भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 179

❖ ईशावास्योपनिषद् ❖ १६३ अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् । तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥ ४ ॥ (तत्)=वे परमेश्वर; अनेजत्=अचल; एकम्=एक; (और) मनसः=मनसे (भी), जवीयः=अधिक तीव्र गतियुक्त हैं, पूर्वम्=सबके आदि, अर्षत्=ज्ञानस्वरूप या सबके जाननेवाले हैं, एनत्=इन परमेश्वरको, देवाः=इन्द्रादि देवता भी, न आप्नुवन्=नहीं पा सके या जान सके हैं, तत्=वे (परब्रह्म पुरुषोत्तम), अन्यान्=दूसरे, धावतः=दौड़ने- वालोंको, तिष्ठत्=(स्वयं) स्थित रहते हुए ही; अत्येति=अतिक्रमण कर जाते हैं, तस्मिन्=उनके होनेपर ही—उन्हींकी सत्ता-शक्तिसे, मातरिश्वा=वायु आदि देवता, अपः=जलवर्षण, जीवकी प्राणधारणादि क्रिया प्रभृति कर्म, दधाति=सम्पादन करनेमें समर्थ होते हैं ॥ ४ ॥ व्याख्या—वे सर्वान्तर्यामी सर्वशक्तिमान् परमेश्वर अचल और एक हैं, तथापि मनसे भी अधिक तीव्र वेगयुक्त हैं। जहाँतक मनकी गति है, वे उससे भी कहीं आगे पहलेसे ही विद्यमान हैं। मन तो वहाँतक पहुँच ही नहीं पाता । वे सबके आदि और ज्ञानस्वरूप हैं अथवा सबके आदि होनेके कारण सबको पहलेसे ही जानते हैं। पर उनको देवता तथा महर्षिगण भी पूर्ण- रूपसे नहीं जान सकते (गीता १०। २)। जितने भी तीव्र वेगयुक्त बुद्धि, मन और इन्द्रियाँ अथवा वायु आदि देवता हैं, अपनी गतिभर परमेश्वरके अनुसन्धानमें सदा दौड़ लगाते रहते हैं, परंतु परमेश्वर नित्य अचल रहते हुए ही उन सबको पार करके आगे निकल जाते हैं। वे सब वहाँतक पहुँच ही नहीं पाते। असीमकी सीमाका पता ससीमको कैसे लग सकता है ? बल्कि वायु आदि देवताओंमें जो शक्ति है, जिसके द्वारा वे जलवर्षण, प्रकाशन, प्राणि-प्राणधारण आदि कर्म करनेमें समर्थ होते हैं, वह इन अचिन्त्यशक्ति परमेश्वरकी शक्तिका एक अंशमात्र ही है ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—अब परमेश्वरकी अचिन्त्यशक्तिमत्ता तथा व्यापकताका प्रकारान्तरसे पुन वर्णन करते हैं— तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके। तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥ ५ ॥ तत्=वे; एजति=चलते हैं; तत्=वे; न एजति=नहीं चलते, तत्=वे, दूरे=दूरसे भी दूर हैं; तत्=वे, उ अन्तिके= अत्यन्त समीप हैं; तत्=वे, अस्य=इस, सर्वस्य=समस्त जगत्के, अन्तः=भीतर परिपूर्ण हैं, (और) तत्=वे, अस्य=इस, सर्वस्य=समस्त जगत्के; उ बाह्यतः=बाहर भी हैं ॥ ५ ॥ व्याख्या—वे परमेश्वर चलते भी हैं और नहीं भी चलते, एक ही कालमे परस्परविरोधी भाव, गुण तथा क्रिया जिनमे रह सकती हैं, वे ही तो परमेश्वर हैं। यह उनकी अचिन्त्य शक्तिकी महिमा है। दूसरे प्रकारसे यह भी कहा जा सकता है कि भगवान् जो अपने दिव्य परम धाममें और लीलाधाममें अपने प्रिय भक्तोंको सुख पहुँचानेके लिये अप्राकृत सगुण- साकार रूपमे प्रकट रहकर लीला किया करते हैं, यह उनका चलना है, और निर्गुणरूपसे जो सदा-सर्वथा अचल स्थित हैं, यह उनका न चलना है। इसी प्रकार वे श्रद्धा-प्रेमसे रहित मनुष्योंको कभी दर्शन ही नहीं देते, अतः उनके लिये दूर-से दूर हैं, और प्रेमकी पुकार सुनते ही जिन प्रेमीजनोके सामने चाहे जहाँ उसी क्षण प्रकट हो जाते हैं, उनके लिये वे समीप-से- समीप है। इसके अतिरिक्त वे सदा-सर्वत्र परिपूर्ण हैं, इसलिये दूर-से-दूर भी वही हैं और समीप-से-समीप भी वही हैं; क्योंकि ऐसा कोई स्थान ही नहीं है, जहाँ वे न हों। सबके अन्तर्यामी होनेके कारण भी वे अत्यन्त समीप हैं; पर जो अज्ञानी लोग उन्हें इस रूपमें नहीं पहचानते, उनके लिये वे बहुत दूर हैं। वस्तुतः वे इस समस्त जगत्‌के परम आधार हैं और परम कारण हैं, इसलिये बाहर-भीतर सभी जगह वे ही परिपूर्ण हैं। * (गीता ७। ७) ॥ ५ ॥

  • कुछ आदरणीय विद्वानोंने इसका भावार्थ इस प्रकार माना है— यह आत्मतत्त्व अचल रहकर ही चलता हुआ-सा जान पड़ता है, अज्ञानियोंके लिये अप्राप्य होनेसे बहुत दूर है और ज्ञानियोंका आत्मा होनेसे समीप है। महाकाशमें घटाकाशकी भाँति भीतर और बाहर भी वही है। एक दूसरे विद्वान् यह अर्थ करते हैं—