भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 178, कुल 832 में से

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पृष्ठ 178

१६२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ममता और आसक्ति कर बैठता है। ये सब परमेश्वरके हैं और उन्हींके लिये इनका उपयोग होना चाहिये * ॥ १ ॥ कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ २ ॥ कर्माणि=शास्त्रनियत कर्मोंको, कुर्वन्=(ईश्वरपूजार्थ) करते हुए; एव=ही, इह=इस जगत्‌में, शतम् समाः=सौ वर्षोंतक, जिजीविषेत्=जीनेकी इच्छा करनी चाहिये, एवम्=इस प्रकार (त्यागभावसे, परमेश्वरके लिये), कर्म=किये जानेवाले कर्म, त्वयि=तुझ, नरे=मनुष्यमें, न लिप्यते=लिप्त नहीं होंगे; इतः=इससे (भिन्न), अन्यथा=अन्य कोई प्रकार अर्थात् मार्ग, न अस्ति=नहीं है (जिससे कि मनुष्य कर्मसे मुक्त हो सके) ॥ २ ॥ व्याख्या—अतएव समस्त जगत्‌के एकमात्र कर्ता, धर्ता, हर्ता, सर्वशक्तिमान् सर्वमय परमेश्वरका सतत स्मरण रखते हुए सब कुछ उन्हींका समझकर उन्हींकी पूजाके लिये शास्त्रनियत कर्तव्यकर्मोंका आचरण करते हुए ही सौ वर्षतक जीनेकी इच्छा करो—इस प्रकार अपने पूरे जीवनको परमेश्वरके प्रति समर्पण कर दो। ऐसा समझो कि शास्त्रोक्त स्वकर्मका आचरण करते हुए जीवन-निर्वाह करना केवल यज्ञार्थ—परमेश्वरकी पूजाके लिये ही है; अपने लिये नहीं—भोग भोगनेके लिये नहीं। कर्म करते हुए कर्मोंमें लिप्त न होनेका यही एकमात्र मार्ग है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी मार्ग कर्मबन्धनसे मुक्त होनेका नहीं है (गीता २।५०, ५१, ५।१०) ॥ २ ॥ सम्बन्ध—इस प्रकार कर्मफलरूप जन्मबन्धनसे मुक्त होनेके निश्चित मार्गका निर्देश करके अब इसके विपरीत मार्गपर चलनेवाले मनुष्योंकी गतिका वर्णन करते हैं— असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः । तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ ३ ॥ असुर्याः=असुरोंके, (जो) नाम=प्रसिद्ध, लोकाः=नाना प्रकारकी योनियाँ एवं नरकरूप लोक हैं; ते=वे सभी; अन्धेन तमसा=अज्ञान तथा दुःख-क्लेशरूप महान् अन्धकारसे; आवृताः=आच्छादित हैं, ये के च=जो कोई भी; आत्महनः=आत्माकी हत्या करनेवाले, जनाः=मनुष्य हैं; ते=वे; प्रेत्य=मरकर; तान्=उन्हीं भयङ्कर लोकोंको; अभिगच्छन्ति=बार-बार प्राप्त होते हैं ॥ ३ ॥ व्याख्या—मानव शरीर अन्य सभी शरीरोंसे श्रेष्ठ और परम दुर्लभ है एव वह जीवको भगवान्‌की विशेष कृपासे जन्म-मृत्युरूप संसार-समुद्रसे तरनेके लिये ही मिलता है। ऐसे शरीरको पाकर भी जो मनुष्य अपने कर्मसमूहको ईश्वर-पूजाके लिये समर्पण नहीं करते और कामोपभोगको ही जीवनका परम ध्येय मानकर विषयोंकी आसक्ति और कामनावश जिस किसी प्रकारसे भी केवल विषयोंकी प्राप्ति और उनके यथेच्छ उपभोगमें ही लगे रहते हैं, वे वस्तुतः आत्माकी हत्या करनेवाले ही हैं; क्योंकि इस प्रकार अपना पतन करनेवाले वे लोग अपने जीवनको केवल व्यर्थ ही नहीं खो रहे हैं वर अपनेको और भी अधिक कर्मबन्धनमे जकड़ रहे हैं। इन काम भोग-परायण लोगोंको,—चाहे वे कोई भी क्यो न हों, उन्हें चाहे संसारमें कितने ही विशाल नाम, यश, वैभव या अधिकार प्राप्त हों,—मरनेके बाद उन कर्मोंके फलस्वरूप बार-बार कूकर-शूकर, कीट- पतङ्गादि विभिन्न शोक-सन्तापपूर्ण आसुरी योनियोंमें और भयानक नरकोंमे भटकना पड़ता है। (गीता १६। १६, १९, २०) इसीलिये श्रीभगवान्‌ने गीतामें कहा है कि मनुष्यको अपनेद्वारा अपना उद्धार करना चाहिये, अपना पतन नहीं करना चाहिये (गीता ६।५) ॥ ३ ॥ सम्बन्ध—जो परमेश्वर सम्पूर्ण जगत्‌में व्याप्त हैं, जिनका सतत स्मरण करते हुए तथा जिनकी पूजाके लिये ही समस्त कर्म करने चाहिये, वे कैसे हैं? इस जिज्ञासापर कहते हैं—

  • कुछ आदरणीय विद्वानोंने इसका भावार्थ ऐसा माना है— इस ब्रह्माण्डमें जो कुछ यह जगत् है, सब ईश्वरसे व्याप्त है। उस ईश्वरके द्वारा तुम्हारे लिये जो त्याग किया गया है अर्थात् प्रदान किया गया है, उसीको अनासक्तरूपसे भोगो। किसीके भी धनकी इच्छा मत करो।
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