषद् १३२ भस्मजाबालोपनिषद् \hfill १६८. लक्ष्म्युपनिषद् १३३. भावनोपनिषद् (कापिलोपनिषद्) \hfill १६९. लाङ्गलोपनिषद् १३४ भिक्षुकोपनिषद् \hfill १७० लिङ्गोपनिषद् १३५. मठान्नायोपनिषद् \hfill १७१. वज्रपञ्जरोपनिषद् १३६ मण्डलब्राह्मणोपनिषद् \hfill १७२. वज्रसूचिकोपनिषद् १३७. मन्त्रिकोपनिषद् (चूलिकोपनिषद्) \hfill १७३ वनदुर्गापनिषद् १३८. मल्लायुपनिषद् \hfill १७४. वराहोपनिषद् १३९ महानारायणोपनिषद् (बृहन्नारायणोपनिषद्, उत्तर- \hfill १७५ वासुदेवोपनिषद् नारायणोपनिषद्) \hfill १७६. विश्रामोपनिषद् १४० महावाक्योपनिषद् \hfill १७७ विष्णुहृदयोपनिषद् १४१. महोपनिषद् \hfill १७८. शरभोपनिषद् १४२. माण्डूक्योपनिषद् \hfill १७९. शाट्यायनीयोपनिषद् १४३. माण्डूक्योपनिषत्कारिका \hfill १८०. शाण्डिल्योपनिषद् (क) आगम \hfill १८१. शारीरकोपनिषद् (ख) अलातशान्ति \hfill १८२ (१) शिवसङ्कल्पोपनिषद् (ग) वैतथ्य \hfill १८३. (२) शिवसङ्कल्पोपनिषद् (घ) अद्वैत \hfill १८४ शिवोपनिषद् १४४ मुक्तिकोपनिषद् \hfill १८५. शुकरहस्योपनिषद् १४५. मुण्डकोपनिषद् \hfill १८६. शौनकोपनिषद् १४६ मुद्गलोपनिषद् \hfill १८७ श्यामोपनिषद् १४७ मृत्युलाङ्गलोपनिषद् \hfill १८८ श्रीकृष्णपुरुषोत्तमसिद्धान्तोपनिषद् १४८. मैत्रायण्युपनिषद् \hfill १८९. श्रीचक्रोपनिषद् १४९ मैत्रेय्युपनिषद् \hfill १९०. श्रीविद्यातारकोपनिषद् १५० यज्ञोपवीतोपनिषद् \hfill १९१. श्रीसूक्तम् \hfill १९२ श्वेताश्वतरोपनिषद्
१५६ ⁘ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ⁘ १९३ षोढोपनिषद् २०७ सिद्धान्तसारोपनिषद् १९४ सङ्कर्षणोपनिषद् २०८ सीतोपनिषद् १९५ सदानन्दोपनिषद् २०९. सुदर्शनोपनिषद् १९६ सन्न्यासोपनिषद् २१०. सुबालोपनिषद् १९७. सन्यासोपनिषद् ( अध्यायात्मक ) २११ सुमुख्युपनिषद् १९८ ,, ( वाक्यात्मक ) २१२ सूर्यनारायणोपनिषद् १९९ सरस्वतीरहस्योपनिषद् २१३. सूर्योपनिषद् २०० सर्वसारोपनिषद् ( सर्वोप० ) २१४ सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद् २०१. स ह वै उपनिषद् २१५ स्कन्दोपनिषद् २०२ सहितोपनिषद् २१६. स्वसंवेद्योपनिषद् २०३ सामरहस्योपनिषद् २१७. हयग्रीवोपनिषद् २०४ सावित्र्युपनिषद् २१८ हंसषोढोपनिषद् २०५. सिद्धान्तविष्ठलोपनिषद् २१९. हंसोपनिषद् २०६ सिद्धान्तशिखोपनिषद् २२०. हेरम्बोपनिषद् उपनिषद् हिंदू-जातिके प्राण हैं ( लेखक—भक्त रामशरणदासजी ) उपनिषद् हिंदू-जातिके प्राण हैं । यदि हिंदू-जाति जीवित रह सकती है तो वह उपनिषदोंके द्वारा ही रह सकती है । जिस समय भारतकी प्रत्येक सन्तान उपनिषदोंकी इस शिक्षाको कि, आत्मा अमर है—कभी मरता नहीं, याद रखता था और आत्माकी अमरतामें विश्वास रखता था, उस समय वह धर्म, गौ, स्वजाति, स्वधर्म और सभ्यता-संस्कृतिकी रक्षाके लिये उल्लासके साथ मृत्युका आलिङ्गन करता था और प्राण देकर उन्हें बचाता था । इस प्रकार वह हिंदूधर्मकी पंताकाको शानसे फहराता था, कभी झुकने नहीं देता था । यवनकालमे हजारों-लाखों क्षत्रियोंने धर्मरक्षा, चोटी जनेऊकी रक्षा- के लिये सिर दे दिये । श्रीगुरुगोविन्दसिंहजीके लाल दीवारोमे हँसते हँसते चुने गये । मतीराम आरेसे चीरे जानेपर भी हँसते रहे । बन्दावीरका मास नोचवाया गया, पर उसने उफ तक नहीं की । यह सब क्या था ? यह था उपनिषदोंकी शिक्षाका चमत्कार, जिससे आत्माकी अमरतामे विश्वास कर भारतयोंने धर्म-देशके लिये मर-मिटना सीखा था। जिस दिनसे हमने उपनिषदोंसे मुख मोड़ा और गंदे साहित्यको अपनाया, तभीसे हमारा घोर पतन हो गया । अतः यदि फिरसे भारतका और हिंदू-जातिका उत्थान करना है तो उपनिषदोंकी शरणमे आना होगा और आत्माकी अमरतामे और विश्वमे एक ही परमात्माकी व्यापकतापर विश्वास कर शरीरका मोह दूर करना होगा । महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्यदेवने भी हिंदू-जातिका घोर पतन होते देख कलि- संतरणोपनिषद्का सहारा ले उसके बताये हुए महामन्त्र— हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥ —का जप और इसीका कीर्तन कराकर लोगोको जगाया । श्रीहरिनामके बलपर हिंदू-जातिका कल्याण कर दिखाया । कलिपावनावतार गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी महाराजने श्रीरामनाम-महिमाको जान स्वय तो प्रभु श्रीरामका साक्षात्कार किया ही, लाखोंको श्रीरामनाम-मन्त्र देकर सन्मार्गपर लगाया और देश-धर्मकी डूबती नैयाको बचाया । इस प्रकार हिंदू-जाति जिस समय उपनिषदोंके बताये मार्गपर चलती थी, उन्नतिके शिखरपर थी और जिस दिन इसने इनसे मुख मोड़ा, इसका पतन हो गया । आज भी यदि हिंदू-जाति अपनी भूलको समझ ले और उपनिषदोंके मार्गपर चले तो इसमे तनिक भी सन्देह नहीं कि यह पुनः सच्ची उन्नतिके शिखरपर पहुँच जायगी ।
अध्यात्मवाद ( रचयिता—प० श्रीरघुनाथप्रसादजी शास्त्री 'साधक' ) जागो पुनः अमर भारतमें, ओ अजेय अध्यात्मवाद ! देश-जाति-जनता-उर-नभमें, आज घिरे घन-सघन-विषाद् । अनाचार, अतिचार, पाप, पर-पीडनकी रणभेरी है । अपना स्वत्व सुरक्षित करने, पर-विनाशकी ढेरी है । सर्व-स्वत्व-संरक्षित करने, हरने आततायी अतिवाद , निर्भय रण-प्रांगणमें आकर, गाओ ब्राह्मी-विजयनिनाद् । ओ अजेय अध्यात्मवाद ! भेद-भाव बहु भाँति भरे हैं, बन्धु-भावना लुप्त हुई । सहयोगिता, सुसेवा, समता, प्रेम-भावना सुप्त हुई । अन्तर्दाह कलह-कायरता, कलुषित काम-क्रोध दुर्वाद । आकर शीघ्र समाज जातिके, दूर करो सब निंद्य विवाद । ओ अजेय अध्यात्मवाद ! विविध मतोंके पन्थ-प्रवर्त्तन, गतिमय बहु विध अग जगमें । व्यापक, शास्त्र, समर्थन करते स्वयं सिद्ध बन प्रति पगमें । किन्तु मानवोंको कर पाये वे गत-संशय तनिक न आज । ओ वेदान्तकेसरी ! गर्जन करो, मिटा दो गीदड़-गाज । ओ अजेय अध्यात्मवाद ! वर्गवाद, श्रमवाद अनेकों, वर्तमान जगतीतलमें । संघर्ष-भूमिका रचते, नित उत्पाती प्रतिपलमें । शान्त, महाप्रभु शंकरके ओ ! चिरपरिचित अद्वैतवाद । करो समन्वय सभी वर्गके, करके यावत् शान्त विवाद । ओ अजेय अध्यात्मवाद ! व्यापक आत्म-तत्त्व चेतनका, मानवको दे करके ज्ञान । ऐक्य-भावना-निष्ठ, इष्ट हो, 'साधक' विश्व-जगत् उत्थान । आदिस्रोत कल्याण ! ध्यानमय श्रवण समुत्सुक शुभ संवाद । सरस-सुधा-सम-वरद प्राप्त कर सरसित, सागर-सम आह्लाद । जागो पुनः अमर भारतमें—ओ अजेय अध्यात्मवाद ! ओ अजेय अध्यात्मवाद !
बृहदारण्यकोपनिषद्में ऐतिहासिक अध्ययनकी सामग्री (लेखक—आचार्य वी० आर० श्रीरामचन्द्र दीक्षितार एम्० ए० )
भारतवर्षकी वास्तविक प्रतिभा यहाँके प्राचीन ऋषि- मुनियोंमें पायी जाती है। उनकी दृष्टि बड़ी दूरदर्शिनी थी । वे वस्तुओंको उनके वास्तविक रूपमे देखते थे। इन्हीं ऋषि- मुनियोंकी कृपासे वह वैदिक एव वेदान्तिक वाङ्मय उपलब्ध हुआ है, जिसे आज हम बड़ी रुचिके साथ एक निधिके रूप- मे सँजोते हैं। इस वाङ्मयमें उपनिषद् साहित्यका बहुत ऊँचा स्थान है और उसका यह गौरव न्याय्य भी है। उपनिषदोंमे बृहदारण्यकोपनिषद् एक विशेष स्थान रखता है। उपनिषदोंकी महत्ताका पार पाना दुष्कर है। उनकी गणना उस श्रेणीके साहित्यमें की जा सकती है, जिसका सृजन तब होता था, जब देशके गण्यमान्य व्यक्ति—प्रधानतया राजा तथा ऊँची श्रेणीके राजनीतिज्ञ अपने कठिन कर्मठ जीवनके बाद वन्य आश्रमोंमें चले जाते थे और मोक्षकी आकाङ्क्षासे अपने जीवनके सन्ध्याकालको भजन-ध्यानमें व्यतीत करते थे। उन आश्रमोंमें उन शिष्ट नरेशों एवं विद्वान् ब्राह्मणोंके बीच जो वार्तालाप होता था, उसे भावी सन्ततिके हितार्थ लिपिबद्ध कर लिया जाता था। उपनिषद् शब्दके वाच्यार्थ निकट उपवेशनसे ही उपनिषदोंके उद्भवकी उपर्युक्त सम्भावनाका सङ्केत मिल जाता है। उपनिषदोंके नामोंसे ही उनको जन्म देनेवाले भौगोलिक प्रदेशोंका भी सङ्केत मिलता है और यह भी पता चलता है कि सबका लक्ष्य उसी एक दुरधिगम महान् तत्त्व अर्थात् आत्म-साक्षात्कारका ही विवेचन और निर्णय करना है। उपनिषदोंमे मुख्यतया पुनर्जन्मके सिद्धान्तका प्रतिपादन हुआ है । इस सिद्धान्तका धर्म अथवा इतिहासकी अपेक्षा हिंदू-दर्शनसे अधिक सम्बन्ध है । संक्षेपमे यह सिद्धान्त हमे बतलाता है कि सभी प्राणियोंके हृदयमे एक ही परमात्माका निवास है, जो अमर और अविनाशी है। शरीरके शान्त हो जानेपर उसमे रहने- वाला देही उसको त्यागकर दूसरे शरीरमे प्रवेश कर जाता है। इसलिये वास्तवमे मृत्यु शरीरकी होती है, आत्माकी नही। इस तथ्यका अर्थात् आत्माकी अमरताका जिसको ज्ञान हो जाता है, वह जीवन-मरणके चक्करसे छूटकर ब्रह्मसे एकत्व प्राप्त कर लेता है। बृहदारण्यकका शाब्दिक अर्थ है एक विशाल वनसे सम्बन्धित । ऐसा अनुमान होता है कि किसी आत्मदर्शना- भिलाषी विद्वत्समाजने इस ग्रन्थरत्नको किसी वृहद्वनमे जन्म दिया होगा, जो प्राचीन भारतमे पर्याप्त प्रसिद्ध था । आज यह कहना सम्भव नहीं है कि वह वन कौन सा था तथा किस युगमे यह ग्रन्थ लिखा गया था। यह प्रमाणभूत वैदिक ग्रन्थ माध्यन्दिन और काण्व नामक दो शाखाओमें प्राप्त है, पर श्रीशङ्कराचार्यजीने अपनी भाष्यरचनाके लिये काण्व शाखाके पाठको ही ग्रहण किया है। यह ग्रन्थ महत्त्वपूर्ण उपनिषदोंकी कोटिमे आता है। मधु, याज्ञवल्क्य और खिल नामसे इसके तीन खण्ड हैं। पर हम इस उपनिषद्में यत्र- तत्र प्राप्य ऐतिहासिक सामग्रीपर ही विचार करेंगे। अश्वमेध प्रथम अध्यायके आरम्भमें ही अश्वमेध यज्ञका उल्लेख है । वास्तवमे प्रथम अध्यायके अन्तर्गत प्रथम खण्डका नाम ही अश्वब्राह्मण है। इसमे यज्ञीय अश्वके शरीरको यज्ञके अधिष्ठातृ देवता प्रजापतिका विराट् देह मानकर वर्णन किया गया है । अश्वमेध एक वैदिक यज्ञ है । ऊर्ध्वलोकोंमे सबसे ऊँचे ब्रह्मलोककी प्राप्ति ही इसके अनुष्ठानका उद्देश्य होता है। पर यह स्थिति नित्य नहीं है । यज्ञ करनेवालेको फिर जन्म लेना पड़ता है और आवागमनसे उसे तबतक मुक्ति नहीं मिलती, जबतक कि वह अज्ञानपर विजय पाकर ब्रह्मके साथ एकाकार नहीं हो जाता। वैदिक संहिताओंमें उल्लिखित तीन कर्म ऐसे हैं, जिनका स्वरूप राजनीतिक है। इन कर्मोंका राज्याभिषेक-संस्कारसे घनिष्ठ सम्बन्ध है। राजसूय यज्ञके अनुष्ठानसे मनुष्य राजा बनता है। इसलिये जैसा कि मैने अपने ‘Hindu Administrative Institutions' नामक ग्रन्थमें कहा है, यह यज्ञ राजाके लिये राज्याधिकार ग्रहण सस्कार है। वाजपेय यज्ञका करनेवाला सम्राट्की पदवी प्राप्त करता है। स्मृतिकार^१ कात्यायनने राजसूयसे वाजपेय यज्ञकी श्रेष्ठता बतायी है। शतपथ ब्राह्मणमे^२ राजसूय यज्ञका विस्तृत वर्णन मिलता है। वाजपेयकी महत्ता- का वर्णन भी इस ग्रन्थमें^३ पाया जाता है। अश्वमेधका उद्देश्य भी राजनीतिक होता था। प्रत्येक प्रतापी नरेशसे यह आशा की जाती थी कि वह इस इन्द्रपद ( १ ) १५ १ १०.२, (२) ५ २, (३) ५ १. १. ८,
- बृहदारण्यकोपनिषद्में ऐतिहासिक अध्ययनकी सामग्री * १५९ प्रदान करनेवाले यज्ञका अनुष्ठान करे । यद्यपि इस यज्ञका स्वरूप बड़ा जटिल है, फिर भी एगेलिंग (Eggeling) के शब्दोंमें यह एक राजकीय महोत्सव था। इस यज्ञके मूलका हमे कोई पता नहीं है । पर ऋग्वेदमे, यहाँतक कि पहले ही मण्डल ( १ । १६२-१६३ ) मे इसका उल्लेख मिलता है। अश्वमेधका, जिसका शतपथब्राह्मणके १३ वे खण्डमे निरूपण किया गया है, महाभारतमें भी रोचक वर्णन मिलता है। वहाँ पाण्डवोंने बड़े समारोहसे इसे किया है। उक्त इतिहास ग्रन्थमें इस प्रसङ्गके अन्तमे लिखा है 'अश्वमेध यजमानको समस्त पाप- कर्मों और दुष्कृतोंसे मुक्त कर देता है।' पर प्राय. इसका अनुष्ठान विश्व-विजय कर लेनेके उपरान्त ही होता था । दूसरे शब्दोंमें इसका यह अर्थ है कि प्राचीन हिन्दू राजा भारतवर्ष- को अपने शासनाधीन भूमण्डलका एक प्रदेश तथा अपनेको अखिल पृथ्वीका अधिपति मानते थे ।१ उपनिषदोंका प्रधान विषय ब्रह्मज्ञान है और इसको प्राप्त करनेके लिये उन विधियों और साधनोंका उल्लेख किया गया है, जिनसे हम आत्म-सम्बन्धी अपने अज्ञानको मिटाकर ब्रह्मत्व लाभ करें । प्रथम अध्यायके दूसरे खण्डका नाम अग्नि-ब्राह्मण है । इसमे अश्वमेधमे प्रयुक्त होनेवाली अग्निकी उत्पत्ति और स्वरूपका वर्णन है । यहाँ ध्यानपर भी जोर दिया गया है। जैसे यज्ञीय अश्वका प्रजापतिके रूपमे ध्यान किया जाता है, वैसे ही अग्निका भी उसी रूपमें ध्यान करना चाहिये । बृहदारण्यकोपनिषद्ने इस वैदिक अनुष्ठानको प्रत्येक सच्चे क्षत्रियके लिये विधेय बताया है । ऐतिहासिक कालमें भी पुष्यमित्र, शुङ्ग और समुद्रगुप्त आदि राजाओंने इस महान् यज्ञको किया था और इस प्रकार विजित प्रदेशोंपर अपने चक्रवर्तित्वकी प्रतिष्ठा की थी । इसका अनुष्ठान ईस्वी सन्की दसवीं शताब्दिके आसपास बद हुआ प्रतीत होता है। धर्म 'धर्म' शब्द बड़ा व्यापक और विभिन्न अर्थोंमें प्रयुक्त होता है । इससे सदाचारके विविध स्वरूपोंका बोध होता है । प्रत्येक मत एव सम्प्रदायका एक विशिष्ट धर्म होता है । इसीको हम हिंदू-धर्म, बौद्ध-धर्म या जैन-धर्म आदि नामोंसे पुकारते है । परंतु एक हिंदूके लिये सभी कुछ धर्म है, क्योंकि उसका सत्यमें विश्वास है । ससारकी सृष्टिके समय केवल मात्र एक विराट् था । इस विराट्ने अपनेको एकाकी पाया और अपने हितक लिये एव परिणामतः जगत्के हितार्थ उसने न केवल स्त्री-पुरुषों की वर इतर जीवों तथा अन्य पदार्थोंकी सृष्टि की। फिर भी उसको सतोष नहीं हुआ, तब उसने ब्राह्मण जातिकी रचना की । तत्पश्चात् क्षत्रियोकी उत्पत्ति हुई, जिन्हें रक्षाका भार सौंपा गया । क्षत्रियोंको ऐसे विशेष गुणोंसे विभूषित किया गया, जिनकी ब्राह्मण भी प्रशसा करते हैं। राजसूय यज्ञमे ब्राह्मणका आसन सदैव नीचे रहता है, यद्यपि क्षत्रियोंको प्रकट उन्होंने ही किया है । यज्ञके समाप्त हो जानेपर क्षत्रिय यजमान ब्राह्मणको प्रणाम करता था। ऐसा किये बिना वह अपने मूलको ही नष्ट करनेवाला हो जायगा । क्षत्रियकी राजाके रूपमे प्रतिष्ठा होती थी । इस वर्णकी सृष्टिके बाद भी धनका अभाव प्रतीत हुआ, जिसके बिना यज्ञादिका सपूर्ण होना असभव था । अतः वैश्योंकी उत्पत्ति हुई । किंतु विराट्को जीवनमे ऐश्वर्यसम्पन्न होनेके लिये एक भृत्यकी भी आवश्यकताका अनुभव हुआ । अतएव शूद्र जातिका आविर्भाव हुआ । इस वर्णके अधिष्ठातृ देवता पूषण हैं। इसका वाच्यार्थ है 'पोषण करनेवालां।'१ यह वर्णधर्मका ही वर्णन है । इससे हमें यह मान लेना चाहिये कि समाजका चार वर्णोंमें विभाजन एक वैदिक व्यवस्था है; और हिंदू होनेके नाते हमें यह भी मानना चाहिये कि यह मनुष्यकृत नहीं, भगवत्कृत है। ऋग्वेदके पुरुषसूक्तसे ही इस बातका प्रमाण मिल जाता है । वैदिक कालके बादके साहित्यमें एतद्विषयक प्रचुर प्रमाणोंका तो कहना ही क्या है । इसीलिये श्रीकृष्ण महाराज भगवद्गीतामें कहते है— 'चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश. ।' आधुनिक विद्वान् 'सृष्टम्' शब्दके वास्तविक तात्पर्यको बिना समझे ही इसकी इस प्रकारसे असदालोचना करते हैं— मानो यह व्यवस्था भगवान्की नहीं, बल्कि भारतीय प्राचीन पूर्वजोंकी बनायी हुई हो । यदि और कुछ नहीं तब भी यह एक दृढ आर्थिक व्यवस्था थी, जिसमे आधुनिक सभ्यताके प्रतियोगिता, योग्यतमावशेष आदि कई निकृष्ट दोषोंका सर्वथा अभाव था । दु.खकी बात है कि यह व्यवस्था धीरे- धीरे मिट रही है और अव्यवस्थाग्रस्त जगत्की दुरवस्था और भी बढ़ती जा रही है । जबतक हम ऐसी ही किसी व्यवस्थाका, जिसको ससार स्वीकार कर ले, पुनर्निर्माण नहीं कर लेंगे तबतक विश्वके अनेक आर्थिक और सामाजिक दोषोंका, जो आज हमारे सामने उपस्थित है, सन्तोषजनक परिहार नहीं होगा, चाहे हम कितने ही सभा-सम्मेलन कर लें । ( १ ) शतपथब्राह्मण १२ ७. १ ( १ ) १ ४. १०. १.
१६० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * बृहदारण्यकोपनिषद्में लिखा है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, नाम भी हैं जैसे विश्वामित्र और जमदग्नि, गौतम और भरद्वाज, वैश्य एवं शूद्र आदि चारों वर्णोंकी सृष्टि कर लेनेके बाद भी वसिष्ठ और कश्यप, अत्रि और मैत्रेयी । यह मैत्रेयी विराट्को पूर्ण सन्तोष नहीं प्राप्त हुआ। उसके मनमें यह याज्ञवल्क्य ऋषिकी पत्नी थी । उपनिषद्के दूसरे अध्यायके आशङ्का छिपी हुई थी कि क्षत्रिय लोग उच्छृङ्खल हो जायेंगे। चौथे ब्राह्मणमें जो कथा है, उसका समावेश आत्म विद्याकी उनको नियन्त्रणमे तथा अपने उचित स्थानपर स्थिर प्राप्तिके लिये त्यागकी आवश्यकता बतानेके लिये किया गया रखनेके लिये धर्मकी उत्पत्ति हुई और सच्चे क्षत्रियको है, याज्ञवल्क्य और मैत्रेयीका संवाद है। इस संलापका बताया गया कि धर्म ही राजाओंका भी राजा है। दूसरे शब्दोंमें निष्कर्ष यह है कि केवल आत्मा ही ध्यानीय है । एक धर्मसे बड़ा और कुछ नहीं था। चाहे कोई राजा कितना भी इतिहासका विद्यार्थी इससे इस निश्चयपर पहुँचता है कि शक्तिशाली हो, धर्मका अनुशासन मानना उसके लिये ये व्यक्ति बृहदारण्यकोपनिषद्की रचनाके पूर्वके एक युगमें अनिवार्य था। दुर्बल व्यक्ति भी धर्मकी शरणमे जाकर त्राण विद्यमान थे । उनमेंसे कुछ प्रसिद्ध वैदिक ऋषि हैं। मैत्रेयी पा सकते थे। उपनिषदोंके अनुसार धर्म ही सत्य है और इस बातके उदाहरणके रूपमें उपस्थित की जा सकती हैं कि सत्य ही धर्म है। किसी वस्तुके सैद्धान्तिक ज्ञानका नाम सत्य वैदिक कालमे भारतवर्षमें स्त्रियाँ न केवल शिक्षित और है, पर आचरणमे लानेपर वही धर्म कहा जाता है। किसी संस्कृत ही होती थीं, परन्तु वे आत्मज्ञानकी प्राप्तिमे भी स्वतन्त्र विशेष धर्मका आचरण करनेके लिये मनुष्यको पहले चारों थीं। यह कहना भूल है कि वे अशिक्षित, अज्ञ और पराधीन वर्णोंमेसे किसी एकसे सम्बन्ध स्थिर करना चाहिये, क्योंकि थीं। यहाँ एक प्रश्न यह उठता है कि क्या याज्ञवल्क्य- प्रत्येक वर्णका अपना विशेष धर्म है। स्मृतिकी रचना करनेवाले ही वे ऋषि हैं, जिनका उल्लेख उपनिषद्मे हुआ है। याज्ञवल्क्य स्मृतिको ध्यानसे देखनेपर यह कहा जा चुका है कि धर्मसे बढकर कुछ नहीं है यह पता चलता है कि इसका आचार, व्यवहार और प्रायश्चित्त और धर्म ही राजाओंका भी राजा है। इसका यह अर्थ हुआ नामक तीन खण्डोंमें विभाजन एक ऐसी प्रणाली है जो पीछेकी कि राजाओंका कर्तव्य नयी धाराओंको बनाना नहीं है, अपेक्षा प्राचीन धर्म शास्त्रोंमे ही अधिक पायी जाती है। वर पूर्वनिश्चित नियमोंको ही शासनव्यवहारमें लाना है। मेरी सम्मतिमे यह स्मृति जिस रूपमे प्राप्त हैं, वह पर्याप्त अतः राजाका कर्तव्य धर्मकी व्याख्या करके निर्णय देना है। इससे पहलेकी रचना है, सम्भवतः कौटिल्यके अर्थशास्त्रसे भी यह प्रकट होता है कि हिंदू कालके भारतवर्षमें कोई धारासभा पूर्वकी। यद्यपि अपने वर्तमान स्वरूपमें यह ग्रन्थ आदिसे अन्त- नहीं थी । वास्तवमें उल्लेखके योग्य कोई धारा-निर्माण- तक ऋषि याज्ञवल्क्यकी ही रचना न भी हो, पर यह बिल्कुल विभाग नहीं था । राजाको अनीति मार्गपर जानेसे रोकनेके सम्भव है कि यह याज्ञवल्क्यके सम्प्रदायकी वस्तु हो और कई उपायोंमेंसे एक यह भी था कि उसे देशके विधानोंके सम्भवतः उनके किमी उत्साही शिष्यद्वारा लिपिबद्ध हुई हो। अनुसार ही शासन करनेको बाध्य किया जाता था। इन विधानोंके निर्माणका कार्य अधिक बुद्धिवाले व्यक्तियोंके बृहदारण्यकके स्वरूप, इसके विषय तथा शतपथ ब्राह्मणका (ब्राह्मणोंके) हाथमे था । अन्तिम भाग होनेके कारण आधुनिक विद्वानोंकी सम्मतिमें इसके रचना कालको आठवीं और सातवीं शताब्दी ईसापूर्व उपनिषद्में आये हुए कुछ नाम माना जाता है । परन्तु इसका रचनाकाल चाहे जो भी हो, यह ग्रन्थ है अत्यन्त प्राचीन । विश्वमें व्याप्त मायापर विजय बृहदारण्यकोपनिषद्में आये हुए कई नामोंमेंसे याज्ञवल्क्य पानेका सर्वोत्तम साधन क्या है--यही इसका प्रतिपाद्य विषय है एव जनक वैदेहका नाम मुख्यरूपसे उल्लेखनीय है। गर्ग और अन्तमे यह इस निष्कर्षपर पहुँचता है कि परमात्माका कुलके भी एक वग़जका उल्लेख है, जिसने काशीके किन्हीं ज्ञान हुए बिना मायापर विजय सम्भव नहीं । राजा अजातशत्रुसे मिलकर उन्हें ब्रह्मसम्बन्धी वास्तविक सत्यका उपदेश किया था (अध्याय २-१) । कुछ अन्य व्यक्तियोंके
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(१) उसी ग्रन्थमें १ ४. १४—१५
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कल्याण प्रार्थना
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह । तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ (ईशा० १६)
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ 'शावा 'पो॑ षद् यह ईशावास्योपनिषद् शुक्लयजुर्वेदसंहिताका चालीसवाँ अध्याय है। मन्त्र-भागका अंश होनेसे इसका विशेष महत्त्व है। इसीको सबसे पहली उपनिषद् माना जाता है। शुक्लयजुर्वेदके प्रथम उनतालीस अध्यायोंमें कर्मकाण्डका निरूपण हुआ है। यह उस काण्डका अन्तिम अध्याय है और इसमें भगवत्तत्त्वरूप ज्ञानकाण्डका निरूपण किया गया है। इसके पहले मन्त्रमें 'ईशा वास्यम्' वाक्य आनेसे इसका नाम 'ईशावास्य' माना गया है। शान्तिपाठ • ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥* ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॐ=सच्चिदानन्दघन, अदः=वह परब्रह्म; पूर्णम्=सब प्रकारसे पूर्ण है, इदम्=यह (जगत् भी), पूर्णम्=पूर्ण (ही) है; (क्योंकि) पूर्णात्=उस पूर्ण (परब्रह्म) से ही; पूर्णम्=यह पूर्ण, उदच्यते=उत्पन्न हुआ है, पूर्णस्य=पूर्णके, पूर्णम्=पूर्णको, आदाय=निकाल लेनेपर (भी), पूर्णम्, एव=ही, अवशिष्यते=बच रहता है। व्याख्या—वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म पुरुषोत्तम सब प्रकारसे सदा-सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत् भी उस परब्रह्मसे पूर्ण ही है, क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तमसे ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्मकी पूर्णतासे जगत् पूर्ण होनेपर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है। उस पूर्णमेंसे पूर्णको निकाल लेनेपर भी वह पूर्ण ही बच रहता है। त्रिविध तापकी शान्ति हो। ईशा वास्यमिदꣳ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद् धनम् ॥ १ ॥ जगत्याम्=अखिल ब्रह्माण्डमें, यत् किं च=जो कुछ भी, जगत्=जड-चेतनस्वरूप जगत् है, इदम्=यह, सर्वम्=समस्त; ईशा=ईश्वरसे, वास्यम्=व्याप्त है, तेन=उस ईश्वरको साथ रखते हुए, त्यक्तेन=त्यागपूर्वक, भुञ्जीथाः= (इसे) भोगते रहो, मा गृधः=(इसमें) आसक्त मत होओ, (क्योंकि) धनम्=धन—भोग्य-पदार्थ, कस्य स्वित्= किसका है अर्थात् किसीका भी नहीं है ॥ १ ॥ व्याख्या—मनुष्योंके प्रति वेद भगवान्का पवित्र आदेश है कि अखिल विश्व-ब्रह्माण्डमें जो कुछ भी यह चराचरात्मक जगत् तुम्हारे देखने-सुननेमें आ रहा है, सब-का-सब सर्वाधार, सर्वनियन्ता, सर्वाधिपति, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वकल्याण- गुणस्वरूप परमेश्वरसे व्याप्त है, सदा सर्वत्र उन्हींसे परिपूर्ण है (गीता ९।४)। इसका कोई भी अंग उनसे रहित नहीं है (गीता १०। ३९,४२)। ऐसा समझकर उन ईश्वरको निरन्तर अपने साथ रखते हुए—सदा-सर्वदा उनका स्मरण करते हुए ही तुम इस जगत्में त्यागभावसे केवल कर्तव्यपालनके लिये ही विषयोंका यथाविधि उपभोग करो अर्थात् यथार्थ—विश्वरूप ईश्वरकी पूजाके लिये ही कर्मोंका आचरण करो। विषयोंमें मनको मत फँसने दो, इसीमे तुम्हारा निश्चित कल्याण है (गीता २।६४; ३।९; १८।४६)। वस्तुतः ये भोग्य-पदार्थ किसीके भी नहीं हैं। मनुष्य भूलसे ही इनमें
- यह मन्त्र बृहदारण्यक उपनिषद्के पाँचवें अध्यायके प्रथम ब्राह्मणकी प्रथम कण्डिकाका पूर्वार्द्धरूप है। उ० अ० २१—
१६२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ममता और आसक्ति कर बैठता है। ये सब परमेश्वरके हैं और उन्हींके लिये इनका उपयोग होना चाहिये * ॥ १ ॥ कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ २ ॥ कर्माणि=शास्त्रनियत कर्मोंको, कुर्वन्=(ईश्वरपूजार्थ) करते हुए; एव=ही, इह=इस जगत्में, शतम् समाः=सौ वर्षोंतक, जिजीविषेत्=जीनेकी इच्छा करनी चाहिये, एवम्=इस प्रकार (त्यागभावसे, परमेश्वरके लिये), कर्म=किये जानेवाले कर्म, त्वयि=तुझ, नरे=मनुष्यमें, न लिप्यते=लिप्त नहीं होंगे; इतः=इससे (भिन्न), अन्यथा=अन्य कोई प्रकार अर्थात् मार्ग, न अस्ति=नहीं है (जिससे कि मनुष्य कर्मसे मुक्त हो सके) ॥ २ ॥ व्याख्या—अतएव समस्त जगत्के एकमात्र कर्ता, धर्ता, हर्ता, सर्वशक्तिमान् सर्वमय परमेश्वरका सतत स्मरण रखते हुए सब कुछ उन्हींका समझकर उन्हींकी पूजाके लिये शास्त्रनियत कर्तव्यकर्मोंका आचरण करते हुए ही सौ वर्षतक जीनेकी इच्छा करो—इस प्रकार अपने पूरे जीवनको परमेश्वरके प्रति समर्पण कर दो। ऐसा समझो कि शास्त्रोक्त स्वकर्मका आचरण करते हुए जीवन-निर्वाह करना केवल यज्ञार्थ—परमेश्वरकी पूजाके लिये ही है; अपने लिये नहीं—भोग भोगनेके लिये नहीं। कर्म करते हुए कर्मोंमें लिप्त न होनेका यही एकमात्र मार्ग है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी मार्ग कर्मबन्धनसे मुक्त होनेका नहीं है (गीता २।५०, ५१, ५।१०) ॥ २ ॥ सम्बन्ध—इस प्रकार कर्मफलरूप जन्मबन्धनसे मुक्त होनेके निश्चित मार्गका निर्देश करके अब इसके विपरीत मार्गपर चलनेवाले मनुष्योंकी गतिका वर्णन करते हैं— असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः । तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ ३ ॥ असुर्याः=असुरोंके, (जो) नाम=प्रसिद्ध, लोकाः=नाना प्रकारकी योनियाँ एवं नरकरूप लोक हैं; ते=वे सभी; अन्धेन तमसा=अज्ञान तथा दुःख-क्लेशरूप महान् अन्धकारसे; आवृताः=आच्छादित हैं, ये के च=जो कोई भी; आत्महनः=आत्माकी हत्या करनेवाले, जनाः=मनुष्य हैं; ते=वे; प्रेत्य=मरकर; तान्=उन्हीं भयङ्कर लोकोंको; अभिगच्छन्ति=बार-बार प्राप्त होते हैं ॥ ३ ॥ व्याख्या—मानव शरीर अन्य सभी शरीरोंसे श्रेष्ठ और परम दुर्लभ है एव वह जीवको भगवान्की विशेष कृपासे जन्म-मृत्युरूप संसार-समुद्रसे तरनेके लिये ही मिलता है। ऐसे शरीरको पाकर भी जो मनुष्य अपने कर्मसमूहको ईश्वर-पूजाके लिये समर्पण नहीं करते और कामोपभोगको ही जीवनका परम ध्येय मानकर विषयोंकी आसक्ति और कामनावश जिस किसी प्रकारसे भी केवल विषयोंकी प्राप्ति और उनके यथेच्छ उपभोगमें ही लगे रहते हैं, वे वस्तुतः आत्माकी हत्या करनेवाले ही हैं; क्योंकि इस प्रकार अपना पतन करनेवाले वे लोग अपने जीवनको केवल व्यर्थ ही नहीं खो रहे हैं वर अपनेको और भी अधिक कर्मबन्धनमे जकड़ रहे हैं। इन काम भोग-परायण लोगोंको,—चाहे वे कोई भी क्यो न हों, उन्हें चाहे संसारमें कितने ही विशाल नाम, यश, वैभव या अधिकार प्राप्त हों,—मरनेके बाद उन कर्मोंके फलस्वरूप बार-बार कूकर-शूकर, कीट- पतङ्गादि विभिन्न शोक-सन्तापपूर्ण आसुरी योनियोंमें और भयानक नरकोंमे भटकना पड़ता है। (गीता १६। १६, १९, २०) इसीलिये श्रीभगवान्ने गीतामें कहा है कि मनुष्यको अपनेद्वारा अपना उद्धार करना चाहिये, अपना पतन नहीं करना चाहिये (गीता ६।५) ॥ ३ ॥ सम्बन्ध—जो परमेश्वर सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त हैं, जिनका सतत स्मरण करते हुए तथा जिनकी पूजाके लिये ही समस्त कर्म करने चाहिये, वे कैसे हैं? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
- कुछ आदरणीय विद्वानोंने इसका भावार्थ ऐसा माना है— इस ब्रह्माण्डमें जो कुछ यह जगत् है, सब ईश्वरसे व्याप्त है। उस ईश्वरके द्वारा तुम्हारे लिये जो त्याग किया गया है अर्थात् प्रदान किया गया है, उसीको अनासक्तरूपसे भोगो। किसीके भी धनकी इच्छा मत करो।
❖ ईशावास्योपनिषद् ❖ १६३ अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् । तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥ ४ ॥ (तत्)=वे परमेश्वर; अनेजत्=अचल; एकम्=एक; (और) मनसः=मनसे (भी), जवीयः=अधिक तीव्र गतियुक्त हैं, पूर्वम्=सबके आदि, अर्षत्=ज्ञानस्वरूप या सबके जाननेवाले हैं, एनत्=इन परमेश्वरको, देवाः=इन्द्रादि देवता भी, न आप्नुवन्=नहीं पा सके या जान सके हैं, तत्=वे (परब्रह्म पुरुषोत्तम), अन्यान्=दूसरे, धावतः=दौड़ने- वालोंको, तिष्ठत्=(स्वयं) स्थित रहते हुए ही; अत्येति=अतिक्रमण कर जाते हैं, तस्मिन्=उनके होनेपर ही—उन्हींकी सत्ता-शक्तिसे, मातरिश्वा=वायु आदि देवता, अपः=जलवर्षण, जीवकी प्राणधारणादि क्रिया प्रभृति कर्म, दधाति=सम्पादन करनेमें समर्थ होते हैं ॥ ४ ॥ व्याख्या—वे सर्वान्तर्यामी सर्वशक्तिमान् परमेश्वर अचल और एक हैं, तथापि मनसे भी अधिक तीव्र वेगयुक्त हैं। जहाँतक मनकी गति है, वे उससे भी कहीं आगे पहलेसे ही विद्यमान हैं। मन तो वहाँतक पहुँच ही नहीं पाता । वे सबके आदि और ज्ञानस्वरूप हैं अथवा सबके आदि होनेके कारण सबको पहलेसे ही जानते हैं। पर उनको देवता तथा महर्षिगण भी पूर्ण- रूपसे नहीं जान सकते (गीता १०। २)। जितने भी तीव्र वेगयुक्त बुद्धि, मन और इन्द्रियाँ अथवा वायु आदि देवता हैं, अपनी गतिभर परमेश्वरके अनुसन्धानमें सदा दौड़ लगाते रहते हैं, परंतु परमेश्वर नित्य अचल रहते हुए ही उन सबको पार करके आगे निकल जाते हैं। वे सब वहाँतक पहुँच ही नहीं पाते। असीमकी सीमाका पता ससीमको कैसे लग सकता है ? बल्कि वायु आदि देवताओंमें जो शक्ति है, जिसके द्वारा वे जलवर्षण, प्रकाशन, प्राणि-प्राणधारण आदि कर्म करनेमें समर्थ होते हैं, वह इन अचिन्त्यशक्ति परमेश्वरकी शक्तिका एक अंशमात्र ही है ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—अब परमेश्वरकी अचिन्त्यशक्तिमत्ता तथा व्यापकताका प्रकारान्तरसे पुन वर्णन करते हैं— तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके। तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥ ५ ॥ तत्=वे; एजति=चलते हैं; तत्=वे; न एजति=नहीं चलते, तत्=वे, दूरे=दूरसे भी दूर हैं; तत्=वे, उ अन्तिके= अत्यन्त समीप हैं; तत्=वे, अस्य=इस, सर्वस्य=समस्त जगत्के, अन्तः=भीतर परिपूर्ण हैं, (और) तत्=वे, अस्य=इस, सर्वस्य=समस्त जगत्के; उ बाह्यतः=बाहर भी हैं ॥ ५ ॥ व्याख्या—वे परमेश्वर चलते भी हैं और नहीं भी चलते, एक ही कालमे परस्परविरोधी भाव, गुण तथा क्रिया जिनमे रह सकती हैं, वे ही तो परमेश्वर हैं। यह उनकी अचिन्त्य शक्तिकी महिमा है। दूसरे प्रकारसे यह भी कहा जा सकता है कि भगवान् जो अपने दिव्य परम धाममें और लीलाधाममें अपने प्रिय भक्तोंको सुख पहुँचानेके लिये अप्राकृत सगुण- साकार रूपमे प्रकट रहकर लीला किया करते हैं, यह उनका चलना है, और निर्गुणरूपसे जो सदा-सर्वथा अचल स्थित हैं, यह उनका न चलना है। इसी प्रकार वे श्रद्धा-प्रेमसे रहित मनुष्योंको कभी दर्शन ही नहीं देते, अतः उनके लिये दूर-से दूर हैं, और प्रेमकी पुकार सुनते ही जिन प्रेमीजनोके सामने चाहे जहाँ उसी क्षण प्रकट हो जाते हैं, उनके लिये वे समीप-से- समीप है। इसके अतिरिक्त वे सदा-सर्वत्र परिपूर्ण हैं, इसलिये दूर-से-दूर भी वही हैं और समीप-से-समीप भी वही हैं; क्योंकि ऐसा कोई स्थान ही नहीं है, जहाँ वे न हों। सबके अन्तर्यामी होनेके कारण भी वे अत्यन्त समीप हैं; पर जो अज्ञानी लोग उन्हें इस रूपमें नहीं पहचानते, उनके लिये वे बहुत दूर हैं। वस्तुतः वे इस समस्त जगत्के परम आधार हैं और परम कारण हैं, इसलिये बाहर-भीतर सभी जगह वे ही परिपूर्ण हैं। * (गीता ७। ७) ॥ ५ ॥
- कुछ आदरणीय विद्वानोंने इसका भावार्थ इस प्रकार माना है— यह आत्मतत्त्व अचल रहकर ही चलता हुआ-सा जान पड़ता है, अज्ञानियोंके लिये अप्राप्य होनेसे बहुत दूर है और ज्ञानियोंका आत्मा होनेसे समीप है। महाकाशमें घटाकाशकी भाँति भीतर और बाहर भी वही है। एक दूसरे विद्वान् यह अर्थ करते हैं—
१६४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध- अब अगले दो मन्त्रोंमे इन परब्रह्म परमेश्वरको जाननेवाले महापुरुषकी स्थितिका वर्णन किया जाता है— यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ६ ॥ तु=परन्तु, यः=जो मनुष्य, सर्वाणि=सम्पूर्ण, भूतानि=प्राणियोंको, आत्मनि=परमात्मामे, एव=ही; अनुपश्यति=निरन्तर देखता है, च=और, सर्वभूतेषु=सम्पूर्ण प्राणियोंमे, आत्मानम्=परमात्माको (देखता है); ततः= उसके पश्चात् (वह कभी भी), न विजुगुप्सते=किसीसे घृणा नहीं करता ॥ ६ ॥ व्याख्या-इस प्रकार जो मनुष्य प्राणिमात्रको सर्वाधार परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मामें देखता है और सर्वान्तर्यामी परम प्रभु परमात्माको प्राणिमात्रमें देखता है, वह कैसे किससे घृणा या द्वेष कर सकता है ? वह तो सदा सर्वत्र अपने परम प्रभुके ही दर्शन करता हुआ (गीता ६। २९-३०) मन-ही-मन सबको प्रणाम करता रहता है तथा सबकी सब प्रकार सेवा करना और उन्हें सुख पहुँचाना चाहता है *॥ ६ ॥ यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥ यस्मिन्=जिस स्थितिमें, विजानतः=परब्रह्म परमेश्वरको भलीभाँति जाननेवाले महापुरुषके (अनुभवमे), सर्वाणि= सम्पूर्ण, भूतानि=प्राणी, आत्मा=एकमात्र परमात्मस्वरूप, एव=ही; अभूत्=हो चुकते हैं, तत्र=उस अवस्थामें; (उस) एकत्वम्=एकताका-एकमात्र परमेश्वरका, अनुपश्यतः=निरन्तर साक्षात् करनेवाले पुरुषके लिये; कः=कौन-सा; मोहः= मोह (रह जाता है और), कः=कौन-सा, शोकः=शोक ! (वह शोक-मोहसे सर्वथा रहित, आनन्दपरिपूर्ण हो जाता है) ॥ ७ ॥ व्याख्या-इस प्रकार जब मनुष्य परमात्माको भलीभाँति पहचान लेता है, तब उसकी सर्वत्र भगवद्दृष्टि हो जाती है-तब वह प्राणिमात्रमे एकमात्र तत्त्व श्रीपरमात्माको ही देखता है। उसे सदा सर्वत्र परमात्माके दर्शन होते रहते हैं और इस कारण वह इतना आनन्दमग्न हो जाता है कि शोक-मोहादि विकारोंकी छाया भी कहीं उसके चित्तप्रदेशमे नहीं रह जाती । लोगोंके देखनेमें वह सब कुछ करता हुआ भी वस्तुतः अपने प्रभुमे ही क्रीड़ा करता है (गीता ६। ३१) । उसके लिये प्रभु और प्रभुकी लीलाके अतिरिक्त अन्य कुछ रह ही नहीं जाता † ॥ ७ ॥ सम्बन्ध- अब इस प्रकार परमप्रभु परमेश्वरको तत्त्वसे जाननेका तथा सर्वत्र देखनेका फल बतलाते हे— स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविर शुद्धमपापविद्धम् । कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ८ ॥ सः=वह महापुरुष, शुक्रम्=(उन) परम तेजोमय, अकायम्=सूक्ष्मशरीरसे रहित; अव्रणम्=छिद्ररहित या क्षत- रहित, अस्नाविरम्=शिराओंसे रहित-स्थूल पाञ्चभौतिक शरीरसे रहित, शुद्धम्=अप्राकृत दिव्य सच्चिदानन्दस्वरूप; अपाप- दूसरे सब उससे भय-प्रकम्पित रहते हैं, पर वे किसीके भयसे नहीं कापते। वे दूर भी हैं, समीप भी हैं, सबके भीतर भी हैं और बाहर भी ।
- कुछ आदरणीय विद्वान् इस मन्त्रका भावार्थ इस प्रकार करते हैं— (१) जो मुमुक्षु सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने आत्मासे पृथक् नहीं देखता और उन प्राणियोंके आत्माको अपना ही आत्मा जानता है, वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें अपने आत्मस्वरूपको देखनेवाला पुरुष किसीसे भी घृणा नहीं करता । (२) जो पुरुष सब प्राणियोंको परमात्मामें और सब प्राणियोंमें परमात्माको देखता है, वह निर्भय हो जाता है। फिर वह अपनी रक्षाकी कोई चिन्ता नहीं करता । • † कुछ आदरणीय विद्वान् इसका ऐसा भावार्थ मानते हैं— जिस समय आत्मस्वरूपमें परमार्थतत्त्वको जाननेवालेकी दृष्टिमें समस्त प्राणी आत्मभावको ही प्राप्त हो गये होते हैं, उस समय अथवा उस आत्मामें कहाँ मोह रह सकता है और कहाँ शोक ?
- ईशावास्योपनिषद् * १६५ विद्धम् = शुभाशुभकर्म-सम्पर्कशून्य परमेश्वरको, पर्यगात् = प्राप्त हो जाता है, (जो) कविः = सर्वद्रष्टा, मनीषी = सर्वज्ञ एवं ज्ञानस्वरूप, परिभूः = सर्वोपरि विद्यमान एवं सर्वनियन्ता; स्वयम्भूः = स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले हैं (और), शाश्वतीभ्यः = अनादि; समाभ्यः = कालसे, याथातथ्यतः = सब प्राणियोंके कर्मानुसार यथायोग्य, अर्थान् = सम्पूर्ण पदार्थोंकी, व्यदधात् = रचना करते आये है ॥ ८ ॥ व्याख्या-उपर्युक्त वर्णनके अनुसार परमेश्वरको सर्वत्र जानने-देखनेवाला महापुरुष उन परब्रह्म पुरुषोत्तम सर्वेश्वरको प्राप्त होता है, जो शुभाशुभ कर्मजनित प्राकृत सूक्ष्म देह तथा पाञ्चभौतिक अस्थि-शिरा-मांसादिमय षड्विकारयुक्त स्थूल देहसे रहित, छिद्ररहित, दिव्य शुद्ध सच्चिदानन्दघन हैं, एवं जो क्रान्तदर्शी-सर्वद्रष्टा हैं, सबके ज्ञाता, सबको अपने नियन्त्रणमें रखनेवाले सर्वाधिपति और कर्मपरवश नहीं, वरं स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले हैं। तथा जो सनातन कालसे सब प्राणियोंके लिये उनके कर्मानुसार समस्त पदार्थोंकी यथायोग्य रचना और विभाग-व्यवस्था करते आये हैं * ॥ ८ ॥ सम्बन्ध-अब अगले तीन मन्त्रोंमें विद्या और अविद्याका तत्त्व समझाया जायगा। इस प्रकरणमें परब्रह्म परमेश्वरकी प्राप्तिके साधन 'ज्ञान'को विद्याके नामसे कहा गया है और स्वर्गादि लोकोंकी प्राप्ति अथवा इस लोकके विविध भोगैश्वर्यकी प्राप्तिके साधन 'कर्म'को अविद्याके नामसे। इन ज्ञान और कर्म-दोनोंके तत्त्वको भलीभाँति समझकर उनका अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य ही इन दोनों साधनोंके द्वारा सर्वोत्तम तथा वास्तविक फल प्राप्त कर सकता है, अन्यथा नहीं-इस रहस्यको समझानेके लिये पहले उन दोनोंके यथार्थ स्वरूपको न समझकर अनुष्ठान करनेवालोंकी दुर्गतिका वर्णन करते हैं- अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया रताः ॥ ९ ॥ ये = जो मनुष्य; अविद्याम् = अविद्याकी; उपासते = उपासना करते हैं, ते = वे, अन्धम् = अज्ञानस्वरूप, तमः = घोर अन्धकारमें, प्रविशन्ति = प्रवेश करते हैं, (और) ये = जो मनुष्य, विद्यायाम् = विद्यामे, रताः = रत हैं अर्थात् ज्ञानके मिथ्याभिमानमे मत्त हैं, ते = वे, ततः = उससे, उ = भी, भूयः इव = मानो अधिकतर, तमः = अन्धकारमे (प्रवेश करते हैं) ॥ ९ ॥ व्याख्या-जो मनुष्य भोगोंमें आसक्त होकर उनकी प्राप्तिके साधनरूप अविद्याका-विविध प्रकारके कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं, वे उन कर्मोंके फलस्वरूप अज्ञानान्धकारसे परिपूर्ण विविध योनियों और भोगोंको ही प्राप्त होते हैं। वे मनुष्य-जन्मके चरम और परम लक्ष्य श्रीपरमेश्वरको न पाकर निरन्तर जन्म-मृत्युरूप संसारके प्रवाहमें पड़े हुए विविध तापोंसे सतत होते रहते हैं। दूसरे जो मनुष्य न तो अन्त:करणकी शुद्धिके लिये कर्त्तापनके अभिमानसे रहित कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं और न विवेक-वैराग्यादि ज्ञानके प्राथमिक साधनोंका ही सेवन करते हैं, परंतु केवल शास्त्रोंको पढ़-सुनकर अपनेमे विद्याका-ज्ञानका मिथ्या आरोप करके ज्ञानाभिमानी वन बैठते हैं, ऐसे मिथ्याज्ञानी मनुष्य अपनेको ज्ञानी मानकर, 'हमारे लिये कोई भी कर्तव्य नहीं है' इस प्रकार कहते हुए कर्तव्यकर्मोंका त्याग कर देते हैं और इन्द्रियोंके वशमे होकर शास्त्रविधिसे विपरीत मनमाना आचरण करने लगते हैं। इससे वे लोग सकामभावसे कर्म करनेवाले विषयासक्त मनुष्योंकी अपेक्षा भी अधिकतरं अन्धकारको-पशु-पक्षी, शूकर-कूकुर आदि नीच योनियोंको और रौरव-कुम्भीपाकादि घोर नरकोंको प्राप्त होते हैं ॥ ९ ॥ सम्बन्ध-शास्त्रके यथार्थ तात्पर्यको समझकर ज्ञान तथा कर्मका अनुष्ठान करनेसे जो सर्वोत्तम परिणाम होता है, उसका संकेतसे वर्णन करते हैं- अन्यदेवाहुर्विद्ययान्यदाहुरविद्यया । इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १० ॥
- इस मन्त्रका भावार्थ कुछ आदरणीय महानुभावोंने इस प्रकार भी किया है- वह पूर्वोक्त निर्विशेष आत्मा आकाशके सदृश सर्वव्यापक, दीप्तिमान्, अशरीरी, अक्षत, स्नायुरहित (स्थूलशरीरसे रहित) तथा धर्माधर्मरूप पापसे रहित है। वह सर्वद्रष्टा, सर्वज्ञ, सबके ऊपर और स्वयं ही सब कुछ है। उस नित्यमुक्त ईश्वरने सम्वत्सर नामक प्रजापतियोंको उनकी योग्यताके अनुसार अर्थोंका-कर्तव्य-पदार्थोंका-यथायोग्य विभाग कर दिया है।
१६६ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * विद्यया=ज्ञानके यथार्थ अनुष्ठानसे, अन्यत् एव=दूसरा ही फल, आहुः=बतलाते हैं ( और ) अविद्यया=कर्मके यथार्थ अनुष्ठानसे, अन्यत्=दूसरा ( ही ) फल, आहुः=बतलाते हैं; इति=इस प्रकार; ( हमने ) धीराणाम्=( उन ) धीर पुरुषोंके, शुश्रुम=वचन सुने हैं, ये=जिन्होंने; नः=हमें, तत्=उस विषयको, विचचक्षिरे=व्याख्या करके भली- भाँति समझाया था ॥ १० ॥ व्याख्या-सर्वोत्तम फल प्राप्त करानेवाले ज्ञानका यथार्थ स्वरूप है-नित्यानित्यवस्तुका विवेक, क्षणभङ्गुर विनाश- शील अनित्य इहलौकिक और पारलौकिक भोगसामग्रियो और उनके साधनोंसे पूर्ण विरक्ति, संयमित पवित्र जीवन और एकमात्र सच्चिदानन्दघन पूर्णब्रह्मके चिन्तनमे अखण्ड संलग्नता । इसके अनुष्ठानमे परब्रह्म पुरुषोत्तमका यथार्थ ज्ञान होता है और उसके अनन्तर उनकी प्राप्ति होती है ( गीता १८ । ४९-५५ ) । ज्ञानाभिमानमे रत स्वेच्छाचारी मनुष्योंको जो दुर्गतिरूप फल मिलता है, यथार्थ ज्ञानका यह सर्वोत्तम फल उससे सर्वथा भिन्न और विलक्षण है। इसी प्रकार सर्वोत्तम फल प्राप्त करानेवाले कर्मका स्वरूप है-कर्ममें कर्तापनके अभिमानका अभाव, राग द्वेष और फलकामनाका अभाव एव अपने वर्णाश्रम तथा परिस्थितिके अनुरूप केवल भगवत्-सेवाके भावसे श्रद्धापूर्वक शास्त्रविहित कर्मोंका यथायोग्य सेवन । इसके अनुष्ठानसे समस्त दुर्गुण और दुराचारोंका अशेष रूपसे नाश हो जाता है और हर्ष- शोकादि समस्त विकारोंसे रहित होकर साधक मृत्युमय संसार-सागरसे तर जाता है । सकामभावसे किये जानेवाले कर्मोंका जो फल उन कर्ताओंको मिलता है, उससे इस यथार्थ कर्म सेवनका यह फल सर्वथा भिन्न और विलक्षण है। इस प्रकार हमने उन परम ज्ञानी महापुरुषोसे सुना है, जिन्होंने हमें यह विषय पृथक् पृथक् रूपसे व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था ॥ १० ॥ सम्बन्ध-अब उपर्युक्त प्रकारसे ज्ञान और कर्म-दोनोंके तत्त्वको एक साथ भलीभाँति समझनेका फल स्पष्ट शब्दोंमें बतलाते हैं- विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ॥ ११ ॥ यः=जो मनुष्य, तत् उभयम्=उन दोनोंको, ( अर्थात् ) विद्याम्=ज्ञानके तत्त्वको, च=और, अविद्याम्= कर्मके तत्त्वको, च=भी, सह=साथ-साथ, वेद=यथार्थतः जान लेता है, अविद्यया=( वह ) कर्मोंके अनुष्ठानसे, मृत्युम्= मृत्युको, तीर्त्वा=पार करके, विद्यया=ज्ञानके अनुष्ठानसे, अमृतम्=अमृतको, अश्नुते=भोगता है अर्थात् अविनाशी आनन्दमय परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्रत्यक्ष प्राप्त हो जाता है ॥ ११ ॥ व्याख्या-कर्म और अकर्मका वास्तविक रहस्य समझनेमे बड़े-बड़े बुद्धिमान् पुरुष भी भूल कर बैठते ह ( गीता ४। १६) । इसी कारण कर्म-रहस्यसे अनभिज्ञ ज्ञानाभिमानी मनुष्य कर्मको ब्रह्मज्ञानमें बाधक समझ लेते हे और अपने वर्णा- श्रमोचित अवश्यकर्तव्य कर्मोंका त्याग कर देते है, परंतु इस प्रकारके त्यागसे उन्हें त्यागका यथार्थ फल-कर्मबन्धनसे छुटकारा नहीं मिलता (गीता १८।८)। इसी प्रकार ज्ञान (अकर्मावस्था-नैष्कर्म्य) का तत्त्व न समझनेके कारण मनुष्य अपनेको ज्ञानी तथा संसारसे ऊपर उठे हुए मान लेते है। अतः वे या तो अपनेको पुण्य-पापसे अलिप्त मानकर मनमाने कर्माचरणमे प्रवृत्त हो जाते हैं, या कर्मोंको भाररूप समझकर उन्हें छोड़ देते हैं और आलस्य, निद्रा तथा प्रमादमे अपने दुर्लभ मानव- जीवनके अमूल्य समयको नष्ट कर देते हैं। इन दोनो प्रकारके अनर्थोंसे बचनेका एकमात्र उपाय कर्म और ज्ञानके रहस्यको साथ-साथ समझकर उनका यथा- योग्य अनुष्ठान करना ही है। इसीलिये इस मन्त्रमें यह कहा गया है कि जो मनुष्य इन दोनोंके तत्त्वको एक ही साथ भलीभाँति समझ लेता है, वह अपने वर्णाश्रम और परिस्थितिके अनुरूप शास्त्रविहित कर्मोंका स्वरूपतः त्याग नहीं करता, बल्कि उनमें कर्तापनके अभिमानसे तथा राग-द्वेष और फलकामनासे रहित होकर उनका यथायोग्य आचरण करता है। इससे उसकी जीवनयात्रा भी सुखपूर्वक चलती है और इस भावसे कर्मानुष्ठान करनेके फलस्वरूप उसका अन्तःकरण समस्त
❖ ईशावास्योपनिषद् ❖ १६७ दुर्गुणों एवं विकारोंसे रहित होकर अत्यन्त निर्मल हो जाता है और भगवत्कृपासे वह मृत्युमय संसारसे सहज ही तर जाता है । इस कर्मसाधनके साथ-ही-साथ विवेक-वैराग्यसम्पन्न होकर निरन्तर ब्रह्मविचाररूप ज्ञानाभ्यास करते रहनेसे श्री- परमेश्वरके यथार्थ ज्ञानका उदय होनेपर वह शीघ्र ही परब्रह्म परमेश्वरको साक्षात् प्राप्त कर लेता है * ॥ ११ ॥ सम्बन्ध—अब अगले तीन मन्त्रोंमें असम्भूति और सम्भूतिका तत्त्व बतलाया जायगा । इस प्रकरणमें 'असम्भूति' शब्दका अर्थ है—जिनकी पूर्णरूपसे सत्ता न हो, ऐसी विनाशशील देव, पितर और मनुष्यादि योनियाँ एवं उनकी भोगसामग्रियाँ । इसीलिये चौदहवें मन्त्रमें 'असम्भूति'के स्थानपर स्पष्टतया 'विनाश' शब्दका प्रयोग किया गया है । इसी प्रकार 'सम्भूति' शब्दका अर्थ है— सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाला अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तम (गीता ७ । ६-७) । देव, पितर और मनुष्यादिकी उपासना किस प्रकार करनी चाहिये और अविनाशी परब्रह्मकी किस प्रकार—इस तत्त्वको समझकर उनका अनुष्ठान करनेवाले मनुष्य ही उनके सर्वोत्तम फलोंको प्राप्त हो सकते हैं, अन्यथा नहीं । इस भावको समझानेके लिये, पहले, उन दोनोंके यथार्थ स्वरूपको न समझकर अनुष्ठान करनेवालोंकी दुर्गतिका वर्णन करते हैं— अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्याँरताः ॥ १२ ॥ ये=जो मनुष्य; असम्भूतिम्=विनाशशील देव-पितरादिकी; उपासते=उपासना करते हैं; (ते)=वे; अन्धम्= अज्ञानरूप; तमः=घोर अन्धकारमें; प्रविशन्ति=प्रवेश करते हैं, (और) ये=जो, सम्भूत्याम्=अविनाशी परमेश्वरमें; रताः=रत हैं अर्थात् उनकी उपासनाके मिथ्याभिमानमें मत्त हैं; ते=वे; ततः=उनसे; उ=भी; भूयः इव=मानो अधिकतर; तमः=अन्धकारमें (प्रवेश करते हैं) ॥ १२ ॥ व्याख्या—जो मनुष्य विनाशशील स्त्री, पुत्र, धन, मान, कीर्ति, अधिकार आदि इस लोक और परलोककी भोग- सामग्रियोंमें आसक्त होकर उन्हींको सुखका हेतु समझते हैं तथा उन्हींके अर्जन-सेवनमें सदा संलग्न रहते हैं एवं इन भोग- सामग्रियोंकी प्राप्ति, संरक्षण तथा वृद्धिके लिये उन विभिन्न देवता, पितर और मनुष्यादिकी उपासना करते हैं जो स्वयं जन्म- मरणके चक्रमें पड़े हुए होनेके कारण शरीरकी दृष्टिसे विनाशशील हैं । ऐसे वे भोगासक्त मनुष्य अपनी उपासनाके फलस्वरूप विभिन्न देवताओंके लोकोंको और विभिन्न भोगयोनियोंको प्राप्त होते हैं। यही उनका अज्ञानरूप घोर अन्धकारमें प्रवेश करना है। दूसरे जो मनुष्य शास्त्रके तात्पर्यको तथा भगवान्के दिव्य गुण, प्रभाव, तत्त्व और रहस्यको न समझनेके कारण न तो भगवान्का भजन-ध्यान ही करते हैं और न श्रद्धाके अभाव तथा भोगासक्तिके कारण लोकसेवा और शास्त्रविहित देवोपासनामें ही प्रवृत्त होते हैं, ऐसे वे विषयासक्त मनुष्य झूठ-मूठ ही अपनेको ईश्वरोपासक बतलाकर सरलहृदय जनता- से अपनी पूजा कराने लगते हैं। ये लोग मिथ्या अभिमानके कारण देवताओंको तुच्छ बतलाते हैं और शास्त्रानुसार अवश्यकर्तव्य देवपूजा तथा गुरुजनोंका सम्मान-सत्कार करना भी छोड़ देते हैं। इतना ही नहीं, दूसरोंको भी अपने वाग्- जालमें फँसाकर उनके मनोंमें भी देवोपासना आदिमे अश्रद्धा उत्पन्न कर देते हैं। ये लोग अपनेको ही ईश्वरके समकक्ष मानते- मनवाते हुए मनमाने दुराचरणमें प्रवृत्त हो जाते हैं । ऐसे दम्भी मनुष्योंको अपने दुष्कर्मोंका कुफल भोगनेके लिये बाध्य होकर कूकर-शूकर आदि नीच योनियोंमें और रौरव-कुम्भीपाकादि नरकोंम जाकर भीषण यन्त्रणाएँ भोगनी पड़ती हैं। यही उनका विनाशशील देवताओंकी उपासना करनेवालोंकी अपेक्षा भी अधिकतर घोर अन्धकारमें प्रवेश करना है ॥ १२ ॥ सम्बन्ध—शास्त्रके यथार्थ तात्पर्यको समझकर सम्भूति और असम्भूतिकी उपासना करनेसे जो सर्वोत्तम परिणाम होता है, अब संक्षेपसे उसका वर्णन करते हैं—
- कुछ महानुभावोंने इसका यह भावार्थ माना है— अविद्या अर्थात् अग्निहोत्रादि कर्म यानी 'मृत्यु' शब्दवाच्य स्वाभाविक कर्म और ज्ञान—इन दोनोंको तरकर, विद्या अर्थात् देवताज्ञानसे अमृत यानी देवात्मभावको प्राप्त हो जाता है। इस देवात्मभावकी प्राप्तिको ही अमृत कहा जाता है।