कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 194, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें१७८ ॐ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॐ ब्रह्म=परब्रह्म परमेश्वरने, ह=ही, देवेभ्यः=देवताओंके लिये (उनको निमित्त बनाकर); विजिग्ये=(असुरोंपर) विजय प्राप्त की, ह=किन्तु; तस्य=उस, ब्रह्मणः=परब्रह्म पुरुषोत्तमकी, विजये=विजयमें; देवाः=इन्द्रादि देवताओंने, अमहीयन्त= अपनेमे महत्त्वका अभिमान कर लिया, ते=वे, इति=ऐसा; ऐक्षन्त=समझने लगे (कि), अयम्=यह; अस्माकम् एव= हमारी ही, विजयः=विजय है, (और) अयम्=यह, अस्माकम् एव=हमारी ही; महिमा=महिमा है ॥ १ ॥ व्याख्या-परब्रह्म पुरुषोत्तमने देवोंपर कृपा करके उन्हें शक्ति प्रदान की, जिससे उन्होंने असुरोंपर विजय प्राप्त कर ली। यह विजय वस्तुतः भगवान्की ही थी, देवता तो केवल निमित्तमात्र थे, परंतु इस ओर देवताओंका ध्यान नहीं गया और वे भगवान्की कृपाकी ओर लक्ष्य न करके भगवान्की महिमाको अपनी महिमा समझ बैठे और अभिमानवश यह मानने लगे कि हम बड़े भारी शक्तिशाली हैं एवं हमने अपने ही बल-पौरुषसे असुरोंको पराजित किया है ॥ १ ॥ तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानत किमिदं यक्षमिति ॥ २ ॥ ह तत्=प्रसिद्ध है कि उस परब्रह्मने, एषाम्=इन देवताओंके; (अभिमानको) विजज्ञौ=जान लिया (और कृपा पूर्वक उनका अभिमान नष्ट करनेके लिये वह); तेभ्यः=उनके सामने, ह=ही, प्रादुर्बभूव=साकाररूपमे प्रकट हो गयाः तत्=उसको (यक्षरूपमे प्रकट हुआ देखकर भी), इदम्=यह, यक्षम्=दिव्य यक्ष, किम् इति=कौन है, इस बातको, न व्यजानत=(देवताओंने) नहीं जाना ॥ २ ॥ व्याख्या-देवताओंके मिथ्याभिमानको करुणावरुणालय भगवान् समझ गये। भक्त-कल्याणकारी भगवान्ने सोचा कि यह अभिमान बना रहा तो इनका पतन हो जायगा। भक्त सुहृद् भगवान् भक्तोंका पतन कैसे सह सकते थे। अतः देवताओं- पर कृपा करके उनका दर्प चूर्ण करनेके लिये वे उनके सामने दिव्य साकार यक्षरूपमे प्रकट हो गये। देवता आश्चर्यचकित होकर उस अत्यन्त अद्भुत विशाल रूपको देखने और विचार करने लगे कि यह दिव्य यक्ष कौन है, पर वे उसको पहचान नहीं सके ॥ २ ॥ तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेद एतद्विजानीहि किमिदं यक्षमिति तथेति ॥ ३ ॥ ते=उन इन्द्रादि देवताओंने, अग्निम्=अग्निदेवसे, इति=इस प्रकार; अब्रुवन्=कहा, जातवेदः=हे जातवेदा; (आप जाकर) एतत्=इस बातको, विजानीहि=जानिये-इसका भलीभाँति पता लगाइये (कि), इदम् यक्षम्=यह दिव्य यक्ष, किम् इति=कौन है; (अग्निने कहा) तथा इति=बहुत अच्छा ॥ ३ ॥ व्याख्या-देवता उस अति विचित्र महाकाय दिव्य यक्षको देखकर मन ही-मन सहम से गये और उसका परिचय जाननेके लिये व्यग्र हो उठे। अग्निदेवता परम तेजस्वी है, वेदार्थके ज्ञाता हैं, समस्त जातपदार्थोंका पता रखते हैं और सर्वज्ञ से हैं। इसीसे उनका गौरवयुक्त नाम 'जातवेदा' है। देवताओंने इस कार्यके लिये अग्निको ही उपयुक्त समझा और उन्होंने कहा-'हे जातवेदा ! आप जाकर इस यक्षका पूरा पता लगाइये कि यह कौन है।' अग्निदेवताको अपनी बुद्धि-शक्तिका गर्व था। अतः उन्होंने कहा-'अच्छी बात है, अभी पता लगाता हूँ' ॥ ३ ॥ तदभ्यद्रवत् तमभ्यवदत् कोऽसीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्यब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति ॥ ४ ॥ तत्=उसके समीप; (अग्निदेव) अभ्यद्रवत्=दौडकर गया; तम्=उस अग्निदेवसे; अभ्यवदत्=(उस दिव्य यक्षने) पूछा, कः असि इति=(कि तुम) कौन हो, अब्रवीत्=(अग्निने) यह कहा (कि), अहम्=मैं; वै अग्निः=प्रसिद्ध अग्निदेव. अस्मि इति=हूँ, (और यह कि) अहम् वै=मै ही, जातवेदाः=जातवेदाके नामसे; अस्मि इति=प्रसिद्ध हूँ ॥ ४॥ व्याख्या-अग्निदेवताने सोचा, इसमें कौन बड़ी बात है; और इसलिये वे तुरत यक्षके समीप जा पहुँचे। उन्हे अपने समीप खड़ा देखकर यक्षने पूछा-आप कौन है? अग्निने सोचा-मेरे तेजःपुञ्ज स्वरूपको सभी पहचानते हैं, इसने कैसे नहीं जाना; अतः उन्होंने तमककर उत्तर दिया-'मैं प्रसिद्ध अग्नि हूँ, मेरा ही गौरवमय और रहस्यपूर्ण नाम जातवेदा है' ॥४॥ सम्बन्ध-तब यक्षरूपी ब्रह्मने अग्निसे पूछा- तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमिति । अपीदं सर्वं दहेयम्, यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ५ ॥