कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
❖ ईशावास्योपनिषद् ❖ १६३ अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् । तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥ ४ ॥ (तत्)=वे परमेश्वर; अनेजत्=अचल; एकम्=एक; (और) मनसः=मनसे (भी), जवीयः=अधिक तीव्र गतियुक्त हैं, पूर्वम्=सबके आदि, अर्षत्=ज्ञानस्वरूप या सबके जाननेवाले हैं, एनत्=इन परमेश्वरको, देवाः=इन्द्रादि देवता भी, न आप्नुवन्=नहीं पा सके या जान सके हैं, तत्=वे (परब्रह्म पुरुषोत्तम), अन्यान्=दूसरे, धावतः=दौड़ने- वालोंको, तिष्ठत्=(स्वयं) स्थित रहते हुए ही; अत्येति=अतिक्रमण कर जाते हैं, तस्मिन्=उनके होनेपर ही—उन्हींकी सत्ता-शक्तिसे, मातरिश्वा=वायु आदि देवता, अपः=जलवर्षण, जीवकी प्राणधारणादि क्रिया प्रभृति कर्म, दधाति=सम्पादन करनेमें समर्थ होते हैं ॥ ४ ॥ व्याख्या—वे सर्वान्तर्यामी सर्वशक्तिमान् परमेश्वर अचल और एक हैं, तथापि मनसे भी अधिक तीव्र वेगयुक्त हैं। जहाँतक मनकी गति है, वे उससे भी कहीं आगे पहलेसे ही विद्यमान हैं। मन तो वहाँतक पहुँच ही नहीं पाता । वे सबके आदि और ज्ञानस्वरूप हैं अथवा सबके आदि होनेके कारण सबको पहलेसे ही जानते हैं। पर उनको देवता तथा महर्षिगण भी पूर्ण- रूपसे नहीं जान सकते (गीता १०। २)। जितने भी तीव्र वेगयुक्त बुद्धि, मन और इन्द्रियाँ अथवा वायु आदि देवता हैं, अपनी गतिभर परमेश्वरके अनुसन्धानमें सदा दौड़ लगाते रहते हैं, परंतु परमेश्वर नित्य अचल रहते हुए ही उन सबको पार करके आगे निकल जाते हैं। वे सब वहाँतक पहुँच ही नहीं पाते। असीमकी सीमाका पता ससीमको कैसे लग सकता है ? बल्कि वायु आदि देवताओंमें जो शक्ति है, जिसके द्वारा वे जलवर्षण, प्रकाशन, प्राणि-प्राणधारण आदि कर्म करनेमें समर्थ होते हैं, वह इन अचिन्त्यशक्ति परमेश्वरकी शक्तिका एक अंशमात्र ही है ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—अब परमेश्वरकी अचिन्त्यशक्तिमत्ता तथा व्यापकताका प्रकारान्तरसे पुन वर्णन करते हैं— तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके। तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥ ५ ॥ तत्=वे; एजति=चलते हैं; तत्=वे; न एजति=नहीं चलते, तत्=वे, दूरे=दूरसे भी दूर हैं; तत्=वे, उ अन्तिके= अत्यन्त समीप हैं; तत्=वे, अस्य=इस, सर्वस्य=समस्त जगत्के, अन्तः=भीतर परिपूर्ण हैं, (और) तत्=वे, अस्य=इस, सर्वस्य=समस्त जगत्के; उ बाह्यतः=बाहर भी हैं ॥ ५ ॥ व्याख्या—वे परमेश्वर चलते भी हैं और नहीं भी चलते, एक ही कालमे परस्परविरोधी भाव, गुण तथा क्रिया जिनमे रह सकती हैं, वे ही तो परमेश्वर हैं। यह उनकी अचिन्त्य शक्तिकी महिमा है। दूसरे प्रकारसे यह भी कहा जा सकता है कि भगवान् जो अपने दिव्य परम धाममें और लीलाधाममें अपने प्रिय भक्तोंको सुख पहुँचानेके लिये अप्राकृत सगुण- साकार रूपमे प्रकट रहकर लीला किया करते हैं, यह उनका चलना है, और निर्गुणरूपसे जो सदा-सर्वथा अचल स्थित हैं, यह उनका न चलना है। इसी प्रकार वे श्रद्धा-प्रेमसे रहित मनुष्योंको कभी दर्शन ही नहीं देते, अतः उनके लिये दूर-से दूर हैं, और प्रेमकी पुकार सुनते ही जिन प्रेमीजनोके सामने चाहे जहाँ उसी क्षण प्रकट हो जाते हैं, उनके लिये वे समीप-से- समीप है। इसके अतिरिक्त वे सदा-सर्वत्र परिपूर्ण हैं, इसलिये दूर-से-दूर भी वही हैं और समीप-से-समीप भी वही हैं; क्योंकि ऐसा कोई स्थान ही नहीं है, जहाँ वे न हों। सबके अन्तर्यामी होनेके कारण भी वे अत्यन्त समीप हैं; पर जो अज्ञानी लोग उन्हें इस रूपमें नहीं पहचानते, उनके लिये वे बहुत दूर हैं। वस्तुतः वे इस समस्त जगत्के परम आधार हैं और परम कारण हैं, इसलिये बाहर-भीतर सभी जगह वे ही परिपूर्ण हैं। * (गीता ७। ७) ॥ ५ ॥
- कुछ आदरणीय विद्वानोंने इसका भावार्थ इस प्रकार माना है— यह आत्मतत्त्व अचल रहकर ही चलता हुआ-सा जान पड़ता है, अज्ञानियोंके लिये अप्राप्य होनेसे बहुत दूर है और ज्ञानियोंका आत्मा होनेसे समीप है। महाकाशमें घटाकाशकी भाँति भीतर और बाहर भी वही है। एक दूसरे विद्वान् यह अर्थ करते हैं—
१६४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध- अब अगले दो मन्त्रोंमे इन परब्रह्म परमेश्वरको जाननेवाले महापुरुषकी स्थितिका वर्णन किया जाता है— यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ६ ॥ तु=परन्तु, यः=जो मनुष्य, सर्वाणि=सम्पूर्ण, भूतानि=प्राणियोंको, आत्मनि=परमात्मामे, एव=ही; अनुपश्यति=निरन्तर देखता है, च=और, सर्वभूतेषु=सम्पूर्ण प्राणियोंमे, आत्मानम्=परमात्माको (देखता है); ततः= उसके पश्चात् (वह कभी भी), न विजुगुप्सते=किसीसे घृणा नहीं करता ॥ ६ ॥ व्याख्या-इस प्रकार जो मनुष्य प्राणिमात्रको सर्वाधार परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मामें देखता है और सर्वान्तर्यामी परम प्रभु परमात्माको प्राणिमात्रमें देखता है, वह कैसे किससे घृणा या द्वेष कर सकता है ? वह तो सदा सर्वत्र अपने परम प्रभुके ही दर्शन करता हुआ (गीता ६। २९-३०) मन-ही-मन सबको प्रणाम करता रहता है तथा सबकी सब प्रकार सेवा करना और उन्हें सुख पहुँचाना चाहता है *॥ ६ ॥ यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥ यस्मिन्=जिस स्थितिमें, विजानतः=परब्रह्म परमेश्वरको भलीभाँति जाननेवाले महापुरुषके (अनुभवमे), सर्वाणि= सम्पूर्ण, भूतानि=प्राणी, आत्मा=एकमात्र परमात्मस्वरूप, एव=ही; अभूत्=हो चुकते हैं, तत्र=उस अवस्थामें; (उस) एकत्वम्=एकताका-एकमात्र परमेश्वरका, अनुपश्यतः=निरन्तर साक्षात् करनेवाले पुरुषके लिये; कः=कौन-सा; मोहः= मोह (रह जाता है और), कः=कौन-सा, शोकः=शोक ! (वह शोक-मोहसे सर्वथा रहित, आनन्दपरिपूर्ण हो जाता है) ॥ ७ ॥ व्याख्या-इस प्रकार जब मनुष्य परमात्माको भलीभाँति पहचान लेता है, तब उसकी सर्वत्र भगवद्दृष्टि हो जाती है-तब वह प्राणिमात्रमे एकमात्र तत्त्व श्रीपरमात्माको ही देखता है। उसे सदा सर्वत्र परमात्माके दर्शन होते रहते हैं और इस कारण वह इतना आनन्दमग्न हो जाता है कि शोक-मोहादि विकारोंकी छाया भी कहीं उसके चित्तप्रदेशमे नहीं रह जाती । लोगोंके देखनेमें वह सब कुछ करता हुआ भी वस्तुतः अपने प्रभुमे ही क्रीड़ा करता है (गीता ६। ३१) । उसके लिये प्रभु और प्रभुकी लीलाके अतिरिक्त अन्य कुछ रह ही नहीं जाता † ॥ ७ ॥ सम्बन्ध- अब इस प्रकार परमप्रभु परमेश्वरको तत्त्वसे जाननेका तथा सर्वत्र देखनेका फल बतलाते हे— स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविर शुद्धमपापविद्धम् । कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ८ ॥ सः=वह महापुरुष, शुक्रम्=(उन) परम तेजोमय, अकायम्=सूक्ष्मशरीरसे रहित; अव्रणम्=छिद्ररहित या क्षत- रहित, अस्नाविरम्=शिराओंसे रहित-स्थूल पाञ्चभौतिक शरीरसे रहित, शुद्धम्=अप्राकृत दिव्य सच्चिदानन्दस्वरूप; अपाप- दूसरे सब उससे भय-प्रकम्पित रहते हैं, पर वे किसीके भयसे नहीं कापते। वे दूर भी हैं, समीप भी हैं, सबके भीतर भी हैं और बाहर भी ।
- कुछ आदरणीय विद्वान् इस मन्त्रका भावार्थ इस प्रकार करते हैं— (१) जो मुमुक्षु सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने आत्मासे पृथक् नहीं देखता और उन प्राणियोंके आत्माको अपना ही आत्मा जानता है, वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें अपने आत्मस्वरूपको देखनेवाला पुरुष किसीसे भी घृणा नहीं करता । (२) जो पुरुष सब प्राणियोंको परमात्मामें और सब प्राणियोंमें परमात्माको देखता है, वह निर्भय हो जाता है। फिर वह अपनी रक्षाकी कोई चिन्ता नहीं करता । • † कुछ आदरणीय विद्वान् इसका ऐसा भावार्थ मानते हैं— जिस समय आत्मस्वरूपमें परमार्थतत्त्वको जाननेवालेकी दृष्टिमें समस्त प्राणी आत्मभावको ही प्राप्त हो गये होते हैं, उस समय अथवा उस आत्मामें कहाँ मोह रह सकता है और कहाँ शोक ?
- ईशावास्योपनिषद् * १६५ विद्धम् = शुभाशुभकर्म-सम्पर्कशून्य परमेश्वरको, पर्यगात् = प्राप्त हो जाता है, (जो) कविः = सर्वद्रष्टा, मनीषी = सर्वज्ञ एवं ज्ञानस्वरूप, परिभूः = सर्वोपरि विद्यमान एवं सर्वनियन्ता; स्वयम्भूः = स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले हैं (और), शाश्वतीभ्यः = अनादि; समाभ्यः = कालसे, याथातथ्यतः = सब प्राणियोंके कर्मानुसार यथायोग्य, अर्थान् = सम्पूर्ण पदार्थोंकी, व्यदधात् = रचना करते आये है ॥ ८ ॥ व्याख्या-उपर्युक्त वर्णनके अनुसार परमेश्वरको सर्वत्र जानने-देखनेवाला महापुरुष उन परब्रह्म पुरुषोत्तम सर्वेश्वरको प्राप्त होता है, जो शुभाशुभ कर्मजनित प्राकृत सूक्ष्म देह तथा पाञ्चभौतिक अस्थि-शिरा-मांसादिमय षड्विकारयुक्त स्थूल देहसे रहित, छिद्ररहित, दिव्य शुद्ध सच्चिदानन्दघन हैं, एवं जो क्रान्तदर्शी-सर्वद्रष्टा हैं, सबके ज्ञाता, सबको अपने नियन्त्रणमें रखनेवाले सर्वाधिपति और कर्मपरवश नहीं, वरं स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले हैं। तथा जो सनातन कालसे सब प्राणियोंके लिये उनके कर्मानुसार समस्त पदार्थोंकी यथायोग्य रचना और विभाग-व्यवस्था करते आये हैं * ॥ ८ ॥ सम्बन्ध-अब अगले तीन मन्त्रोंमें विद्या और अविद्याका तत्त्व समझाया जायगा। इस प्रकरणमें परब्रह्म परमेश्वरकी प्राप्तिके साधन 'ज्ञान'को विद्याके नामसे कहा गया है और स्वर्गादि लोकोंकी प्राप्ति अथवा इस लोकके विविध भोगैश्वर्यकी प्राप्तिके साधन 'कर्म'को अविद्याके नामसे। इन ज्ञान और कर्म-दोनोंके तत्त्वको भलीभाँति समझकर उनका अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य ही इन दोनों साधनोंके द्वारा सर्वोत्तम तथा वास्तविक फल प्राप्त कर सकता है, अन्यथा नहीं-इस रहस्यको समझानेके लिये पहले उन दोनोंके यथार्थ स्वरूपको न समझकर अनुष्ठान करनेवालोंकी दुर्गतिका वर्णन करते हैं- अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया रताः ॥ ९ ॥ ये = जो मनुष्य; अविद्याम् = अविद्याकी; उपासते = उपासना करते हैं, ते = वे, अन्धम् = अज्ञानस्वरूप, तमः = घोर अन्धकारमें, प्रविशन्ति = प्रवेश करते हैं, (और) ये = जो मनुष्य, विद्यायाम् = विद्यामे, रताः = रत हैं अर्थात् ज्ञानके मिथ्याभिमानमे मत्त हैं, ते = वे, ततः = उससे, उ = भी, भूयः इव = मानो अधिकतर, तमः = अन्धकारमे (प्रवेश करते हैं) ॥ ९ ॥ व्याख्या-जो मनुष्य भोगोंमें आसक्त होकर उनकी प्राप्तिके साधनरूप अविद्याका-विविध प्रकारके कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं, वे उन कर्मोंके फलस्वरूप अज्ञानान्धकारसे परिपूर्ण विविध योनियों और भोगोंको ही प्राप्त होते हैं। वे मनुष्य-जन्मके चरम और परम लक्ष्य श्रीपरमेश्वरको न पाकर निरन्तर जन्म-मृत्युरूप संसारके प्रवाहमें पड़े हुए विविध तापोंसे सतत होते रहते हैं। दूसरे जो मनुष्य न तो अन्त:करणकी शुद्धिके लिये कर्त्तापनके अभिमानसे रहित कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं और न विवेक-वैराग्यादि ज्ञानके प्राथमिक साधनोंका ही सेवन करते हैं, परंतु केवल शास्त्रोंको पढ़-सुनकर अपनेमे विद्याका-ज्ञानका मिथ्या आरोप करके ज्ञानाभिमानी वन बैठते हैं, ऐसे मिथ्याज्ञानी मनुष्य अपनेको ज्ञानी मानकर, 'हमारे लिये कोई भी कर्तव्य नहीं है' इस प्रकार कहते हुए कर्तव्यकर्मोंका त्याग कर देते हैं और इन्द्रियोंके वशमे होकर शास्त्रविधिसे विपरीत मनमाना आचरण करने लगते हैं। इससे वे लोग सकामभावसे कर्म करनेवाले विषयासक्त मनुष्योंकी अपेक्षा भी अधिकतरं अन्धकारको-पशु-पक्षी, शूकर-कूकुर आदि नीच योनियोंको और रौरव-कुम्भीपाकादि घोर नरकोंको प्राप्त होते हैं ॥ ९ ॥ सम्बन्ध-शास्त्रके यथार्थ तात्पर्यको समझकर ज्ञान तथा कर्मका अनुष्ठान करनेसे जो सर्वोत्तम परिणाम होता है, उसका संकेतसे वर्णन करते हैं- अन्यदेवाहुर्विद्ययान्यदाहुरविद्यया । इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १० ॥
- इस मन्त्रका भावार्थ कुछ आदरणीय महानुभावोंने इस प्रकार भी किया है- वह पूर्वोक्त निर्विशेष आत्मा आकाशके सदृश सर्वव्यापक, दीप्तिमान्, अशरीरी, अक्षत, स्नायुरहित (स्थूलशरीरसे रहित) तथा धर्माधर्मरूप पापसे रहित है। वह सर्वद्रष्टा, सर्वज्ञ, सबके ऊपर और स्वयं ही सब कुछ है। उस नित्यमुक्त ईश्वरने सम्वत्सर नामक प्रजापतियोंको उनकी योग्यताके अनुसार अर्थोंका-कर्तव्य-पदार्थोंका-यथायोग्य विभाग कर दिया है।
१६६ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * विद्यया=ज्ञानके यथार्थ अनुष्ठानसे, अन्यत् एव=दूसरा ही फल, आहुः=बतलाते हैं ( और ) अविद्यया=कर्मके यथार्थ अनुष्ठानसे, अन्यत्=दूसरा ( ही ) फल, आहुः=बतलाते हैं; इति=इस प्रकार; ( हमने ) धीराणाम्=( उन ) धीर पुरुषोंके, शुश्रुम=वचन सुने हैं, ये=जिन्होंने; नः=हमें, तत्=उस विषयको, विचचक्षिरे=व्याख्या करके भली- भाँति समझाया था ॥ १० ॥ व्याख्या-सर्वोत्तम फल प्राप्त करानेवाले ज्ञानका यथार्थ स्वरूप है-नित्यानित्यवस्तुका विवेक, क्षणभङ्गुर विनाश- शील अनित्य इहलौकिक और पारलौकिक भोगसामग्रियो और उनके साधनोंसे पूर्ण विरक्ति, संयमित पवित्र जीवन और एकमात्र सच्चिदानन्दघन पूर्णब्रह्मके चिन्तनमे अखण्ड संलग्नता । इसके अनुष्ठानमे परब्रह्म पुरुषोत्तमका यथार्थ ज्ञान होता है और उसके अनन्तर उनकी प्राप्ति होती है ( गीता १८ । ४९-५५ ) । ज्ञानाभिमानमे रत स्वेच्छाचारी मनुष्योंको जो दुर्गतिरूप फल मिलता है, यथार्थ ज्ञानका यह सर्वोत्तम फल उससे सर्वथा भिन्न और विलक्षण है। इसी प्रकार सर्वोत्तम फल प्राप्त करानेवाले कर्मका स्वरूप है-कर्ममें कर्तापनके अभिमानका अभाव, राग द्वेष और फलकामनाका अभाव एव अपने वर्णाश्रम तथा परिस्थितिके अनुरूप केवल भगवत्-सेवाके भावसे श्रद्धापूर्वक शास्त्रविहित कर्मोंका यथायोग्य सेवन । इसके अनुष्ठानसे समस्त दुर्गुण और दुराचारोंका अशेष रूपसे नाश हो जाता है और हर्ष- शोकादि समस्त विकारोंसे रहित होकर साधक मृत्युमय संसार-सागरसे तर जाता है । सकामभावसे किये जानेवाले कर्मोंका जो फल उन कर्ताओंको मिलता है, उससे इस यथार्थ कर्म सेवनका यह फल सर्वथा भिन्न और विलक्षण है। इस प्रकार हमने उन परम ज्ञानी महापुरुषोसे सुना है, जिन्होंने हमें यह विषय पृथक् पृथक् रूपसे व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था ॥ १० ॥ सम्बन्ध-अब उपर्युक्त प्रकारसे ज्ञान और कर्म-दोनोंके तत्त्वको एक साथ भलीभाँति समझनेका फल स्पष्ट शब्दोंमें बतलाते हैं- विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ॥ ११ ॥ यः=जो मनुष्य, तत् उभयम्=उन दोनोंको, ( अर्थात् ) विद्याम्=ज्ञानके तत्त्वको, च=और, अविद्याम्= कर्मके तत्त्वको, च=भी, सह=साथ-साथ, वेद=यथार्थतः जान लेता है, अविद्यया=( वह ) कर्मोंके अनुष्ठानसे, मृत्युम्= मृत्युको, तीर्त्वा=पार करके, विद्यया=ज्ञानके अनुष्ठानसे, अमृतम्=अमृतको, अश्नुते=भोगता है अर्थात् अविनाशी आनन्दमय परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्रत्यक्ष प्राप्त हो जाता है ॥ ११ ॥ व्याख्या-कर्म और अकर्मका वास्तविक रहस्य समझनेमे बड़े-बड़े बुद्धिमान् पुरुष भी भूल कर बैठते ह ( गीता ४। १६) । इसी कारण कर्म-रहस्यसे अनभिज्ञ ज्ञानाभिमानी मनुष्य कर्मको ब्रह्मज्ञानमें बाधक समझ लेते हे और अपने वर्णा- श्रमोचित अवश्यकर्तव्य कर्मोंका त्याग कर देते है, परंतु इस प्रकारके त्यागसे उन्हें त्यागका यथार्थ फल-कर्मबन्धनसे छुटकारा नहीं मिलता (गीता १८।८)। इसी प्रकार ज्ञान (अकर्मावस्था-नैष्कर्म्य) का तत्त्व न समझनेके कारण मनुष्य अपनेको ज्ञानी तथा संसारसे ऊपर उठे हुए मान लेते है। अतः वे या तो अपनेको पुण्य-पापसे अलिप्त मानकर मनमाने कर्माचरणमे प्रवृत्त हो जाते हैं, या कर्मोंको भाररूप समझकर उन्हें छोड़ देते हैं और आलस्य, निद्रा तथा प्रमादमे अपने दुर्लभ मानव- जीवनके अमूल्य समयको नष्ट कर देते हैं। इन दोनो प्रकारके अनर्थोंसे बचनेका एकमात्र उपाय कर्म और ज्ञानके रहस्यको साथ-साथ समझकर उनका यथा- योग्य अनुष्ठान करना ही है। इसीलिये इस मन्त्रमें यह कहा गया है कि जो मनुष्य इन दोनोंके तत्त्वको एक ही साथ भलीभाँति समझ लेता है, वह अपने वर्णाश्रम और परिस्थितिके अनुरूप शास्त्रविहित कर्मोंका स्वरूपतः त्याग नहीं करता, बल्कि उनमें कर्तापनके अभिमानसे तथा राग-द्वेष और फलकामनासे रहित होकर उनका यथायोग्य आचरण करता है। इससे उसकी जीवनयात्रा भी सुखपूर्वक चलती है और इस भावसे कर्मानुष्ठान करनेके फलस्वरूप उसका अन्तःकरण समस्त
❖ ईशावास्योपनिषद् ❖ १६७ दुर्गुणों एवं विकारोंसे रहित होकर अत्यन्त निर्मल हो जाता है और भगवत्कृपासे वह मृत्युमय संसारसे सहज ही तर जाता है । इस कर्मसाधनके साथ-ही-साथ विवेक-वैराग्यसम्पन्न होकर निरन्तर ब्रह्मविचाररूप ज्ञानाभ्यास करते रहनेसे श्री- परमेश्वरके यथार्थ ज्ञानका उदय होनेपर वह शीघ्र ही परब्रह्म परमेश्वरको साक्षात् प्राप्त कर लेता है * ॥ ११ ॥ सम्बन्ध—अब अगले तीन मन्त्रोंमें असम्भूति और सम्भूतिका तत्त्व बतलाया जायगा । इस प्रकरणमें 'असम्भूति' शब्दका अर्थ है—जिनकी पूर्णरूपसे सत्ता न हो, ऐसी विनाशशील देव, पितर और मनुष्यादि योनियाँ एवं उनकी भोगसामग्रियाँ । इसीलिये चौदहवें मन्त्रमें 'असम्भूति'के स्थानपर स्पष्टतया 'विनाश' शब्दका प्रयोग किया गया है । इसी प्रकार 'सम्भूति' शब्दका अर्थ है— सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाला अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तम (गीता ७ । ६-७) । देव, पितर और मनुष्यादिकी उपासना किस प्रकार करनी चाहिये और अविनाशी परब्रह्मकी किस प्रकार—इस तत्त्वको समझकर उनका अनुष्ठान करनेवाले मनुष्य ही उनके सर्वोत्तम फलोंको प्राप्त हो सकते हैं, अन्यथा नहीं । इस भावको समझानेके लिये, पहले, उन दोनोंके यथार्थ स्वरूपको न समझकर अनुष्ठान करनेवालोंकी दुर्गतिका वर्णन करते हैं— अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्याँरताः ॥ १२ ॥ ये=जो मनुष्य; असम्भूतिम्=विनाशशील देव-पितरादिकी; उपासते=उपासना करते हैं; (ते)=वे; अन्धम्= अज्ञानरूप; तमः=घोर अन्धकारमें; प्रविशन्ति=प्रवेश करते हैं, (और) ये=जो, सम्भूत्याम्=अविनाशी परमेश्वरमें; रताः=रत हैं अर्थात् उनकी उपासनाके मिथ्याभिमानमें मत्त हैं; ते=वे; ततः=उनसे; उ=भी; भूयः इव=मानो अधिकतर; तमः=अन्धकारमें (प्रवेश करते हैं) ॥ १२ ॥ व्याख्या—जो मनुष्य विनाशशील स्त्री, पुत्र, धन, मान, कीर्ति, अधिकार आदि इस लोक और परलोककी भोग- सामग्रियोंमें आसक्त होकर उन्हींको सुखका हेतु समझते हैं तथा उन्हींके अर्जन-सेवनमें सदा संलग्न रहते हैं एवं इन भोग- सामग्रियोंकी प्राप्ति, संरक्षण तथा वृद्धिके लिये उन विभिन्न देवता, पितर और मनुष्यादिकी उपासना करते हैं जो स्वयं जन्म- मरणके चक्रमें पड़े हुए होनेके कारण शरीरकी दृष्टिसे विनाशशील हैं । ऐसे वे भोगासक्त मनुष्य अपनी उपासनाके फलस्वरूप विभिन्न देवताओंके लोकोंको और विभिन्न भोगयोनियोंको प्राप्त होते हैं। यही उनका अज्ञानरूप घोर अन्धकारमें प्रवेश करना है। दूसरे जो मनुष्य शास्त्रके तात्पर्यको तथा भगवान्के दिव्य गुण, प्रभाव, तत्त्व और रहस्यको न समझनेके कारण न तो भगवान्का भजन-ध्यान ही करते हैं और न श्रद्धाके अभाव तथा भोगासक्तिके कारण लोकसेवा और शास्त्रविहित देवोपासनामें ही प्रवृत्त होते हैं, ऐसे वे विषयासक्त मनुष्य झूठ-मूठ ही अपनेको ईश्वरोपासक बतलाकर सरलहृदय जनता- से अपनी पूजा कराने लगते हैं। ये लोग मिथ्या अभिमानके कारण देवताओंको तुच्छ बतलाते हैं और शास्त्रानुसार अवश्यकर्तव्य देवपूजा तथा गुरुजनोंका सम्मान-सत्कार करना भी छोड़ देते हैं। इतना ही नहीं, दूसरोंको भी अपने वाग्- जालमें फँसाकर उनके मनोंमें भी देवोपासना आदिमे अश्रद्धा उत्पन्न कर देते हैं। ये लोग अपनेको ही ईश्वरके समकक्ष मानते- मनवाते हुए मनमाने दुराचरणमें प्रवृत्त हो जाते हैं । ऐसे दम्भी मनुष्योंको अपने दुष्कर्मोंका कुफल भोगनेके लिये बाध्य होकर कूकर-शूकर आदि नीच योनियोंमें और रौरव-कुम्भीपाकादि नरकोंम जाकर भीषण यन्त्रणाएँ भोगनी पड़ती हैं। यही उनका विनाशशील देवताओंकी उपासना करनेवालोंकी अपेक्षा भी अधिकतर घोर अन्धकारमें प्रवेश करना है ॥ १२ ॥ सम्बन्ध—शास्त्रके यथार्थ तात्पर्यको समझकर सम्भूति और असम्भूतिकी उपासना करनेसे जो सर्वोत्तम परिणाम होता है, अब संक्षेपसे उसका वर्णन करते हैं—
- कुछ महानुभावोंने इसका यह भावार्थ माना है— अविद्या अर्थात् अग्निहोत्रादि कर्म यानी 'मृत्यु' शब्दवाच्य स्वाभाविक कर्म और ज्ञान—इन दोनोंको तरकर, विद्या अर्थात् देवताज्ञानसे अमृत यानी देवात्मभावको प्राप्त हो जाता है। इस देवात्मभावकी प्राप्तिको ही अमृत कहा जाता है।
१६८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात् । इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १३ ॥ सम्भवात् = अविनाशी ब्रह्मकी उपासनासे, अन्यत् एव = दूसरा ही फल; आहुः = बतलाते हैं; (और) असम्भवात् = विनाशशील देव पितरादिकी उपासनासे, अन्यत् = दूसरा (ही) फल, आहुः = बतलाते हैं; इति = इस प्रकार; (हमने) धीराणाम् = (उन) धीर पुरुषोंके, शुश्रुम = वचन सुने हैं; ये = जिन्होंने, नः = हमें; तत् = उस विषयको, विचचक्षिरे = व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था ॥ १३ ॥ व्याख्या-अविनाशी ब्रह्मकी उपासनाका यथार्थ स्वरूप है-परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान्को सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वाधार, सर्वमय, सम्पूर्ण संसारके कर्ता, धर्ता, हर्ता, नित्य अविनाशी समझना और भक्ति श्रद्धा तथा प्रेमपरिपूरित हृदयसे नित्य-निरन्तर उनके दिव्य परम मधुर नाम, रूप, लीला, धाम तथा प्राकृत गुणरहित एव दिव्य गुणगणमय सच्चिदानन्द- घन स्वरूपका श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि करते रहना । इस प्रकारकी सच्ची उपासनासे उपासकको शीघ्र ही अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तमकी प्राप्ति हो जाती है (गीता ९।३४)। ईश्वरोपासनाका मिथ्या स्वाँग भरनेवाले दम्भियों- को जो फल मिलता है, उससे इन सच्चे उपासकोंको मिलनेवाला यह फल सर्वथा भिन्न और विलक्षण है । इसी प्रकार विनाशी देवता आदिकी उपासनाका यथार्थ स्वरूप है-शास्त्रोंके एव श्रीभगवान्के आज्ञानुसार (गीता १७।१४) देवता, पितर, ब्राह्मण, माता-पिता, आचार्य और ज्ञानी महापुरुषोंकी अवश्यकर्त्तव्य समझकर सेवा- पूजादि करना और उसको भगवान्की आज्ञाका पालन एव उनकी परम सेवा समझना। इस प्रकार निष्कामभावसे अन्य देवताओंकी सेवा-पूजा करनेवालोंके अन्तःकरणकी शुद्धि होती है तथा श्रीभगवान्की कृपा एव प्रसन्नता प्राप्त होती है, जिससे वे मृत्युमय संसारसागरसे तर जाते हैं। विनाशशील देवता आदिकी सकाम उपासनामे जो फल मिलता है, उससे यह फल सर्वथा भिन्न और विलक्षण है । इस प्रकार हमने उन धीर तत्त्वज्ञानी महापुरुषोंमे सुना है, जिन्होंने हमें यह विषय पृथक् पृथक् रूपसे व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था ॥ १३ ॥ सम्बन्ध - अब उपर्युक्त प्रकारसे सम्भूति और असम्भूति दोनोंके तत्त्वको एक साथ भलीभाँति समझनेका फल स्पष्ट बतलाते हैं- सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयं सह । विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्यामृतमश्नुते ॥ १४ ॥ यः = जो मनुष्य; तत् उभयम् = उन दोनोंको; (अर्थात्) सम्भूतिम् = अविनाशी परमेश्वरको; च = और; विनाशम् = विनाशशील देवादिको, च = भी, सह = साथ-साथ; वेद = यथार्थतः जान लेता है; विनाशेन = (वह) विनाशशील देवादिकी उपासनासे, मृत्युम् = मृत्युको, तीर्त्वा = पार करके; सम्भूत्या = अविनाशी परमेश्वरकी उपासनासे, अमृतम् = अमृत- को, अश्नुते = भोग करता है अर्थात् अविनाशी आनन्दमय परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्रत्यक्ष प्राप्त हो जाता है ॥ १४ ॥ व्याख्या-जो मनुष्य यह समझ लेता है कि परब्रह्म पुरुषोत्तम नित्य अविनाशी, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सर्वाधिपति, सर्वात्मा और सर्वश्रेष्ठ है, वे परमेश्वर नित्य निर्गुण (प्राकृत गुणोंसे सर्वथा रहित) और नित्य सगुण (स्वरूप- भूत दिव्यकल्याणगुणगणविभूषित) हैं। और इसीके साथ जो यह भी समझ लेता है कि देवता, पितर, मनुष्य आदि जितनी भी योनियाँ तथा भोगसामग्रियाँ हैं, सभी विनाशशील, क्षणभङ्गुर और जन्म-मृत्युशील होनेके कारण महान् दुःखकी कारण हैं; तथापि इनमें जो सत्ता-स्फूर्ति तथा शक्ति है, वह सभी भगवान्की है और भगवान्के जगच्चक्रके सुचारुरूपसे चलते रहनेके लिये भगवत्प्रीत्यर्थ ही इनकी यथास्थान यथायोग्य सेवा पूजा आदि करनेकी शास्त्रोंने आज्ञा दी है और शास्त्र भगवान्की ही वाणी है। वह मनुष्य इहलौकिक तथा पारलौकिक देव पितरादि लोकोंके भोगोंमे आसक्त न होकर कामना-ममता आदिको हृदयसे निकालकर इन सबकी यथायोग्य शास्त्रविहित सेवा-पूजादि करता है। इससे उसकी जीवन-
- ईशावास्योपनिषद् * १६९ यात्रा सुखपूर्वक चलती है,* और उसके आभ्यन्तरिक विकारोंका नाश होकर अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है एवं भगवत्कृपासे वह सहज ही मृत्युमय संसार-सागरको तर जाता है। विनाशशील देवता आदिकी निष्काम उपासनाके साथ-ही-साथ अविनाशी परात्पर प्रभुकी उपासनासे वह शीघ्र ही अमृतरूप परमेश्वरको प्रत्यक्ष प्राप्त कर लेता है † ॥ १४ ॥ सम्बन्ध—श्रीपरमेश्वरकी उपासना करनेवालोंको परमेश्वरकी प्राप्ति होती है, यह कहा गया है। अत भगवान्के भक्तको अन्तकालमें परमेश्वरसे उनकी प्राप्तिके लिये किस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं— हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १५ ॥ पूषन्=हे सबका भरण-पोषण करनेवाले परमेश्वर; सत्यस्य = सत्यस्वरूप आप सर्वेश्वरका, मुखम् = श्रीमुख, हिरण्मयेन = ज्योतिर्मय सूर्यमण्डलखरूप; पात्रेण = पात्रसे, अपिहितम् = ढका हुआ है; सत्यधर्माय = आपकी भक्तिरूप सत्य- धर्मका अनुष्ठान करनेवाले मुझको; दृष्टये = अपने दर्शन करानेके लिये; तत् =उस आवरणको, त्वम् = आप, अपावृणु = हटा लीजिये ॥ १५ ॥ व्याख्या—भक्त इस प्रकार प्रार्थना करे कि हे भगवन् ! आप अखिल ब्रह्माण्डके पोषक हैं, आपसे ही सबको पुष्टि प्राप्त होती है। आपकी भक्ति ही सत्य धर्म है और मैं उसमें लगा हुआ हूँ; अतएव मेरी पुष्टि—मेरे मनोरथकी पूर्ति तो आप अवश्य ही करेंगे। आपका दिव्य श्रीमुख—सच्चिदानन्दस्वरूप प्रकाशमय सूर्यमण्डलसे चमचमाती हुई ज्योतिर्मयी यवनिकासे आवृत्त है। मैं आपका निरावरण प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहता हूँ, अतएव आपके पास पहुँचकर आपका निरावरण दर्शन करनेमें बाधा देनेवाले जितने भी, जो भी आवरण—प्रतिबन्धक हों, उन सबको मेरे लिये आप हटा लीजिये ! अपने सच्चिदानन्दस्वरूपको प्रत्यक्ष प्रकट कीजिये ‡ ॥ १५ ॥ पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह। तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ १६ ॥ पूषन् = हे भक्तोंका पोषण करनेवाले; एकर्षे = हे मुख्य ज्ञानस्वरूप, यम = हे सबके नियन्ता; सूर्य = हे भक्तो या ज्ञानियों (सूरियों) के परम लक्ष्यरूप, प्राजापत्य = हे प्रजापतिके प्रिय; रश्मीन् = इन रश्मियोंको; व्यूह = एकत्र कीजिये या हटा लीजिये; तेजः = इस तेजको, समूह = समेट लीजिये या अपने तेजमें मिला लीजिये; यत् = जो, ते = आपका, कल्याणतमम् = अतिशय कल्याणमय; रूपम् = दिव्य स्वरूप है, तत् =उस, ते = आपके दिव्य स्वरूपको, पश्यामि = मैं आपकी कृपासे ध्यानके द्वारा देख रहा हूँ, यः = जो; असौ = वह (सूर्यका आत्मा) है; असौ = वह, पुरुषः = परम पुरुष (आपका ही स्वरूप है), अहम् = मैं (भी), सः अस्मि = वही हूँ ॥ १६ ॥ व्याख्या—भगवन् ! आप अपनी सहज कृपासे भक्तोंके भक्ति-साधनमे पुष्टि प्रदान करके उनका पोषण करनेवाले हैं, आप समस्त ज्ञानियोंमें अग्रगण्य, परम ज्ञानस्वरूप तथा अपने भक्तोंको अपने स्वरूपका यथार्थ ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं (गीता १० । १२); आप सबका यथायोग्य नियमन, नियन्त्रण और शासन करनेवाले हैं; आप ही भक्तों या ज्ञानी महापुरुषोंके लक्ष्य हैं और अविज्ञेय होनेपर भी अपने भक्तवत्सल स्वभावके कारण भक्तिके द्वारा उनके जाननेमें आ
- कई आदरणीय महानुभावोंने असम्भूतिका अर्थ 'अव्याकृत प्रकृति' और सम्भूतिका अर्थ 'कार्यब्रह्म' किया है। एवं कहा है कि कार्यब्रह्मकी उपासनामे अधर्म तथा कामनादि दोषजनित अनैश्वर्यरूप मृत्युको पार करके, हिरण्यगर्भकी उपासनासे अणिमादि ऐश्वर्यकी प्राप्तिरूप फल मिलना है। अतएव उससे अनैश्वर्य आदि मृत्युको पार करके इम अव्यक्तोपासनामे प्रकृतिलयरूप अमृत प्राप्त कर लेना है। † कुछ अन्य महानुभावोंने असम्भूतिका अर्थ 'महाएकता' और सम्भूतिका 'सृष्टिकर्त्ता' माना है। ‡ एक महानुभावने इस मन्त्रका यह अर्थ किया है— हे पूर्ण परमात्मन् ! सोनेके ढकनेमे (सोनेके समान मन-लुभावने विषयरूपी मायाके परदेमे) तुझ सत्यका मुख ढका हुआ है अर्थात् हम विषयोंमे फँसे हुए हैं। हे सबके पोषक ! उस ढकनेको मुझ सत्य-परायण साधकके लिये तू उठा दे, जिससे मैं दर्शन कर सकूँ। उ० अ० २२—
१७० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * जाते हैं, आप प्रजापतिके भी प्रिय हैं। हे प्रभो ! इस सूर्यमण्डलकी तप्त रश्मियोंको एकत्र करके अपनेमें लुप्त कर लीजिये। इसके उग्र तेजको समेटकर अपनेमें मिला लीजिये और मुझे अपने दिव्यस्वरूपके प्रत्यक्ष दर्शन कराइये। अभी तो मैं आपकी कृपासे आपके सौन्दर्य-माधुर्य-निधि दिव्य परम कल्याणरूप सच्चिदानन्दस्वरूपका ध्यान दृष्टिसे दर्शन कर रहा हूँ, साथ ही बुद्धिके द्वारा समझ भी रहा हूँ कि वही आप परम पुरुष इस सूर्यके और समस्त विश्वके आत्मा हैं। अतः आपके लिये जो वह सूर्यमण्डलस्थ पुरुष है, वही मैं भी हूँ। उस पुरुषमें और मुझमें किसी प्रकारका भेद नहीं है * ॥ १६ ॥ सम्बन्ध-ध्यानके द्वारा भगवान्के दिव्य मङ्गलमय स्वरूपके दर्शन करता हुआ साधक अब भगवान्की साक्षात् सेवामें पहुँचनेके लिये व्यग्र हो रहा है और शरीरका त्याग करते समय सूक्ष्म तथा स्थूल शरीरके सर्वथा विघटनकी भावना करता हुआ भगवान्से प्रार्थना करता है- वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त ँ शरीरम् । ॐ क्रतो स्मर कृत ँ स्मर क्रतो स्मर कृत ँ स्मर ॥ १७ ॥ अथ = अब, वायुः = ये प्राण और इन्द्रियाँ, अमृतम् = अविनाशी; अनिलम् = समष्टि वायु-तत्त्वमे; ( प्रविशतु = प्रविष्ट हो जायँ, ) इदम् = यह, शरीरम् = स्थूल शरीर; भस्मान्तम् = अग्निमे जलकर भस्मरूप, ( भूयात् = हो जाय; ) ॐ = हे सच्चिदानन्दघन; क्रतो = यज्ञमय भगवन्, स्मर = ( आप मुझ भक्तको ) स्मरण करें; कृतम् = मेरे द्वारा किये हुए कर्मोंका; स्मर = स्मरण करें; क्रतो = हे यज्ञमय भगवन्; स्मर = ( आप मुझ भक्तको ) स्मरण करें; कृतम् = ( मेरे ) कर्मोंको, स्मर = स्मरण करें ॥ १७ ॥ व्याख्या-परमधामका यात्री वह साधक अपने प्राण, इन्द्रिय और शरीरको अपनेसे सर्वथा भिन्न समझकर उन सबको उनके अपने-अपने उपादान तत्त्वोंमे सदाके लिये विलीन करना एव सूक्ष्म और स्थूल शरीरका सर्वथा विघटन करना चाहता है। इसलिये कहता है कि प्राणादि समष्टिवायु आदिमे प्रविष्ट हो जायँ और स्थूल शरीर जलकर भस्म हो जाय । फिर वह अपने आराध्य देव परब्रह्म पुरुषोत्तम श्रीभगवान्से प्रार्थना करता है कि हे यज्ञमय विष्णु-सच्चिदानन्द विज्ञानस्वरूप परमेश्वर ! आप अपने निजजन मुझको और मेरे कर्मोंको स्मरण कीजिये। आप स्वभावसे ही मेरा और मेरे द्वारा बने हुए भक्तिरूप कार्योंका स्मरण करेंगे; क्योंकि आपने कहा है, 'अहं स्मरामि मद्भक्तं नयामि परमा गतिम्'-मैं अपने भक्तका स्मरण करता हूँ और उसे परम गतिमें पहुँचा देता हूँ, अपनी सेवामे स्वीकार कर लेता हूँ; क्योंकि यही सर्वश्रेष्ठ गति है। इसी अभिप्रायसे भक्त यहाँ दूसरी बार फिर कहता है कि भगवन् ! आप मेरा और मेरे कर्मोंका स्मरण कीजिये । अन्तकालमें मैं आपकी स्मृतिमें आ गया तो फिर निश्चय ही आपकी सेवामे शीघ्र पहुँच जाऊँगा † ॥ १७ ॥ सम्बन्ध-इस प्रकार अपने आराध्यदेव परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान्से प्रार्थना करके अब साधक अपुनरावर्ती अर्चि आदि मार्गके द्वारा परम धाममें जाते समय उस मार्गके अग्नि-अभिमानी देवतासे प्रार्थना करता है-
- एक आदरणीय विद्वान्ने १६ वें मन्त्रका यह अर्थ किया है- हे जगत्का पोषण करनेवाले पूषन् ! अकेले विचरण करनेवाले एकर्षे ! सबका नियमन करनेवाले यम ! प्राण और रसोंका शोषण करनेवाले सूर्य ! प्रजापति-पुत्र प्राजापत्य ! अपनी किरणोंको हटा लो, अपने तेजको समेट लो। तुम्हारा जो परम कल्याणमय और अत्यन्त शोभन स्वरूप है, उसे तुम आत्माकी कृपासे मै देखता हूँ। तथा यह मै तुममे सेवककी भाँति याचना नहीं करता, क्योकि यह जो व्याहृतिरूप अङ्गोंवाला आदित्यमण्डलस्थ पुरुष है-जो पुरुषाकार होनेसे अथवा जो प्राण और बुद्धिरूपसे सम्पूर्ण जगत्को पूर्ण किये हुए है या जो शरीररूप पुरमें शयन करनेके कारण पुरुष है-वह मै ही हू ॥ १६ ॥ अनुसार... समय जो मेरा स्मरणीय है, उसका स्मरण कर, अब यह उसका समय उपस्थित हो गया है, अत तू स्मरण कर। 'क्रतो स्मर कृत स्मर'का पुनरुक्ति यहाँ आदरके लिये है।
- ईशावास्योपनिषद् * १७१ अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम ॥ १८ ॥ अग्ने=हे अग्निके अधिष्ठातृ देवता !, अस्मान्=हमें, राये=परम धनरूप परमेश्वरकी सेवामें पहुँचानेके लिये; सुपथा= सुन्दर शुभ ( उत्तरायण ) मार्गसे; नय=(आप) ले चलिये, देव=हे देव; ( आप हमारे ) विश्वानि=सम्पूर्ण, वयुनानि= कर्मोंको; विद्वान्=जाननेवाले हैं; ( अत' ) अस्मत्=हमारे, जुहुराणम्=इस मार्गके प्रतिबन्धक, एन:= ( यदि कोई ) पाप हैं ( तो उन सबको ); युयोधि=( आप ) दूर कर दीजिये; ते=आपको, भूयिष्ठाम्=वार-वार; नमउक्तिम्= नमस्कारके वचन; विधेम=( हम ) कहते हैं—वार-वार नमस्कार करते हैं ॥ १८ ॥ व्याख्या—साधक कहता है—हे अग्निदेवता ! मैं अब अपने परम प्रभु भगवान्की सेवामें पहुँचना और सदाके लिये उन्हींकी सेवामे रहना चाहता हूँ । आप शीघ्र ही मुझे परम सुन्दर मङ्गलमय उत्तरायणमार्गसे भगवान्के परमधाममें पहुँचा दीजिये । आप मेरे कर्मोंको जानते हैं। मैंने जीवनमे भगवान्की भक्ति की है और उनकी कृपासे इस समय भी मैं ध्याननेत्रोंसे उनके दिव्य स्वरूपके दर्शन और उनके नामोंका उच्चारण कर रहा हूँ । मेरा अधिकार है कि मैं इसी मार्गसे जाऊँ । तथापि यदि आपके ध्यानमें मेरा कोई ऐसा कर्म शेष हो, जो इस मार्गमें प्रतिबन्धकरूप हो, तो आप कृपा करके उसे नष्ट कर दीजिये । मैं आपको बार-बार विनयपूर्वक नमस्कार करता हूँ *-† ॥ १८ ॥ ॥ यजुर्वेदीय ईशावास्योपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः ॐ शान्तिः ॐ शान्तिः इसका अर्थ ईशावास्योपनिषद्के प्रारम्भमें दिया जा चुका है ।
- इस मन्त्रका भावार्थ एक सज्जन इस प्रकार करते हैं— हे सबके अग्रणी ( जगद्गुरो ) ! तू हमें धनके लिये—लोक और परलोकके सुखके लिये- नेकीके रास्तेसे चला । हे सबके अन्तर्यामी प्रकाशमान ' तू हमारे सब ज्ञानोंको जाननेवाला है । हमसे अच्छे मार्गमें बाधा देनेवाले कुटिल पापको दूर कर । हम तुझे बार-बार नमस्कार करते हैं । † इस उपनिषद्का पन्द्रहवाँ और सोलहवाँ मन्त्र सबके लिये मननीय हैं । उन मन्त्रोंके भावके अनुसार सबको भगवान्से दर्शन देनेके लिये प्रार्थना करनी चाहिये । 'सत्यधर्माय दृष्टये' का यह भाव भी समझना चाहिये कि 'भगवन् ! आप अपने स्वरूपका वह आवरण—वह परदा हटा दीजिये, जिससे सत्यधर्मरूप आप परमेश्वरकी प्राप्ति तथा आपके मङ्गलमय श्रीविग्रहका दर्शन हो सके । इसी प्रकार सत्रहवें और अठारहवें मन्त्रके भावका भी प्रत्येक मनुष्यको विशेषत मुमूर्षु अवस्थामें अवश्य स्मरण करना चाहिये । इन मन्त्रोंके अनुसार अन्तकालमें भगवान्की प्रार्थना करनेसे मनुष्यमात्रका कल्याण हो सकता है । भगवान्ने स्वयं भी गीतामें कहा है—'अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् । य प्रयाति स मद्भाव याति नास्त्यत्र सशय ॥' मुमूर्षुमात्रके लाभके लिये इन दो मन्त्रोंका भावार्थ इस प्रकार है—'हे परमात्मन् ! मेरे ये इन्द्रिय और प्राण आदि अपने-अपने कारण-तत्त्वोंमें लीन हो जायँ और मेरा यह स्थूल शरीर भी भस्म हो जाय । इनके प्रति मेरे मनमें किञ्चित् भी आसक्ति न रहे । हे यज्ञमय विष्णो ! आप कृपा करके मेरा और मेरे कर्मोंका स्मरण करें । आपके स्मरण कर लेनेसे मैं और मेरे कर्म सब पवित्र हो जायँगे । फिर तो मै अवश्य ही आपके चरणोंकी सेवामें पहुँच जाऊँगा ॥ १७ ॥ हे अग्निरूप परमेश्वर ! आप ही मेरे धन हैं—सर्वस्व हैं, अतः आपकी ही प्राप्तिके लिये आप मुझे उत्तम मार्गसे अपने चरणोंके समीप पहुँचाइये । मेरे जितने भी शुभाशुभ कर्म हैं, वे आपसे छिपे नहीं हैं, आप सबको जानते हैं, मैं उन कर्मोंके बलपर आपको नहीं पा सकता, आप स्वयं ही दया करके मुझे अपना लीजिये । आपकी प्राप्तिमें जो भी प्रतिबन्धक पाप हों उन सबको आप दूर कर दें; मैं वारवार आपको नमस्कार करता हूँ ॥ १८ ॥'
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ `नो निषद् यह उपनिषद् सामवेदके ‘तलवकार ब्राह्मण’ के अन्तर्गत है। तलवकारको जैमिनीय उपनिषद् भी कहते हैं। ‘तलवकार ब्राह्मण’ के अस्तित्वके सम्बन्धमे कुछ पाश्चात्त्य विद्वानोंको सन्देह हो गया था, परन्तु डा० बर्नलको कहींसे एक प्राचीन प्रति मिल गयी, तबसे वह सन्देह जाता रहा। इस उपनिषद्में सबसे पहले ‘केन’ शब्द आया है, इसीसे इसका ‘केनोपनिषद्’ नाम पड़ गया। इसे ‘तलवकार उपनिषद्’ और ‘ब्राह्मणोपनिषद्’ भी कहते हैं। तलवकार ब्राह्मणका यह नवम अध्याय है। इसके पूर्वके आठ अध्यायोंमें अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये विभिन्न कर्म और उपासनाओंका वर्णन है। इस उपनिषद्का प्रतिपाद्य विषय परब्रह्म- तत्त्व बहुत ही गहन है, अतएव उसको भलीभाँति समझानेके लिये गुरु-शिष्य-संवादके रूपमे तत्त्वका विवेचन किया गया है। शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि। सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत्, अनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु। तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु, ते मयि सन्तु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॐ=हे परब्रह्म परमात्मन्, मम=मेरे, अङ्गानि=सम्पूर्ण अङ्ग, वाक्=वाणी; प्राणः=प्राण, चक्षुः=नेत्र, श्रोत्रम्=कान, च= और, सर्वाणि=सब, इन्द्रियाणि=इन्द्रियाँ, अथो=तथा, बलम्=शक्ति, आप्यायन्तु=परिपृष्ट हों, सर्वम्=(यह जो) सर्वरूप; औपनिषदम्=उपनिषद्-प्रतिपादित; ब्रह्म=ब्रह्म है, अहम्=मैं; ब्रह्म=इस ब्रह्मको, मा निराकुर्याम्=अस्वीकार न करूँ; (और) ब्रह्म=ब्रह्म, मा=मुझको, मा निराकरोत्=परित्याग न करे, अनिराकरणम्=(उसके साथ मेरा) अटूट सम्बन्ध; अस्तु=हो, मे=मेरे साथ; अनिराकरणम्=(उसका) अटूट सम्बन्ध; अस्तु=हो, उपनिषत्सु=उपनिषदोंमें प्रतिपादित; ये=जो, धर्माः=धर्मसमूह हैं, ते=वे सब, तदात्मनि=उस परमात्मामें, निरते=लगे हुए, मयि=मुझमें; सन्तु=हों, ते=वे सब, मयि=मुझमें, सन्तु=हों। ॐ=हे परमात्मन्; शान्तिः शान्तिः शान्तिः=त्रिविध तापोंकी निवृत्ति हो। व्याख्या—हे परमात्मन् ! मेरे सारे अङ्ग, वाणी, नेत्र श्रोत्र आदि सभी कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ, प्राणसमूह, शारीरिक और मानसिक शक्ति तथा ओज—सब पुष्टि एव वृद्धिको प्राप्त हों। उपनिषदोंमें सर्वरूप ब्रह्मका जो स्वरूप वर्णित है, उसे मैं कभी अस्वीकार न करूँ और वह ब्रह्म भी मेरा कभी प्रत्याख्यान न करे। मुझे सदा अपनाये रक्खे। मेरे साथ ब्रह्मका और ब्रह्मके साथ मेरा नित्य सम्बन्ध बना रहे। उपनिषदोंमे जिन धर्मोंका प्रतिपादन किया गया है, वे सारे धर्म, उपनिषदोंके एकमात्र लक्ष्य परब्रह्म परमात्मामें निरन्तर लगे हुए मुझ साधकमें सदा प्रकाशित रहें, मुझमे नित्य निरन्तर बने रहें। और मेरे त्रिविध तापोंकी निवृत्ति हो। सम्बन्ध—शिष्य गुरुदेवसे पूछता है— ॐ केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः। केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥ १ ॥ केन=किसके द्वारा, इषितम्=सत्ता-स्फूर्ति पाकर, (और) प्रेषितम्=प्रेरित—सञ्चालित होकर (यह), मनः=मन (अन्तःकरण), पतति=अपने विषयोंमें गिरता है—उनतक पहुँचता है, केन=किसके द्वारा, युक्तः=नियुक्त होकर; प्रथमः=अन्य सबसे श्रेष्ठ, प्राणः=प्राण, प्रैति=चलता है, केन=किसके द्वारा, इषिताम्=क्रियाशील की हुई; इमाम्=इस;
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१७४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * उनसे यही सुना है कि वह परब्रह्म परमेश्वर जड चेतन दोनोंसे ही भिन्न है-जाननेमें आनेवाले सम्पूर्ण दृश्य जड-वर्ग (क्षर) से तो वह सर्वथा भिन्न है और इस जड-वर्गको जाननेवाले परंतु स्वय जाननेमे न आनेवाले जीवात्मा (अक्षर) से भी उत्तम है। ऐसी स्थितिमें उसके स्वरूपतत्त्वको वाणीके द्वारा व्यक्त करना कदापि सम्भव नहीं है। इसीसे उसको समझानेके लिये सकेतका ही आश्रय लेना पड़ता है ॥ ३ ॥ सम्बन्ध-अब उसी ब्रह्मको प्रश्नोंके अनुसार पुन' पाँच मन्त्रोंमें समझाते हैं— यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ४ ॥ यत्=जो, वाचा=वाणीके द्वारा, अनभ्युदितम्=नहीं बतलाया गया है, [अपि तु=बल्कि,] येन=जिससे, वाक्=वाणी, अभ्युद्यते=बोली जाती है अर्थात् जिसकी शक्तिसे वक्ता बोलनेमे समर्थ होता है, तत्=उसको, एव=ही, त्वम्=तू, ब्रह्म=ब्रह्म, विद्धि= जान, इदम् यत्=वाणीके द्वारा बतानेमे आनेवाले जिस तत्त्वकी, उपासते=(लोग) उपासना करते हैं, इदम्=यह, न=ब्रह्म नहीं है ४ व्याख्या--वाणीके द्वारा जो कुछ भी व्यक्त किया जा सकता है तथा प्राकृत वाणीसे बतलाये हुए जिस तत्त्वकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है। ब्रह्मतत्त्व वाणीसे सर्वथा अतीत है। उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जिसकी शक्तिके किसी अगसे वाणीमें प्रकाशित होनेकी—बोलनेकी शक्ति आयी है, जो वाणीका भी ज्ञाता, प्रेरक और प्रवर्तक है, वह ब्रह्म है। इस मन्त्रमें 'जिसकी प्रेरणासे वाणी बोली जाती है, वह कौन है ?' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है ॥ ४ ॥ यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ५ ॥ यत्=जिसको, (कोई भी) मनसा=मनसे (अन्तःकरणकेद्वारा ), न=नहीं, मनुते=समझ सकता, [अपि तु=बल्कि,] येन=जिससे, मनः=मन, मतम्=( मनुष्यका ) जाना हुआ हो जाता है, आहुः=ऐसा कहते हैं, तत्=उसको, एव=ही, त्वम्=तू, ब्रह्म=ब्रह्म, विद्धि=जान, इदम् यत्=मन और बुद्धिके द्वारा जाननेमें आनेवाले जिस तत्त्वकी, उपासते= ( लोग ) उपासना करते हैं, इदम्=यह, न=ब्रह्म नहीं है ॥ ५ ॥ व्याख्या-बुद्धि और मनका जो कुछ भी विषय है, जो इनके द्वारा जाननेमे आ सकता है तथा प्राकृत मन-बुद्धिसे जाने हुए जिस तत्त्वकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है। परब्रह्म परमेश्वर मन और बुद्धिसे सर्वथा अतीत है। उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जो मन-बुद्धिका ज्ञाता, उनमें मनन और निश्चय करनेकी शक्ति देनेवाला तथा मनन और निश्चय करनेमें नियुक्त करनेवाला है तथा जिसकी शक्तिके किसी अगसे बुद्धिमें निश्चय करनेकी सामर्थ्य और मनमें मनन करनेकी सामर्थ्य आयी है, वह ब्रह्म है। इस मन्त्रसे 'जिसकी शक्ति और प्रेरणाको पाकर मन अपने ज्ञेय पदार्थोंको जानता है, वह कौन है?' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है ॥ ५ ॥ यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ६ ॥ यत्=जिसको (कोई भी); चक्षुषा=चक्षुके द्वारा, न=नहीं, पश्यति=देख सकता, [अपि तु=बल्कि, ] येन=जिससे; चक्षूंषि=चक्षु, (अपने विषयोंको ) पश्यति=देखता है, तत्=उसको, एव=ही; त्वम्=तू, ब्रह्म=ब्रह्म, विद्धि=जान; इदम् यत्=चक्षुके द्वारा देखनेमें आनेवाले जिस दृश्यवर्गकी, उपासते=( लोग ) उपासना करते हैं, इदम्=यह; न=ब्रह्म नहीं है ॥ ६ ॥ व्याख्या-चक्षुका जो कुछ भी विषय है, जो इसके द्वारा देखने-जाननेमें आ सकता है तथा प्राकृत आँखोंसे देखे जानेवाले जिस पदार्थसमूहकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक रूप नहीं है। परब्रह्म परमेश्वर चक्षु आदि इन्द्रियोंसे सर्वथा अतीत है । उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जिसकी शक्ति और प्रेरणासे चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने विषयको प्रत्यक्ष करनेमें समर्थ होती हैं, जो इनको जाननेवाला और इन्हें अपने विषयोंको जाननेमें प्रवृत्त करनेवाला
- केनोपनिषद् * १७५ है तथा जिसकी शक्तिके किसी अंशका यह प्रभाव है, वह ब्रह्म है। इस मन्त्रमें 'जिसकी शक्ति और प्रेरणासे चक्षु अपने विषयोंको देखता है, वह कौन है ?' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है ॥ ६ ॥ यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ७ ॥ यत्=जिसको ( कोई भी ), श्रोत्रेण=श्रोत्रके द्वारा, न=नहीं, शृणोति=सुन सकता, [ अपि तु=बल्कि, ] येन=जिससे, इदम्=यह; श्रोत्रम्=श्रोत्र-इन्द्रिय; श्रुतम्=सुनी हुई है, तत्=उसको, एव=ही, त्वम्=तू, ब्रह्म=ब्रह्म, विद्धि=जान, इदम् यत्=श्रोत्र-इन्द्रियके द्वारा जाननेमें आनेवाले जिस तत्त्वकी; उपासते=( लोग ) उपासना करते हैं; इदम्=यह; न=ब्रह्म नहीं है ॥ ७ ॥ व्याख्या—जो कुछ भी सुननेमें आनेवाला पदार्थ है तथा प्राकृत कानोंसे सुने जानेवाले जिस वस्तु-समुदायकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है । परब्रह्म परमेश्वर श्रोत्रेन्द्रियसे सर्वथा अतीत है । उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जो श्रोत्र-इन्द्रियका ज्ञाता, प्रेरक और उसमें सुननेकी शक्ति देनेवाला है तथा जिसकी शक्तिके किसी अंशसे श्रोत्र-इन्द्रियमें शब्दको ग्रहण करनेकी सामर्थ्य आयी है, वह ब्रह्म है। इस मन्त्रमें 'जिसकी शक्ति और प्रेरणासे श्रोत्र अपने विषयोंको सुननेमें प्रवृत्त होता है, वह कौन है ?' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है ॥ ७ ॥ यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ८ ॥ यत्=जो, प्राणेन=प्राणके द्वारा, न प्राणिति=चेष्टायुक्त नहीं होता, [ अपि तु=बल्कि, ] येन=जिससे, प्राणः=प्राण; प्रणीयते=चेष्टायुक्त होता है, तत्=उसको, एव=ही, त्वम्=तू, ब्रह्म=ब्रह्म, विद्धि=जान, इदम् यत्=प्राणोंकी शक्तिसे चेष्टायुक्त दीखनेवाले जिन तत्त्वोंकी, उपासते=( लोग ) उपासना करते हैं, इदम्=ये, न=ब्रह्म नहीं हैं ॥ ८ ॥ व्याख्या—प्राणके द्वारा जो कुछ भी चेष्टायुक्त की जानेवाली वस्तु है, तथा प्राकृत प्राणोंसे अनुप्राणित जिस तत्त्वकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है । परब्रह्म परमेश्वर उनसे सर्वथा अतीत है । उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जो प्राणका ज्ञाता, प्रेरक और उसमें शक्ति देनेवाला है, जिसकी शक्तिके किसी अंशको प्राप्त करके और जिसकी प्रेरणासे यह प्रधान प्राण सबको चेष्टायुक्त करनेमें समर्थ होता है, वही सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ब्रह्म है । इस मन्त्रमें 'जिसकी प्रेरणासे प्राण विचरता है, वह कौन है ?' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है । सारांश यह कि प्राकृत मन, प्राण तथा इन्द्रियोंसे जिन विषयोंकी उपलब्धि होती है, वे सभी प्राकृत होते हैं; अतएव उनको परब्रह्म परमेश्वर परात्पर पुरुषोत्तमका वास्तविक स्वरूप नहीं माना जा सकता । इसलिये उनकी उपासना भी परब्रह्म परमेश्वरकी उपासना नहीं है । परब्रह्म परमेश्वरके मन-बुद्धि आदिसे अतीत स्वरूपको साङ्केतिक भाषामें समझानेके लिये ही यहाँ गुरुने इन सबके ज्ञाता, शक्तिप्रदाता, स्वामी, प्रेरक, प्रवर्तक, सर्वशक्तिमान्, नित्य, अप्राकृत परम तत्त्वको ब्रह्म बतलाया है ॥ ८ ॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥ द्वितीय खण्ड यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम् । यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमाꣳस्यमेव ते मन्ये विदितम् ॥ १ ॥ 'यदि=यदि, त्वम्=तू, इति=यह, मन्यसे=मानता है (कि), सुवेद=(मैं ब्रह्मको) भलीभाँति जान गया हूँ; अपि=तो, नूनम्=निश्चय ही, ब्रह्मणः=ब्रह्मका, रूपम्=स्वरूप, दभ्रम्=थोड़ा-सा, एव=ही, (तू) वेत्थ=जानता है; (क्योंकि) अस्य=इस (परब्रह्म परमेश्वर) का, यत्=जो (आंशिक) स्वरूप, त्वम्=तू है, (और) अस्य=इसका, यत्=जो (आंशिक) स्वरूप, देवेषु=देवताओंमें है, [ तत् अल्पम् एव=वह सब मिलकर भी अल्प ही है, ] अथ नु=इसीलिये, मन्ये=मैं मानता हूँ कि; ते विदितम्=तेरा जाना हुआ, (स्वरूप) मीमांस्यम् एव=निस्सन्देह विचारणीय है ॥ १ ॥
१७६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या—इस मन्त्रमें गुरु अपने शिष्यको सावधान करते हुए कहते हे कि 'हमारे द्वारा संकेतसे बतलाये हुए ब्रह्मतत्त्वको सुनकर यदि तू ऐसा मानता है कि मैं उस ब्रह्मको भलीभाँति जान गया हूँ तो यह निश्चित है कि तूने ब्रह्मके स्वरूपको बहुत थोड़ा जाना है, क्योंकि उस परब्रह्मका अंगभूत जो जीवात्मा है, उसीको, अथवा समस्त देवताओंमें—यानी मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय आदिमें जो ब्रह्मका अंश है, जिससे वे अपना काम करनेमे समर्थ हो रहे हे, उसको यदि तू ब्रह्म समझता है तो तेरा यह समझना यथार्थ नहीं है। ब्रह्म इतना ही नहीं है। इस जीवात्माको और समस्त विश्व ब्रह्माण्डमे व्याप्त जो ब्रह्म- की शक्ति है, उस सबको मिलाकर भी देखा जाय तो वह ब्रह्मका एक अंश ही है। अतएव तेरा समझा हुआ यह ब्रह्मतत्त्व तेरे लिये पुनः विचारणीय है, ऐसा मैं मानता हूँ'॥ १॥ सम्बन्ध—गुरुदेवके उपदेशपर गम्भीरतापूर्वक विचार करनेके अनन्तर शिष्य उनके सामने अपना विचार प्रकट करता है— नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च। यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥ २ ॥ अहम्=मैं, सुवेद=ब्रह्मको भलीभाँति जान गया हूँ, इति न मन्ये=यों नहीं मानता, (और) नो=न, इति=ऐसा (ही मानता हूँ कि), न वेद=नहीं जानता, (क्योंकि) वेद च=जानता भी हूँ, (किन्तु यह जानना विलक्षण है) नः=हम शिष्योंमेंसे, यः=जो कोई भी, तत्=उस ब्रह्मको, वेद=जानता है, तत्=(वही) मेरे उक्त वचनके अभिप्रायको, च=भी; वेद=जानता है, (कि) वेद=मैं जानता हूँ, (और) न वेद=नहीं जानता; इति=ये दोनो ही; नो=नहीं है ॥ २ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें शिष्यने अपने गुरुदेवके प्रति संकेतसे अपना अनुभव इस प्रकार प्रकट किया है कि "उस ब्रह्म- को मैं भलीभाँति जानता हूँ, यह मैं नहीं मानता और न यह ही मानता हूँ कि मै उसे नहीं जानता। क्योकि मैं जानता भी हूँ। तथापि मेरा यह जानना वैसा नहीं है, जैसा कि किसी ज्ञाताका किसी ज्ञेय वस्तुको जानना है। यह उससे सर्वथा विलक्षण और अलौकिक है। इसलिये मैं जो यह कह रहा हूँ कि 'मै उसे नही जानता ऐसा भी नहीं, और जानता हूँ ऐसा भी नहीं, तो भी मैं उसे जानता हूँ।' मेरे इस कथनके रहस्यको हम शिष्योमेंसे वही ठीक समझ सकता है, जो उस ब्रह्मको जानता है” ॥२॥ सम्बन्ध—अब श्रुति स्वय उपर्युक्त गुरु-शिष्य-सवादका निष्कर्ष कहती है— यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः। अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥ ३ ॥ यस्य अमतम्=जिसका यह मानना है कि ब्रह्म जाननेमे नहीं आता, तस्य=उसका, मतम्=(तो वह) जाना हुआ है, (और) यस्य=जिसका, मतम्=यह मानना है कि ब्रह्म मेरा जाना हुआ है, सः=वह, न=नहीं, वेद=जानता, (क्योंकि) विजानताम्=जाननेका अभिमान रखनेवालोंके लिये, अविज्ञातम्=(वह ब्रह्मतत्त्व) विना जाना हुआ है, (और) अविजानताम्=जिनमे ज्ञातपनका अभिमान नहीं है, उनका, विज्ञातम्=(वह ब्रह्मतत्त्व) जाना हुआ है अर्थात् उनके लिये वह अपरोक्ष है ॥ ३॥ व्याख्या—जो महापुरुष परब्रह्म परमेश्वरका साक्षात् कर लेते हैं, उनमे किञ्चिन्मात्र भी ऐसा अभिमान नहीं रह जाता कि हमने परमेश्वरको जान लिया है। वे परमात्माके अनन्त असीम महिमा-महार्णवमे निमग्न हुए यही समझते हैं कि परमात्मा स्वय ही अपनेको जानते हैं। दूसरा कोई भी ऐसा नहीं है, जो उनका पार पा सके। भला, असीमकी सीमा ससीम कहाँ पा सकता है? अतएव जो यह मानता है कि मैंने ब्रह्मको जान लिया है, मे ज्ञानी हूँ, परमेश्वर मेरे ज्ञेय हैं, वह वस्तुत. सर्वथा भ्रममें है। क्योंकि ब्रह्म इस प्रकार ज्ञानका विषय नहीं है। जितने भी ज्ञानके साधन हैं, उनमेंसे एक भी ऐसा नहीं जो ब्रह्मतक पहुँच सके। अतएव इस प्रकारके जाननेवालोंके लिये परमात्मा सदा अज्ञात है, जबतक जाननेका अभिमान रहता है, तबतक परमेश्वरका साक्षात्कार नहीं होता। परमेश्वरका साक्षात्कार उन्हीं भाग्यवान् महापुरुषोको होता है, जिनमे जाननेका अभिमान किञ्चित् भी नहीं रह गया है ॥ ३॥ प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते। आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥ ४ ॥
- केनोपनिषद् * १७७ प्रतिबोधविदितम्=उपर्युक्त प्रतिबोध ( संकेत ) से उत्पन्न ज्ञान ही; मतम्=वास्तविक ज्ञान है, हि=क्योंकि इससे; अमृतत्वम्=अमृतरूप परमात्माको; विन्दते=मनुष्य प्राप्त करता है; आत्मना=अन्तर्यामी परमात्मासे, वीर्यम्=परमात्मा- को जाननेकी शक्ति ( ज्ञान ); विन्दते=प्राप्त करता है; ( और उस ) विद्यया=विद्या-ज्ञानसे, अमृतम्=अमृतरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको; विन्दते=प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ **व्याख्या—**उपर्युक्त वर्णनमे परमात्माके जिस स्वरूपका लक्ष्य कराया गया था, उसको भलीभाँति समझ लेना ही वास्तविक ज्ञान है और इसी ज्ञानसे परमात्माकी प्राप्ति होती है। परमात्माका ज्ञान करानेकी यह जो ज्ञानरूपा शक्ति है, यह मनुष्यको अन्तर्यामी परमात्मासे ही मिलती है। मन्त्रमे 'विद्यासे अमृतरूप परब्रह्मकी प्राप्ति होती है' यह इसीलिये कहा गया है कि जिससे मनुष्यमे परब्रह्म पुरुषोत्तमके यथार्थ स्वरूपको जाननेके लिये रुचि और उत्साहकी वृद्धि हो ॥ ४ ॥ **सम्बन्ध—**अब उस ब्रह्मतत्त्वको इसी जन्ममें जान लेना अत्यन्त प्रयोजनीय है, यह बतलाकर इस प्रकरणका उपसहार किया जाता है— इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः । भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ ५ ॥ चेत्=यदि; इह=इस मनुष्यशरीरमें; अवेदीत्=( परब्रह्मको ) जान लिया, अथ=तब तो, सत्यम्=बहुत कुशल; अस्ति=है; चेत्=यदि, इह=इस शरीरके रहते-रहते; न अवेदीत्=( उसे ) नहीं जान पाया ( तो ), महती=महान्; विनष्टिः=विनाश है, ( यही सोचकर ) धीराः=बुद्धिमान् पुरुष; भूतेषु भूतेषु=प्राणी-प्राणीमें ( प्राणिमात्रमें ); विचित्य=( परब्रह्म पुरुषोत्तमको ) समझकर, अस्मात्=इस; लोकात्=लोकसे; प्रेत्य=प्रयाण करके, अमृताः=अमर ( परमेश्वरको प्राप्त ); भवन्ति=हो जाते हैं ॥ ५ ॥ **व्याख्या—**मानव-जन्म अत्यन्त दुर्लभ है। इसे पाकर जो मनुष्य परमात्माकी प्राप्तिके साधनमें तत्परताके साथ नहीं लग जाता, वह बहुत बड़ी भूल करता है। अतएव श्रुति कहती है कि 'जबतक यह दुर्लभ मानवशरीर विद्यमान है, भगवत्कृपासे प्राप्त साधनसामग्री उपलब्ध है, तभीतक शीघ्र-से शीघ्र परमात्माको जान लिया जाय तो सब प्रकारसे कुशल है— मानव जन्मकी परम सार्थकता है। यदि यह अवसर हाथसे निकल गया तो फिर महान् विनाश हो जायगा—बार-बार मृत्युरूप संसारके प्रवाहमें बहना पड़ेगा। फिर, रो-रोकर पश्चात्ताप करनेके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं रह जायगा। संसारके त्रिविध तापो और विविध शूलोंसे बचनेका यही एक परम साधन है कि जीव मानव-जन्ममे दक्षताके साथ साधनपरायण होकर अपने जीवन- को सदाके लिये सार्थक कर ले। मनुष्यजन्मके सिवा जितनी और योनियाँ हैं, सभीकेवल कर्मोंका फल भोगनेके लिये ही मिलती हैं। उनमें जीव परमात्माको प्राप्त करनेका कोई साधन नहीं कर सकता। बुद्धिमान् पुरुष इस बातको समझ लेते हैं और इसीसे वे प्रत्येक जातिके प्रत्येक प्राणीमें परमात्माका साक्षात्कार करते हुए सदाके लिये जन्म-मृत्युके चक्रसे छूटकर अमर हो जाते हैं ॥५॥ ॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय खण्ड **सम्बन्ध—**प्रथम प्रकरणमं ब्रह्मका स्वरूप-तत्त्व समझानेके लिये उसकी शक्तिका सांकेतिक भाषामें विभिन्न प्रकारसे दिग्दर्शन कराया गया। द्वितीय प्रकरणमें ब्रह्मज्ञानकी विलक्षणता बतलानेके लिये यह कहा गया कि प्रथम प्रकरणके वर्णनसे आपाततः ब्रह्मका जैसा स्वरूप समझमें आता है, वस्तुतः उसका पूर्णस्वरूप वही नहीं है। वह तो उसकी महिमाका अशमात्र है। जीवात्मा, मन, प्राण, इन्द्रियादि तथा उनके देवता—सभी उसीसे अनुप्राणित, प्रेरित और शक्तिमान् होकर कार्यक्षम होते हैं। अब इस तीसरे प्रकरणमें दृष्टान्तके द्वारा यह समझाया जाता है कि विश्वमें जो कोई भी प्राणी या पदार्थ शक्तिमान्, सुन्दर और प्रिय प्रतीत होते हैं, उनके जीवनमें जो सफलता दीखती है, वह सभी उस परब्रह्म परमेश्वरके एक अशकी ही महिमा है ( गीता १० । ४१ )। इनपर यदि कोई अभिमान करता है तो वह बहुत बड़ी भूल करता है— ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह विजये देवा अमहीयन्त त ऐक्षन्तास्माकमेवाय विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति ॥ १ ॥ उ० अं० २३—
१७८ ॐ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॐ ब्रह्म=परब्रह्म परमेश्वरने, ह=ही, देवेभ्यः=देवताओंके लिये (उनको निमित्त बनाकर); विजिग्ये=(असुरोंपर) विजय प्राप्त की, ह=किन्तु; तस्य=उस, ब्रह्मणः=परब्रह्म पुरुषोत्तमकी, विजये=विजयमें; देवाः=इन्द्रादि देवताओंने, अमहीयन्त= अपनेमे महत्त्वका अभिमान कर लिया, ते=वे, इति=ऐसा; ऐक्षन्त=समझने लगे (कि), अयम्=यह; अस्माकम् एव= हमारी ही, विजयः=विजय है, (और) अयम्=यह, अस्माकम् एव=हमारी ही; महिमा=महिमा है ॥ १ ॥ व्याख्या-परब्रह्म पुरुषोत्तमने देवोंपर कृपा करके उन्हें शक्ति प्रदान की, जिससे उन्होंने असुरोंपर विजय प्राप्त कर ली। यह विजय वस्तुतः भगवान्की ही थी, देवता तो केवल निमित्तमात्र थे, परंतु इस ओर देवताओंका ध्यान नहीं गया और वे भगवान्की कृपाकी ओर लक्ष्य न करके भगवान्की महिमाको अपनी महिमा समझ बैठे और अभिमानवश यह मानने लगे कि हम बड़े भारी शक्तिशाली हैं एवं हमने अपने ही बल-पौरुषसे असुरोंको पराजित किया है ॥ १ ॥ तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानत किमिदं यक्षमिति ॥ २ ॥ ह तत्=प्रसिद्ध है कि उस परब्रह्मने, एषाम्=इन देवताओंके; (अभिमानको) विजज्ञौ=जान लिया (और कृपा पूर्वक उनका अभिमान नष्ट करनेके लिये वह); तेभ्यः=उनके सामने, ह=ही, प्रादुर्बभूव=साकाररूपमे प्रकट हो गयाः तत्=उसको (यक्षरूपमे प्रकट हुआ देखकर भी), इदम्=यह, यक्षम्=दिव्य यक्ष, किम् इति=कौन है, इस बातको, न व्यजानत=(देवताओंने) नहीं जाना ॥ २ ॥ व्याख्या-देवताओंके मिथ्याभिमानको करुणावरुणालय भगवान् समझ गये। भक्त-कल्याणकारी भगवान्ने सोचा कि यह अभिमान बना रहा तो इनका पतन हो जायगा। भक्त सुहृद् भगवान् भक्तोंका पतन कैसे सह सकते थे। अतः देवताओं- पर कृपा करके उनका दर्प चूर्ण करनेके लिये वे उनके सामने दिव्य साकार यक्षरूपमे प्रकट हो गये। देवता आश्चर्यचकित होकर उस अत्यन्त अद्भुत विशाल रूपको देखने और विचार करने लगे कि यह दिव्य यक्ष कौन है, पर वे उसको पहचान नहीं सके ॥ २ ॥ तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेद एतद्विजानीहि किमिदं यक्षमिति तथेति ॥ ३ ॥ ते=उन इन्द्रादि देवताओंने, अग्निम्=अग्निदेवसे, इति=इस प्रकार; अब्रुवन्=कहा, जातवेदः=हे जातवेदा; (आप जाकर) एतत्=इस बातको, विजानीहि=जानिये-इसका भलीभाँति पता लगाइये (कि), इदम् यक्षम्=यह दिव्य यक्ष, किम् इति=कौन है; (अग्निने कहा) तथा इति=बहुत अच्छा ॥ ३ ॥ व्याख्या-देवता उस अति विचित्र महाकाय दिव्य यक्षको देखकर मन ही-मन सहम से गये और उसका परिचय जाननेके लिये व्यग्र हो उठे। अग्निदेवता परम तेजस्वी है, वेदार्थके ज्ञाता हैं, समस्त जातपदार्थोंका पता रखते हैं और सर्वज्ञ से हैं। इसीसे उनका गौरवयुक्त नाम 'जातवेदा' है। देवताओंने इस कार्यके लिये अग्निको ही उपयुक्त समझा और उन्होंने कहा-'हे जातवेदा ! आप जाकर इस यक्षका पूरा पता लगाइये कि यह कौन है।' अग्निदेवताको अपनी बुद्धि-शक्तिका गर्व था। अतः उन्होंने कहा-'अच्छी बात है, अभी पता लगाता हूँ' ॥ ३ ॥ तदभ्यद्रवत् तमभ्यवदत् कोऽसीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्यब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति ॥ ४ ॥ तत्=उसके समीप; (अग्निदेव) अभ्यद्रवत्=दौडकर गया; तम्=उस अग्निदेवसे; अभ्यवदत्=(उस दिव्य यक्षने) पूछा, कः असि इति=(कि तुम) कौन हो, अब्रवीत्=(अग्निने) यह कहा (कि), अहम्=मैं; वै अग्निः=प्रसिद्ध अग्निदेव. अस्मि इति=हूँ, (और यह कि) अहम् वै=मै ही, जातवेदाः=जातवेदाके नामसे; अस्मि इति=प्रसिद्ध हूँ ॥ ४॥ व्याख्या-अग्निदेवताने सोचा, इसमें कौन बड़ी बात है; और इसलिये वे तुरत यक्षके समीप जा पहुँचे। उन्हे अपने समीप खड़ा देखकर यक्षने पूछा-आप कौन है? अग्निने सोचा-मेरे तेजःपुञ्ज स्वरूपको सभी पहचानते हैं, इसने कैसे नहीं जाना; अतः उन्होंने तमककर उत्तर दिया-'मैं प्रसिद्ध अग्नि हूँ, मेरा ही गौरवमय और रहस्यपूर्ण नाम जातवेदा है' ॥४॥ सम्बन्ध-तब यक्षरूपी ब्रह्मने अग्निसे पूछा- तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमिति । अपीदं सर्वं दहेयम्, यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ५ ॥
कल्याण देवताओंके सामने यक्षका ग अग्निकी असमर्थता
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- केनोपनिषद् * १७९ तस्मिन् त्वयि=उक्त नामोंवाले तुझ अग्निमें; किं वीर्यम्=क्या सामर्थ्य है; इति=यह बता; (तब अग्निने यह उत्तर दिया कि) अपि=यदि (मैं चाहूँ तो); पृथिव्याम्=पृथ्वीमें; यत् इदम्=यह जो कुछ भी है, इदम् सर्वम्=इस सबको, दहेयम् इति=जलाकर भस्म कर दूँ ॥ ५ ॥ व्याख्या—अग्निकी गर्वोक्ति सुनकर ब्रह्मने अनजानकी भाँति कहा—'अच्छा ! आप अग्निदेवता हैं और जातवेदा— मन्त्रका ज्ञान रखनेवाले भी आप ही हैं ? बड़ी अच्छी बात है; पर यह तो बताइये कि आपमें क्या शक्ति है, आप क्या कर सकते हैं।' इसपर अग्निने पुनः सगर्व उत्तर दिया—'मैं क्या कर सकता हूँ, इसे आप जानना चाहते हैं? अरे, मैं चाहूँ तो इस मारे भूमण्डलमें जो कुछ भी देखनेमे आ रहा है, सबको जलाकर अभी राखका ढेर कर दूँ' ॥ ५ ॥ तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते, नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥ ६ ॥ (तब उस दिव्य यक्षने); तस्मै=उस अग्निदेवके सामने; तृणम्=एक तिनका; निदधौ=रख दिया, (और यह कहा कि) एतत्=इस तिनकेको; दह इति=जला दो; सः=वह (अग्नि); सर्वजवेन=पूर्ण शक्ति लगाकर; तत् उपप्रेयाय=उस तिनकेपर टूट पड़ा (परंतु), तत्=उसको; दग्धुम्=जलानेमें; न एव शशाक=किसी प्रकार समर्थ नहीं हुआ, ततः=(तब लज्जित होकर) वहाँसे; निववृते=लौट गया (और देवताओंसे बोला); पतत्=यह; विज्ञातुम्=जाननेमें; न अशकम्= मैं समर्थ नहीं हो सका (कि वस्तुतः); पतत्=यह; यक्षम्=दिव्य यक्ष; यत् इति=कौन है ॥ ६ ॥ व्याख्या—अग्निदेवताकी पुनः गर्वोक्ति सुनकर सबको सत्ता-शक्ति देनेवाले यक्षरूपी परब्रह्म परमेश्वरने उनके आगे एक सूखा तिनका डालकर कहा—'आप तो सभीको जला सकते हैं, तनिक-सा बल लगाकर इस सूखे तृणको जला दीजिये।' अग्निदेवताने मानो इसको अपना अपमान समझा और वे सहज ही उस तृणके पास पहुँचे । जलाना चाहा, जब नहीं जला तो उन्होंने उसे जलानेके लिये अपनी पूरी शक्ति लगा दी। पर उसको तनिक-सी आँच भी नहीं लगी । आँच लगती कैसे । अग्निमे जो अग्नित्व है—दाहिका शक्ति है, वह तो शक्तिके मूल भडार परमात्मासे ही मिली हुई है। वे यदि उस शक्ति- स्रोतको रोक दें तो फिर शक्ति कहाँसे आयेगी । अग्निदेव इस बातको न समझकर ही डींग हाँक रहे थे। पर जब ब्रह्मने अपनी शक्तिको रोक लिया, सूखा तिनका नहीं जल सका, तब तो उनका सिर लज्जासे झुक गया और वे हतप्रतिज्ञ और हतप्रभ होकर चुपचाप देवताओंके पास लौट आये और बोले कि 'मै तो भलीभाँति नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन है' ॥ ६ ॥ अथ वायुमब्रुवन् वायवेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति तथेति ॥ ७ ॥ अथ=तब, वायुम्=वायुदेवतासे, अब्रुवन्=(देवताओँने) कहा; वायो=हे वायुदेव ! (जाकर); पतत्=इस बातको, विजानीहि=आप जानिये—इसका भलीभांति पता लगाइये (कि); एतत्=यह, यक्षम्=दिव्य यक्ष, किम् इति= कौन है; (वायुने कहा) तथा इति=बहुत अच्छा । ॥ ७ ॥ व्याख्या—जब अग्निदेव असफल होकर लौट आये, तब देवताओंने इस कार्यके लिये अप्रतिमशक्ति वायुदेवको चुना और उनसे कहा कि 'वायुदेव ! आप जाकर इस यक्षका पूरा पता लगाइये कि यह कौन है।' वायुदेवको भी अपनी बुद्धि-शक्तिका गर्व था; अतः उन्होंने भी कहा—'अच्छी बात है; अभी पता लगाता हूँ' ॥ ७ ॥ तदभ्यद्रवत् तमभ्यवदत् कोऽसीति । वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥८॥ तत्=उसके समीप; अभ्यद्रवत्=(वायुदेवता) दौड़कर गया, तम्=उससे (भी); अभ्यवदत्=(उस दिव्य यक्षने) पूछा, कः असि इति=(कितुम) कौन हो, अब्रवीत्=(तब वायुने) यह कहा (कि), अहम्=मै, वै वायुः=प्रसिद्ध वायुदेव, अस्मि इति=हूँ; (और यह कि) अहम् वै=म ही, मातरिश्वा=मातरिश्वाके नामसे; अस्मि इति=प्रसिद्ध हूँ॥ ८ ॥ व्याख्या—वायुदेवताने सोचा, 'अग्नि कहीं भूल कर गये होंगे, नही तो यक्षका परिचय जानना कौन बड़ी बात थी । अस्तु, इस सफलताका श्रेय मुझको ही मिलेगा।' यह सोचकर वे तुरंत यक्षके समीप जा पहुँचे । उन्हें अपने समीप
१८० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * खड़ा देखकर यक्षने पूछा—'आप कौन हैं?' वायुने भी अपने गुण गौरवके गर्वसे तमककर उत्तर दिया 'मै प्रसिद्ध वायु हूँ, मेरा ही गौरवमय और रहस्यपूर्ण नाम मातरिश्वा है' ॥ ८ ॥ सम्बन्ध—यक्षरूपी ब्रह्मने वायुसे पूछा— तस्मिँ२स्त्वयि किं वीर्यमिति ? अपीदँ२ सर्वमाददीयम्, यदिदं पृथिव्यामिति ॥९॥ तस्मिन् त्वयि = उक्त नामोंवाले तुझ वायुमे; किं वीर्यम् = क्या सामर्थ्य है; इति = यह बता; (तत्र वायुने यह उत्तर दिया कि ) अपि = यदि ( मैं चाहूँ तो), पृथिव्याम् = पृथ्वीमें, यत् इदम् = यह जो कुछ भी है; इदम् सर्वम् = इस सबको; आददीयम् इति = उठा लूँ-आकाशमें उड़ा दूँ ॥ ९ ॥ व्याख्या—वायुकी भी वैसी ही गर्वोक्ति सुनकर ब्रह्मने इनसे भी वैसे ही अनजानकी भाँति कहा—'अच्छा ! आप वायुदेवता हैं और मातरिश्वा—अन्तरिक्षमें विना ही आधारके विचरण करनेवाले भी आप ही हैं ! बड़ी अच्छी बात है ! पर यह तो बताइये कि आपमें क्या शक्ति है—आप क्या कर सकते हैं ?' इसपर वायुने भी अग्निकी भाँति ही पुन. सगर्व उत्तर दिया कि 'मैं चाहूँ तो इस सारे भूमण्डलमें जो कुछ भी देखनेमें आ रहा है, सबको बिना आधारके उठा लूँ— उड़ा दूँ' ॥ ९ ॥ तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाकादातुं स तत एव निववृते, नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद् यक्षमिति ॥ १० ॥ तस्मै = (तब उस दिव्य यक्षने ) उस वायुदेवके सामने, तृणम् = एक तिनका; निदधौ = रख दिया, ( और यह कहा कि) एतत् = इस तिनकेको; आदत्स्व इति = उठा लो-उड़ा दो; सः = वह ( वायु ); सर्वजवेन = पूर्ण शक्ति लगाकर; तत् उपप्रेयाय = उस तिनकेपर झपटा (परन्तु); तत् = उसको, आदातुम् = उड़ानेमे, न एव शशाक = किसी प्रकार भी समर्थ नहीं हुआ, ततः = ( तब लज्जित होकर ) वहाँसे, निववृते = लौट गया (और देवताओंसे बोला), एतत् = यह; विज्ञातुम् = जाननेमें, न अशकम् = मैं समर्थ नहीं हो सका ( कि वस्तुतः); एतत् = यह, यक्षम् = दिव्य यक्ष, यत् इति = कौन है ॥ १० ॥ व्याख्या—वायुदेवताकी भी पुन: वैसी ही गर्वोक्ति सुनकर सबको सत्ता-शक्ति देनेवाले परब्रह्म परमेश्वरने उनके आगे भी एक सूखा तिनका डालकर कहा—'आप तो सभीको उड़ा सकते हैं, तनिक-सा बल लगाकर इस सूखे तृणको उड़ा दीजिये ।' वायुदेवताने भी मानो इसको अपना अपमान समझा और वे सहज ही उस तृणके पास पहुँचे, उसे उड़ाना चाहा, जब नहीं उड़ा तो उन्होंने अपनी पूरी शक्ति लगा दी । परन्तु शक्तिमान् परमात्माके द्वारा शक्ति रोक लिये जानेके कारण वे उसे तनिक-सा हिला भी नहीं सके और अग्निकी ही भाँति हतप्रतिष्ठ और हतप्रभ होकर लज्जासे सिर झुकाये वहाँसे लौट आये एव देवताओंसे बोले कि 'मैं तो भलीभाँति नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन है ।' ॥ १० ॥ अथेन्द्रमब्रुवन् मघवन्नेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति । तथेति । तदभ्यद्रवत् । तस्मात् तिरोदधे ॥ ११ ॥ अथ = तदनन्तर, इन्द्रम् = इन्द्रसे; अब्रुवन् = (देवताओंने) यह कहा; मघवन् = हे इन्द्रदेव; एतत् = इस बातको; विजानीहि = आप जानिये—भलीभाँति पता लगाइये (कि); एतत् = यह; यक्षम् = दिव्य यक्ष; किम् इति = कौन है; (तब इन्द्रने यह कहा ) तथा इति = बहुत अच्छा, तत् अभ्यद्रवत् = (और वे ) उस यक्षकी ओर दौड़कर गये (परन्तु वह दिव्य यक्ष ), तस्मात् = उनके सामनेसे, तिरोदधे = अन्तर्धान हो गया ॥ ११ ॥ व्याख्या—जब अग्नि और वायु-सरीखे अप्रतिम शक्ति और बुद्धिसम्पन्न देवता असफल होकर लौट आये और उन्होंने कोई कारण भी नहीं बताया, तब देवताओंने विचार करके स्वय देवराज इन्द्रको इस कार्यके लिये चुना और उन्होंने कहा—'हे महान् बलशाली देवराज ! अब आप ही जाकर पूरा पता लगाइये कि यह यक्ष कौन है । आपके सिवा अन्य किसीसे इस काममे सफल होनेकी सम्भावना नही है ।' इन्द्र 'बहुत अच्छा' कहकर तुरत यक्षके पास गये, पर उनके वहाँ पहुँचते ही वह उनके सामनेसे अन्तर्धान हो गया । इन्द्रमे इन देवताओंसे अधिक अभिमान था; इसलिये ब्रह्मने उनको