भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 193
  • केनोपनिषद् * १७७ प्रतिबोधविदितम्=उपर्युक्त प्रतिबोध ( संकेत ) से उत्पन्न ज्ञान ही; मतम्=वास्तविक ज्ञान है, हि=क्योंकि इससे; अमृतत्वम्=अमृतरूप परमात्माको; विन्दते=मनुष्य प्राप्त करता है; आत्मना=अन्तर्यामी परमात्मासे, वीर्यम्=परमात्मा- को जाननेकी शक्ति ( ज्ञान ); विन्दते=प्राप्त करता है; ( और उस ) विद्यया=विद्या-ज्ञानसे, अमृतम्=अमृतरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको; विन्दते=प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ **व्याख्या—**उपर्युक्त वर्णनमे परमात्माके जिस स्वरूपका लक्ष्य कराया गया था, उसको भलीभाँति समझ लेना ही वास्तविक ज्ञान है और इसी ज्ञानसे परमात्माकी प्राप्ति होती है। परमात्माका ज्ञान करानेकी यह जो ज्ञानरूपा शक्ति है, यह मनुष्यको अन्तर्यामी परमात्मासे ही मिलती है। मन्त्रमे 'विद्यासे अमृतरूप परब्रह्मकी प्राप्ति होती है' यह इसीलिये कहा गया है कि जिससे मनुष्यमे परब्रह्म पुरुषोत्तमके यथार्थ स्वरूपको जाननेके लिये रुचि और उत्साहकी वृद्धि हो ॥ ४ ॥ **सम्बन्ध—**अब उस ब्रह्मतत्त्वको इसी जन्ममें जान लेना अत्यन्त प्रयोजनीय है, यह बतलाकर इस प्रकरणका उपसहार किया जाता है— इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः । भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ ५ ॥ चेत्=यदि; इह=इस मनुष्यशरीरमें; अवेदीत्=( परब्रह्मको ) जान लिया, अथ=तब तो, सत्यम्=बहुत कुशल; अस्ति=है; चेत्=यदि, इह=इस शरीरके रहते-रहते; न अवेदीत्=( उसे ) नहीं जान पाया ( तो ), महती=महान्; विनष्टिः=विनाश है, ( यही सोचकर ) धीराः=बुद्धिमान् पुरुष; भूतेषु भूतेषु=प्राणी-प्राणीमें ( प्राणिमात्रमें ); विचित्य=( परब्रह्म पुरुषोत्तमको ) समझकर, अस्मात्=इस; लोकात्=लोकसे; प्रेत्य=प्रयाण करके, अमृताः=अमर ( परमेश्वरको प्राप्त ); भवन्ति=हो जाते हैं ॥ ५ ॥ **व्याख्या—**मानव-जन्म अत्यन्त दुर्लभ है। इसे पाकर जो मनुष्य परमात्माकी प्राप्तिके साधनमें तत्परताके साथ नहीं लग जाता, वह बहुत बड़ी भूल करता है। अतएव श्रुति कहती है कि 'जबतक यह दुर्लभ मानवशरीर विद्यमान है, भगवत्कृपासे प्राप्त साधनसामग्री उपलब्ध है, तभीतक शीघ्र-से शीघ्र परमात्माको जान लिया जाय तो सब प्रकारसे कुशल है— मानव जन्मकी परम सार्थकता है। यदि यह अवसर हाथसे निकल गया तो फिर महान् विनाश हो जायगा—बार-बार मृत्युरूप संसारके प्रवाहमें बहना पड़ेगा। फिर, रो-रोकर पश्चात्ताप करनेके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं रह जायगा। संसारके त्रिविध तापो और विविध शूलोंसे बचनेका यही एक परम साधन है कि जीव मानव-जन्ममे दक्षताके साथ साधनपरायण होकर अपने जीवन- को सदाके लिये सार्थक कर ले। मनुष्यजन्मके सिवा जितनी और योनियाँ हैं, सभीकेवल कर्मोंका फल भोगनेके लिये ही मिलती हैं। उनमें जीव परमात्माको प्राप्त करनेका कोई साधन नहीं कर सकता। बुद्धिमान् पुरुष इस बातको समझ लेते हैं और इसीसे वे प्रत्येक जातिके प्रत्येक प्राणीमें परमात्माका साक्षात्कार करते हुए सदाके लिये जन्म-मृत्युके चक्रसे छूटकर अमर हो जाते हैं ॥५॥ ॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय खण्ड **सम्बन्ध—**प्रथम प्रकरणमं ब्रह्मका स्वरूप-तत्त्व समझानेके लिये उसकी शक्तिका सांकेतिक भाषामें विभिन्न प्रकारसे दिग्दर्शन कराया गया। द्वितीय प्रकरणमें ब्रह्मज्ञानकी विलक्षणता बतलानेके लिये यह कहा गया कि प्रथम प्रकरणके वर्णनसे आपाततः ब्रह्मका जैसा स्वरूप समझमें आता है, वस्तुतः उसका पूर्णस्वरूप वही नहीं है। वह तो उसकी महिमाका अशमात्र है। जीवात्मा, मन, प्राण, इन्द्रियादि तथा उनके देवता—सभी उसीसे अनुप्राणित, प्रेरित और शक्तिमान् होकर कार्यक्षम होते हैं। अब इस तीसरे प्रकरणमें दृष्टान्तके द्वारा यह समझाया जाता है कि विश्वमें जो कोई भी प्राणी या पदार्थ शक्तिमान्, सुन्दर और प्रिय प्रतीत होते हैं, उनके जीवनमें जो सफलता दीखती है, वह सभी उस परब्रह्म परमेश्वरके एक अशकी ही महिमा है ( गीता १० । ४१ )। इनपर यदि कोई अभिमान करता है तो वह बहुत बड़ी भूल करता है— ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह विजये देवा अमहीयन्त त ऐक्षन्तास्माकमेवाय विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति ॥ १ ॥ उ० अं० २३—