भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 192, कुल 832 में से

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पृष्ठ 192

१७६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या—इस मन्त्रमें गुरु अपने शिष्यको सावधान करते हुए कहते हे कि 'हमारे द्वारा संकेतसे बतलाये हुए ब्रह्मतत्त्वको सुनकर यदि तू ऐसा मानता है कि मैं उस ब्रह्मको भलीभाँति जान गया हूँ तो यह निश्चित है कि तूने ब्रह्मके स्वरूपको बहुत थोड़ा जाना है, क्योंकि उस परब्रह्मका अंगभूत जो जीवात्मा है, उसीको, अथवा समस्त देवताओंमें—यानी मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय आदिमें जो ब्रह्मका अंश है, जिससे वे अपना काम करनेमे समर्थ हो रहे हे, उसको यदि तू ब्रह्म समझता है तो तेरा यह समझना यथार्थ नहीं है। ब्रह्म इतना ही नहीं है। इस जीवात्माको और समस्त विश्व ब्रह्माण्डमे व्याप्त जो ब्रह्म- की शक्ति है, उस सबको मिलाकर भी देखा जाय तो वह ब्रह्मका एक अंश ही है। अतएव तेरा समझा हुआ यह ब्रह्मतत्त्व तेरे लिये पुनः विचारणीय है, ऐसा मैं मानता हूँ'॥ १॥ सम्बन्ध—गुरुदेवके उपदेशपर गम्भीरतापूर्वक विचार करनेके अनन्तर शिष्य उनके सामने अपना विचार प्रकट करता है— नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च। यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥ २ ॥ अहम्=मैं, सुवेद=ब्रह्मको भलीभाँति जान गया हूँ, इति न मन्ये=यों नहीं मानता, (और) नो=न, इति=ऐसा (ही मानता हूँ कि), न वेद=नहीं जानता, (क्योंकि) वेद च=जानता भी हूँ, (किन्तु यह जानना विलक्षण है) नः=हम शिष्योंमेंसे, यः=जो कोई भी, तत्=उस ब्रह्मको, वेद=जानता है, तत्=(वही) मेरे उक्त वचनके अभिप्रायको, च=भी; वेद=जानता है, (कि) वेद=मैं जानता हूँ, (और) न वेद=नहीं जानता; इति=ये दोनो ही; नो=नहीं है ॥ २ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें शिष्यने अपने गुरुदेवके प्रति संकेतसे अपना अनुभव इस प्रकार प्रकट किया है कि "उस ब्रह्म- को मैं भलीभाँति जानता हूँ, यह मैं नहीं मानता और न यह ही मानता हूँ कि मै उसे नहीं जानता। क्योकि मैं जानता भी हूँ। तथापि मेरा यह जानना वैसा नहीं है, जैसा कि किसी ज्ञाताका किसी ज्ञेय वस्तुको जानना है। यह उससे सर्वथा विलक्षण और अलौकिक है। इसलिये मैं जो यह कह रहा हूँ कि 'मै उसे नही जानता ऐसा भी नहीं, और जानता हूँ ऐसा भी नहीं, तो भी मैं उसे जानता हूँ।' मेरे इस कथनके रहस्यको हम शिष्योमेंसे वही ठीक समझ सकता है, जो उस ब्रह्मको जानता है” ॥२॥ सम्बन्ध—अब श्रुति स्वय उपर्युक्त गुरु-शिष्य-सवादका निष्कर्ष कहती है— यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः। अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥ ३ ॥ यस्य अमतम्=जिसका यह मानना है कि ब्रह्म जाननेमे नहीं आता, तस्य=उसका, मतम्=(तो वह) जाना हुआ है, (और) यस्य=जिसका, मतम्=यह मानना है कि ब्रह्म मेरा जाना हुआ है, सः=वह, न=नहीं, वेद=जानता, (क्योंकि) विजानताम्=जाननेका अभिमान रखनेवालोंके लिये, अविज्ञातम्=(वह ब्रह्मतत्त्व) विना जाना हुआ है, (और) अविजानताम्=जिनमे ज्ञातपनका अभिमान नहीं है, उनका, विज्ञातम्=(वह ब्रह्मतत्त्व) जाना हुआ है अर्थात् उनके लिये वह अपरोक्ष है ॥ ३॥ व्याख्या—जो महापुरुष परब्रह्म परमेश्वरका साक्षात् कर लेते हैं, उनमे किञ्चिन्मात्र भी ऐसा अभिमान नहीं रह जाता कि हमने परमेश्वरको जान लिया है। वे परमात्माके अनन्त असीम महिमा-महार्णवमे निमग्न हुए यही समझते हैं कि परमात्मा स्वय ही अपनेको जानते हैं। दूसरा कोई भी ऐसा नहीं है, जो उनका पार पा सके। भला, असीमकी सीमा ससीम कहाँ पा सकता है? अतएव जो यह मानता है कि मैंने ब्रह्मको जान लिया है, मे ज्ञानी हूँ, परमेश्वर मेरे ज्ञेय हैं, वह वस्तुत. सर्वथा भ्रममें है। क्योंकि ब्रह्म इस प्रकार ज्ञानका विषय नहीं है। जितने भी ज्ञानके साधन हैं, उनमेंसे एक भी ऐसा नहीं जो ब्रह्मतक पहुँच सके। अतएव इस प्रकारके जाननेवालोंके लिये परमात्मा सदा अज्ञात है, जबतक जाननेका अभिमान रहता है, तबतक परमेश्वरका साक्षात्कार नहीं होता। परमेश्वरका साक्षात्कार उन्हीं भाग्यवान् महापुरुषोको होता है, जिनमे जाननेका अभिमान किञ्चित् भी नहीं रह गया है ॥ ३॥ प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते। आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥ ४ ॥