भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 832 में से

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पृष्ठ 180

१६४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध- अब अगले दो मन्त्रोंमे इन परब्रह्म परमेश्वरको जाननेवाले महापुरुषकी स्थितिका वर्णन किया जाता है— यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ६ ॥ तु=परन्तु, यः=जो मनुष्य, सर्वाणि=सम्पूर्ण, भूतानि=प्राणियोंको, आत्मनि=परमात्मामे, एव=ही; अनुपश्यति=निरन्तर देखता है, च=और, सर्वभूतेषु=सम्पूर्ण प्राणियोंमे, आत्मानम्=परमात्माको (देखता है); ततः= उसके पश्चात् (वह कभी भी), न विजुगुप्सते=किसीसे घृणा नहीं करता ॥ ६ ॥ व्याख्या-इस प्रकार जो मनुष्य प्राणिमात्रको सर्वाधार परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मामें देखता है और सर्वान्तर्यामी परम प्रभु परमात्माको प्राणिमात्रमें देखता है, वह कैसे किससे घृणा या द्वेष कर सकता है ? वह तो सदा सर्वत्र अपने परम प्रभुके ही दर्शन करता हुआ (गीता ६। २९-३०) मन-ही-मन सबको प्रणाम करता रहता है तथा सबकी सब प्रकार सेवा करना और उन्हें सुख पहुँचाना चाहता है *॥ ६ ॥ यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥ यस्मिन्=जिस स्थितिमें, विजानतः=परब्रह्म परमेश्वरको भलीभाँति जाननेवाले महापुरुषके (अनुभवमे), सर्वाणि= सम्पूर्ण, भूतानि=प्राणी, आत्मा=एकमात्र परमात्मस्वरूप, एव=ही; अभूत्=हो चुकते हैं, तत्र=उस अवस्थामें; (उस) एकत्वम्=एकताका-एकमात्र परमेश्वरका, अनुपश्यतः=निरन्तर साक्षात् करनेवाले पुरुषके लिये; कः=कौन-सा; मोहः= मोह (रह जाता है और), कः=कौन-सा, शोकः=शोक ! (वह शोक-मोहसे सर्वथा रहित, आनन्दपरिपूर्ण हो जाता है) ॥ ७ ॥ व्याख्या-इस प्रकार जब मनुष्य परमात्माको भलीभाँति पहचान लेता है, तब उसकी सर्वत्र भगवद्दृष्टि हो जाती है-तब वह प्राणिमात्रमे एकमात्र तत्त्व श्रीपरमात्माको ही देखता है। उसे सदा सर्वत्र परमात्माके दर्शन होते रहते हैं और इस कारण वह इतना आनन्दमग्न हो जाता है कि शोक-मोहादि विकारोंकी छाया भी कहीं उसके चित्तप्रदेशमे नहीं रह जाती । लोगोंके देखनेमें वह सब कुछ करता हुआ भी वस्तुतः अपने प्रभुमे ही क्रीड़ा करता है (गीता ६। ३१) । उसके लिये प्रभु और प्रभुकी लीलाके अतिरिक्त अन्य कुछ रह ही नहीं जाता † ॥ ७ ॥ सम्बन्ध- अब इस प्रकार परमप्रभु परमेश्वरको तत्त्वसे जाननेका तथा सर्वत्र देखनेका फल बतलाते हे— स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविर शुद्धमपापविद्धम् । कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ८ ॥ सः=वह महापुरुष, शुक्रम्=(उन) परम तेजोमय, अकायम्=सूक्ष्मशरीरसे रहित; अव्रणम्=छिद्ररहित या क्षत- रहित, अस्नाविरम्=शिराओंसे रहित-स्थूल पाञ्चभौतिक शरीरसे रहित, शुद्धम्=अप्राकृत दिव्य सच्चिदानन्दस्वरूप; अपाप- दूसरे सब उससे भय-प्रकम्पित रहते हैं, पर वे किसीके भयसे नहीं कापते। वे दूर भी हैं, समीप भी हैं, सबके भीतर भी हैं और बाहर भी ।

  • कुछ आदरणीय विद्वान् इस मन्त्रका भावार्थ इस प्रकार करते हैं— (१) जो मुमुक्षु सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने आत्मासे पृथक् नहीं देखता और उन प्राणियोंके आत्माको अपना ही आत्मा जानता है, वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें अपने आत्मस्वरूपको देखनेवाला पुरुष किसीसे भी घृणा नहीं करता । (२) जो पुरुष सब प्राणियोंको परमात्मामें और सब प्राणियोंमें परमात्माको देखता है, वह निर्भय हो जाता है। फिर वह अपनी रक्षाकी कोई चिन्ता नहीं करता । • † कुछ आदरणीय विद्वान् इसका ऐसा भावार्थ मानते हैं— जिस समय आत्मस्वरूपमें परमार्थतत्त्वको जाननेवालेकी दृष्टिमें समस्त प्राणी आत्मभावको ही प्राप्त हो गये होते हैं, उस समय अथवा उस आत्मामें कहाँ मोह रह सकता है और कहाँ शोक ?
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