कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 177
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ 'शावा 'पो॑ षद् यह ईशावास्योपनिषद् शुक्लयजुर्वेदसंहिताका चालीसवाँ अध्याय है। मन्त्र-भागका अंश होनेसे इसका विशेष महत्त्व है। इसीको सबसे पहली उपनिषद् माना जाता है। शुक्लयजुर्वेदके प्रथम उनतालीस अध्यायोंमें कर्मकाण्डका निरूपण हुआ है। यह उस काण्डका अन्तिम अध्याय है और इसमें भगवत्तत्त्वरूप ज्ञानकाण्डका निरूपण किया गया है। इसके पहले मन्त्रमें 'ईशा वास्यम्' वाक्य आनेसे इसका नाम 'ईशावास्य' माना गया है। शान्तिपाठ • ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥* ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॐ=सच्चिदानन्दघन, अदः=वह परब्रह्म; पूर्णम्=सब प्रकारसे पूर्ण है, इदम्=यह (जगत् भी), पूर्णम्=पूर्ण (ही) है; (क्योंकि) पूर्णात्=उस पूर्ण (परब्रह्म) से ही; पूर्णम्=यह पूर्ण, उदच्यते=उत्पन्न हुआ है, पूर्णस्य=पूर्णके, पूर्णम्=पूर्णको, आदाय=निकाल लेनेपर (भी), पूर्णम्, एव=ही, अवशिष्यते=बच रहता है। व्याख्या—वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म पुरुषोत्तम सब प्रकारसे सदा-सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत् भी उस परब्रह्मसे पूर्ण ही है, क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तमसे ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्मकी पूर्णतासे जगत् पूर्ण होनेपर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है। उस पूर्णमेंसे पूर्णको निकाल लेनेपर भी वह पूर्ण ही बच रहता है। त्रिविध तापकी शान्ति हो। ईशा वास्यमिदꣳ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद् धनम् ॥ १ ॥ जगत्याम्=अखिल ब्रह्माण्डमें, यत् किं च=जो कुछ भी, जगत्=जड-चेतनस्वरूप जगत् है, इदम्=यह, सर्वम्=समस्त; ईशा=ईश्वरसे, वास्यम्=व्याप्त है, तेन=उस ईश्वरको साथ रखते हुए, त्यक्तेन=त्यागपूर्वक, भुञ्जीथाः= (इसे) भोगते रहो, मा गृधः=(इसमें) आसक्त मत होओ, (क्योंकि) धनम्=धन—भोग्य-पदार्थ, कस्य स्वित्= किसका है अर्थात् किसीका भी नहीं है ॥ १ ॥ व्याख्या—मनुष्योंके प्रति वेद भगवान्का पवित्र आदेश है कि अखिल विश्व-ब्रह्माण्डमें जो कुछ भी यह चराचरात्मक जगत् तुम्हारे देखने-सुननेमें आ रहा है, सब-का-सब सर्वाधार, सर्वनियन्ता, सर्वाधिपति, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वकल्याण- गुणस्वरूप परमेश्वरसे व्याप्त है, सदा सर्वत्र उन्हींसे परिपूर्ण है (गीता ९।४)। इसका कोई भी अंग उनसे रहित नहीं है (गीता १०। ३९,४२)। ऐसा समझकर उन ईश्वरको निरन्तर अपने साथ रखते हुए—सदा-सर्वदा उनका स्मरण करते हुए ही तुम इस जगत्में त्यागभावसे केवल कर्तव्यपालनके लिये ही विषयोंका यथाविधि उपभोग करो अर्थात् यथार्थ—विश्वरूप ईश्वरकी पूजाके लिये ही कर्मोंका आचरण करो। विषयोंमें मनको मत फँसने दो, इसीमे तुम्हारा निश्चित कल्याण है (गीता २।६४; ३।९; १८।४६)। वस्तुतः ये भोग्य-पदार्थ किसीके भी नहीं हैं। मनुष्य भूलसे ही इनमें
- यह मन्त्र बृहदारण्यक उपनिषद्के पाँचवें अध्यायके प्रथम ब्राह्मणकी प्रथम कण्डिकाका पूर्वार्द्धरूप है। उ० अ० २१—